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हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि) हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है. भाषा का विकास  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.) 2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.) 3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ ) 4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ) 5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.) 6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में) *1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है वर्णमाला वर्ण क्या है?  उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है। वर्णमाला वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। हिंदी लिपि के चिन्ह अ आ इ ई उ ऊ ऋ  ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ

उत्तराखंड का आधुनिक इतिहास (1815-1857)

आधुनिक उत्तराखंड का इतिहास (भाग -01)

उपयुक्त लेख उत्तराखंड में लोकसभा द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है और मुख्य परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण हैं। लेख में ब्रिटिश शासन स्थापित होने के पश्चात उत्तराखंड में क्या हुआ, क्या बदलाव हुए, किसके द्वारा किए गए। आदि विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है। अतः लेख को पूरा अवश्य पढ़ें। यहां पर 1815 से 1857 के इतिहास का वर्णन किया गया है।

उत्तराखंड में ब्रिटिश प्रशासन व्यवस्था (1815-1857)

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि 1815 में कुमाऊं और गढ़वाल में ब्रिटिश शासन की स्थापना हो चुकी थी। उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन की स्थापना से पूर्व गोरखों का शासन था। जिन्होंने जनता का सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न किया था इसलिए गढ़वाल में गोरखा शासन को "गोरख्याली" नाम से संबोधित किया गया। गोरखों का उत्तराखंड में शोषण अत्यधिक बढ गया था। जिस कारण यहां के राजवंश और स्थानीय जनता ने गोरखों को भगाने के लिए अंग्रेजी सेना से सहयोग लिया।

ब्रिटिश प्रशासन

उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन की स्थापना से परंपरागत सामंती मूल्यों और प्रथाओं पर आधारित शासन समाप्त हो गया था। इसके स्थान पर ब्रिटिश प्रशासकों ने उत्तराखंड में ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्र में पहली बार लिखित कानूनों पर आधारित प्रशासन के माध्यम से जनता को न्याय पूर्ण और सुव्यवस्थित शासन स्थापित करने की कोशिश की। उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन की स्थापना के समय भारत का ब्रिटिश गवर्नर लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813-1823) था।

अंग्रेजी सरकार ने शुरुआत में प्रशासनिक व्यवस्था का दायित्व विलियम फ्रेजर को सौंपा था उसने केंद्रीय सरकार की नीतियों के अनुरूप जनता को पूर्ण सुरक्षा और सुव्यवस्थित शासन का वचन देते हुए उन्हें उनके सामाजिक धार्मिक विश्वासों की रक्षा करने का आश्वासन दिया। गोरखा शासन के अस्त-व्यस्त शासन और अर्थव्यवस्था को सुधारने के उद्देश्य से फ्रेजर ने कुमाऊं गढ़वाल की स्थिति से सरकार को अवगत कराया। तत्पश्चात जमीदारों के माध्यम से उजड़े हुए गांव को नए सिरे से विस्थापित करने का कार्य आरंभ किया गया। और साथ ही कुमाऊं का प्रथम कमिश्नर एडवर्ड गार्डनर को नियुक्त किया गया। गार्डनर ने कुमाऊं में डाक व्यवस्था लागू की।

ब्रिटिश कमिश्नरों द्वारा किए गए सुधार

ब्रिटिश उत्तराखंड में प्रशासन की बागडोर संभालने के लिए कमिश्नरों की नियुक्ति की गई। ब्रिटिश प्रशासकों ने अपने शासन के आरंभिक वर्षों में प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों पर ध्यान दिया। जिसमें सबसे पहला कार्य भू-सुधार था जिसके अंतर्गत किसानों को पहली बार जोत पर अधिकार प्रदान किए गए । इन सुधारकों में कुमाऊं कमिश्नर ट्रेल, बैटन और रैमजे का नाम उल्लेखनीय है। कुमाऊं में ब्रिटिश शासन स्थापित होने के बाद 1815 से 1857 क्रांति के बीच उत्तराखंड के दूसरे ब्रिटिश कमिश्नर ट्रेल का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा।

1857 की क्रांति से पूर्व उत्तराखंड का इतिहास

1815 में ट्रेल को पर्वतीय क्षेत्र की अर्थव्यवस्था निर्धारित करने का दायित्व सौंपा। ट्रेल कुमाऊं कमिश्नर ई. गार्डनर के सहायक के रूप उत्तराखंड आए थे। और बाद में उन्हें दूसरा कमिश्नर नियुक्त किया गया।

