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हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि) हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है. भाषा का विकास  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.) 2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.) 3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ ) 4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ) 5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.) 6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में) *1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है वर्णमाला वर्ण क्या है?  उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है। वर्णमाला वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। हिंदी लिपि के चिन्ह अ आ इ ई उ ऊ ऋ  ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ

नैनीताल का इतिहास - देवभूमि उत्तराखंड

 नैनीताल का इतिहास



वादियों से घिरा झीलों का शहर - नैनीताल
नैनीताल उत्तराखंड की पावन भूमि पर एक विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं। यह शहर तीन ओर से टिफिन टॉप, चाइना पीक, लड़ियां कांटा, स्नोव्यू, हाड़ी गड़ी, शेर का डांडा आदि ऊंची ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ है। नैनीताल उत्तराखंड का ही नहीं बल्कि पूरे भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय पर्यटक स्थल है।  प्राकृतिक सौंदर्य और मनलुभावन दृश्यों का प्रतीक यह शहर एक लंबे अरसे से विश्व में टॉप 10 पर्यटक स्थलों में जगह बनाए हुए। नैनीताल की नैनी झील, नैना देवी मंदिर, कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान व कार्बेट जलप्रपात और नैना पीक के प्रमुख स्थलों में आते हैं। भयंकर गर्मी हो या सर्दी यहां प्रतिवर्ष देश-विदेश से लाखों सैलानी घूमने के लिए आते हैं। सर्दियों में बर्फ के दिवाने, बर्फ देखने आते हैं तो वहीं मई-जून के महीनों में गर्मी से बचने के लिए आते हैं।                            
                 नैनीताल की आय का मुख्य स्रोत पर्यटक स्थलों से प्राप्त आय है। इसीलिए उत्तराखंड की परीक्षाओं की तैयारी करने वाले परीक्षार्थियों को नैनीताल का इतिहास व नैनीताल के महत्वपूर्ण स्थानों का अध्यन करना अति आवश्यक है। हमारे द्वारा तैयार की गई उत्तराखंड के 25 प्रमुख शहरों की लिस्ट में नैनीताल के बारे में जरूर पढ़ें और उनसे संबंधित प्रश्नों के उत्तर दें।

नैनीताल का इतिहास 

नैनीताल की खोज पी. बैरन ने 1841 ई. में की थी। अर्थात नैनीताल शहर को बसाने का श्रेय पी. बैरन दिया जाता है । गोरखाओं को हराने के पश्चात 1815 में कुमाऊं और गढ़वाल पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया था। उस समय ई. गार्डनर कुमाऊ के कमिश्नर के रूप में शासन व्यवस्था संभाले हुए थे और तीन महीने बाद जी.जे. ट्रेल को सहायक के रूप में भेजा गया। ट्रेल नैनीताल की यात्रा करने वाले पहले व्यक्ति थे। 

