सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि) हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है. भाषा का विकास  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.) 2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.) 3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ ) 4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ) 5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.) 6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में) *1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है वर्णमाला वर्ण क्या है?  उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है। वर्णमाला वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। हिंदी लिपि के चिन्ह अ आ इ ई उ ऊ ऋ  ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ

देहरादून का इतिहास - देवभूमि उत्तराखंड

 देहरादून का इतिहास

मेरे प्रिय पाठक आपका प्रेम पूर्वक नमस्कार हमारे इस नए लेख में | इस लेख में देहरादून के इतिहास की संपूर्ण जानकारी देंगे अतः आपसे अनुरोध है कि हमारे इस लेख को अंत तक पढ़ें |

History of Dehradun

आर्थिक एवं पर्यटक स्थलों की दृष्टि से देवभूमि उत्तराखंड का एक और प्रमुख शहर - देहरादून। जहां पहाड़ों की रानी कही जाने वाली मसूरी,  देवों की पवित्र भूमि - ऋषिकेश, लाखामंडल , चकराता जैसी पहाड़ियां देहरादून को सुंदर और आकर्षित बनाती है। देहरादून दुनिया में विश्व प्रसिद्ध है। फिल्म जगत की दुनिया में भी एक विशेष पहचान बनाए हुए अनेकों बॉलीवुड फिल्मों का स्थल है।

जैसा कि आप सभी जानते हैं उत्तराखंड की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए उत्तराखंड के इतिहास का अध्ययन करने से पूर्व उत्तराखंड के प्रमुख शहरों के बारे में अध्ययन करना अति आवश्यक है। यदि आप उत्तराखंड के इतिहास का गहराई से अध्ययन करना चाहते हैं तो 25 प्रमुख शहरों की सीरीज को जरूर पढ़ें।  देहरादून पर्यटक स्थल की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण जनपद  है।  देहरादून जनपद का प्रमुख शहर है - देहरादून शहर  और इसके अन्य प्रमुख शहरों का अध्ययन करेंगे जैसे मसूरी, ऋषिकेश, चकराता लाखामंडल। 

बीते कुछ दशकों से देहरादून ने तेजी से विकास कर शिक्षा, संस्कृति, कृषि क्षेत्र में अग्रणी बनकर उभरा है। वर्तमान समय में देहरादून को उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी का दर्जा प्राप्त है। देहरादून उत्तर में हिमालय से तथा दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों से घिरा हुआ है। तथा पूर्व में गंगा नदी और पश्चिम में यमुना नदी प्राकृतिक सीमा बनाती है। इस तरह प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह नगर स्वयं अपनी एक अलग पहचान प्रदर्शित करता है। अतः  यह जरूरी है कि देहरादून के इतिहास के साथ भौगोलिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक स्थिति का विस्तारपूर्वक अध्ययन करें।

देहरादून का इतिहास

देहरादून दो शब्दों से मिलकर बना है - देहरा और दून। किंवदंतियों के अनुसार देहरा शब्द का उद्भव डेरा शब्द से हुआ है। दरअसल 1675 में सिखों के सातवें गुरु हरि राय के पुत्र रामराय ने विश्राम के लिए अपने साथियों के साथ यहां डेरा लगाया। (इस समय गढ़वाल का शासक फतेह शाह था) । इसी डेरा को बाद में देहरा कहा जाने लगा। लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि देहरा शब्द का अर्थ देवगृह या देवालय से निकला  है। वहीं दूसरा शब्द  दून (दूण) शब्द का अर्थ है - दो पहाड़ों के बीच की घाटी है। यदि बात करें देहरादून के इतिहास की तो देहरादून हिमालय पर्वत श्रेणी का एक भाग और हिमालय देवी देवताओं का मुख्य पवित्र स्थल है इसीलिए इसका इतिहास कुछ सौ बरसों पुराना न होकर लाखों वर्षों  पुराना है जिसका उल्लेख पुराणों और ग्रंथों में भी मिलता है ।