पर्वतीय क्षेत्र में ब्रिटिश शासन की स्थापना के उपरांत गोरखा अत्याचारों से पीड़ित व्यक्ति जो अपने गांव छोड़कर दूसरे स्थानों पर बस गए थे वे सभी शांति और सुव्यवस्थित का वातावरण देखकर अपने अपने गांव वापस लौट कर आने लगे । उन्होंने ब्रिटिश शासकों को प्रार्थना पत्र देकर पैतृक जमीदारी लौटाने के लिए आवेदन किया । इस संदर्भ में छानबीन करने के उपरांत किसानों को भू स्वामित्व का अधिकार प्रदान किया गया। ट्रेल ने पहला भूमि बंदोबस्त कुमाऊं कमिश्नर ई.गार्डनर के द्वारा लागू करवाया था।

ट्रेल का पहला भूमि बंदोबस्त गोरखा शासन और गढनरेशों की गांव पर निर्धारित कर प्रणाली पर आधारित था लेकिन ट्रेल की व्यवस्था की विशेषता से जागीरदार और उसके सैन्य अधिकारी द्वारा कर वसूली और ग्रामों की व्यवस्था में हस्तक्षेप सीमित हो गया था। ट्रेल ने गढ़वाल में उजाड़ी हुई कृषि व्यवस्था को नए सिरे से स्थापित करते हुए आरंभ में भूमि कर 37506 निर्धारित किया। लेकिन कुल ₹35990 ही वसूल किए जा सके। इस घाटे को पूरा करने के उद्देश्य से चुंगी व आबकारी करों में वृद्धि कर राजस्व बढ़ाया गया। इससे पहले गोरखा शासन में जनता से भूमि कर के रूप में ₹87725 का लक्ष्य निर्धारित किया गया था किंतु गोरखों द्वारा अव्यवस्थित नीति अर्थात मार, धाड़ व जबर्दस्ती करके के ₹37000 से अधिक कभी वसूली नहीं कर पाए। और ट्रेल ने आसानी से अपना लक्ष्य पूरा कर लिया।

ट्रेल की दूसरे भू बंदोबस्त का उद्देश्य पट्टे में भूमि देकर गांव से निर्धारित राजस्व को प्राप्त करना था। ट्रेल ने सुधारों के अंतर्गत राजस्व वृद्धि का आधार प्रत्येक गांव में बीते वर्ष जमा किए राजस्व को आधार मानकर उसमें वृद्धि की। और इसके अलावा  समाज में सामंती प्रथा का अंत कर इसे सुनिश्चित नियमों के साथ पुनः स्थापित किया था।


ट्रेल ने अपने प्रशासनिक कार्यकाल के अंतर्गत सात बार भू-सुधार किया था। प्रत्येक भूमि व्यवस्था में कर वृद्धि की गई थी। यदि आप ट्रेल द्वारा लागू किए गए सभी भूमि बंदोबस्त के बारे में अध्ययन करना चाहते हैं तो दिए गए लिंक पर क्लिक करें। 

उत्तराखंड में भूमि बन्दोबस्त व्यवस्था (विस्तार से)

अन्य कमिश्नर द्वारा सुधार



  • ट्रेल की भू-व्यवस्था के उपरांत 8, 9 10, 10, 11 भू-व्यवस्था क्रमशः बैटन, बेकेट, पौ, इबटसन द्वारा लागू किए गए।
  • पौ के भू-सुधारों की उल्लेखनीय विशेषता कैडेस्ट्राल सर्वे था। इसके माध्यम से पहली बार वैज्ञानिक आधार पर "भूमि की पैमाइश" कर कृषि भूमि का विस्तार किया गया।
  • पौ के उपरांत गढ़वाल में अंतिम भुगतान भू-व्यवस्था "इबटसन" के कार्यकाल में सन 1926-1930 के बीच की गई।

उत्तराखंड में रैयतवाडी भू-व्यवस्था

ब्रिटिश शासन के पूर्व में भू स्वामित्व केवल राजा के अधिकार में था अन्य जागीरदार, चौकीदार, सयाणा आदि उच्च वर्ग तथा उन पर आधारित हिस्सेदार लाभांश के उपभोक्ता थे। वे खायकर और सिरतान कहलाते थे। भूस्वामी होने के कारण राजा एकमात्र मौरूसीदार था। अंग्रेजी शासन के अधीन उत्तराखंड ब्रिटिश क्षेत्र में रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू की गई । 

