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अगस्त, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि) हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है. भाषा का विकास  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.) 2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.) 3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ ) 4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ) 5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.) 6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में) *1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है वर्णमाला वर्ण क्या है?  उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है। वर्णमाला वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। हिंदी लिपि के चिन्ह अ आ इ ई उ ऊ ऋ  ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ

वित्तीय बाजार और भारतीय रिजर्व बैंक

वित्तीय बाजार क्या है?  What is financial Market? वैसे तो यह सब सामान्य बातें हैं । जिनका दैनिक जीवन में प्रयोग होता है । प्रत्येक माह आप एक या दो बार बैंक तो जरूर जाते हैं लेकिन क्या आपने सोचा है? बैंक कैसे काम करते हैं?  और बैंक को कौन संचालित करता है?  जब अर्थशास्त्र के अंदर यह सब पढ़ते हैं। तो परीक्षार्थी परेशान हो जाते हैं, इसलिए आसान शब्दों में बात करें। तो जहां पैसों की खरीद-बिक्री होती है। वह वित्तीय बाजार कहलाता है । पैसों की खरीद बिक्री  ऑनलाइन भी हो सकती है,  ऑफलाइन भी हो सकती है और कॉल पर भी हो सकती है । लेकिन पैसा कुछ ही देशों में ही मान्य है । जहां डॉलर अधिकांश देशों में प्रचलित है इसलिए वित्तीय बाजार में पैसों के स्थान पर मुद्रा का प्रयोग करते हैं।                          जैसे-जैसे समय बीता पैसों की खरीद-बिक्री का कार्य चलने लगा  । तो एक नई समस्या उत्पन्न हुई- समय की। कोई व्यक्ति तुरंत पैसा दे देता थाा। तो कोई उधार चुकाने में लंबा समय लगा देता था  । पैसे तो आप भी उधार देते होंगे लेकिन जब बहुत बड़ी रकम देने की बात आती है। तब सोच समझकर पैसे दिए जाते हैं। वर्तमान समय में 

निजीकरण का महत्व

  निजीकरण  का महत्व वर्तमान सरकार द्वारा सरकारी कंपनियों को बेचने का अर्थात निजी करण का क्या उद्देश्य है?  वर्तमान में सर्वाधिक चर्चित मुद्दा है । "निजीकरण" बहुत सारे युवा काफी परेशान है। सरकार के इस फैसले की वजह से लंबे समय से बनाई अच्छी छवि धूमिल की होती नजर आ रही है ।भारतीय युवाओं द्वारा जगह-जगह विरोध किया जा रहा है। धरना-प्रदर्शन, हड़ताल और आंदोलन होने की भी संभावना हो सकती है । सोशल मीडिया पर भी यूजर्स कड़ी आलोचना कर रहे हैं तो वहीं बहुत सारे सपोर्ट भी कर रहे है। निजीकरण क्या है?   वैसे तो निजीकरण के बारे में सभी लोग जानते हैं। लेकिन साधारण शब्दों में इतना समझ लीजिए। आजादी के समय में बहुत सारी कंपनी सरकार के हाथों में थी । अर्थात सरकार का स्वामित्व था। सरकार की कंपनी होने से सरकारी कर्मचारियों की भर्ती समय-समय पर की जाती थी ।  लाखों युवा इन कंपनियों में भर्ती होकर रोजगार पाते थे । 1991 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव  और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के द्वारा LPG (उदारीकरण,  निजीकरण और वैश्वीकरण) की नीति लाई गई ।जिसमें बहुत सारी कंपनियों का निजीकरण प्रारंभ हुआ। उसके बाद निजीक