                  स्कंद पुराण में इस भूभाग को केदारखंड कहा गया है । केदार का अर्थ है शंकर या शिव। इस प्रकार प्राचीन काल में इस भूभाग को शिव भूमि के नाम से जाना जाता था। देहरादून-ऋषिकेश-हरिद्वार में ऐसे स्थल हैं जो रामायण काल और महाभारत से जुड़े हुए हैं। कहा जाता है कि लंका से लौटने के बाद भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण इस क्षेत्र में आए थे। यही स्थान गुरु द्रोणाचार्य का आवास स्थान भी कहा जाता है। महाभारत में कुणिंदो और खस जाति का वर्णन मिलता है ।  मध्य हिमालय के क्षेत्र तराई क्षेत्र में सुबाहु नाम का राजा राज करता था। उस समय कुणिंदों का कालाकोट (कालसी और देहरादून का क्षेत्र) पर आधिपत्य था। जबकि कालसी पर राजा विराट शासन कर रहे थे । कालसी की राजधानी विराटगढ़ थी (राजा विराट वही राजा थे जिनके यहां पांडवों ने 1 वर्ष अज्ञातवास वेश बदलकर व्यतीत किया था । राजा विराट की पुत्री उत्तरा का विवाह अभिमन्यु के साथ हुआ था) ।  

                  महाभारत के युद्ध के बाद  स्वर्ग की यात्रा के दौरान पांडवों ने यहां कुछ समय व्यतीत किया था। वैदिक साहित्य के अनुसार आर्यों से पूर्व इस भूमि में असुर जाति के लोग निवास करते थे इस क्षेत्र के यज्ञ, नाग व असुरों के पतन के बाद यहां किरत आए थे। 300 ईसा पूर्व जब मौर्य वंश ने संपूर्ण भारत पर पर नियंत्रण स्थापित किया । उस समय देहरादून उत्तर कुरु जनपद में शामिल था। जिस पर मौर्य शासकों का पूर्ण नियंत्रण था। बिंदुसार के पुत्र अशोक ने कलिंग के युद्ध के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। और बौद्ध धर्म की शिक्षा  का प्रचार प्रसार देश-विदेश के कोने-कोने तक करवाया। सम्राट अशोक के काल में बौद्ध धर्म का सबसे अधिक प्रचार प्रसार हुआ। अनेकों शिलालेखों का निर्माण करवाया। उन्हीं शिलालेखों में अशोक ने यमुना नदी के किनारे कालसी नामक स्थान में एक शिलालेख का निर्माण कराया। जिसे आज "कालसी शिलालेख" के नाम से जाना जाता है। इसी अभिलेख से यह भी पता चलता है कि कुणिंद मौर्यों के अधीन थे। कालसी का उल्लेख सातवीं सदी में चीनी यात्री व्हेनसांग ने अपनी यात्रा में किया है। चीनी यात्री के अनुसार कालसी उस समय एक समृद्धशाली क्षेत्र था। कालसी का पुराना नाम सुधनगर था। सुधनगर के निकट हरिपुर के राजा रसाल केे नाम के अवशेष प्राप्त हुए थे। मौर्यों के पश्चात यहांं शीलवर्मन और  गुप्त वंश के राजाओं ने शासन स्थापित किया लेकिन गुप्त काल के बाद केंद्र की शक्ति कमजोर हो गई और अनेकों राजवंशों का उदय हुआ। ऐसे ही हिमालय के उत्तराखंड राज्य में कत्यूरी राजवंश का उदय हुआ। जिन्हें कार्तिकेयपुर वंश के नाम से जाना जाता है । कत्यूरीओं ने लगभग 300 वर्षों तक उत्तराखंड में शासन किया। कत्यूरी शासकों के बाद गढ़वाल के परमार वंश ने संपूर्ण गढ़वाल मंडल पर शासन व्यवस्था स्थापित की । वहीं दूसरी तरफ कुमाऊं पर चंद राजवंश का उदय हुआ। गढ़वाली राजाओं ने गढ़वाल सहित देहरादून पर 1804 ईसवी तक शासन व्यवस्था बनाए रखा। लेकिन 1804 ईसवी में देहरादून के खुड़बुड़ा मैदान में प्रदुम्न शाह गोरखाओं से हार जाते हैं। और देहरादून पर गौरखाओं का अधिकार हो जाता है।

