सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गजानन माधव मुक्तिबोध : Biography

हिन्दी भाषा के प्रमुख साहित्यकार  नमस्कार दोस्तों आज हम हिंदी साहित्य के सिलेबस के अनुसार बाहरी राज्यों में जन्म लेने वाले साहित्यकारों का अध्ययन करेंगे।‌ जो उत्तराखंड की परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं आज के लेख में गजानन माधव मुक्तिबोध के जीवन परिचय और उनकी प्रमुख सभी रचनाओं के बारे में विस्तार से जानेंगे । इससे पूर्व हम सुमित्रानंदन पंत, राहुल सांकृत्यायन, महादेवी वर्मा, शैलेश मटियानी और मंगलेश डबराल के बारे में विस्तार से पढ़ चुके हैं। जिनके लिंक लेख के अंत में नीचे दिए गए हैं। तो आईए जानते हैं गजानन मुक्तिबोध के बारे में विस्तार से - गजानन माधव मुक्तिबोध  हिंदी साहित्य में 'अंधेरे के कवि' और फेंटेसी के बेजोड़ शिल्पी के रूप में विख्यात गजानन माधव मुक्तिबोध का नाम आधुनिक हिंदी काव्य के इतिहास में सबसे अलग और चमकीला है । वे प्रगतिशील चेतना और प्रयोगवाद के एक ऐसे अनूठे सेतु थे, जिन्होंने कविता को आत्म संघर्ष, आत्मा खोज और व्यवस्था के खिलाफ एक तीव्र बौद्धिक हथियार बनाया।  जीवन परिचय  गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर, 1917 को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के 'श्...

कर्नाटक युद्ध (आधुनिक इतिहास)

 कर्नाटक  युद्ध (1748-1754)

 वर्ष - 2018  प्रश्नपत्र - 2 प्रश्न संख्या 2(c) (इतिहास)

क्या आप इस बात से सहमत हैं कि कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष ने दक्षिण भारत के प्रांतीय छत्रपों की आंतरिक अवनति को प्रदर्शित किया ? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए ।


Do you subscribe to the view  that the Anglo French tussle is Carnatic demonstrated the internal decay of the provincivle chieftains of South India.

यह कहा जा सकता है कि कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष ने दक्षिण भारत के प्रांतीय क्षत्रपों की  आंतरिक अवनति को  प्रदर्शित किया । क्योंकि भारतीय शासकों में राष्ट्रवादी भावना का अभाव था। लाभ कि संकुचित भावना से प्रेरित थे। सत्ता की लालच के लिए विदेशियों की सहायता मांगने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती थी। इसी का फायदा अंग्रेजों और फ्रांसीसीयों ने कर्नाटक और हैदराबाद के प्रांतीय शासकों से उठाया । वह भी तब जब अंग्रेजों और फ्रांसीसीयों  का युद्ध चल रहा था।

कर्नाटक की पृष्ठभूमि

कर्नाटक कोरोमंडल तट से जुड़ा ऐसा क्षेत्र था जिस पर हैदराबाद के निजाम उल मुल्क आसफजाह और मराठों की नजर नियंत्रण करने पर थी। जबकि मुगल शासक कर्नाटक को पहले ही जीत चुके थे। जिसका सूबेदार सहादत खां  को नियुक्त किया था। सहादत खां ने दोस्त अली को जब उत्तराधिकारी घोषित किया परिस्थिति बिगड़ गई । मराठों ने कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया और दोस्त अली को मार दिया।  सहादत खां ने खुद को सरेंडर कर दिया । वहीं उसके दामाद चंदा साहब को बंदी बना लिया। इस स्थिति का फायदा  ने आसफजाह उठाया और खाली गद्दी देखकर वहां का शासक अनावरुद्दीन  को बना दिया। इसी बीच फ्रांसीसी और अंग्रेजों की लड़ाई चल रही थी। अंग्रेजों ने कूटनीति चाल चली । अनावरुद्दीन और फ्रांसीसी  के बीच युद्ध करा दिया।