कोरोना के चलते: शिक्षा बेहाल

कोरोना के चलते : शिक्षा  बेहाल विश्वविद्यालयों की उलझन जब देश के पास कश्मीर का,  धर्म का,  नेपाल का और पाकिस्तान का कोई मुद्दा नहीं बचा। तो देश के नेता उलझ गए हैं कोरोना  में । सब अपनी अपनी राय दे रहे हैं। सभी को मालूम है आज तक सर्दी जुखाम की कोई दवाई नहीं बनी है। बीमारी से बचना है तो एक ही उपाय है। इम्यून सिस्टम को मजबूत करो जिसका रहस्य भारत देश में शुरुआत मे ही जान लिया था। बाबा रामदेव ने कोरोना  का समाप्त करने के लिए व इम्यून सिस्टम मजबूत करने के लिए आयुर्वेद से निर्मित दवा तैयार कर ली थी। लेकिन हमें तो आदत है- ना विदेशी दवाइयों का उपयोग करने की । अब हम इम्यून सिस्टम को बढ़ाने के लिए फिर से अमेरिका,  फ्रांस और चीन से वैक्सीन  खरीदेंगे । चीन ने तो वैक्सीन बनाकर पेटेंट का अधिकार भी ले लिया है । और हमारा देश यही सोच में डूबा है कि विश्वविद्यालय की परीक्षा कराई जाए या नहीं। विभिन्न प्रकार के सरकारी विभागों पर भर्ती कराई जाए या नहीं । वही स्कूल खोलें या बंद रखें। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि कोरोना   के कारण विद्यार्थियों के भविष्य के साथ नहीं खेल सकते हैं।  तो वही बच्चों के 64% अभिभा

पैसे छापने वाली मशीन

           मुद्रा पूर्ति                    Money supply महंगाई और पैसो में संबंध!  पैसे छापने वाली मशीन भारत में मुद्रा आपूर्ति के दो माध्यम हैं। (1) भारत सरकार व रिजर्व बैंक (C+R) (2) जनता के पास व बैंक जमाएं(M1+M2+M3+M4)                अगर आप देश की गरीबी के बारे में सोचते हैं या फिर आप अमीर बनने के बारे में सोचते हैं । एक बात जहन में जरूर आती होगी कि जब भारत के पास पैसा छापने वाली मशीन है। तो अधिक पैसा छाप कर सभी समस्याएं खत्म क्यों नहीं कर देता है?  विदेशों से लिया गया कर्ज क्यों नहीं चुका  देता है? आइए ऐसे ही सवालों की पूर्ण जानकारी आसान शब्दों में जाने।                  अगर आप सोचते हैं कि पैसा छापने से गरीबी कम होगी । तो बिल्कुल गलत सोचते हो । अगर पैसे छाप कर सरकार मुफ्त में पैसे बांटने लग जाए तो लोग मेहनत करना छोड़ देंगे । जब मेहनत कम होगी तो उत्पादन में गिरावट आएगी और फिर वस्तुएं महंगी होंगी । इस तरह वस्तुएं और सेवाएं इतनी अधिक महंगी हो जाएंगी कि 2 किलो आलू खरीदने के लिए भी आपको  हजारों रुपए देने पड़ सकते हैं। वैसे तो यह एक अर्थशास्त्र का विषय है और अर्थशास्त्र के विद्यार्थी

पंचायती राज व्यवस्था

  पंचायती राज व्यवस्था                  पंचायत दिवस  24 अप्रैल 1992 को संविधान में 73वां संशोधन संशोधन हुआ जिसके तहत देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई । जिसके बाद प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल 1993 से पंचायती राज  दिवस मनाने की शुरुआत हुई। प्रस्तुत लेख प्रतियोगी परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक सदाबहार टॉपिक है । चाहे UPSC हो या राज्य सरकार का कोई भी एग्जाम जैसे- ukpcs, uppcs, mppcs और bppcs  यहां से प्रत्येक वर्ष प्रश्न पूछे जाते हैं अतः दिए गए आर्टिकल को ध्यानपूर्वक पढ़ें। पंचायती राज व्यवस्था क्या है?  जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को लागू करने को ही पंचायती राज व्यवस्था कहते हैं। अर्थात ग्रामीण क्षेत्रों से ही एक समझदार और विचारशील व्यक्ति को नेता (सभापति) चुना जाता है । जिसका कार्य होता है कि सरकार के द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का कार्यान्वयन करें। और इसके अतिरिक्त गांव की समस्या का चयन करके विकास के लिए सुझाव दें। यदि हम किताबी भाषा की बात करें तो लोकतांत्रिक सरकार का विकेंद्रीकरण ही पंचायती राज व्यवस्था कहलाता है । अर्थात लोकतंत्र सरकार की शक्तियों का विभाजन