             1804-1815 तक लगभग 2 दशकों तक यह क्षेत्र गोरखाओं के कब्जे में था। अप्रैल 1815 में अंग्रेजों ने गोरखा सैनिकों को गढ़वाल से हटा दिया और गढ़वाल पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया । प्रारंभिक समय में अंग्रेजों ने देहरादून की स्थापना 1817 में की और सहारनपुर जिले में शामिल किया और 1825 में देहरादून को कुमाऊं कमिश्नरी में शामिल कर लिया गया। लेकिन जिला सहारनपुर ही रहा। परंतु देहरादून की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति को देखते 1871 में अंग्रेजों नेे जिला बना दिया। आजादी के बाद 1975 ईस्वी में देहरादून को गढ़वाल मंडल में शामिल किया गया। राज्य गठन से पूर्व 9 दिसंबर 1998 में देहरादून को नगर निगम बनाया गया। 

            आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के पहाड़ी जिलों को गढ़वाल व कुमाऊं 2 मंडलों में विभाजित कर दिया गया। देहरादून को मेरठ मंडल से गढ़वाल मंडल में मिला दिया गया। अंततः कुमाऊं और गढ़वाल के अथक प्रयासों और संघर्षों से 9 नवंबर सन 2000 को उत्तरांचल को 27वां नए राज्य के रूप में दर्जा प्राप्त हुआ और देहरादून को इसकी अस्थाई राजधानी बनाया गया।

देहरादून की भौगोलिक स्थिति

देहरादून जनपद लगभग 3088 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ विस्तृत क्षेत्र है। संपूर्ण देहरादून का क्षेत्र दो भागों में विभाजित है । घाटी में स्थित प्रमुख शहर देहरादून है तथा हिमालय की घाटियों के बीच स्थित हैै। दूसरा जौनसार बावर केे क्षेत्र आता है जो हिमालय की पहाड़ी में बसा हुआ है यहां मसूरी, सहस्त्रधारा, चकराता, लाखामंडल तथा डाकपत्थर जैसे प्रसिद्ध पर्यटन एवं धार्मिक स्थल है जो देहरादून थी और मनमोहक बनाते हैंं। देहरादून के उत्तर में उत्तरकाशी व दक्षिण में हरिद्वार स्थित है। पूर्व में पौढ़ी व पश्चिम का भाग हिमालय प्रदेश की सीमा को छूता है जहां टोंंस और यमुना नदी गुजरती है। देहरादून  रहने के लिए अनुकूल वातावरण कराते हैं जिस कारण देहरादून जनपद की कुल जनसंख्या 16,96,969 है । जनसंख्या की दृष्टि से देहरादून  उत्तराखंड का दूसरा बड़ा जिला है । जनपद की वर्तमान साक्षरता दर 78.5% है जो सभी जिलों में सर्वाधिक है। पुरुषों की साक्षरता दर 85.87 तथा महिलाओं की 70.2 जीरो प्रतिशत है। महिला साक्षरता की दृष्टि से देहरादून जनपद का उत्तराखंड में प्रथम स्थान है ।

देहरादून पर्यटक स्थल के रूप में

पर्यटन की दृष्टि से देहरादून जनपद उत्तराखंड का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां पर ऋषिकेश तथा मसूरी मुख्य पर्यटक स्थल है।  लाखामंडल, चकराता, सहस्त्रधारा, हनोल, कैमल बैक, आदि देहरादून को महत्वपूर्ण राज्य को बेहद आकर्षक बनाते हैं।