उत्तराखंड में हरिजन समाज की भूमिका

उत्तराखंड में ब्रिटिश प्रशासकों के द्वारा किए गए सुधारों के अंतर्गत प्रत्येक गांव में कुछ हरिजन परिवारों को बसाया गया था। यह वर्ग सुख-दुख में सवर्णो के साथ सहयोग करता था। गढ़वाल की सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत शिल्पकार-सवर्णों के बीच सौहार्द के अनुपम अनुकरणीय परंपरा रही थी । विवाह आदि मांगलिक कार्यों के अतिरिक्त यहां का हरिजन वर्ग सवर्णों के साथ किसी कार्य में सहयोग करता था इसके अतिरिक्त गांव के आवश्यक कुटीर शिल्प चिनाई, बड़ईगिरी, शिल्प कार्यो के माध्यम से हरिजनों में स्थानीय स्तर पर अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की थी।

उत्तराखंड में पशुपालन (ब्रिटिश काल)

उत्तराखंड में अंग्रेजी शासन की स्थापना के प्रथम अर्ध शताब्दी तक सभी कृषक पशुओं को बड़ी संख्या में पालते थे। इससे खेतों को प्रचुर मात्रा में खाद मिलती थी अन्य उत्पादन भी अच्छा था इससे भोज्य पदार्थों में दूध का महत्व बढ़ गया। कृषक मवेशियों में मुख्य रूप से गाय, भैंस, गाय, भेड़, बकरी आदि पालते थे किंतु 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों से जनसंख्या बढ़ने से वनो पर सरकारी नियंत्रण होने से पशुचारको के लिए कठिनाइयां उत्पन्न होने लगी। फलस्वरुप धीरे-धीरे पशुपालक के रूप में पशुधन शक्ति मिटने लगी थी । क्षेत्र में पशुपालन से संबंधित उद्योग प्रमुख थे। इनका उपयोग स्थानीय स्तर पर होता था । व्यापारिक दृष्टि से तिब्बत के साथ सोना कीमती पत्थर खनिज ऊन व नमक का मुख्य रूप से आयात निर्यात होता था।

उच्च हिमालय के निवासी तगड़े, गठीले और आत्मसम्मान से भरे थे इसलिए उत्तराखंड में इस हिस्से के लोगों को ही फौज में वरीयता दी थी। प्रशासन ने ईमानदारी, राज भक्ति, के लिए इस क्षेत्र के निवासियों को विशेष सम्मान दिया । प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध में इस क्षेत्र से सेना में विशाल पैमाने में भर्ती हुई । भौगोलिक कठिनाइयों और सैन्य परंपरा के क्षेत्र में व्यापक संगठित, राजनीतिक हलचल नहीं हो पाती थी। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही देश में फैल रही राजनीतिक चेतना ने इस क्षेत्र को प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया था।

मौलाराम और ब्रिटिश प्रशासन

उपयुक्त व्याख्यान से ज्ञात होता है कि गोरखओं के बाद अंग्रेजी शासन ने उत्तराखंड का अत्यधिक विकास किया। और राज्य की जनता पर शोषण की वजह सुविधाएं प्रदान की। और ऐसा प्रदर्शित किया गया कि राज्य के सभी लोग प्रसन्न थे। किन्तु ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। यह सब इतिहास अंग्रेजी इतिहासकारों के अनुसार था। क्योंकि प्रत्येक इतिहासकार अपने देश नीतियों की सकारात्मक पहलुओं का ही उल्लेख करता है। इसके विपरीत भारतीय इतिहासकार मौलाराम जोकि 1815 से 1850 के समय ब्रिटिश प्रशासकों के समकालीन थे उन्होंने अंग्रेजी शासन की आलोचना की है। और अंग्रेजी शासन की तुलना गोरखा शासन से की है। 

मौलाराम लिखता है कि गढ़वाल में आंग्ल शासन की स्थापना के पश्चात गोवध किए जाने से जनता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही थी। अंग्रेज अधिकारी उत्तराखंड में सैनिक छावनी स्थापित करने की कोशिशों में जुटे थे। चालाक और भोग विलास प्रवृत्ति के प्रशासकों के कारण यहां के सामाजिक जीवन और प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार का बोलबाला था। मौलाराम तोमर का कथन था कि "उत्तराखंड में आंग्ल शासन के अधिकारी पूर्ववर्ती गोरखा सैनिकों की भांति स्वैच्छधारी-व्याभिचारी कृत्यों में लिप्त रहकर जनता का उत्पीड़न कर रहे थे" फलस्वरुप यहां महिलाओं का पनघट और जंगलों में घास लकड़ी के लिए जाना दिन प्रतिदिन कठिन होता गया था ।मौलाराम ने इसे गोरखा शासन की पुनरावृति कहा। न्याय की आकांक्षा में पुलिस की शरण में गए व्यक्ति की समस्या सुने बिना कारण ही उसे जेल में ठूंस दिया जाता था। गवाही के आधार पर न्याय देने की नई व्यवस्था के प्रति जनता ने घोर आपत्ति की। क्योंकि इसके अंतर्गत झूठी गवाही तथा धन प्राप्ति के प्रलोभन से नकली गवाह बनाने की को प्रथाओं का चलन और संकेत राजस्व पुलिस से बड़ा हुआ। उत्पीड़न से यह सभी व्यवस्था आंग्ल प्रशासन की देन थी। प्रशासनिक कार्यों में बढ़ती घूसखोरी से स्थानीय जनता पर कष्ट बढ़ते जा रहे थे। फलस्वरुप न्याय व्यवस्था भ्रष्टाचार के वातावरण में शिथिल होने लगी थी । मौलाराम ने अपनी कविताओं के माध्यम से जन समस्याओं की अपेक्षा ईस्ट इंडिया कंपनी में अंग्रेजी नवाबों के उन्मुक्त भोग विलास के जीवन पर अधिक टीका टिप्पणी की।

