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कोठारी आयोग : शिक्षा का एक ऐतिहासिक दस्तावेज

कोठारी आयोग : शिक्षा का एक ऐतिहासिक दस्तावेज 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) से पूर्व, भारत की शिक्षा व्यवस्था औपनिवेशिक प्रभावों और व्यापक असमानताओं से ग्रस्त थी। 1854 की "वुड्स शिक्षा प्रणाली" ने औपनिवेशिक शिक्षा का आधार तैयार किया, जिसमें अंग्रेजी भाषा, पश्चिमी ज्ञान और रटने पर अत्यधिक ज़ोर दिया गया। उच्च शिक्षा को प्राथमिकता दी गई, जबकि प्राथमिक शिक्षा उपेक्षित रही। शिक्षा का उद्देश्य भारतीयों को ब्रिटिश शासन में सहायक बनाना था। इस प्रणाली ने विभिन्न प्रकार के विद्यालयों (सरकारी, मिशनरी, निजी) में शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता में भारी असमानताएं पैदा कीं। जाति, लिंग और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव व्याप्त था। लड़कियों और महिलाओं के लिए शिक्षा तक पहुंच अत्यंत सीमित थी। उस समय पाठ्यक्रम में सैद्धांतिक ज्ञान और रटने पर ज़ोर दिया गया था, जबकि व्यावहारिक शिक्षा और कौशल विकास को नजरअंदाज किया गया था। शिक्षा का मूल्यांकन मुख्य रूप से परीक्षाओं पर आधारित था, जिसके कारण रटने और परीक्षा में सफल होने पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया गया।  स्वतंत्रता के पश्चात भारत में शि

महात्मा गांधी का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान (भाग -01)

महात्मा गांधी (1869-1947) ऐसी कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं है जिसमें महात्मा गांधी से संबंधित प्रश्न ना आया हो? महात्मा गांधी की जीवनी से लेकर उनके समस्त आंदोलनों का हमें पूर्ण ज्ञान होना अति आवश्यक है। इसलिए आज के लेख में हम आपको महात्मा गांधी के सभी आंदोलनों के बारे में बताएंगे। अतः लेख को ध्यानपूर्वक पढ़ें  प्रथम भाग में महात्मा गांधी की जीवनी तथा द्वितीय भाग में महात्मा गांधी आंदोलन और अंततः तृतीय भाग में महात्मा गांधी से संबंधित प्रश्न पूछे जाएंगे। महात्मा गांधी का राष्ट्रीय आंदोलन में क्या योगदान था? आधुनिक भारत के इतिहास में महात्मा गांधी सर्वाधिक लोकप्रिय महापुरुष है। जिनका अपना एक इतिहास है जिसे देश के प्रत्येक नागरिक को अवश्य ही पढ़ना चाहिए क्योंकि भारत को स्वतंत्र कराने में सबसे अधिक योगदान महात्मा गांधी का रहा है। महात्मा गांधी राजनीतिज्ञ संगठन करता एवं सुधारक थे आदर्शवादी राजनीतिज्ञ थे उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह के बल पर देश की जनता को एकत्रित कर अंग्रेजी साम्राज्य से टक्कर ली और अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश किया। जीवन परिचय  महात्मा गांधी के बचपन का नाम मोहनदास करमचंद

Uttrakhand d.led model paper 2023 (mock test -2)

Uttrakhand d.led model paper 2023 सामान्य ज्ञान अध्ययन  (1) 1906 से 1920 के मध्य मोहम्मद अली जिन्ना की भूमिका भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष (संग्राम) में थी (a) अलगाववादी (b) चरमपंथी (c) राष्ट्रवादी (d) राष्ट्रवादी एवं धर्म निरपेक्ष व्याख्या - वर्ष 1906 से 1920 के मध्य मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उस समय उनकी छवि राष्ट्रवादी एवं धर्मनिरपेक्ष थी। Answer - (d) (2) दलित अधिकारों की सुरक्षा के लिए डॉ. बी आर अम्बेडकर ने तीन पत्रिकाएं निकालीं । निम्न में से कौन उनमें से एक नहीं है  (a) मूक नायक  (b) बहिष्कृत भारत (c) बहिष्कृत समाज (d) इक्वालिटी जनता Answer - भारतीय संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉक्टर अंबेडकर ने मूकनायक, बहिष्कृत भारत, इक्वलिटी जनता, जाति के विनाश, हू आर द शूद्राज जैसी कई पत्रिकाएं पुस्तकें लिखी। Answer - (c) (3) ब्रिटिश सरकार ने किस तिथि को भारत को पूर्ण स्वशासन देने की घोषणा की थी ? (a) 26 जनवरी, 1946 (b) 15 अगस्त, 1947 (c) 31 दिसम्बर, 1947 (d) 30 जून, 1948 व्याख्या :- द्वितीय विश्व यद