ऋषिकेश 

ऋषिकेश देहरादून का सर्वाधिक प्रमुख नगर है जो कि हरिद्वार से 24 किलोमीटर दूर तथा देहरादून से 43 किलोमीटर दूर उत्तर बॉर्डर पर गंगा एवं चंद्रभागा नदी संगम पर स्थित है। ऋषिकेश को 'संत नगरी' व 'विश्व योग' की राजधानी कहा जाता है।कथाओं के अनुसार यह नगर ऋषि मुनियों की तपस्थली और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा है। ऋषिकेश का प्राचीन नाम कुब्जाम्रक है । यहां सर्वाधिक मंदिर व तीर्थस्थान स्थित है। जिसमें नीलकंठ महादेव, तपोवन लक्ष्मण झूला,  त्रिवेणी घाट , भद्रदाज मंदिर, शिवानंद आश्रम, शत्रुघ्न मंदिर, शिवानंद झूला, कैलाश निकेतन मंदिर, भरत मंदिर आदि शामिल है। ऋषिकेश का सबसे पुराना मंदिर भरत मंदिर है।

                 केंद्र सरकार ने ऋषिकेश व हरिद्वार को भारत के पहले जुड़वा राष्ट्रीय विरासत शहरों का खिताब दिया। ऋषिकेश नगर पालिका 1952 में बनी। और राज्य गठन के बाद अक्टूबर 2017 में ऋषिकेश को नगर निगम घोषित किया गया। ऋषिकेश में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIMS) की स्थापना 2004 में की गई इसमें फरवरी 2014 से कार्य शुरू किया।

             

मसूरी -  पहाड़ों की रानी

मसूरी को गंगोत्री व यमुनोत्री का प्रवेश द्वार कहा जाता है। इसके अलावा मसूरी को 'पहाड़ों की रानी' भी कहा जाता है। दिसंबर और जनवरी में विंटर लाइन नामक प्राकृतिक घटना घटित होती है। विंटर लाइन की घटना विश्व में  स्विट्जरलैंड में घटित होती है। मसूरी देहरादून से लगभग 35 किलोमीटर दूर मध्य हिमालय श्रेणी के पहाड़ों पर स्थित है। यहां पर सर्वाधिक मात्रा में क्रीम रंग का भारीवास तक प्रकार के चूने का भंडार पाया जाता है। यह भारत के सबसे पुराने हिल स्टेशनों में से एक है।

            मसूरी की खोज आयरिश अफसर कैप्टन यंग ने 1824 की थी। मसूरी नगर पालिका का गठन 1842 में हुआ। मसूरी राज्य की सबसे पुरानी नगरपालिका परिषद है। 1842 ईसवी में जॉन मैकिनन ने मसूरी से राज्य का प्रथम समाचार पत्र 'द हिल्स' का संपादन किया जो 8 वर्षों तक चला था। यहां 2 सितंबर 1994 में मसूरी गोलीकांड घटना घटित हुई । 

            सन् 1 सितंबर 1959 को मसूरी में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी की स्थापना की गई थी। मसूरी में हार्डी जलप्रपात व भट्टा जलप्रपात प्रमुख दर्शनीय स्थल है इसके अलावा कैमलबैक 3 किलोमीटर लंबा रोड प्रमुख स्थल है। मसूरी रोपवे का निर्माण 1970 में हुआ। मसूरी की सबसे ऊंची चोटी लाल टिब्बा और गनहिल पहाड़ी है।

*विंटर लाइन क्या है ?