आंग्ल-फ्रांसीसी युद्ध

इस युद्ध के मुख्य कारण 1740 में ऑस्ट्रिया उत्तराधिकार युद्ध तथा अमेरिकी उपनिवेश  था जिसके कारण 1740 से 1748 तक प्रथम युद्ध यूरोप में शुरू हुआ। यूरोप से हाईकमान मिलने पर भारत में भी होने लगा । पहला युद्ध लो-सिपला संधि (1748) से समाप्त हो गया । डूप्ले मद्रास पर कब्जा कर लिया था वह अंग्रेजों को वापस कर दिया। 1 साल बाद 1749 से 1754 तक दूसरा युद्ध शुरू हुआ । 1748 में हैदराबाद के निजामउल मुल्क आसफजाह   की मृत्यु के बाद उसके पुत्र और मुजफ्फर जंग में गृहयुद्ध छिड़ गया । वहीं दूसरी तरफ चंदा साहब मराठों की कैद से छूट गया। और कर्नाटक के नवाब को हटाने का षड्यंत्र रचने लगा यहीं से फ्रांसीसी अफसर डुप्ले ने कूटनीति अपनाई और दोनों विरोधियों की मदद से एक सेना बनाई और अनवरूद्दीन पर धावा बोल दिया । इस युद्ध में अनवरूद्दीन मारा गया और चंदा साहब को कर्नाटक का नवाब बनाया गया । चंदा साहब ने कर्नाटक में आर्कट को नयी राजधानी बनााई । नवाब बनने की खुशी में डूप्ले को पांडिचेरी में 80 गांव दान में दे दिए। वहीं दूसरी तरफ नासिर जंग मारा गया। और मुजफ्फर जंग हैदराबाद का शासक बनाा। नए निजाम ने भी फ्रंसीसियों को पांडिचेरी के निकट जमीन दी और पुरस्कार दिए साथ ही पांच लाख कंपनी को 1 लाख सेना को दिए । डूप्ले को 20 लाख रूपयों के साथ जागीर दी। लेकिन एक दुर्घटना में मुजफ्फर जंग मारा गया । तब बुस्सी ने तुरंत सलावत जंग को गद्दी पर बैठा दिया। बदले में नए निजाम ने फ्रंसीसियों को आंध्र के 4 जिले मुस्ताफनगर, एलोर , राजमुंद्री और चिकाकोल दे दिया। इससे फ्रांसीसी अत्यधिक शक्तिशाली हो गए। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजों ने मोहम्मद अली और नासिर जंग से मिलकर षड्यंत्र रचा। 1757 की प्लासी की जंग के बाद अंग्रेज बड़ी शक्ति बन चुके थे।  वांडीवाश की लड़ाई ( 1760) में फ्रांसीसियों की  एक बड़ी हार हुई । इस लड़ाई के बाद  फ्रांसीसीयों के हाथों से सब कुछ चला गया। और युद्ध का अंत 1763 में पेरिस समझौते से हुआ। 

निष्कर्ष

उपयुक्त विवेचना से स्पष्ट हो रहा है कि अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने आपसी लड़ाई के कारण अपनी शक्तियों का विस्तार किया। सबसे पहले प्रांतीय शासकों की कमजोरियों का पता लगाया। और प्रांतीय शासकों का प्रयोग करके अपने व्यापार और राज्य का विस्तार किया । जहां कर्नाटक और हैदराबाद के शासकों ने फ्रांसीसी और अंग्रेजों पर लाखों रुपए लुटाए । जमीनी दी, जागीरे दी । एक तरह से प्रांतीय शासकों ने ही विदेशियों के साम्राज्य का विस्तार किया है। यदि सारा धन प्रांतों के निर्माण में लगाते तो विदेशी शक्तियां व्यापार तक सीमित रहती। लेकिन सत्ता के लालच में प्रांतीय शासकों ने दक्षिण भारत को कमजोर कर दिया । यहीं से ईस्ट इंडिया कंपनी को आत्मबल और आत्मविश्वास मिला ।जिससे वह इतने लंबे काल तक भारत पर शासन कर पाया।

उपयुक्त प्रश्न -2018 में प्रश्नपत्र - 2 प्रश्न संख्या 2(c) के इतिहास विषय से पूछा गया है। यह एक जटिल प्रश्न है जो आसानी से समझ नहीं आ सकता है । लेकिन मैंने फिर भी अपने शब्दों में उत्तर लिखने की कोशिश की है । अतः शिक्षाविदों से अनुरोध है कि मेरे उत्तर का मूल्यांकन करें और सुझाव दें।

धन्यवाद।

स्रोत : इतिहास की एनसीईआरटी बुक

इन्हें भी जाने।







टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

If you have any doubts.
Please let me now.

