पृथ्वी की आंतरिक संरचना "नमस्कार साथियों/छात्रों, आज के इस लेख में हम पृथ्वी की आंतरिक संरचना पढ़ने वाले हैं। यह अध्याय परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है प्रत्येक परीक्षा में 2-3 प्रश्न यहां से अवश्य पूछे जाते हैं। देवभूमि उत्तराखंड द्वारा यह प्रयास किया गया है कि सभी तथ्यों को आसान भाषा में परिभाषित किया जा सके। इस लेख में दिए गए सभी तथ्य 6-12 तक की एनसीईआरटी पुस्तक और माजिद हुसैन की भूगोल से लिए गए हैं। प्रस्तावना, जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, उसके बाहरी रूप—जैसे ऊंचे पर्वत, गहरी नदियाँ, विशाल महासागर और हरे-भरे मैदानों से तो हम भली-भांति परिचित हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस ठोस जमीन पर हम खड़े हैं, उसके हजारों किलोमीटर नीचे पैर पसारकर बैठी दुनिया कैसी दिखती होगी? जैसे एक पके हुए आम का सबसे बाहरी हिस्सा उसका पतला छिलका होता है, बीच में उसका रसदार गूदा और सबसे अंदर एक ठोस गुठली होती है; या जैसे एक उबले हुए अंडे में सबसे बाहर एक पतला सफेद छिलका, फिर सफेद भाग और केंद्र में पीला भाग (Yolk) होता है—ठीक वैसे ही हमारी पृथ्वी भी परतों में बंटी हुई है। भले ...
काव्य संग्रह किसान ही भविष्य हैं। किसान ही भविष्य होते हैं, चीर कर धरती का जिगर जब वो अनाज बोते हैं , जो बैठे हैंं इंसाफ करने को , वो तो महलों में सोते हैं , वर्षा हो या धूप कड़ी , वो फिर भी पौधे रोपते हैं, जुल्मों से जी ना भरा तो , कानून पर कानून थोपते हैं। सींचा है - जिसने भारत को, वो आज भी क्यों रोते हैं ? किसान ना चाहे शोर शराबा, फिर क्यों आंदोलन होते हैं ? उन्हें क्या मालूम ? कैसे-खेती, कैसे-खेत होते हैं ? कभी पैर रखोगे जमीं पर तब एहसास होगा , किसान कितना कुछ सहते हैंं? दलालों के आगे झुक गई हैै सत्ता , उद्योगपति ही दौलत ढोते हैं। किसान तो खिलौना है माटी का, वो तो माटी में बोते हैं। संकट आए कुटुंब पर, किसान ही हमेशा खोते हैं , घर आज भी खाली हैं उनके , सिर्फ़ वही हक से वंचित रहते हैं। क्यों भूल जाती है सरकारें ? किसान ही भविष्य होते हैं। किसान ही भविष्य हैं काव्य संग्रह जब ख्वाब पूरे होते हैं। सुकून मिलता है ना, जब ख्वाब पूरे होते हैं। जो बैठे थे - उपहास करने को वही सफलता पर हम...