सन् 1839 में एक अंग्रेज व्यापारी पी. बैरन जो शाहजहांपुर का एक चीनी का व्यापारी होता है। वह पर्वतीय अंचल में घूमने आता है उसे घूमने का बहुत शौक होता है और वह घूमते-घूमते प्राकृतिक दृश्यों को निहारते हुए "शेर का डाण्डा" पर्वत चोटी के पीछे एक सुंदर झील के पास पहुंच जाता है । वह उस क्षेत्र और झील की सुंदरता देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता है । उसी दिन वह नैनीताल में सुंदर नगर बसाने की योजना बना लेता है। सर्वप्रथम वहां के थोकदार नूर सिंह से इजाजत लेकर 12 बंगलो का निर्माण कराने का निर्णय लेता है। उस समय नैनीताल की खोज की खबर 24 नवंबर 1841 को कलकत्ता के इंग्लिश में अखबार में छपी थी और बाद में इसका विस्तृत विवरण आगरा अखबार में भी छपा था। सन् 1842 में बैरन ने पहले पहले 'पिलग्रिम' नाम के कॉटेज को बनवाया था। जिसका उल्लेख अपनी पुस्तक 'वंडरिंग द हिमालय' में किया  है। सन् 1842 में नैनीताल को बनाने की जिम्मेदारी मोतीलाल शाहा को दी गई जिन्होंने नैनी झील के तट पर नैना देवी मंदिर बनवाया था।  समय बितने के साथ अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर भी अधिकार कर लिया और अक्टूबर 1850 को नैनीताल नगर निगम का औपचारिक रूप से गठन किया। उसके कुछ समय बाद ही सन् 1854 में कुमाऊं मंडल की स्थापना में हुई व इसका मुख्यालय बनाया गया। सन् 1862 में नैनीताल उत्तरी पश्चिमी प्रान्त का ग्रीष्मकालीन मुख्यालय बन गया। परंतु 18 सितंबर 1880 को नैनीताल में एक बड़ा भूस्खलन आया जिसमें 151 लोगों की दबकर मृत्यु हो गई। नैनीताल जनपद का गठन 1891 ईस्वी में हुआ व 1962 तक उत्तर प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा। अंग्रेजों के समय से नैनीताल एक ऐसा नगर बनकर उभरा जिसकी सुन्दरता का वर्णन विदेशों में भी होता है। मसूरी के बाद नैनीताल अंग्रेजों के प्रिय हिल स्टेशनों में शामिल था। नैनीताल में ही गांधी जी ने 1929 ईस्वी में ताकुला नामक स्थान पर स्वराज आश्रम की स्थापना की थी।

पौराणिक कथा के अनुसार

             पौराणिक कथाओं के अनुसार यह कहा जाता है कि देवी सती के भस्म हुए शरीर को जब अपने कंधों पर धारण किए भगवान शिव तांडव करते हुए आकाश मार्ग से गुजर रहे थे। शिव तांडव से पृथ्वी पर चारों ओर तबाही हो रही थी। तब भगवान विष्णु ने जगत के कल्याण के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए। कथा के अनुसार जहां-जहां देवी सती के अंग गिरे। वही स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गए। ऐसा माना जाता है कि नैनीताल में देवी सती की बायीं आंख के गिरने से नैना देवी शक्ति पीठ की स्थापना हुई और देवी के अश्रुधारा से नैनी ताल का निर्माण हुआ । आकाश से देखने पर नैनी झील नैनो की भांति सुंदर और आकर्षक लगती है। नैनी अर्थात नंदा देवी की पूजा यहां पर युगों-युगों से होती आ रही है। उत्तराखंड में देवी सती को ही नंदा देवी कहा जाता है। नंदा देवी गढ़वाल और कुमाऊं के राजाओं की इष्ट देवी हैं। प्रत्येक वर्ष मां नैनी देवी का मेला नैनीताल में  आयोजित किया जाता है।
                  कुछ इतिहासकार उपयुक्त पौराणिक कथा को भ्रमित मानते हैं क्योंकि तंत्र चूड़ामणि में 52 शक्तिपीठों व शिवचरित्र में 51 शक्तिपीठों का वर्णन किया गया है। 52 शक्तिपीठों में नैना देवी को शामिल नहीं किया गया है। हालांकि देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों के बारे में बताया गया है। परंतु देवी भागवत के शक्तिपीठ आदि शक्ति सती के अंग से संबंध नहीं रखते हैं। स्कंदपुराण के मानसखंड में नैनी ताल का वर्णन त्रिऋषि सरोवर के नाम से किया गया। अर्थात अत्रि, पुलस्क, तथा पुलक तीनों ऋषियों ने ताल का निर्माण किया था। एक बार की बात है। तीनों ऋषि तपस्या करने के लिए हिमालय की ओर जा रहे थे। मार्ग में उन्हें यह स्थान मिला तो वह इस स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य पर मुग्ध हो गए और वहीं तपस्या करने का विचार बनाया । परंतु यहां पानी का अभाव था। जब उन्हें प्यास लगी तो अपने तप के बल पर तिब्बत में स्थित पवित्र मानसरोवर झील के जल को यहां ले आए। जिसे यहां पर ताल का निर्माण हो गया। इसलिए कुछ इतिहासकार इस ताल को  त्रिऋषि सरोवर के नाम से पुकारना श्रेयस्कर समझते हैं।