मौलाराम कौन थे ?

मौलाराम गढ़वाल चित्रशैली के महान चित्रकार थे उनके चित्रों में गढ़वाल चित्रशैली अपने चरमोत्कर्ष पर देखी जा सकती है। इसके अलावा मौलाराम एक कुशल कवि इतिहासकार और राजनीतिज्ञ थे। उत्तराखंड के इतिहास में उनका विशेष योगदान रहा है। मौलाराम का जन्म 1743 ईस्वी में श्रीनगर में हुआ था। इनके पिता का नाम मंगतराम था और माता का नाम रमा देवी था। मौलाराम बहुभाषावादी थे इन्होंने हिंदी, फारसी, संस्कृत के साथ-साथ ब्रजभाषा का भी ज्ञान था। ब्रजभाषा में इनके अनेक रचनाएं आज भी उपलब्ध है। मौलाराम ने मन्मथ संप्रदाय को अपनाया था। हालांकि कहा जाता है कि मौलाराम ने प्रारंभ में गोरखनाथ संप्रदाय के समर्थक थे। 

              मौलाराम को गढ़वाल के परमार वंश के शासकों ने संरक्षण दिया था सर्वप्रथम इन्हें "प्रदीप शाह" ने संरक्षण दिया। क्योंकि यह एक लंबे समय तक जीवित रहे थे इसलिए प्रदीप शाह के बाद इन्हें  ललितशाह, जयकृत शाह  प्रदुम्न शाह , गोरखा सूबेदारों और सुदर्शन शाह ने संरक्षण दिया था। गोरखा शासन के दौरान मौला राम ने गोरखों से अच्छे संबंध स्थापित किए थे और नेपाल के शासक रण बहादुर व विक्रम शाह की प्रशंसा की थी। इन्होंने नेपाल के शासक रण बहादुर को दानवीर कर्ण की उपाधि दी थी। 

मौलाराम ने अपने ग्रंथों में स्वयं के लिए संत तथा साधु शब्द का प्रयोग किया था। 

मौला राम की प्रमुख रचनाएं

  1. गढ़ गीता संग्राम - ब्रज भाषा
  2. मन्मथ सागर - यह एक अध्यात्मिक ग्रंथ है। (हस्तलिखित ग्रंथों में सबसे बड़ा ग्रंथ है )
  3. श्रीनगर दुर्दशा 
  4. गढ़ राजवंश काव्य - मौला राम ने गोरखा वीरों के युद्ध कौशल का वर्णन किया।
  5. गोरखाली-अमल, 
  6. दीवाने-ई-मौलाराम,
  7. बख्तावर-जस-चंद्रिका 

मौलाराम ने पुस्तक 5, 6, 7, में गोरखाओं के क्रूर शासन का वर्णन किया है। इनके अलावा मौलाराम ने कालिदास द्वारा रचित अभिज्ञान शकुंतलम का हिंदी अनुवाद किया है।

मौलाराम के प्रमुख चित्र

राधा-कृष्ण मिलन, कालिया दमन, चकोर प्रिया, मोर प्रिया, कदली प्रिया, अभी सारिक नायिका, उत्कंठा नायिका, महादेवी पर्वत, मयंक मुखी आदि हैं।

इनकी मृत्यु 1833 ई. में हुई थी इनके बाद इनके चित्र नष्ट हो गए ऐसा कहा जाता है।

बैरिस्टर मुकुंदी लाल

बैरिस्टर मुकंदी लाल ने सर्वप्रथम मौलाराम के चित्रों की विश्व प्रसिद्ध दिलाई थी। गढ़वाल पेंटिंग्स "सम नोट्स ऑन मौलाराम" आदि मुकंदी लाल की प्रमुख रचनाएं हैं।

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