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड में भूमि बंदोबस्त का इतिहास

  भूमि बंदोबस्त व्यवस्था         उत्तराखंड का इतिहास भूमि बंदोबस्त आवश्यकता क्यों ? जब देश में उद्योगों का विकास नहीं हुआ था तो समस्त अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। उस समय राजा को सर्वाधिक कर की प्राप्ति कृषि से होती थी। अतः भू राजस्व आय प्राप्त करने के लिए भूमि बंदोबस्त व्यवस्था लागू की जाती थी । दरअसल जब भी कोई राजवंश का अंत होता है तब एक नया राजवंश नयी बंदोबस्ती लाता है।  हालांकि ब्रिटिश शासन से पहले सभी शासकों ने मनुस्मृति में उल्लेखित भूमि बंदोबस्त व्यवस्था का प्रयोग किया था । ब्रिटिश काल के प्रारंभिक समय में पहला भूमि बंदोबस्त 1815 में लाया गया। तब से लेकर अब तक कुल 12 भूमि बंदोबस्त उत्तराखंड में हो चुके हैं। हालांकि गोरखाओ द्वारा सन 1812 में भी भूमि बंदोबस्त का कार्य किया गया था। लेकिन गोरखाओं द्वारा लागू बन्दोबस्त को अंग्रेजों ने स्वीकार नहीं किया। ब्रिटिश काल में भूमि को कुमाऊं में थात कहा जाता था। और कृषक को थातवान कहा जाता था। जहां पूरे भारत में स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी बंदोबस्त और महालवाड़ी बंदोबस्त व्यवस्था लागू थी। वही ब्रिटिश अधिकारियों ...

परमार वंश - उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

उत्तराखंड का इतिहास History of Uttarakhand भाग -1 परमार वंश का इतिहास उत्तराखंड में सर्वाधिक विवादित और मतभेद पूर्ण रहा है। जो परमार वंश के इतिहास को कठिन बनाता है परंतु विभिन्न इतिहासकारों की पुस्तकों का गहन विश्लेषण करके तथा पुस्तक उत्तराखंड का राजनैतिक इतिहास (अजय रावत) को मुख्य आधार मानकर परमार वंश के संपूर्ण नोट्स प्रस्तुत लेख में तैयार किए गए हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में 688 ईसवी से 1947 ईसवी तक शासकों ने शासन किया है (बैकेट के अनुसार)।  गढ़वाल में परमार वंश का शासन सबसे अधिक रहा।   जिसमें लगभग 12 शासकों का अध्ययन विस्तारपूर्वक दो भागों में विभाजित करके करेंगे और अंत में लेख से संबंधित प्रश्नों का भी अध्ययन करेंगे। परमार वंश (गढ़वाल मंडल) (भाग -1) छठी सदी में हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात संपूर्ण उत्तर भारत में भारी उथल-पुथल हुई । देश में कहीं भी कोई बड़ी महाशक्ति नहीं बची थी । जो सभी प्रांतों पर नियंत्रण स्थापित कर सके। बड़े-बड़े जनपदों के साथ छोटे-छोटे प्रांत भी स्वतंत्रता की घोषणा करने लगे। कन्नौज से सुदूर उत्तर में स्थित उत्तराखंड की पहाड़ियों में भी कुछ ऐसा ही...