नैनीताल जनपद का भौगोलिक विस्तार

नैनीताल जनपद के प्रमुख शहर नैनीताल और हल्द्वानी हैं। नैनीताल शहर भारत के  उत्तराखंड में स्थित शिवालिक पर्वत श्रेणी की ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ समुद्र तल से लगभग 1938 मीटर की ऊंचाई पर बसा खूबसूरत झीलों का शहर है। जिसका अधिकतम तापमान 27 डिग्री सेल्सियस व न्यूनतम तापमान 8 डिग्री सेल्सियस के करीब रहता है। वहीं हल्द्वानी तराई के मैदान में जनसंख्या की दृष्टि से हरिद्वार के बाद दूसरी सबसे बड़ी नगर पालिका परिषद है। हल्द्वानी का नामकरण 1834 में हल्दू के पेड़ की अधिकता के कारण कमिश्नर ट्रेल ने हल्दूवणी रखा था। हल्द्वानी के इतिहास को जानने के लिए यहां क्लिक करें (हल्द्वानी का इतिहास)। इसके अतिरिक्त नैनीताल जनपद के प्रमुख नगर है काठगोदाम, कालाढूंगी, घोड़ाखाल, मुक्तेश्वर, रामगढ़ और रामनगर । जिनका विस्तृत अध्ययन करेंगे। 

काठगोदाम 

काठगोदाम को कुमाऊ का प्रवेश द्वार कहा जाता है । यहां से कुमाऊं के पहाड़ों की यात्रा का सफर शुरू होता है। यह नगर एक प्रमुख व्यापारिक मण्डी है। काठगोदाम पूर्वोत्तर रेलवे लाइन का एक महत्वपूर्ण कुमाऊनी रेलवे स्टेशन है । काठगोदाम रेलवे स्टेशन की स्थापना 1884 में हुई थी। कुमाऊं मंडल की महत्वत्ता में को समझते हुए ब्रिटिश सरकार ने 10 वर्ष पश्चात 1894  में बड़ी लाइन से अन्य राज्यों को जोड़ा। काठगोदाम से कुछ दूरी पर स्थित पर्यटक स्थल रानीबाग है। जहां पुष्पभद्रा  व गंगरांचल नदियों का संगम है। यहां की गुलाब घाटी अत्यधिक सुंदर और प्रसिद्ध है। काठगोदाम को बमोरी घाट व बाड़ाखेती भी कहा जाता है। काठगोदाम के निकट शीतला देवी मंदिर स्थित है।

भवाली

भुवाली अपनी प्राकृतिक उत्कृष्टता एवं पर्वतीय बाजार के लिए प्रसिद्ध है। यह नैनीताल से लगभग 11 किमी. दूरी पर स्थित है।
फिकी झरना (जल प्रपात ) भवाली में ही स्थित है। छय रोग से संश्लेषित टीवी सेेनोटोरियम भवाली में ही स्थित हैै। नीम करोली बाबा से संबंधित कैंची धाम यहीं स्थित हैै।

मुक्तेश्वर

नैनीताल जनपद का एक और सुंदर नगर मुक्तेश्वर जो हल्द्वानी से 51 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह नगर फलदार तथा बांस बुरांश के घने वृक्षों से भरा हुआ है। यहां आडू, सेब, खुमानी आदि फलों की खेती होती है । यहां अंग्रेजों द्वारा स्थापित भारतीय पशु चिकित्सा शोध संस्थान है। मालूगढ जलप्रपात मुक्तेश्वर में स्थित है।

रामगढ़

रामगढ़ को कुमाऊं में "फलों का कटोरा" कहा जाता है। यह स्थान मुक्तेश्वर से कुछ ही दूरी पर स्थित है। यहां आडू की सर्वाधिक उत्पादन किया जाता है। तोतापरी वह हिल्सखर्ती  प्रमुख प्रजाति हैं। इसके अलावा रसीले सेब, नाशपाती का उत्पादन किया जाता है। यहां कवियत्री महादेवी वर्मा का संग्रहालय बनाया गया है।

