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हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि) हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है. भाषा का विकास  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.) 2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.) 3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ ) 4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ) 5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.) 6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में) *1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है वर्णमाला वर्ण क्या है?  उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है। वर्णमाला वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। हिंदी लिपि के चिन्ह अ आ इ ई उ ऊ ऋ  ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ

टिहरी जनपद का इतिहास

टिहरी जनपद का इतिहास

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पृष्ठभूमि

टिहरी गढ़वाल राज्य के चार आंतरिक जिलों में से राज्य का एक प्रमुख जिला है। जिसका कुल क्षेत्रफल 3642 वर्ग किलोमीटर है। टिहरी जनपद का आकार तितली की तरह है। राज्य में सर्वाधिक वर्षा टिहरी के नरेंद्र नगर में होती है। उत्तराखंड पुलिस प्रशिक्षण अकादमी टिहरी के नरेंद्र नगर में स्थापित है। जिसकी स्थापना 2011 में की गई थी। टिहरी गढ़वाल को 1 अगस्त 1949 ईस्वी में पृथक जनपद का दर्जा दिया गया।

टिहरी जनपद का इतिहास 

टिहरी नगर की स्थापना 28 दिसंबर 1815 को गढ़वाल नरेश सुदर्शन शाह ने की थी। टिहरी को गणेश प्रयाग और धनुष तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि टिहरी शब्द की उत्पत्ति त्रिहरि शब्द से हुई है। त्रिहरि का अर्थ तीन जल या त्रिवेणी से माना जाता है। यहां पर भागीरथी भिलंगना के अलावा पातालगंगा का भी संगम है। पुराणों में मनसा, वाचा, कर्मणा रूपी तीनों पापों से मुक्ति का स्थल माना जाता है। भागीरथी एवं भिलंगना के संगम पर टीरी या टिपरी नामक स्थान पर पंवार वंश के 55वें शासक सुदर्शन शाह ने राजधानी बनाई थी। जोकि 29 अक्टूबर 2005 को टिहरी डैम में समा गया। सुदर्शन शाह द्वारा स्थापित पुराना टिहरी शहर, टिहरी डैम में डूबने के बाद बौराणी गांव में नई टिहरी की स्थापना की जाती है। 

टिहरी में कीर्ति शाह के शासनकाल समय सन् 1904 में अमर सिंह के नेतृत्व में कर बढ़ाए जाने के विरोध में 'कुंजणी वन आंदोलन' हुआ था। और उसके बाद सन् 1906-1907 में भूमि बंदोबस्त के विरोध में किसानों द्वारा 'खास पट्टी वन आन्दोलन' चलाया जाता है। और सन् 1930 में नरेंद्र शाह के शासनकाल में किसानों की वन भूमि में बदलने के विरोध में तिलाड़ी गोली कांड की घटना घटित हुई थी। जिसके बाद टिहरी राजाशाही के विरुद्ध 23 जनवरी 1939 में देहरादून में टिहरी राज्य प्रजामंडल की स्थापना की जाती है। स्वतंत्रता के पश्चात 1 अगस्त 1949 को टिहरी गढ़वाल एक पृथक जनपद के रूप में गठित किया गया। इससे काटकर 1960 में उत्तरकाशी तथा 1997 में रुद्रप्रयाग जिले बनाए गए हैं। टिहरी के भिलंगना क्षेत्र में सन् 1994 ईस्वी में वनों की कटाई के विरोध में सुरेश भाई के नेतृत्व में 'रक्षा सूत्र आंदोलन' चलाया गया 

नई टिहरी की स्थापना

पुरानी टिहरी से 24 किलोमीटर एवं चंबा से 11 किलोमीटर दूर स्थित नगर टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन द्वारा तैयार योजनाबद्ध (मास्टर प्लान) के आधार पर बसा शहर है। इसे बसाने के लिए 1983 में कार्य प्रारंभ हो गया था वर्तमान नई टिहरी बौराणी गांव की भूमि पर बसाया गया है। टिहरी जनपद का मुख्यालय कुछ वर्ष तक नरेंद्र नगर था किंतु सन् 1990 में टिहरी जिला का मुख्यालय नरेंद्र नगर से यहां स्थानांतरित किया गया । और सभी कार्यालय यही स्थानांतरित कर दिए गए 