जब कभी सूर्यास्त के समय 15 से 20 मिनट तक सूर्य की लालिमा लंबी रेखा की भांति दिखे तो उस दृश्य को विंटर लाइन कहते हैं।

सहस्त्रधारा

अनेक समूहों की धाराओं में बहने के कारण इसे सहस्त्रधारा कहा जाता है। यह प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण होने के कारण इस स्थान पर पर्यटकों की काफी भीड़ रहती है। 

देहरादून से संबंधित प्रमुख तथ्य


देहरादून उत्तराखंड की राजधानी होने के कारण यहां आने को प्रमुख कार्यालय और संस्थाओं की स्थापना की गई है जिनमें से प्रमुख संस्थाएं निम्नलिखित हैं। 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण संस्थान

भारतीय वन्यजीव संस्थान

उत्तराखंड भाषा संस्थान

भारतीय सैन्य अकादमी

हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड - ऋषिकेश (देहरादून)

देहरादून जनपद से संबंधित प्रश्न

(1) किस गढ़वाल शासक के शासनकाल में गुरु रामराय देहरादून आए थे ?
(a) अजयपाल
(b) पृथ्वी शाह
(c) फतेह शाह
(d) सुदर्शन शाह

(2) निम्नलिखित में से उत्तराखंड के किस जिले की साक्षरता दर सबसे अधिक है ?
(a) देहरादून
(b) अल्मोड़ा
(c) हरिद्वार
(d) चमोली

(3) किस अभिलेख से यह  पता चलता है कि कुणिंद लोग मौर्य के अधीन थे ?
(a) हाथी गुम्फा अभिलेख
(b) कालसी शिलालेख
(c) एरण अभिलेख
(d) भ्राबू शिलालेख

(4) उत्तराखंड राज्य एवं उत्तर भारत की प्रथम जल विद्युत  परियोजना कहां बनाई गई है ?
(a) देहरादून में
(b) हरिद्वार में 
(c) नैनीताल में 
(d) मसूरी में

(5) जनसंख्या की दृष्टि से देहरादून जनपद का उत्तराखंड में कौन सा स्थान है ?
(a) पहला
(b) दूसरा
(c) तीसरा
(d) चौथा

(6) भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान कहां स्थित है?
(a) अल्मोड़ा
(b) पिथौरागढ़
(c) देहरादून
(d) हरिद्वार

(7) उत्तराखंड में चूने का विशाल भंडार होने से अधिकांश सीमेंट फैक्ट्रियां कहां स्थित है ?
(a) रुद्रप्रयाग
(b) उत्तरकाशी
(c) पौड़ी गढ़वाल
(d) देहरादून

(8) निम्नलिखित में से कुब्जाम्रक किसका प्राचीन नाम है ?
(a) अल्मोड़ा
(b) देहरादून
(c) हरिद्वार
(d) ऋषिकेश

(9) भारतीय वन्यजीव संस्थान कहां स्थित है ?
(a) अल्मोड़ा
(b) देहरादून
(c) टिहरी
(d) उधम सिंह नगर

(10) कालसी शिलालेख का निर्माण किस  शासक द्वारा कराया गया था ?
(a) पुष्यमित्र शुंग
(b) चंद्रगुप्त मौर्य
(c) सम्राट अशोक
(d) समुद्रगुप्त

(11) उत्तराखंड के किस हिल स्टेशन को 'पहाड़ों की रानी' कहा जाता है ?
(a) मसूरी
(b) ऋषिकेश
(c) नैनीताल
(d) रानीखेत

(12) निम्नलिखित में से किस पर्वतीय स्थल को पहाड़ों की राजा कहा गया है ?
(a) कौसानी
(b) रानीखेत
(c) नैनीताल
(d) चकराता

(13) उत्तराखंड में अशोक कालीन शिलालेख   किस स्थान से मिला है ?
(a) देहरादून
(b) श्रीनगर
(c) कालसी
(d) केदारनाथ

(14) महिला साक्षरता की दृष्टि से देहरादून जनपद का उत्तराखंड में कौन सा स्थान है ?
(a) पहला
(b) दूसरा
(c) तीसरा
(d) चौथा

(15) पहाड़ों की रानी मसूरी किस श्रेणी का अंग है ?
(a) शिवालिक श्रेणी
(b) मध्य हिमालय श्रेणी
(c) वृहत हिमालय श्रेणी
(d) इनमें से कोई नहीं