रामनगर

यह मुरादाबाद काशीपुर रेल पथ का अंतिम स्टेशन है। रामनगर में स्थित प्रसिद्ध गर्जिया देवी का मंदिर है। यहां प्रतिवर्ष अनेकों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। यह मंदिर कोसी नदी के बीचों-बीच स्थित है। रामनगर के पास में ही सीतावनी है जहां महर्षि वाल्मीकि आश्रम के भाग्नाशेष आज भी मौजूद है। गर्जिया मंदिर रामनगर से 10 किलोमीटर दूर ढिकुली के निकट स्थित है। ढिकुली वही स्थान है जहां कत्यूरी शासकों ने किसी समय अपनी राजधानी बनाई  थी।

                     नैनीताल जनपद का कुल क्षेत्रफल 4251 वर्ग किलोमीटर है। 2011 की जनगणना के अनुसार जनपद की कुल जनसंख्या 9.55 लाख की थी। जनसंख्या संख्या की दृष्टि से नैनीताल चौथा बड़ा जनपद है। इसका लिंगानुपात 934 है। सबसे कम लिंगानुपात हरिद्वार (880), देहरादून (902), उधम सिंह नगर (920), और चौथे स्थान पर नैनीताल है। नैनीताल साक्षरता की दर 83.88% है । साक्षरता में यह जनपद दूसरे स्थान पर है जबकि देहरादून प्रथम स्थान पर है। नैनीताल जनपद में सर्वाधिक मात्रा में लोहा पाया जाता है।

नैनीताल के पर्यटक स्थल

यूं तो उत्तराखंड की भूमि के कण-कण में पर्यटक स्थल बसे हैं। प्रत्येक नगर प्रत्येक स्थल प्राकृतिक सौंदर्यता परिपूर्ण है। नहान पर्वत श्रृंखला हल्द्वानी में स्थित है। बात करें नैनीताल की तो इसकी बात ही कुछ और है। नैनीताल के अलावा नैनीताल के सभी स्थान पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है जिनमें से कुछ स्थलों का वर्णन निम्नलिखित है।

नैनी ताल

नैनी झील दो भागों में विभक्त है जिसमें ऊपरी भाग को मल्लीताल और निचले भाग को तल्लीताल कहा जाता है । नैनी झील के उत्तरी भाग पर मैदानी क्षेत्र को फ्लैट्स कहते हैं।  नैना देवी मंदिर का निर्माण श्री मोतीराम शाह जी ने कराया था झील के पश्चिम में देवपाठा तथा दक्षिण में आधार पाठा चोटी हैं। नैनी झील में नौकायन का लुत्फ उठाने के लिए देश विदेश से लाखों सैलानी आते हैं। यहां हर प्रकार की  नावों की सुविधा है। इस झील के किनारे बने अनेकों बॉलीवुड मूवी और गाने आज भी फिल्मों में छाए हुए हैं । नैन झील के निकट "वुडलैंड वाटर फाल" है।

नैनी झील का दृश्य


भीमताल

भीमताल जी नैनीताल की सभी जिलों से बड़ी है । यह झील पर्यटकों को खूब लुभाती है क्योंकि झील के मध्य एक द्वीप है। जिस पर रेस्टोरेंट स्थित है । पर्यटक यहां नौकायान झील के बीचो बीच भोजन करने का आनंद लेने आते हैं।

नलताल 

नैनीताल से 27 किलोमीटर दूर नलताल स्थित है। यहां कमल के फूलों की अधिकता के कारण इसे कमलताल भी कहा जाता है।

नौकुचिया ताल

नोकिचिया ताल की कुमाऊं की सबसे गहरी 9 कोने वाली ताल है । इस ताल की गहराई लगभग 40 मीटर है। यह ताल पक्षियों के लिए सर्वोत्तम स्थान है । किसी विशेष मौसम में यहां विदेशी पक्षी प्रवास करते हैं।