टिहरी जनपद की प्रमुख नदी

टिहरी की प्रमुख नदी भिलंगना नदी है। जिसका उद्गम स्थल खतलिंग ग्लेशियर है। यह ग्लेशियर तीन जिलों के संगम पर स्थित है जहां प्राकृतिक शिवलिंग मिलता है। खतलिंग ग्लेशियर की खोज इंद्रमणि बडोनी और सुरेंद्र सिंह पांगती ने की थी। भिलंगना की सहायक नदी -
  1. दूधगंगा
  2. बालगंगा,
  3. धर्म गंगा 
है। खतलिंग हिमनद के पास जहां राजहंस देखने को मिलते हैं वही मंसूर ताल के पास से दूध गंगा निकलती है। भिलंगना नदी गणेश प्रयाग में भागीरथी नदी से मिलती है। टिहरी गढ़वाल के देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है जिसे सास और बहू का संगम कहा जाता है। देवप्रयाग से भागीरथी नदी गंगा के नाम से जानी जाती है। देवप्रयाग से हरिद्वार तक गंगा की लंबाई 96 किलोमीटर है।

टिहरी जनपद में प्रसिद्ध मंदिर

  1. रघुनाथ मंदिर - यह मंदिर देवप्रयाग में स्थित है भगवान राम को समर्पित रघुनाथ मंदिर द्रविड़ शैली में बना हुआ है। रघुनाथ मंदिर के द्वार पर पृथ्वी पति शाह के का मथुरा वौराणी का एक लेख है ।
  2. बूढा केदार - यह मंदिर आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित बालगंगा एवं धर्मगंगा के संगम पर स्थित है। दीपावली के अवसर पर बूढ़ा केदार में कैलावीर का मेला लगता है। जिसे रिख बग्वाल या ढिक्याजोर कहा जाता है। जो यहां के इष्टदेव कैलावीर के युद्ध में विजय प्राप्त कर लौटने के उपलक्ष में आयोजित होता है इस मेले को बलिराज का मेला भी कहते हैं । उत्तराखंड सरकार द्वारा वर्ष 2017 में इसे राजकीय मेला घोषित किया गया था।
  3. पलेठी का सूर्य मंदिर - पलेठी का सूर्य मंदिर हिंडोला खाल के निकट लुलेरा गुलेरा घाटी देवप्रयाग (टिहरी) में स्थित है। इसका निर्माण लगभग सातवीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। भारतीय पुरातत्व विभाग एन.एस.घईवी. रमेश द्वारा सन् 1968 में मंदिर में स्थित शिलालेखों का अध्ययन किया गया था। जो संभवत है ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं किंतु स्पष्ट न होने के कारण सही जानकारी उपलब्ध नहीं है हैं। उक्त लेख आदि आदिवर्मन एवं कल्याण वर्मन के माने जाते हैं।

टिहरी जनपद के तीन शक्ति पीठ

तीनों शक्ति पीठों की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी।
  1. सुरकंडा देवी मंदिर - यह मंदिर चंबा मसूरी रोड के त्रिकूट पर्वत पर स्थित है। ब्लॉक में राज्य का इकलौता सिद्ध पीठ जहां गंगा दशहरे में मेला लगता है। मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती का सिर गिरा था। मंदिर का निर्माण आनंद सिंह जड़धारी ने किया था तथा इसका पुनर्निर्माण स्वामी शिवानंद द्वारा 1946 में किया गया इसके पुजारी स्थानीय लेखवार ब्राह्मण होते हैं
  2. चंद्रबदनी मंदिर - यह मंदिर जामड़ी खाल नामक स्थान पर नैखरी के समीप चंद्रकूट पर्वत पर स्थित है। यहां पर अखंड ज्योति निरंतर प्रज्वलित रहती है। चंद्रबदनी नाम स्कंद पुराण के केदारखंड में उल्लेखित है । स्कंद पुराण में चंद्रबदनी मंदिर को भुवनेश्वरी पीठ कहा गया है। 1903 में भूकंप के कारण इस मंदिर को क्षति पहुंची जिसका जीर्णोद्धार स्वामी मनमंथन द्वारा 1969 में कराया गया। यहां पर एक प्राकृतिक श्रीयंत्र स्थापित है।
  3. कुंजापुरी देवी का मंदिर - माता सती के सिद्ध पीठ में से एक यहां सती का कुंज अथवा वृक्ष गिरा था अतः इसे कुंजापुरी के रूप में पूजा जाता है यह स्थान नरेंद्र नगर के निकट देवस्थल में स्थित है। इसमें भंडारी राजपूत पुजारी मंदिर सिरोही का एक वृक्ष है जहां भक्त लोग चुनिया बांधते हैं।
इनके अलावा टिहरी में सेम मुखेम मंदिर, देवलसारी महादेव मंदिर, सत्यश्वर महादेव मंदिर, तुरंग बली मंदिर आदि स्थित हैं।