यदि आपको हमारे द्वारा तैयार किए गए नोट्स और उत्तराखंड के जनपदों से संबंधित प्रश्न पसंद आते हैं तो इन्हें अधिक से अधिक लोगों तक शेयर कीजिए इसके अतिरिक्त यदि आप उत्तराखंड का संपूर्ण इतिहास पढ़ना चाहते हैं तो देवभूमि उत्तराखंड वेबसाइट को फॉलो कीजिए।

Answer - (1)c , (2)a, (3)b, (4)d, (5)b, (6)c, (7)d,  (8)d, (9)b, (10)c, (11)a, (12)d, (13)c, (14)a, (15)b, 

Related posts :-

अल्मोड़ा का इतिहास

हरिद्वार का इतिहास

गढ़वाल का परमार वंश


टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

If you have any doubts.
Please let me now.

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व एवं स्वतंत्रता सेनानी

उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व उत्तराखंड की सभी परीक्षाओं हेतु उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व एवं स्वतंत्रता सेनानियों का वर्णन 2 भागों में विभाजित करके किया गया है । क्योंकि उत्तराखंड की सभी परीक्षाओं में 3 से 5 मार्क्स का उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान अवश्य ही पूछा जाता है। अतः लेख को पूरा अवश्य पढ़ें। दोनों भागों का अध्ययन करने के पश्चात् शार्ट नोट्स पीडीएफ एवं प्रश्नोत्तरी पीडीएफ भी जरूर करें। भाग -01 उत्तराखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी [1] कालू महरा (1831-1906 ई.) कुमाऊं का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) "उत्तराखंड का प्रथम स्वतंत्रा सेनानी" कालू महरा को कहा जाता है। इनका जन्म सन् 1831 में चंपावत के बिसुंग गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम रतिभान सिंह था। कालू महरा ने अवध के नबाब वाजिद अली शाह के कहने पर 1857 की क्रांति के समय "क्रांतिवीर नामक गुप्त संगठन" बनाया था। इस संगठन ने लोहाघाट में अंग्रेजी सैनिक बैरकों पर आग लगा दी. जिससे कुमाऊं में अव्यवस्था व अशांति का माहौल बन गया।  प्रथम स्वतंत्रता संग्राम -1857 के समय कुमाऊं का कमिश्नर हेनरी रैम्

चंद राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास

चंद राजवंश का इतिहास पृष्ठभूमि उत्तराखंड में कुणिंद और परमार वंश के बाद सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजवंश है।  चंद वंश की स्थापना सोमचंद ने 1025 ईसवी के आसपास की थी। वैसे तो तिथियां अभी तक विवादित हैं। लेकिन कत्यूरी वंश के समय आदि गुरु शंकराचार्य  का उत्तराखंड में आगमन हुआ और उसके बाद कन्नौज में महमूद गजनवी के आक्रमण से ज्ञात होता है कि तो लगभग 1025 ईसवी में सोमचंद ने चंपावत में चंद वंश की स्थापना की है। विभिन्न इतिहासकारों ने विभिन्न मत दिए हैं। सवाल यह है कि किसे सच माना जाए ? उत्तराखंड के इतिहास में अजय रावत जी के द्वारा उत्तराखंड की सभी पुस्तकों का विश्लेषण किया गया है। उनके द्वारा दिए गए निष्कर्ष के आधार पर यह कहा जा सकता है । उपयुक्त दिए गए सभी नोट्स प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से सर्वोत्तम उचित है। चंद राजवंश का इतिहास चंद्रवंशी सोमचंद ने उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में लगभग 900 वर्षों तक शासन किया है । जिसमें 60 से अधिक राजाओं का वर्णन है । अब यदि आप सभी राजाओं का अध्ययन करते हैं तो मुमकिन नहीं है कि सभी को याद कर सकें । और अधिकांश राजा ऐसे हैं । जिनका केवल नाम पता है । उनक

