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हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि) हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है. भाषा का विकास  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.) 2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.) 3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ ) 4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ) 5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.) 6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में) *1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है वर्णमाला वर्ण क्या है?  उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है। वर्णमाला वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। हिंदी लिपि के चिन्ह अ आ इ ई उ ऊ ऋ  ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ

उत्तराखंड का इतिहास : उत्तरवर्ती परमार वंश (भाग -3)

 उत्तराखंड का इतिहास

गढ़वाल का परमार वंश (उत्तरवर्ती परमार वंश

                       भाग - 3

श्री सुदर्शन शाह प्रद्युम्न शाह के उत्तराधिकारी थे । 14 मई 1804 में खुड़बुड़ा के मैदान में  प्रद्युम्नशाह राज्य की रक्षा करते हुए शहीद हो जाते है। कुमाऊं और गढ़वाल पर गोरखाओं का शासन हो जाता है। उसी बीच सुदर्शन शाह जान बचाते हुए बरेली में शरण लेते हैं और कुछ वर्ष फतेहगढ़ में व्यतीत करते हैं । गोरखाओं  का शासन काल क्रूरता व बर्बरता से भरा हुआ था। गोरखाओं का राज्य सैनिक शासन पर आधारित थाा। वे तेजी से गोरखा साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। कुमाऊं व गढ़वाल विजय के बाद महाराजा रणजीत सिंह के राज्य का एक भाग कांगड़ा पर भी अधिकार कर लिया। गोरखपुर में ईस्ट इंडिया कंपनी से 200 ग्राम छीन लिए जो ब्रिटिश-नेपाल युद्ध का मुख्य कारण बना। दूसरी तरफ सुदर्शन शाह अपनी खोई हुई सत्ता को गोरखा उसे प्राप्त करना चाहते थे उन्होंने अंग्रेजों से सहायता मांगी । फलतः लॉर्ड मायो ने नवंबर 1814 में नेपाल के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। अंग्रेजों ने अपने 22000 सैनिकों के साथ चार टुकड़ों में बांटकर गोरखाओ के ऊपर चारों तरफ से हमला कर दिया। 2 वर्षों तक लगातार आंग्ल-गोरखा युद्ध चलता रहा । अंत में गोरखाओं की हार हुई और 1815 में संगोली  की संधि से युद्ध समाप्त हुआ। 3 मई 1815 ईसवी में गार्डनर कुमाऊं  के कमिश्नर नियुक्त किए गए तथा उनके सहायक के रूप में ट्रेल को नियुक्त किया गया। गोरखाओं को कुमाऊं और गढ़वाल से जाना पड़ा। अब समस्त कुमाऊं और गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में अलकनंदा के पूर्वी क्षेत्र देहरादून पर ब्रिटिश शासन का अधिकार हो गया। ब्रिटिश सरकार ने सुदर्शन शाह को अलकनंदा नदी का पश्चिमी क्षेत्र राज करने को  दे दिया। 18 दिसंबर 1815 को राजा सुदर्शन शाह ने टिहरी गढ़वाल मेें नई राजधानी स्थापित की । इस तरह एक बार पुनः टिहरी गढ़वाल में परमार वंश का शासन स्थापित किया।

श्री सुदर्शन शाह  ( 55वां शासक )

टिहरी वंश की स्थापना सुदर्शन शाह ने की थी। सुदर्शन शाह  टिहरी वंश का प्रथम शासक भी कहा जाता है। सुदर्शन शाह परमार वंश के 55 वां राजा था । गोरखा युद्ध के दौरान राजा के वफादारों के द्वारा इन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचा कर बचा लिया गया था। इनका जन्म 1784 इसवी में हुआ था। गोरखाओं के शासन के अंत के बाद ये 18 दिसंबर 1815 में राजगद्दी पर बैठे। इन्होंने भिलंगना एवं भागीरथी नदी के किनारे स्थित टिहरी गढ़वाल को अपनी नई राजधानी बनायी। और टिहरी में त्रिखंडिय भवन का निर्माण कराया। जिसको बनाने में लगभग 30 वर्ष (1848 में पूरा हुआ) का समय लगा। 
              सुदर्शन शाह उच्च कोटि के विद्वान थे । उन्होंने "सभासार नामक ग्रंथ" की रचना सात खंडों में की । जिसमें अपने शासन तथा साहित्य से संबंधित बातों का उल्लेख किया । सुदर्शन शाह वीर और सहासी थे। इनके राजकवि हरिदत्त शर्मा ने अपनी कविताओं में उनके साहस की भूरी पशंसा की है। इनके अतिरिक्तत कवि  कुमुचानंद ने "सुदर्शनोदय काव्य" में इनके शासन और व्यवहार को उजागर किया है। वहीं महान कवि एवं गढ़वाल दरबार के प्रसिद्ध चित्रकार श्री मोलाराम ने भी उनके अदम्य साहस का परिचय अपनी कविता पुस्तक "सुदर्शन्दर्शन" में किया है।  
        सुदर्शन शाह अंग्रेजी सरकार के प्रति अति कृतज्ञ थे। क्योंकि उनकी सहायता से ही सुदर्शन शाह को राज वैभव का सुख प्राप्त हुआ था। 4 मार्च सन 1820 ईस्वी में सुदर्शन शाह एवं ब्रिटिश सरकार के मध्य एक संधि हुई । जिसमें यह प्रावधान था कि टिहरी गढ़वाल पर सुदर्शन शाह और उनके वंशजों का अधिकार पूर्वक बना रहेगा। इसके बदले में गढ नरेश ने किसी भी विपत्ति के समय अंग्रेज सरकार को सहायता का वचन दिया। फलस्वरूप 1857 ईसवी के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सुदर्शन शाह ने फिरंगियों की पूरी मदद की थी। इसलिए कृतज्ञता प्रदर्शन हेतु ब्रिटिश सरकार उन्हें "बिजनौर का क्षेत्र" प्रदान किया।