टिहरी के प्रमुख मेले

रणभूत कौथिक मैला - इस मेले की प्रमुख विशेषता भूत नृत्य है।
मौण मैला - इस मेले की प्रमुख विशेषता मछलियों को पकड़ना है यह टिहरी की अगलाड़ नदी में लगता है।
सेम-मुखेम मेला - यह टिहरी में 26 नवंबर को लगता है।

जनपद की प्रमुख ताल

  1. सहस्त्र ताल - गढ़वाल क्षेत्र का सबसे बड़ा एवं गहरा ताल सहस्त्र ताल है।
  2. महासरताल - महासर ताल को भाई-बहन का ताल कहा जाता है इसकी आकृति कटोरे नुमा है और यह सहस्त्र ताल के पास स्थित है।
  3. वासुकी ताल - यह लाल पानी वाला ताल है। यह ताल मिले कमल के लिए प्रसिद्ध है।
इसके अलावा टिहरी जनपद में मंसूर ताल, अप्सरा ताल (अछरी ताल) एवं केंपटी फॉल जलप्रपात स्थित है।

टिहरी की प्रमुख गुफाएं

  1. विश्वनाथ गुफा
  2. वशिष्ठ गुफा
  3. शंकर गुफा

टिहरी के तीन प्रमुख नगर

  1. प्रतापनगर - प्रतापनगर की स्थापना परमार वंश के 57वें शासक प्रताप शाह ने की थी । प्रताप नगर का प्राचीन नाम ठांगधार था। रैका गढ़ व गाजणा पट्टी प्रताप नगर में स्थित है। 
  2. कीर्ति नगर - कीर्ति नगर की स्थापना परमार वंश के 58वें शासक कीर्ति शाह ने की थी । इसका प्राचीन नाम बिडोलीसेंण था नगर स्थापना के समय इस चित्र को बिलोली गांव के रूप में जाना जाता था जो कि माधो सिंह भंडारी के गांव मलेथा के निकट ही स्थित था ।राज्य का सबसे छोटा नगर निकाय कीर्ति नगर है। 
  3. नरेन्द्र नगर - नरेंद्र नगर की स्थापना परमार वंश के 59वें शासक नरेंद्र शाह सन् 1921 में की थी । इसका प्राचीन नाम ओड़ाथली था। नरेंद्र नगर को उत्तराखंड का चेरापूंजी कहा जाता है एवं 1 मई 2011 में यहां राज्य पुलिस प्रशिक्षण अकादमी स्थापित की गई थी। 