सातताल

सातताल पांच कोने वाली 7 झीलों का समूह है। यहां पर पहले सात तालें थी। जिनमें से वर्तमान में कई सूख गई। इनमें नल दमयंती ताल, गरुड़ या पन्ना ताल, गरूण ताल, लक्ष्मण ताल, राम सीता ताल प्रमुख हैं। इस झील की आकृति "अश्वखुर " के सामान है। सातताल की तुलना इंग्लैंड के बेस्टमोरलैंड से की जाती है। यह कुमाऊं की सबसे रमणीक  झील है। नैनीताल से आने वाली बालियागाड़ नदी के माध्यम से इन तालों का जल गोला नदी में चला जाता है।

खुरपाताल

खुरपाताल समुंद्र से लगभग 1635 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है । इस ताल का जल गहरा हरा है। इसका आकार जानवर के खुर के सामान है इसके चारों ओर सीढ़ीनुमा खेत बने हुए हैं
। इसके अतिरिक्त सूखाताल , मलवाताल , सडियाताल, तथा हरिताल आदि नैनीताल जनपद में है।

नैना पीक

नैना पीक नैनीताल की सबसे ऊंची चोटी है। जिसकी ऊंचाई लगभग 2611 मीटर है । शहर से 5.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नैन पीक से सफेद चादर से ढका हुआ हिमालय का मनोरमा दृश्य स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 

नैना पीक से दिखता हिमालय

स्नो व्यू 

नैनीताल से कुछ दूरी पर ही स्नो व्यू पर्वत चोटी है। इसकी ऊंचाई 2270 भी. है। जहां पैदल रज्जू मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है। इसके लिए मल्लीताल से रोप वे का भी निर्माण किया गया है। परंतु जो मजा पैदल चलकर एक दूसरे का हाथ थामें और आसपास के सुंदर दृश्यों का लुफ्त उठाते हुए शायद वो रोप-वे में न आए।

कैंची धाम

बाबा नीम करोली महाराज द्वारा स्थापित कैंची धाम आज तीर्थ यात्रा एवं पर्यटक स्थल के नाम से विख्यात है। नैनीताल घूमने वालों के लिए यात्रा का एक यह मुख्य पड़ाव बन चुका है यह प्रतिवर्ष 15 जून को विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। 

कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान

राज्य में सर्वाधिक पर्यटक सैलानी कार्बेट नेशनल पार्क में ही आते हैं। कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान 2 जनपदों में विभाजित है - नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल। इसका ज्यादातर क्षेत्र पौड़ी गढ़वाल में लगभग 312.76 भाग में फैला है और 208.8 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र नैनीताल में है। कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान का कुल क्षेत्रफल 520.8 वर्ग किलोमीटर है। इसकी स्थापना 1936 में हैली राष्ट्रीय उद्यान के नाम से की गई थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस राष्ट्रीय उद्यान का नाम 'रामगंगा नेशनल पार्क' रखा गया तथा 1957 में इसका नाम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान कर दिया गया। इस पार्क का प्रवेश द्वार ढिकाला (नैनीताल) में है , जो कि रामनगर के काफी निकट है। 'पाटलीदून' कार्बेट नेशनल पार्क के मध्य में स्थित है. यह 1973 में टाइगर प्रोजेक्ट की में शामिल होने वाला देश का पहला राष्ट्रीय उद्यान है।

नैनीताल जनपद से संबंधित पश्न


(1) निम्नलिखित में ढिकाला किस राष्ट्रीय उद्यान का प्रवेश द्वार है? 
(a) राजाजी राष्ट्रीय उद्यान
(b) कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान
(c) नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान
(d) गोविंद राष्ट्रीय उद्यान

(2) निम्नलिखित में से नैनीताल जनपद में कौन सी धातु प्रचुर मात्रा पायी जाती है ? 
(a) चांदी
(b) तांबा
(c) लोहा
(d) सोना