भवानी शाह  ( 56वां शासक )

सुदर्शन शाह की मृत्यु के पश्चात गणराज्य में एक बार पुनः ग्रह क्लेश की स्थिति पैदा हो गई । उसके पुत्रों ने उत्तराधिकार के लिए आपस में लड़ाई करना शुरू कर दिया। सुदर्शन शाह के छोटे पुत्र शेर शाह ने अपने बड़े भाई भवानी शाह को हटा दिया। और थोड़े समय के लिए राजा बना । इस पर ब्रिटिश सरकार ने अपने प्रतिनिधि कुमाऊं कमिश्नर रैमजे  को समस्या का समाधान करने के लिए भेजा। उसके बाद शेरशाह को हटाकर भवानी शाह को राजा बनाया । इसके शासनकाल में कमिश्नर हेनरी रैमजे ने कुमाऊं और गढ़वाल के क्षेत्र में "बारह आना बीसी भूमि व्यवस्था" लागू की। व सन् 1862 ईसवी में देवप्रयाग में एक संस्कृत पाठशालाा बनवाया। भवानी शाह ने 12 वर्षों तक राज्य किया तथा दिसंबर 1871 ईसवीं में परलोक सिधार गए।

प्रताप शाह  ( 57वां शासक )

प्रताप शाह पंवार  वंश का 57वां  शासक था । इसने टिहरी गढ़वाल में 15 वर्षों तक (1871 से 1886) तक शासन किया था। परमार नरेशों में  यह प्रथम शासक था जिसने अपने राज्य में अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत की। और 1883 में आठवीं कक्षा तक अंग्रेजी स्कूल की स्थापना  में की  । प्रताप शाह ने अपने नाम से प्रताप नगर की स्थापना भी की। व टिहरी में एक प्रिंटिंग प्रेस खोला और उसका नाम भी प्रताप प्रिंटिंग प्रेस रखा। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य सुविधा हेतु 1888 में टिहरी में प्रथम अस्पताल का निर्माण कराया ।

कीर्ति शाह  ( 58वां शासक )

प्रताप शाह के 3 पुत्र थे - युवराज कीर्ति शाह,  युवराज विचित्र शाह व युवराज सुरेंद्र शाह। प्रताप शाह की मृत्यु के पश्चात जेष्ठ पुत्र  कीर्ति शाह राजा बनता है परंतु वह उस समय अल्पव्यस्क होता है । शासन के प्रारंभिक समय में माता गुलेरिया रानी कुंदन देवी कीर्ति शाह की संरक्षिका के रूप में 1992 तक शासन करती हैं । शासनकाल के दौरान टिहरी में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ, रंगनाथ, गंगा माता मंदिरों का निर्माण करवाया। कीर्ति शाह शिक्षा पूरी करने के बाद 1898 ईसवी में राज्य का कार्यभार अपने हाथों में ले लेते हैं और एक नए सिरे से शासन व्यवस्था शुरू करते हैं।  कीर्ति शाह  पंवार राजवंश के सबसे योग्य व जनता का प्रिय शासक माने जाते हैं। अपने शासनकाल के दौरान इन्होंने  राज्य के विकास के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य कराएं ।