ग्रामीण विकास

 ग्राम प्रधान की भूमिका गांव का विकास कैसे हो?  जब-जब गांव के विकास का प्रश्न उठता है?  तो ग्राम प्रधान (सभापति)  की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि आप सूझ बूझ  के साथ ग्राम प्रधान का सही चुनाव करते हैं । तो निश्चय ही आप के गांव का विकास होगा। और यदि आपने चंद पैसों के खातिर ग्राम प्रधान को गलत चुन लिया है । तो गलती सरकार या  प्रधान की नहीं होगी बल्कि आपकी होगी।                  सामान्यतः  यदि आप लंबे समय से गांव में रहते हैं तो आपके अंदर इतनी समझ तो आ ही गई होगी। कि चुनाव के लिए उठे प्रत्याशी को पहचान सके। और नहीं जानते हो तो पहले यह सुनिश्चित करें। कि ग्राम प्रधान शिक्षित अर्थात काबिल होना चाहिए । और यदि  वह शिक्षित नहीं है  तो ऐसे व्यक्ति का चुनाव करें तो जुझारू और कर्तव्य के प्रति कर्मठ हो । अर्थात साधारण शब्दों में कह तो गांव की समस्याओं की पूर्ण जानकारी रखता हो।                  ज्ञात है कि ग्रामसभा की बैठक वर्ष में दो बार होना अति आवश्यक है। अब जरा सोचिए यदि आप एक अशिक्षित या किसी ऐसे व्यक्ति को ग्राम प्रधान बना देते हैं जिसे गांव की मूलभूत आवश्यकता नहीं पता है । तो वह कैसे गां

पत्थर का टुकड़ा ( by sunil.)

  पत्थर का टुकड़ा    मैं पत्थर का वो शिला हूं।    जो विराजमान हूं मंदिर में । बरसो लगे हैं मुझको,  यहां तक पहुंचने में,     कभी ना रुका में,     कभी ना थका में,  एक निरंतर पथ पर,  स्थिर गति से बड़ा हूं मैं । मैं पत्थर का वो  शिला हूं,  जो बैठा था भूधर में । तूफान कुछ ऐसा आया,  जा गिरा बवंडर में।  धारा का हाथ पकड़कर,  आ गया तटनी शरण में । बिन सोचे बह चला में,   एक ऐसे अनजान सफर में । मैं पत्थर का वो शिला हूं । जो घिस-घिस कर,  हीरा बना हूं।  पूजते हैं लोग मुझ को,  तराशा है शिलाकारों ने,   अभिनंदन है उस पर्वत का,   अभिनंदन है उस नदिया का,   धारा को में शीश झुकाऊं,   तब मैं पत्थर,वह शिला कहलाऊंं। By : sunil प्रेरणा प्रस्तुत पंक्तियां एक कहानी से प्रेरित है आपने बचपन में अक्सर यह कहानी जरूर सुनी होगी । कि एक बड़ा सा पत्थर पर्वत के शिखर पर होता है एक दिन अचानक तेज तूफान आता है और पत्थर के दो टुकड़े एक नदी के बवंडर में जा गिरते हैं । नदी से जब बाहर आते हैं तो एक पत्थर वहीं रुक जाता है। उसका कहना होता है कि सब किस्मत का खेल है। "आज राजा तो कल रंक" और वह इसी उम्मीद के सहारे आगे नहीं ब