(3) नैनीताल की खोज श्रेय किसको दिया जाता है ?
(a) ई.गार्डनर
(b) जे. ट्रेल
(c) हैलट बेलन
(d) पी. बैरन

(4) नैनीताल में नैना देवी मंदिर का निर्माण किसने करवाया था ?
(a) नूर सिंह
(b) मोतिराम शाह
(c) जे. ट्रेल
(d) रूपचंद

(5) काठगोदाम रेलवे स्टेशन की स्थापना कब की गई थी ?
(a) 1854
(b) 1882
(c) 1884
(d) 1894

(6) कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कब की गई थी ?
(a) 1935
(b) 1966
(c) 1972
(d) 1988

(7) कुमाऊं मंडल के किस नगर को "फलों का कटोरा" कहा जाता है ?
(a) रामनगर
(b) रामगढ़
(c) मुक्तेश्वर
(d) रानीबग

(8) नैनीताल की सबसे ऊंची चोटी कौन सी है ?
(a) स्नोव्यू
(b) गनहिल 
(c) नैन पीक
(d) शेर का डांडा

(9) स्कंद पुराण के मानसखंड में नैनी ताल को किस नाम से जाना जाता है ? 
(a) कुब्जाम्रक
(b) त्रिऋषि सरोवर 
(c) कमलताल
(d) सतोपंथ झील

(10) नैनीताल जनपद का गठन कब हुआ था ?
(a) 1882
(b) 1854
(c) 1891
(d) 1962

(11) उत्तराखंड में निम्न झीलों में कौन 9 कौनों वाली झील है ?
(a) नौकुचिया ताल
(b) भीमताल
(c) गिरीताल
(d) नैनीताल

(12) 2011 की जनगणना के अनुसार सर्वाधिक साक्षरता की दृष्टि से नैनीताल का 13 ज़िलों में से कौनसा स्थान है ?
(a) पहला
(b) दूसरा
(c) तीसरा
(d) चौथा

Answer - (1)b, (2)c, (3)d, (4)b, (5)c, (6)a, (7)b, (8)c, (9)b, (10)c, (11)a, (12)b

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  भूमि बंदोबस्त व्यवस्था         उत्तराखंड का इतिहास भूमि बंदोबस्त आवश्यकता क्यों ? जब देश में उद्योगों का विकास नहीं हुआ था तो समस्त अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। उस समय राजा को सर्वाधिक कर की प्राप्ति कृषि से होती थी। अतः भू राजस्व आय प्राप्त करने के लिए भूमि बंदोबस्त व्यवस्था लागू की जाती थी । दरअसल जब भी कोई राजवंश का अंत होता है तब एक नया राजवंश नयी बंदोबस्ती लाता है।  हालांकि ब्रिटिश शासन से पहले सभी शासकों ने मनुस्मृति में उल्लेखित भूमि बंदोबस्त व्यवस्था का प्रयोग किया था । ब्रिटिश काल के प्रारंभिक समय में पहला भूमि बंदोबस्त 1815 में लाया गया। तब से लेकर अब तक कुल 12 भूमि बंदोबस्त उत्तराखंड में हो चुके हैं। हालांकि गोरखाओ द्वारा सन 1812 में भी भूमि बंदोबस्त का कार्य किया गया था। लेकिन गोरखाओं द्वारा लागू बन्दोबस्त को अंग्रेजों ने स्वीकार नहीं किया। ब्रिटिश काल में भूमि को कुमाऊं में थात कहा जाता था। और कृषक को थातवान कहा जाता था। जहां पूरे भारत में स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी बंदोबस्त और महालवाड़ी बंदोबस्त व्यवस्था लागू थी। वही ब्रिटिश अधिकारियों ने कुमाऊं के भू-राजनैतिक महत्

