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हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि) हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है. भाषा का विकास  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.) 2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.) 3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ ) 4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ) 5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.) 6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में) *1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है वर्णमाला वर्ण क्या है?  उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है। वर्णमाला वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। हिंदी लिपि के चिन्ह अ आ इ ई उ ऊ ऋ  ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ

उत्तराखंड का काशी : उत्तरकाशी का इतिहास

 उत्तराकाशी का इतिहास

           देवभूमि उत्तराखंड

क्या आप जानते हैं उत्तराखंड में एक ऐसा शिवालय है जहां कहा जाता है कि इसके दर्शन मात्र से ही वाराणसी के काशी के बराबर दर्शन पाने का सुख मिलता है जहां गंगा नदी का उद्गम स्थल गोमुख है। वह स्थान है - उत्तरकाशी
           उत्तरकाशी के नाम से ही स्पष्ट है - "उत्तर का काशी" भारत में यूं तो तीन काशी प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश में स्थित 'काशी का वाराणासी' के बारे में तो संपूर्ण विश्व जानता है । लेकिन इसके अतिरिक्त भी उत्तराखंड में दो प्रमुख काशी हैं-
(1) उत्तरकाशी और (2) गुप्तकाशी (रूद्रप्रयाग)।

आज हम उत्तरकाशी शहर का इतिहास और उत्तरकाशी जनपद की संपूर्ण व्याख्या करेंगे, जो परीक्षाओं की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थल है।

उत्तरकाशी का पौराणिक इतिहास

एक कहानी तो आप सभी ने कक्षा तृतीय में पढी होगी, 'राजा सगर के साठ हजार पुत्रों और भगीरथ की' जो अपने कठोर तप से गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। शायद आप उस समय छोटे थे जिस कारण आपको केवल कहानी याद रही होंगी, शायद ही किसी ने उस स्थान के बारे में ध्यान दिया होगा या सोचा होगा, कि भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया था। वह स्थान कहां है? बता दूं कि जिस स्थान पर गंगा उतरी थी वह स्थान आज गोमुख या गंगोत्री पर्वत के नाम से जाना जाता है। गोमुख को गंगा नदी का उद्गम स्थल कहा जाता है। गोमुख उत्तरकाशी में स्थित है। वैज्ञानिक दृष्टि से गोमुख वह स्थान है, जहां गंगोत्री ग्लेशियर का निर्माण होता है और गोमुख से गंगा नदी भागीरथी के नाम से निकलती है । कहा जाता है कि गोमुख की बनावट राजस्थान के आबू पर्वत के गोमुख जैसी है। मुझे लगता है शायद आप कहानी भूल चुके होंगे, इसलिए एक बार संक्षेप में कहानी का वर्णन करना आवश्यक है, जिससे उत्तरकाशी का इतिहास अत्याधिक रोचक हो जाएगा। अतः ध्यानपूर्वक कहानी पढ़ें।

                         कहानी - राजा भागीरथ

रामायण में वर्णित कथानुसार इक्ष्वाकु वंश में सगर नामक एक प्रसिद्ध राजा थे। उन्हें भगवान राम और भगीरथ का पूर्वज कहा जाता है। राजा सगर की दो रानियां थी - केशिनी और सुमति । लेकिन राजा सगर की दो रानियां के बावजूद कोई संतान नहीं थी। जिस कारण वह काफी दुखी रहते थे तब एक ऋषि ने संतान प्राप्ति के लिए उन्हें उपाय बताया और संतान प्राप्ति के लिए हिमालय पर्वत में तपस्या करने को कहा। तत्पश्चात राजा सगर अपनी दोनों रानियों के साथ हिमालय पर्वत पर जाकर पुत्र प्राप्ति के लिए तपस्या करने लगे। भगवान ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महाऋषि भृंगु उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को 60,000 पुत्र होंगे और दूसरी रानी से एक पुत्र होगा जो वंश को आगे बढ़ाएगा। कहा जाता है कि वरदान के कुछ दिनों बाद रानी सुमति ने तूँबी के आकार के एक गर्भपिंड को जन्म दिया । जब सारे पुत्र युवा हो गए तो राजा सगर अभिमानी हो गया और उसने अपनी ताकत और शक्ति प्रदर्शन के लिए अश्वमेध यज्ञ कराया । उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्वमेघ के घोड़ों की सुरक्षा में नियुक्त किया। परंतु देवराज इंद्र ने राजा और राजा के पुत्रों का घमण्ड चूर करने के लिए छलपूर्वक घोड़े का चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। जब घोड़ा समय से वापस नहीं पहुंचा तो साठ हजार पुत्रों ने घोड़े को ढूंढना शुरू कर दिया। और ढूंढते हुए वे सभी कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे। कपिल मुनि उस समय ध्यान में लीन थे। साठ हजार पुत्रों ने आश्रम में घोड़े को देखकर अत्यधिक शोर-शराबा करने लगे । उन्होंने कपिल मुनि को चोर कहा और उन्हें अपमानित किया। राजकुमारों के शोर से ऋषि का ध्यान टूटा और क्रोध आ गया। उन्होंने क्रोधवश सगर के साठ हजार पुत्रों को भस्म कर दिया। राजा सगर को जब सभी बातों की जानकारी हुई तो उन्होंने कपिल मुनि से क्षमा याचना मांगी और अपने पुत्रों की मुक्ति का उपाय पूछा। तब कपिल मुनि ने राजा सगर से कहा की स्वर्ग की नदी गंगा जब इनके अवशेषों को स्पर्श करेगी तो इनकी मुक्ति मिलेगी।