परमार वंश - उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

उत्तराखंड का इतिहास History of Uttarakhand भाग -1 परमार वंश का इतिहास उत्तराखंड में सर्वाधिक विवादित और मतभेद पूर्ण रहा है। जो परमार वंश के इतिहास को कठिन बनाता है परंतु विभिन्न इतिहासकारों की पुस्तकों का गहन विश्लेषण करके तथा पुस्तक उत्तराखंड का राजनैतिक इतिहास (अजय रावत) को मुख्य आधार मानकर परमार वंश के संपूर्ण नोट्स प्रस्तुत लेख में तैयार किए गए हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में 688 ईसवी से 1947 ईसवी तक शासकों ने शासन किया है (बैकेट के अनुसार)।  गढ़वाल में परमार वंश का शासन सबसे अधिक रहा।   जिसमें लगभग 12 शासकों का अध्ययन विस्तारपूर्वक दो भागों में विभाजित करके करेंगे और अंत में लेख से संबंधित प्रश्नों का भी अध्ययन करेंगे। परमार वंश (गढ़वाल मंडल) (भाग -1) छठी सदी में हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात संपूर्ण उत्तर भारत में भारी उथल-पुथल हुई । देश में कहीं भी कोई बड़ी महाशक्ति नहीं बची थी । जो सभी प्रांतों पर नियंत्रण स्थापित कर सके। बड़े-बड़े जनपदों के साथ छोटे-छोटे प्रांत भी स्वतंत्रता की घोषणा करने लगे। कन्नौज से सुदूर उत्तर में स्थित उत्तराखंड की पहाड़ियों में भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्

उत्तराखंड में भूमि बंदोबस्त का इतिहास

  भूमि बंदोबस्त व्यवस्था         उत्तराखंड का इतिहास भूमि बंदोबस्त आवश्यकता क्यों ? जब देश में उद्योगों का विकास नहीं हुआ था तो समस्त अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। उस समय राजा को सर्वाधिक कर की प्राप्ति कृषि से होती थी। अतः भू राजस्व आय प्राप्त करने के लिए भूमि बंदोबस्त व्यवस्था लागू की जाती थी । दरअसल जब भी कोई राजवंश का अंत होता है तब एक नया राजवंश नयी बंदोबस्ती लाता है।  हालांकि ब्रिटिश शासन से पहले सभी शासकों ने मनुस्मृति में उल्लेखित भूमि बंदोबस्त व्यवस्था का प्रयोग किया था । ब्रिटिश काल के प्रारंभिक समय में पहला भूमि बंदोबस्त 1815 में लाया गया। तब से लेकर अब तक कुल 12 भूमि बंदोबस्त उत्तराखंड में हो चुके हैं। हालांकि गोरखाओ द्वारा सन 1812 में भी भूमि बंदोबस्त का कार्य किया गया था। लेकिन गोरखाओं द्वारा लागू बन्दोबस्त को अंग्रेजों ने स्वीकार नहीं किया। ब्रिटिश काल में भूमि को कुमाऊं में थात कहा जाता था। और कृषक को थातवान कहा जाता था। जहां पूरे भारत में स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी बंदोबस्त और महालवाड़ी बंदोबस्त व्यवस्था लागू थी। वही ब्रिटिश अधिकारियों ने कुमाऊं के भू-राजनैतिक महत्