कृषि विकास मॉडल : किसानोंं के विकास की ओर

     कृषि विकास मॉडल 2.5 लाख एकड़ से अधिक खाली भूमि सरकार के पास है, । तो सवाल यह है उसका प्रयोग कृषि के लिए क्यों नहीं होता है ? या क्या हम कृषि भूमि में उद्योग शुरू कर सकते हैं? आइए जानते हैं सभी सवालों के उत्तर विस्तारपूर्वक । यूपीएससी और यूपीपसीएस वाले छात्रों के लिए महत्वपूर्ण लेख।                    मैं अक्सर सफर के दौरान  रास्ते के किनारे बड़े-बड़े प्लॉट खाली देखता हूं। वहीं जब किसी सरकारी विभाग में दस्तक देता हूं तो एक बड़ा भूखंड खाली दिखाई देता है। और हैरानी तब होती है जब रेलवे विभाग के पास अधिकांश क्षेत्र सदियों-सदियों तक खाली पड़े हैं यह सुनने में आता है।  जाहिर है जब मैं इतना सोचता हूं तो आप भी बहुत सारे लोग कुछ ऐसा सोचते होंगें।  काश!  यह खाली प्लाट मुझे मिल जाए ।                     हालांकि सरकार ने किसान के विकास के लिए अनेक कदम उठाए हैं। लेकिन जमीनी स्तर तक उतना लाभ नहीं मिला है ।और सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा परेशान है। सरकार की रणनीति तो है 2022 तक सभी किसानों की आय दुगनी करना । वर्तमान सरकार ने सारे प्रयास कर लिए हैं । 2020 आ चुका

वृद्धा आश्रम व्यवस्था

सामाजिक विकास  वृद्धा आश्रम व्यवस्था : पक्ष विपक्ष               आप घर में एक पार्टी कर रहे हो । सभी दोस्त और रिश्तेदार एंजॉय कर रहें हो । इतने में एक बूढा व्यक्ति आए और गाली देना शुरू कर दे या घर से भगाने लगे । हो सकता है लाठी भी मारे  तो आप क्या करेंगे?   तनाव का मुख्य कारण                 यह लेख है उन बूढ़े माता-पिता के बच्चों के लिए जो अपने बूढ़े मां बाप को वृद्धाश्रम आश्रम छोड़ देते हैं,  और बाहरी दुनिया उनको जलील करती है और केवल उन्हीं को गलत बताती है । सबसे ज्यादा आलोचना उनके रिश्तेदार करते हैं। कभी-कभी यही वजह तनाव का कारण भी बनती है और अच्छे-अच्छे रिश्तो में दरार आ जाती है फिर सारा इल्जाम घर की बहू पर आ जाता है। बात दरअसल यह है कि वृद्ध आश्रम व्यवस्था जो समाज मैं बहुत पहले से चलती आ रही है । वह आज के समय में कितनी सही है या गलत? आज इस बात पर विस्तार पूर्वक बात करेंगे ।बहुत सारे संस्कारी परिवार इस व्यवस्था को गलत मानते हैं ।क्योंकि उनको संस्कार में यही सिखाया जाता है कि हमारे बड़े बूढ़े बुजुर्ग सही हो या गलत कोई भी उनसे बहस नहीं करेगा। ज्यादा बोल दो तो कह देते हैं "वह ज्या

अल्मोड़ा का इतिहास

           अल्मोड़ा          उत्तराखंड का इतिहास प्राकृतिक सौंदर्य का एक और सुंदर शहर जो उत्तराखंड में अपनी एक विशेष पहचान बनाए हुए हैं "अल्मोड़ा" अल्मोड़ा जनपद व्यापार की दृष्टि से महत्वपूर्ण शहर है साथ ही साथ सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र रहा है। कुमाऊं मंडल की असली छाप अल्मोड़ा जिले में ही स्थित है। इसका एक विस्तृत इतिहास है। यह पर्यटक स्थलों का मुख्य केंद्र है । रानीखेत, द्वाराहाट, कसार देवी मंदिर,  दूनागिरी मंदिर, जागेश्वर मंदिर,  नंदा देवी मंदिर और चितई गोलू देवता जैसे -प्रसिद्ध मंदिर अल्मोड़ा में ही स्थित है। अल्मोड़ा का इतिहास अल्मोड़ा में लम्बे समय तक चंद शासकों ने शासन किया था। इसकी जानकारी चंद शासक 'त्रिमल चंद' और 'बाज बहादुर चंद' के अभिलेखों से मिलता है। मानसखंड में अल्मोड़ा जिले को ' रामशिला ' क्षेत्र कहा गया है। अल्मोड़ा का प्राचीन नाम " आलमनगर " है। इसकी भौगोलिक विशेषता घोड़े के खुर के सामान की है। अल्मोड़ा को 'राजाओं की घाटी' भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार अल्मोड़ा में कौशिका द