पौराणिक कथाओं के अनुसार उत्तरकाशी में ही राजा सगर के वंशज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने एक पैर पर 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें वरदान दिया और कहा कि भगवान शिव धरती पर आ रही गंगा का वेग धारण कर लेंगे। स्वर्ग से धरती पर आ रही गंगा शिव ने अपनी जटाओं में बांध लिया। और गंगा की एक धारा को लेकर भगीरथ कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे इससे राजा सगर के पुत्रों को मुक्ति मिली।

उत्तराखंड में काशी की स्थापना की ?

उत्तरकाशी का प्राचीन नाम "बाड़ाहाट" है । विश्वनाथ मंदिर के कारण इसका नाम उत्तरकाशी पड़ा। कहा जाता है की वैदिक काल में काशी को श्राप मिला था कि कलयुग में "वाराणसी का काशी" यवनों के संताप से अपवित्र हो जाएगा। इस श्राप से व्याकुल होकर देवताओं और ऋषि-मुनियों ने भगवान शिव से उनकी उपासना का स्थान पूछा? तब उन्होंने बताया कि काशी सहित सभी तीर्थों के साथ में हिमालय पर निवास करेंगे । इसी कारण वरुणापर्वत पर अस्सी और भागीरथी संगम पर देवताओं द्वारा उत्तरकाशी बसाई गई। वर्तमान में उत्तरकाशी में वे सभी मंदिर एवं घाट स्थित है जो वाराणसी में स्थित है । इसमें विश्वनाथ मंदिर, अन्नापूर्ण मंदिर, भैरव मंदिर समेत माणिकर्णिका घाट एवं केदार घाट आदि शामिल हैं। केदारखंड में वर्णित कथानुसार उत्तर काशी में विश्वनाथ मंदिर भगवान परशुराम ने बनवाया था। उत्तरकाशी को प्राचीन समय में "विश्वनाथ की नगरी" कहा जाता था। पुराणों में उत्तराकाशी को  "सौम्यकाशी" के नाम से भी संबोधित किया गया है । महारानी सुदर्शन शाह की पत्नी कांति ने 1857 ई में इस मंदिर की मरम्मत करवायी थी। 

मान्यता है कि कलयुग में उत्तरकाशी ही एकमात्र ऐसा तीर्थस्थल है। जहां भगवान भोलेनाथ इस नगर के बीचों-बीच काशी विश्वनाथ के रूप में विराजमान हैं । उत्तरकाशी शहर मां भागीरथी के तट पर स्थित भव्य मंदिर है। यह आस्था का बड़ा केंद्र है। मंदिर उत्तरकाशी के बस स्टैंड 300 मीटर की दूरी में स्थित हैं । यहां प्रतिवर्ष बिस्सू मेलाठर पूजा उत्सव, कण्डक मेला , समेश्वर मेला और बाड़ाहाट का मेला लगता हैं।