कत्यूरी राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

 कत्यूरी राजवंश का इतिहास भाग -1 अमोघभूति कुणिद वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। कुणिद वंश उत्तराखंड में लगभग तीसरी- चौथी शताब्दी की पहली राजनीतिक शक्ति थी । जबकि कत्यूर राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला पहला ऐतिहासिक शक्तिशाली राजवंश था। इसे कार्तिकेयपुर वंश के नाम से भी जाना जाता है। 'कत्यूरी' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग एटकिंसन ने किया था।  कत्यूरी राजवंश के संस्थापक बसंत देव थे । जिन्हें बासुदेव के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी। पांडुकेश्वर ताम्रलेख में पाए गए कत्यूरी राजा ललितशूर के अनुसार कत्यूरी शासकों की प्राचीनतम राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी । बाद में नरसिंह देव ने जोशीमठ से बैजनाथ (बागेश्वर ) में राजधानी स्थानांतरित कर दी । जहां से कत्यूरी राजवंश को विशिष्ट पहचान मिली । कत्यूरी राजवंश का उदय कुणिंदों के पतन के पश्चात देवभूमि उत्तराखंड की भूमि पर कुछ नए राजवंशों का उदय हुआ। जैसे गोविषाण, कालसी लाखामंडल आदि जबकि कुछ स्थानों पर कुणिंद भी शासन करते रहे। कुणिंदो के बाद शक, कुषाण और यौधेय  वंश के शासकों ने कुछ क्षेत्रों पर शासन व्यवस्था स्थ

उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न (उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14)

उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14 उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां वर्ष 1965 में केंद्र सरकार ने जनजातियों की पहचान के लिए लोकर समिति का गठन किया। लोकर समिति की सिफारिश पर 1967 में उत्तराखंड की 5 जनजातियों थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा, और राजी को एसटी (ST) का दर्जा मिला । राज्य की मात्र 2 जनजातियों को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है । सर्वप्रथम राज्य की राजी जनजाति को आदिम जनजाति का दर्जा मिला। बोक्सा जनजाति को 1981 में आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ था । राज्य में सर्वाधिक आबादी थारू जनजाति तथा सबसे कम आबादी राज्यों की रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल एसटी आबादी 2,91,903 है। जुलाई 2001 से राज्य सेवाओं में अनुसूचित जन जातियों को 4% आरक्षण प्राप्त है। उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न विशेष सूचना :- लेख में दिए गए अधिकांश प्रश्न समूह-ग की पुरानी परीक्षाओं में पूछे गए हैं। और कुछ प्रश्न वर्तमान परीक्षाओं को देखते हुए उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित 25+ प्रश्न तैयार किए गए हैं। जो आगामी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। बता दें की उत्तराखंड के 40 प्रश्नों में से 2

गोरखा शासन : उत्तराखंड का इतिहास

    उत्तराखंड का इतिहास           गोरखा शासन (भाग -1) पृष्ठभूमि मल्ल महाजनपद का इतिहास (आधुनिक नेपाल) 600 ईसा पूर्व जब 16 महाजनपदों का उदय हुआ। उन्हीं में से एक महाजनपद था - मल्ल (आधुनिक नेपाल का क्षेत्र)। प्राचीन समय में नेपाल भारत का ही हिस्सा था। मल्ल महाजनपद का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ के " अगुंत्तर निकाय " में किया गया है। और जैन ग्रंथ के भगवती सूत्र में इसका नाम " मौलि या मालि " नाम से जनपद का उल्लेख है। मल्ल महाजनपद की प्रथम राजधानी कुशीनगर थी । कुशीनगर में गौतम बुद्ध के निर्वाण (मृत्यु) प्राप्त करने के बाद उनकी अस्थि-अवशेषों का एक भाग मल्लो को मिला था । जिसके संस्मारणार्थ उन्होंने कुशीनगर में एक स्तूप या चैत्य का निर्माण किया था। मल्ल की वित्तीय राजधानी पावा थी । पावा में ही महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था ।                 322 ईसा पूर्व समस्त उत्तर भारत में मौर्य साम्राज्य ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। मल्ल महाजनपद भी मौर्यों के अधीन आ गया था। गुप्त वंश के बाद उत्तर भारत की केंद्र शक्ति कमजोर हो गई । जिसके बाद  लगभग 5वीं सदीं में वैशाली से आए 'लिच्