कुणिंद वंश का इतिहास (1500 ईसा पूर्व - 300 ईसवी)

कुणिंद वंश का इतिहास   History of Kunid dynasty   (1500 ईसा पूर्व - 300 ईसवी)  उत्तराखंड का इतिहास उत्तराखंड मूलतः एक घने जंगल और ऊंची ऊंची चोटी वाले पहाड़ों का क्षेत्र था। इसका अधिकांश भाग बिहड़, विरान, जंगलों से भरा हुआ था। इसीलिए यहां किसी स्थाई राज्य के स्थापित होने की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है। थोड़े बहुत सिक्कों, अभिलेखों व साहित्यक स्रोत के आधार पर इसके प्राचीन इतिहास के सूत्रों को जोड़ा गया है । अर्थात कुणिंद वंश के इतिहास में क्रमबद्धता का अभाव है।               सूत्रों के मुताबिक कुणिंद राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला प्रथम प्राचीन राजवंश है । जिसका प्रारंभिक समय ॠग्वैदिक काल से माना जाता है। रामायण के किस्किंधा कांड में कुणिंदों की जानकारी मिलती है और विष्णु पुराण में कुणिंद को कुणिंद पल्यकस्य कहा गया है। कुणिंद राजवंश के साक्ष्य के रूप में अभी तक 5 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। जिसमें से एक मथुरा और 4 भरहूत से प्राप्त हुए हैं। वर्तमान समय में मथुरा उत्तर प्रदेश में स्थित है। जबकि भरहूत मध्यप्रदेश में है। कुणिंद वंश का ...

Uttarakhand Current Affairs 2025

उत्तराखंड करेंट अफेयर्स 2025 नवंबर 2025 से अप्रैल 2025 तक जैसा कि आप सभी जानते हैं देवभूमि उत्तराखंड प्रत्येक मा उत्तराखंड के विशेष करंट अफेयर्स उपलब्ध कराता है। किंतु पिछले 6 माह में व्यक्तिगत कारणों के कारण करेंट अफेयर्स उपलब्ध कराने में असमर्थ रहा। अतः उत्तराखंड की सभी आगामी परीक्षाओं को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि नवंबर 2024 से अप्रैल 2025 तक के सभी करेंट अफेयर्स चार भागों में विभाजित करके अप्रैल के अन्त तक उपलब्ध कराए जाएंगे। जिसमें उत्तराखंड बजट 2025-26 और भारत का बजट 2025-26 शामिल होगा। अतः सभी करेंट अफेयर्स प्राप्त करने के लिए टेलीग्राम चैनल से अवश्य जुड़े। 956816280 पर संपर्क करें। उत्तराखंड करेंट अफेयर्स (भाग - 01) (1) 38वें राष्ट्रीय खेलों का आयोजन कहां किया गया ? (a) उत्तर प्रदेश  (b) हरियाणा (c) झारखंड  (d) उत्तराखंड व्याख्या :- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 जनवरी 2025 को राजीव गाँधी अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम रायपुर देहरादून, उत्तराखंड में 38वें ग्रीष्मकालीन राष्ट्रीय खेलों का उद्घाटन किया। उत्तराखंड पहली बार ग्रीष्मकालीन राष्ट्रीय खेलों की मेजबानी की और य...

उत्तराखंड का इतिहास : चंद राजवंश (भाग-2)

  उत्तराखंड का इतिहास चंद राजवंश का इतिहास (भाग-२) विस्तार से चंद राजा कन्नौज के शासकों के वंशज थे । जो महमूद गजनवी के आक्रमण के समय कुर्मांचल में प्रविष्ट हुए थे। उस समय कुर्मांचल में ब्रह्मदेव का शासन था। ब्रह्मदेव कत्यूर वंश का अंतिम सम्राट था। 10 वीं शताब्दी में लोहाघाट के आसपास सुई राज्य था। सुई राज्य पर ब्रह्मदेव शासन कर रहा था। *इतिहासकार श्यामलाल, एटकिंसन, वाल्टन व बद्रीदत्त पांडे के अनुसार चंद शासक इलाहाबाद के निकट झूंसी से आया था। चंद राजवंश का उदय चंद वंश के संस्थापक - (1) सोमचंद (1025-1046 ईसवी) 1025 ईस्वी के आसपास सोमचंद ने चंपावत में अपनी राजधानी स्थापित की। इतिहासकार श्यामलाल के अनुसार सोमचंद इलाहाबाद के निकट झूंसी से आया था। कुमाऊं में सोमचंद के आने की अनेक कहानियां है । परीक्षाओं की दृष्टि से यह मान सकते हैं कि सोमचंद 11 वीं सदी के आरंभ में बद्रीनाथ की यात्रा पर आया था। संयोगवश उसकी मुलाकात कत्यूरी नरेश ब्रह्मदेव से हो जाती है। ब्रह्मदेव सोमचंद की राजोचित, योग्यता, रूप-रंग व व्यक्तित्व को देखकर अत्यधिक प्रभावित हो जाता है। और अपनी एकलौती पुत्री चंपा का विवाह सोमचंद...