ऐतिहासिक इतिहास

ह्वेनसांग ने उत्तरकाशी क्षेत्र के लिए अपनी यात्रा वृतांत में "शत्रुघ्न" से संबोधित किया है। उत्तरकाशी जनपद में स्थित पुरोला देवढूंगा , से कुणिंदशासक अमोघभूति की यज्ञ वेदिका प्राप्त हुई है। छठी शताब्दी के पश्चात उत्तरकाशी जनपद के क्षेत्र में परमार वंश के राजाओं ने शासन किया। परमार शासक अजय पाल ने अपनी राजधानी चांदपुरगढ़ से श्रीनगर स्थापित की। 1803 ईसवी से 1815 ईसवी तक यह क्षेत्र गौरखा सैनिकों के अधीन रहा। गढ़वाल में 1803 ईसवी में आए भूकंप के कारण भागीरथी नदी ने अपनी धार बदल ली। अंग्रेजों के सहयोग से सुदर्शन शाह ने गढ़वाल को गोरखा सैनिकों से आजाद करवाया बदले में अंग्रेजों को गढ़वाल का कुछ क्षेत्र देना पड़ा । 4 मार्च 1820 में सुदर्शन शाह एवं ब्रिटिश सरकार के मध्य एक संधि हुई। जिसके अनुसार ब्रिटिश सरकार टिहरी गढ़वाल पर राजा सुदर्शन व उनके वंशजों का अधिकार स्वीकार किया। उत्तरकाशी के कुछ क्षेत्र टिहरी गढ़वाल प्रशासन के अधीन था। जिसमें सुदर्शन शाह ने रवांई क्षेत्र को 1824 ईसवी में टिहरी रियासत में शामिल किया गया। 30 मई 1930 ईस्वी में रवांई क्षेत्र में तिलाड़ी कांड नामक घटना घटी। तिलाड़ी कांड को "उत्तराखंड का जलियांवाला बाग हत्याकांड" भी कहा जाता है। आजादी के पश्चात 24 फरवरी 1960 में उत्तरकाशी को एक जनपद के रूप स्थापना की गयी। उत्तरकाशी को 2 नगरपालिका व 6 तहसीलों में विभाजित किया गया है। इसके अतिरिक्त प्रशासन को मजबूत करने के लिए 6 विकासखंड व 2 उप तहसील की बनाई गई है। उत्तरकाशी में 3 विधानसभा क्षेत्र हैं। 

उत्तरकाशी की भौगोलिक स्थिति

उत्तरकाशी मध्य हिमालय व वृहत हिमालय के क्षेत्र में स्थित उत्तराखंड का सबसे उत्तरी जनपद है। इसका कुल क्षेत्रफल 8016 वर्ग किलोमीटर है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह उत्तराखंड का सबसे बड़ा जनपद है (आयोग के अनुसार) जबकि दूसरे स्थान पर चमोली है। उत्तरकाशी वरुणा पर्वत की तलहटी में भागीरथी नदी के किनारे बसा हुआ विस्तृत क्षेत्र है । इसकी कुल जनसंख्या 3,30,0ं86 है। जनसंख्या की दृष्टि से यह चौथा सबसे कम जनसंख्या वाला जनपद है। क्षेत्रफल अधिक तथा जनसंख्या कम होने के कारण इसका कुल जनसंख्या घनत्व 41 वर्ग किलोमीटर है। अर्थात 1 वर्ग किलोमीटर में मात्र 41 लोग ही निवास करते हैं इसलिए उत्तरकाशी को सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाला जिला कहा जाता है । जिस तरह उत्तरकाशी का आकार बड़ा है ठीक उसी तरह यहां अनेक पहाड़, दर्रे, नदी, झीलें और ग्लेशियर हैं।

उत्तरकाशी के प्रमुख दर्रे व घाटियां


दो या दो से अधिक पहाड़ों के बीच की जगह या पहाड़ों के बीच आने-जाने वालों के लिए एक पतले रास्ते को दर्रा कहा जाता है। ये वे प्राकृतिक मार्ग हैं जिनसे होकर पहाड़ों को पार किया जाता है। अधिकांश घाटियां दर्रो के पास स्थित होती है। क्योंकि जब दर्रों के बीच की गहराई बढ़ जाती तब वह घाटी कहलाती  है। अर्थात दो या दो से अधिक पहाड़ो के बीच का गहरा भाग ही घाटी है, आमतौर गहराई अधिक होने के कारण इनमें नदी का प्रवाह पाया जाता है। जैसे - उत्तराकाशी में नेलांग दर्रा व नेलांग घाटी और बारसू दर्रा व बारसू घाटी स्थित हैं। नेलांग घाटी को उत्तरकाशी में पहाड़ का रेगिस्तान कहा जाता है।
  1. नेलांग दर्रा,  थांगला दर्रा, मुलिंगला दर्रा और सागचौकला दर्रा  उत्तरकाशी और तिब्बत के बीच में स्थित हैं। इसमें नेलांग को छोड़कर शेष सभी उत्तरकाशी से तिब्बत के पर्वतों के बीच 3 अलग-अलग पतले रास्ते का निर्माण करते हैं। इसमें थांगला दर्रा 6079 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। थांगला दर्रा के पास से ही जाडगंगा नदी निकलती है । हरकी दून व किन्नौर घाटी के बीच बारसू दर्रा व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
  2. उत्तरकाशी और हिमाचल प्रदेश के बीच श्रृंगकंठ दर्रा है। इस दर्रे की ऊंचाई लगभग 1500 है।
  3. उत्तरकाशी व चमोली के बीच कालिंदी दर्रा है।
  4. बाली पास दर्रा उत्तरकाशी के यमुनोत्री में स्थित है। इसके अतिरिक्त आर्डन कार्ल दर्रा उत्तरकाशी से भिलंगना घाटी के मार्ग के लिए जाता है।
  5. मांझी बन फूलों की घाटी , बासपा घाटी (हर्षिल) व भैरव घाटी (भटवाड़ी) उत्तरकाशी में स्थित है।