कत्यूरी राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

 कत्यूरी राजवंश का इतिहास भाग -1 अमोघभूति कुणिद वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। कुणिद वंश उत्तराखंड में लगभग तीसरी- चौथी शताब्दी की पहली राजनीतिक शक्ति थी । जबकि कत्यूर राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला पहला ऐतिहासिक शक्तिशाली राजवंश था। इसे कार्तिकेयपुर वंश के नाम से भी जाना जाता है। 'कत्यूरी' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग एटकिंसन ने किया था।  कत्यूरी राजवंश के संस्थापक बसंत देव थे । जिन्हें बासुदेव के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी। पांडुकेश्वर ताम्रलेख में पाए गए कत्यूरी राजा ललितशूर के अनुसार कत्यूरी शासकों की प्राचीनतम राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी । बाद में नरसिंह देव ने जोशीमठ से बैजनाथ (बागेश्वर ) में राजधानी स्थानांतरित कर दी । जहां से कत्यूरी राजवंश को विशिष्ट पहचान मिली । कत्यूरी राजवंश का उदय कुणिंदों के पतन के पश्चात देवभूमि उत्तराखंड की भूमि पर कुछ नए राजवंशों का उदय हुआ। जैसे गोविषाण, कालसी लाखामंडल आदि जबकि कुछ स्थानों पर कुणिंद भी शासन करते रहे। कुणिंदो के बाद शक, कुषाण और यौधेय  वंश के शासकों ने कुछ क्षेत्रों पर शासन व्यवस्था स्थ

उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न (उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14)

उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14 उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां वर्ष 1965 में केंद्र सरकार ने जनजातियों की पहचान के लिए लोकर समिति का गठन किया। लोकर समिति की सिफारिश पर 1967 में उत्तराखंड की 5 जनजातियों थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा, और राजी को एसटी (ST) का दर्जा मिला । राज्य की मात्र 2 जनजातियों को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है । सर्वप्रथम राज्य की राजी जनजाति को आदिम जनजाति का दर्जा मिला। बोक्सा जनजाति को 1981 में आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ था । राज्य में सर्वाधिक आबादी थारू जनजाति तथा सबसे कम आबादी राज्यों की रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल एसटी आबादी 2,91,903 है। जुलाई 2001 से राज्य सेवाओं में अनुसूचित जन जातियों को 4% आरक्षण प्राप्त है। उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न विशेष सूचना :- लेख में दिए गए अधिकांश प्रश्न समूह-ग की पुरानी परीक्षाओं में पूछे गए हैं। और कुछ प्रश्न वर्तमान परीक्षाओं को देखते हुए उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित 25+ प्रश्न तैयार किए गए हैं। जो आगामी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। बता दें की उत्तराखंड के 40 प्रश्नों में से 2

गोरखा शासन : उत्तराखंड का इतिहास

    उत्तराखंड का इतिहास           गोरखा शासन (भाग -1) पृष्ठभूमि मल्ल महाजनपद का इतिहास (आधुनिक नेपाल) 600 ईसा पूर्व जब 16 महाजनपदों का उदय हुआ। उन्हीं में से एक महाजनपद था - मल्ल (आधुनिक नेपाल का क्षेत्र)। प्राचीन समय में नेपाल भारत का ही हिस्सा था। मल्ल महाजनपद का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ के " अगुंत्तर निकाय " में किया गया है। और जैन ग्रंथ के भगवती सूत्र में इसका नाम " मौलि या मालि " नाम से जनपद का उल्लेख है। मल्ल महाजनपद की प्रथम राजधानी कुशीनगर थी । कुशीनगर में गौतम बुद्ध के निर्वाण (मृत्यु) प्राप्त करने के बाद उनकी अस्थि-अवशेषों का एक भाग मल्लो को मिला था । जिसके संस्मारणार्थ उन्होंने कुशीनगर में एक स्तूप या चैत्य का निर्माण किया था। मल्ल की वित्तीय राजधानी पावा थी । पावा में ही महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था ।                 322 ईसा पूर्व समस्त उत्तर भारत में मौर्य साम्राज्य ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। मल्ल महाजनपद भी मौर्यों के अधीन आ गया था। गुप्त वंश के बाद उत्तर भारत की केंद्र शक्ति कमजोर हो गई । जिसके बाद  लगभग 5वीं सदीं में वैशाली से आए 'लिच्