ब्रिटिश कुमाऊं कमिश्नर : उत्तराखंड

ब्रिटिश कुमाऊं कमिश्नर उत्तराखंड 1815 में गोरखों को पराजित करने के पश्चात उत्तराखंड में ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से ब्रिटिश शासन प्रारंभ हुआ। उत्तराखंड में अंग्रेजों की विजय के बाद कुमाऊं पर ब्रिटिश सरकार का शासन स्थापित हो गया और गढ़वाल मंडल को दो भागों में विभाजित किया गया। ब्रिटिश गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल। अंग्रेजों ने अलकनंदा नदी का पश्चिमी भू-भाग पर परमार वंश के 55वें शासक सुदर्शन शाह को दे दिया। जहां सुदर्शन शाह ने टिहरी को नई राजधानी बनाकर टिहरी वंश की स्थापना की । वहीं दूसरी तरफ अलकनंदा नदी के पूर्वी भू-भाग पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। जिसे अंग्रेजों ने ब्रिटिश गढ़वाल नाम दिया। उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन - 1815 ब्रिटिश सरकार कुमाऊं के भू-राजनीतिक महत्व को देखते हुए 1815 में कुमाऊं पर गैर-विनियमित क्षेत्र के रूप में शासन स्थापित किया अर्थात इस क्षेत्र में बंगाल प्रेसिडेंसी के अधिनियम पूर्ण रुप से लागू नहीं किए गए। कुछ को आंशिक रूप से प्रभावी किया गया तथा लेकिन अधिकांश नियम स्थानीय अधिकारियों को अपनी सुविधानुसार प्रभावी करने की अनुमति दी गई। गैर-विनियमित प्रांतों के जिला प्रमु...

भारत की जनगणना 2011 से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न (भाग -01)

भारत की जनगणना 2011 मित्रों वर्तमान परीक्षाओं को पास करने के लिए रखने से बात नहीं बनेगी अब चाहे वह इतिहास भूगोल हो या हमारे भारत की जनगणना हो अगर हम रटते हैं तो बहुत सारे तथ्यों को रटना पड़ेगा जिनको याद रखना संभव नहीं है कोशिश कीजिए समझ लीजिए और एक दूसरे से रिलेट कीजिए। आज हम 2011 की जनगणना के सभी तथ्यों को समझाने की कोशिश करेंगे। यहां प्रत्येक बिन्दु का भौगोलिक कारण उल्लेख करना संभव नहीं है। इसलिए जब आप भारत की जनगणना के नोट्स तैयार करें तो भौगोलिक कारणों पर विचार अवश्य करें जैसे अगर किसी की जनसंख्या अधिक है तो क्यों है ?, अगर किसी की साक्षरता दर अधिक है तो क्यों है? अगर आप इस तरह करेंगे तो शत-प्रतिशत है कि आप लंबे समय तक इन चीजों को याद रख पाएंगे साथ ही उनसे संबंधित अन्य तथ्य को भी आपको याद रख सकेंगे ।  भारत की जनगणना (भाग -01) वर्ष 2011 में भारत की 15वीं जनगणना की गई थी। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का कुल क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किलोमीटर था तथा भारत की कुल आबादी 121,08,54,922 (121 करोड़) थी। जिसमें पुरुषों की जनसंख्या 62.32 करोड़ एवं महिलाओं की 51.47 करोड़ थी। जनसंख्या की दृष...