उत्तरकाशी में पर्वत श्रेणी

उत्तरकाशी जनपद मध्य हिमालय व वृहत हिमालय के क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहां चमोली जिले के बाद सर्वाधिक पर्वत स्थित है। चमोली व उत्तरकाशी जनपद के बीच स्थित केदारनाथ उत्तरकाशी जनपद का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित पर्वत है।  इसकी ऊंचाई  6968 मीटर है। उत्तरकाशी जिले का दूसरा ऊंचा पर्वत थलैया सागर है जिसकी ऊंचाई 6904 मीटर है। यह पर्वत गंगोत्री ग्लेशियर के दक्षिण में स्थित है। उत्तराखंड का चौथा व भारत का 13 वां सबसे ऊंचा पर्वत है। साथ ही मेरु पर्वत जिसकी ऊंचाई 6660 मीटर है यह पर्वत थलैया शिखर व शिवलिंग शिखर के बीच में स्थित है। इसके निकट ही सुमेरू पर्वत (6331) है। इसके अतिरिक्त उत्तरकाशी के प्रमुख पर्वत निम्न  है -:
  1. भागीरथी पर्वत (6856 मी.) - इस पर्वत में राजा भागीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए एक पैर से खड़े होकर वर्षों तक तपस्या की थी। इसलिए इसे भागीरथ पर्वत कहा जाता है। इसकी ऊंचाई 6856 मीटर है।
  2. श्रीकंठ पर्वत (6728 मी.)
  3. गंगोत्री पर्वत (6672 मी.) - गंगोत्री पर्वत में गंगोत्री ग्लेशियर स्थित है जो राज्य का सबसे बड़ा हिमनद है जिसकी लंबाई 30 किलोमीटर तथा चौड़ाई 2 किलोमीटर है। इसमें कीर्ति ग्लेशियर (7 किमी) व चतुरंगी ग्लेशियर (16 किमी) गंगोत्री पर्वत पर स्थित हैं।
  4. यमुनोत्री पर्वत (6400 मी.) - यमुनौत्री पर्वत में सूर्यकुंड कुंड व सप्तऋषि कुंड स्थित है। सूर्य कुंड को गर्म पानी का कुंड कहा जाता है । सप्तऋषि कुंड को पुराणों में 'मलिंग सरोवर' कहा गया है। जौंधर, सियार, चारण, बमक आदि ग्लेशियर यमुनोत्री में स्थित है।
  5. जैलंग पर्वत (5781 मी.)
  6. बंदरपूंछ पर्वत (6320 मी.) - बंदरपूंछ पर्वत उत्तरकाशी जिले के यमुनोत्री में स्थित है । इस पर्वत में 12 किलोमीटर के दायरे में बंदरपूंछ ग्लेशियर स्थित है। कलिंग पर्वत इसी पर्वत श्रेणी का ही हिस्सा है।
  7. स्वर्गारोहिणी पर्वत (6252 मी.) - यह पर्वत चमोली उत्तरकाशी में पड़ता है।
उत्तरकाशी में कुछ ऐसे पर्वत भी हैं जिनका उल्लेख आपको कुछ  किताबों में ही मिलेगा जैसे - खुंटा पर्वत, त्रिमुखी पर्वत, फतेह पर्वत,  कीर्ति स्तंभ पर्वत , इंद्रकील पर्वत,  भैरोझाप पहाड़ , जोगिन ज्योति , द्रौपदी का डांडा,  राड़ी का डांडा , कालानाग या काली चोटी आदि।