उत्तराखंड का आधुनिक इतिहास (भाग - 04)

आधुनिक उत्तराखंड का इतिहास (1930-1947) भाग -04 क्योंकि आगे का इतिहास गांधीजी के आंदोलनों से जुड़ा है। इसलिए हम सर्वप्रथम गांधी जी के बारे में जानेंगे और फिर उत्तराखंड के इतिहास को पढ़ेंगे। मित्रों परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण टॉपिक है इसलिए अंत तक जरूर पढ़ें। गांधी जी का उत्तराखंड में आगमन यूं तो गांधीजी उत्तराखंड में प्रथम बार 5 अप्रैल 1915 ईस्वी को हरिद्वार के कुंभ मेले में आए थे। और दूसरी बार राजनीतिक उद्देश्य से सन् 1916 में देहरादून  आए थे। जहां उन्होंने राष्ट्रीय भावना से ओत प्रोत भाषण दिए जिससे वहां की जनता काफी प्रभावित हुई। किंतु उत्तराखंड की यात्रा के उद्देश्य से प्रथम बार जून 1929 में आए थे। जब उत्तराखंड में कुमाऊं परिषद का बोलबाला था उस दौरान देश का राष्ट्रीय आंदोलन गांधीजी के नेतृत्व में आ चुका था। 9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद सर्वप्रथम उन्होंने वर्ष 1917 में बिहार के चंपारण में नील की खेती की दमनकारी प्रणाली के लिए भारत में सत्याग्रह आंदोलन चलाया। उसके बाद 1917 में ही खेड़ा सत्याग्रह और वर्ष 1918 में कपास मिल श्रमिकों के लिए अहमदाबाद स

कुली बेगार आंदोलन -1921 (विस्तार से)

कुली बेगार प्रथा और कुली बेगार आंदोलन  कुली बेगार आंदोलन उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस आंदोलन ने जिस सफलता के साथ क्षेत्र में बरसों से चले आ रहे अत्याचार, अन्याय तथा शोषण के प्रतीक प्रथा की जड़ों का उन्मूलन किया और उत्तराखंड के विभिन्न वर्गों के लोगों ने जिस उत्साह व निर्माता से हिस्सा लिया वह प्रशंसनीय है। इस आंदोलन के अनेक महत्वपूर्ण नेता भी उभर कर आए जिन्होंने आगामी समय में आने वाले आंदोलनों में राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण  योगदान दिया। कुली बेगार प्रथा का प्रारंभ 1815 में ब्रिटिश काल से प्रारंभ होता है तथा कुली बेगार प्रथा का अंत 14 जनवरी 1921 से प्रारंभ होता है। महात्मा गांधी जी ने कुली बेगार आंदोलन को "रक्तहीन क्रांति" की संज्ञा दी थी। कुली बेगार प्रथा का इतिहास  उत्तराखंड में बेगारी का अस्तित्व प्राचीन काल से ही रहा है कत्यूरी, चंद एवं गोरखों के समय बेगार प्रथा को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया। सन् 1815 ई. के पश्चात उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन स्थापित हुआ और बेगारी का नया स्वरूप प्रकट हुआ। ब्रिटिश काल में

उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम (भाग -03)

उत्तराखंड का आधुनिक इतिहास (कुमाऊं और गढ़वाल) भाग -03 दोस्तों आज उत्तराखंड के आधुनिक इतिहास का अति महत्वपूर्ण टॉपिक है। यहां से 2 से 4 प्रश्न उत्तराखंड की प्रत्येक परीक्षा में पूछे जाते हैं अतः लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।  उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम की नींव कैसे और कब पड़ी ? उत्तराखंड स्वतंत्रता संग्राम में किन व्यक्तियों ने सहयोग किया और कौन-कौन से संगठन बनाएं ? इसका विस्तार से अध्ययन करेंगे यहां साथ ही भारत के इतिहास के साथ संबंध बनाते हुए सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं की चर्चा करेंगे।  उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम (1912-1930 ईस्वी) यूं तो उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत 1857 से पहले 1822 में सर्वप्रथम हरिद्वार जिले के कुंजाबहादुरपुर गांव के गुर्जरों द्वारा "कुंजा क्रांति" के रूप में हो चुकी थी। कुंजा क्रांति के बाद 1857 में क्रांति में कुमाऊं के लोग शामिल हुए थे। जिसमें कालू सिंह मेहरा ने "क्रांतिवीर संगठन" की स्थापना की और प्रथम स्वतंत्रा सेनानी कहलाए। किंतु उत्तराखंड में वास्तविक स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत भारत के स्वदेशी आंदोलन से हुई। भारत में

ब्रिटिश कमिश्नर हेनरी रैमजे को कुमाऊं का बेताज बादशाह क्यों कहा जाता है?