टिहरी जनपद के प्रमुख पर्यटक स्थल 

देवप्रयाग -

इस क्षेत्र को सुदर्शन क्षेत्र एवं इंद्र प्रयाग के नाम से भी जाना जाता है। महाभारत में देवप्रयाग को समस्त तीर्थों का शिरोमणि तथा समग्र पापों का विनाशक बताया गया है। पुराणों के अनुसार सतयुग में देवशर्मा नामक ऋषि ने यहां तप किया था जिस कारण इसका नाम देवप्रयाग पड़ा। देवराज इंद्र ने यहां पर भगवान शिव की उपासना की थी जिस कारण इसे इंद्र प्रयाग कहा गया। ऐसा भी कहा जाता है कि राजा बलि से भगवान ने वामन अवतार में यहीं पर तीन पग भूमि मांगी थी। देवप्रयाग में 2 कुंड ब्रह्मकुंड एवं वशिष्ठ कुंड स्थित है। क्योंकि यह भागीरथी एवं अलकनंदा नदी का संगम स्थान है इसलिए पंचप्रयागों में सर्वाधिक महत्व रखता है। मान्यता है कि देवप्रयाग में कौवे नहीं दिखाई देते हैं। रावण वध के पश्चात भगवान श्रीराम ने जिस स्थान पर पूजा की थी वहां रघुनाथ मंदिर स्थापना की गई थी जो आज भी स्थापित है। देवप्रयाग में "हिमालय नक्षत्र वेधशाला" की स्थापना सन् 1946 ईस्वी में चक्रधर जोशी ने की थी।

मुनि की रेती

यह स्थल लक्ष्मण झूला के निकट चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित है इसे टिहरी गढ़वाल का प्रवेश द्वार कहा जाता है इसका पुराना नाम मौनि की रेती था जो की रैम्य ऋषि की तपस्थली के रूप में जाना जाता था। यहां पर आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए देश विदेश से सैकड़ों लोग आते हैं। 1815 तक यह ऋषिकेश में शामिल था किंतु ब्रिटिश गढ़वाल में चंद्रभागा नदी को सीमा रेखा माना। अतः यह टिहरी का हिस्सा बना दिया गया। मुनी की रेती के निकट तपोवन पर्यटक स्थल है जिसके अंतर्गत लक्ष्मण झूला आता है यहां लक्ष्मण मंदिर श्री राम मंदिर एवं ध्रुव मंदिर स्थित है।

भुवनेश्वरी महिला आश्रम

महिला आश्रम टिहरी अंजलिसैंण में है। इस आश्रम की स्थापना 1977 में स्वामी मनमंथन ने की थी। स्वामी मनमंथन केरल के मूल निवासी हैं जो कि 1964 में टिहरी आए थे। भुवनेश्वरी महिला आश्रम का ध्येय वाक्य "खुशहाल बच्चा खुशहाल परिवार व खुशहाल समाज" है। सन 1976 में टिहरी जनपद में बंटा जन आंदोलन की शुरुआत हुई जिसमें स्वामी मनमंथन की मुख्य भूमिका रही जिस कारण अलकनंदा नदी से पानी पंप करने की योजना पारित हुई।

टिहरी की प्रमुख परियोजना

कोटेश्वर बांध परियोजना - कोटेश्वर बांध परियोजना भागीरथी नदी पर 400 मेगावाट की है।
कोटली भेल परियोजना - टिहरी में गंगा नदी पर 100 मेगा वाट की परियोजना है।
टिहरी बांध परियोजना - यह उत्तराखंड राज्य की सबसे प्रमुख योजना है। टिहरी बांध बनाने की स्वीकृति योजना आयोग द्वारा 1972 में दी गई थी। यह भागीरथी एवं भिलंगना के संगम पर बना हुआ है। टिहरी बांध का डिजाइन जेम्स ब्रून ने तैयार किया था। टिहरी बांध की 2400 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता है जो कि प्रारंभ में 600 मेगावाट से शुरू की गई थी। टिहरी बांध का जलाशय से 42 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसे रामतीर्थ सागर के नाम से भी जाना जाता है। टिहरी परियोजना को 'राष्ट्र के गांव' की संज्ञा दी गई है। टिहरी बांध का कार्य 1978 में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने प्रारंभ किया था । टिहरी बांध का प्रथम चरण 1000 मेगा वाट का 30 जुलाई 2006 से शुरू हुआ जिससे राज्य को रॉयल्टी के रूप में 12% बिजली मुफ्त मिलती थी। टिहरी बांध एशिया का सबसे ऊंचा पद दुनिया का चौथा सबसे ऊंचा बांध है टिहरी बांध की ऊंचाई 260.5 मीटर है। टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की स्थापना 12 जुलाई 1988 में हुई थी। फरवरी 1989 से THDC टिहरी जल परियोजना का कार्यभार संभाला।

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