उत्तरकाशी जनपद की प्रमुख नदियां

भागीरथी नदी (गंगा)

उत्तराखंड में गंगा नदी को गंगा के नाम से देवप्रयाग के बाद जाना जाता है। जबकि गंगोत्री से देवप्रयाग तक इसे भागीरथी के नाम से जाना जाता है। भागीरथी नदी का उद्गम स्थल गंगोत्री ग्लेशियर (गोमुख) है। सर्वप्रथम भागीरथी में रूद्रगंगा गंगोत्री के पास में मिलती है। गोमुख से गंगोत्री के बीच भागीरथी में अकाशगंगा मिलती है। गंगोत्री के निकट ही भैरव घाटी है। जहां जाड़ गंगा अर्थात जाह्नवी नदी भागीरथी से मिल जाती है। जाह्नवी नदी थांगला दर्रा के पास हिमनद से निकलती है। उसके बाद केदार गंगा मिलती है। 
             गंगौरी नामक स्थान पर भागीरथी नदी में अस्सी गंगा मिलती है। जहां वरुणापर्वत पर अस्सी और भागीरथी संगम पर देवताओं द्वारा उत्तरकाशी बसाया गया था। देवप्रयाग में भागीरथी (सास) व अलकनंदा (बहु) का संगम होने के बाद गंगा नाम से आगे बढ़ती है । गोमुख से देवप्रयाग से तक भागीरथी की लंबाई 205 किलोमीटर है तथा देवप्रयाग से हरिद्वार तक गंगा की नदी लम्बाई 96 किलोमीटर है। भारत में गंगा नदी की कुल लंबाई 2525 किलोमीटर है। भागीरथी नदी व भिलंगना नदी के संगम पर टिहरी बांध बना हुआ है।

यमुना नदी 


यमुना नदी उत्तरकाशी के बंदरपूंछ पर्वत के दक्षिण पश्चिमी घाट पर स्थित यमुनोत्री हिमनद के यमुनोत्री कांठा नामक स्थान से निकलती है। इसे कालिंदी नदी भी कहा जाता है। पुराणों में यमुना को सूर्यपुत्री, यम की बहन एवं कृष्णा की पटरानी बताया गया है । यमुना नदी की लंबाई उत्तराखंड राज्य में 136 किलोमीटर है जबकि इलाहाबाद तक इसकी लंबाई 1384 किलोमीटर है। यमुना की प्रमुख सहायक नदी टोंस नदी है जो कालसी के पास यमुना में मिल जाती है।  देहरादून के धालीपुर में यमुना नदी राज्य से बाहर हो जाती है।  इसके अतिरिक्त यमुना की सहायक नदियां ऋषि गंगा , हनुमान गंगा, बनाड़ गाड, मुगरा गाड, गडोली गाड, कमल गाड़, खतनु गाड़ आदि हैं ।  

टोंस नदी

टोंस नदी उत्तरकाशी के बंदरपूछ पर्वत की स्वर्गारोहिणी हिमनद से निकलने वाली सूपिन नदी और हिमाचल प्रदेश से निकलने वाली रूपिन नदी से मिलकर बनती है। टोंस नदी उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश का बॉर्डर निर्धारित करती है। टोंस की सहायक नदी खूनी गाड और मौना गाड हैं। टोंस नदी 148 किलोमीटर बहने के बाद कालसी के आसपास यमुना में मिल जाती है यह नदी राज्य में सर्वाधिक वनाच्छादित नदी घाटी है।

उत्तरकाशी की प्रमुख झीलें

डोडीताल उत्तराकाशी की सर्वाधिक प्रसिद्ध ताल है। डोडीताल  6 कोनो वाला ताल है जो सुंदर मछलियों के लिए प्रसिद्ध है । अस्सी गंगा डोडीताल के पास से निकलती है। डोडी ताल का नाम हिमालय ब्राउन ट्राउन प्रजाति की मछलियों के नाम पर रखा गया है। डोडीताल के पास काणा ताल है। 'फाचकंडी बयांताल' उत्तरकाशी जिले में गर्म पानी का ताल है। इसके अतिरिक्त यहां नचिकेता ताल, केदारताल,  , सरताल , खेड़ा ताल , मंगुलाछु ताल आदि है। मंगलाछु ताल खास विशेषता यह है कि ताली बजाने से ताल में बुलबुले निकलते हैं। साथ ही यहां मंदाकिनी झरना उत्तरकाशी के हर्षिल में स्थित है तथा खराड़ी झरना गंगनानी में स्थित है।