कुमाऊं का बेताज बादशाह "हेनरी रैमजे" यह सब तो आप सब ने सुना होगा कि हेनरी रैमजे को कुमाऊं का बेताज बादशाह कहा जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि  सर हेनरी रैम्जे को कुमाऊं का बेताज बादशाह क्यों कहा जाता है ? दरअसल 1857 की क्रांति के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों में हैनरी रैमजे ने अहम भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से 10 मई 1857 से 1 नवंबर 1858 तक इलाहाबाद दरबार में शाही घोषणा तक, कुमाऊं एक शांत क्षेत्र बना रहा। 1857 की क्रांति की आग की लपटें बरेली (प्राचीन रूहेलखंड) तक पहुंच चुकी थी। रुहेलखंड के कमिश्नर एलेग्जेंडर व यूरोपीय सैनिकों व व्यक्तियों ने नैनीताल में शरण ली। इस अवधि में उनके रहन सहन की व्यवस्था से लेकर आंशिक वेतन आदि की व्यवस्था भी रैम्जे द्वारा की गई। और क्रांति से उत्तराखंड को बचाने के लिए उत्तराखंड में मार्शल लॉ लागू किया जिससे पहाड़ का संपर्क देश के अन्य भागों से कट गया। यहां तक कि अंग्रेजों का सामान ढोने हेतु कुली तक मिलने बंद हो गए थे। उत्तराखंड में मार्शल लॉ लागू -1857 1857 में क्रांति की संभावना को देखते हुए उत्तराखंड में हेनरी रैमजे ने पूर्ण सतर्कता का परिचय देते

उत्तराखंड का आधुनिक इतिहास (भाग -02)

उत्तराखंड का आधुनिक इतिहास  भाग -02 (सन् 1857 से सन् 1912 ई. तक) 29 मार्च 1857 में बैरकपुर में भारतीय ब्रिटिश सैनिकों द्वारा चर्बी लगे कारतूस का प्रयोग से इनकार करना एवं मंगल पांडे का बलिदान भारतीय सैनिकों के लिए बारूद में चिंगारी साबित हुआ। इस घटना से लगी आग की लपटों से संपूर्ण भारत में 10 मई 1857 ई. से देश का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हुआ। क्रांति की आग की आंच से उत्तराखंड भी अछूता नहीं रह । और उत्तराखंड में 1857 की क्रांति का प्रभाव कुमाऊं के दो स्थानों पर देखने को मिला। जबकि गढ़वाल में क्रांति से संबंधित कोई उल्लेखनीय घटना नहीं घटी थी। हल्द्वानी में क्रांति का प्रभाव - 1857 की क्रांति की लपटें बरेली पहुंच चुकी थी जो कि उत्तराखंड से जुड़ा क्षेत्र था। बरेली क्षेत्र का नेतृत्व "खान बहादुर खान" कर रहे थे। उन्होंने सेनापति काले खां के नेतृत्व में क्रांति का विस्तार करने के लिए उत्तराखंड में 1000 सैनिकों की टुकड़ी भेजी। जिसने ब्रिटिश सेना के कैप्टन मैक्सवेल एवं लै. चैपमैन को हराकर कुमाऊं क्षेत्र के हल्द्वानी में 17 सितंबर 1857 को कब्जा कर लिया था। किंतु कुछ ही समय में

उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित Top 50 प्रश्न

उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी - 21 उत्तराखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न (Top 50) मित्रों इस लेख में उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तियों और स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित महत्वपूर्ण 50 प्रश्न तैयार किए गए हैं। जिसके नोट्स आपको पहले ही उपलब्ध कराए जा चुके हैं। अपनी तैयारी को बेहतर दिशा देने के लिए देवभूमि के उत्तराखंड नोट्स पढ़ने के पश्चात उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी को जरूर हल करें।  नोट्स - यहां आपको 50 प्रश्नों उत्तर सहित उपलब्ध कराए गए हैं। यदि आप उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी की प्रैक्टिस करना चाहते हैं तो pdf file download करके प्रैक्टिस अवश्य करें। लाभ होगा। Download pdf file -click here Uttrakhand history mcq question  (1) उत्तराखंड के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री कौन थे? (a) नित्यानंद स्वामी (b) भगत सिंह कोश्यारी (c) नारायण दत्त तिवारी (d) भुवन चंद्र खंडूरी Answers (c) (2) उत्तराखंड से विक्टोरिया क्रॉस सम्मान पाने वाले पहले व्यक्ति दरबान सिंह नेगी किस रेजिमेंट के सैनिक थे? (a) कुमाऊँ रेजीमेंट (b) 1/38 वीं गढ़वाल राइफल्स (c) गोरखा रेजीमेंट (d) 1/39 वीं गढ़वाल राइफल्स Ans