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 कत्यूरी राजवंश का इतिहास भाग -1 अमोघभूति कुणिद वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। कुणिद वंश उत्तराखंड में लगभग तीसरी- चौथी शताब्दी की पहली राजनीतिक शक्ति थी । जबकि कत्यूर राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला पहला ऐतिहासिक शक्तिशाली राजवंश था। इसे कार्तिकेयपुर वंश के नाम से भी जाना जाता है। 'कत्यूरी' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग एटकिंसन ने किया था।  कत्यूरी राजवंश के संस्थापक बसंत देव थे । जिन्हें बासुदेव के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी। पांडुकेश्वर ताम्रलेख में पाए गए कत्यूरी राजा ललितशूर के अनुसार कत्यूरी शासकों की प्राचीनतम राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी । बाद में नरसिंह देव ने जोशीमठ से बैजनाथ (बागेश्वर ) में राजधानी स्थानांतरित कर दी । जहां से कत्यूरी राजवंश को विशिष्ट पहचान मिली । कत्यूरी राजवंश का उदय कुणिंदों के पतन के पश्चात देवभूमि उत्तराखंड की भूमि पर कुछ नए राजवंशों का उदय हुआ। जैसे गोविषाण, कालसी लाखामंडल आदि जबकि कुछ स्थानों पर कुणिंद भी शासन करते रहे। कुणिंदो के बाद शक, कुषाण और यौधेय  वंश के शासकों ने कुछ क्षेत्रों पर शासन व्यवस्था स्थ

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उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14 उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां वर्ष 1965 में केंद्र सरकार ने जनजातियों की पहचान के लिए लोकर समिति का गठन किया। लोकर समिति की सिफारिश पर 1967 में उत्तराखंड की 5 जनजातियों थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा, और राजी को एसटी (ST) का दर्जा मिला । राज्य की मात्र 2 जनजातियों को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है । सर्वप्रथम राज्य की राजी जनजाति को आदिम जनजाति का दर्जा मिला। बोक्सा जनजाति को 1981 में आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ था । राज्य में सर्वाधिक आबादी थारू जनजाति तथा सबसे कम आबादी राज्यों की रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल एसटी आबादी 2,91,903 है। जुलाई 2001 से राज्य सेवाओं में अनुसूचित जन जातियों को 4% आरक्षण प्राप्त है। उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न विशेष सूचना :- लेख में दिए गए अधिकांश प्रश्न समूह-ग की पुरानी परीक्षाओं में पूछे गए हैं। और कुछ प्रश्न वर्तमान परीक्षाओं को देखते हुए उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित 25+ प्रश्न तैयार किए गए हैं। जो आगामी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। बता दें की उत्तराखंड के 40 प्रश्नों में से 2

गोरखा शासन : उत्तराखंड का इतिहास

    उत्तराखंड का इतिहास           गोरखा शासन (भाग -1) पृष्ठभूमि मल्ल महाजनपद का इतिहास (आधुनिक नेपाल) 600 ईसा पूर्व जब 16 महाजनपदों का उदय हुआ। उन्हीं में से एक महाजनपद था - मल्ल (आधुनिक नेपाल का क्षेत्र)। प्राचीन समय में नेपाल भारत का ही हिस्सा था। मल्ल महाजनपद का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ के " अगुंत्तर निकाय " में किया गया है। और जैन ग्रंथ के भगवती सूत्र में इसका नाम " मौलि या मालि " नाम से जनपद का उल्लेख है। मल्ल महाजनपद की प्रथम राजधानी कुशीनगर थी । कुशीनगर में गौतम बुद्ध के निर्वाण (मृत्यु) प्राप्त करने के बाद उनकी अस्थि-अवशेषों का एक भाग मल्लो को मिला था । जिसके संस्मारणार्थ उन्होंने कुशीनगर में एक स्तूप या चैत्य का निर्माण किया था। मल्ल की वित्तीय राजधानी पावा थी । पावा में ही महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था ।                 322 ईसा पूर्व समस्त उत्तर भारत में मौर्य साम्राज्य ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। मल्ल महाजनपद भी मौर्यों के अधीन आ गया था। गुप्त वंश के बाद उत्तर भारत की केंद्र शक्ति कमजोर हो गई । जिसके बाद  लगभग 5वीं सदीं में वैशाली से आए 'लिच्