टिहरी राज्य का कार्यभार संभालने से पहले ही कीर्ति शाह ने टिहरी में टिहरी प्रताप स्कूल की स्थापना 1891 इसमें कर दी थी । 1897 ईस्वी में प्रशासन को व्यवस्थित बनाने के लिए नए राजभवन का निर्माण कराया। महारानी विक्टोरिया के जन्मदिन पर टिहरी में घंटाघर (1898) की स्थापना करवाई । कीर्ति शाह धार्मिक प्रवृत्ति के तो थे ही साथ ही जिज्ञासु भी थे। उन्होंने 1902 में उन्होंने टिहरी में सर्वधर्म सम्मेलन का आयोजन भी करवाया। इनके के शासनकाल के दौरान  स्वामी रामतीर्थ का टिहरी में आगमन हुआ । उनके ज्ञान और साधु वाणी से प्रसन्न होकर उन्होंने स्वामी रामतीर्थ को अंतरराष्ट्रीय धार्मिक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए जापान भेजा । 1907 में कैम्बेल ने टिहरी में बोडिंग हाउस की स्थापना की।  
               कीर्ति शाह महान शिक्षाविद थे। वह संस्कृति और सभ्यता का महत्व भली-भांति समझते थे अतः इसके संरक्षण के लिए 1909 में हिबेट संस्कृत पाठशाला की स्थापना की। साथ ही श्रीनगर में राजकीय विद्यालय छात्रावास का निर्माण कराया व ₹13000 दान में भी दिए। इन सब कार्यों की अतिरिक्त कीर्ति शाह ने टिहरी में नगर पालिका की स्थापना की व उत्तरकाशी में कुष्ठ आश्रम स्थापित किया । अपने नाम से कीर्ति नगर शहर की स्थापना की। और इन के शासनकाल में ही जनता को प्रथम बार बिजली की सुविधा प्राप्त हुई। एक प्रकार से कीर्ति शाह ने टिहरी में आधुनिक गढ़वाल की नींव डाली। और इस विकास की दौड़ में  कृषकों  के कल्याण के लिए कृषि बैंक की स्थापना की।
                कीर्ति शाह के इन सभी कार्यों को देखते हुए 1900 में इंग्लैंड की यात्रा के दौरान 11 तोपों की सलामी दी गई। ब्रिटिश सरकार और विभिन्न विद्वानों ने इन्हें विभिन्न उपाधियां से विभूषित किया था।
  • अंग्रेजों ने कीर्ति शाह को "कमांडर स्टेट ऑफ इंडिया", "नाइट कमांडर" , व "कंपनिया ऑफ इंडिया" की उपाधि दी।
  • भक्त दर्शन ने कीर्ति शाह को "राज्यश्री" की उपाधि प्रदान की।
  • कैंपबेल ने इनकी प्रशंसा में कहा कि "कीर्ति शाह जैसा शासक मैंने पूरे भारत में नहीं पाया"।
  • जबकि लॉर्ड लैंसडाउन ने 1892 में यह घोषणा में यह कहा कि "भारतीय राजाओं को कीर्ति शाह को आदर्श  मान लेना  चाहिए उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए"

नरेंद्र शाह  ( 59वां शासक )

कीर्ति शाह के बाद उनके एकमात्र पुत्र नरेंद्र शाह गद्दी पर बैठे। नरेंद्र शाह का जन्म अगस्त 1898 ईस्वी को प्रताप नगर में हुआ था । उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा में मेयो कॉलेज अजमेर से प्राप्त की थी । जब नरेंद्र शाह राजगद्दी पर बैठे तो उनकी उम्र मात्र 15 वर्ष थी। राजमाता  नेपोलिया के संरक्षण में नरेंद्र शाह ने राज्य के प्रशासन को संभाला और पिता की भांति ही टिहरी राज्य का विकास किया । उन्होंने लगभग 27 वर्ष तक शासन किया । उनका वास्तविक शासन 4 अक्टूबर 1919 से प्रारंभ हुआ। शासन के प्रथम वर्ष में ही  नरेंद्र शाह ने सन् 1919 में ही सर्वप्रथम गांव के विकास के लिए टिहरी में पंचायतों की स्थापना की । उन्होंने वन विभाग की उन्नति एवं कल्याण के लिए विशेष कदम उठाए । राज्य के कई युवाओं को प्रशिक्षण हेतु "फॉरेस्ट ट्रेनिंग कॉलेज" देहरादून भेजा । छात्रों के लिए छात्रवृत्ति निधि की स्थापना की।  शिक्षा के लिए "प्रताप हाई स्कूल" का विस्तार करके "इंटरमीडिएट प्रताप कॉलेज" बनवा दिया साथ ही कन्याओं के   लिए एक पाठशाला का निर्माण कराया और सभी के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना की। टिहरी के निकट अपने नाम से नरेंद्र नगर की स्थापना की । और उसे 1925 से ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा दिया । उसके बाद देवलगढ़ में स्थित कुल देवी राजराजेश्वरी मंदिर का जीर्णोद्धार भी करवाया । 
नरेंद्र शाह ने व्यापार को सरल बनाने के लिए  व बाह्य संसार से जोड़ने के लिए सर्वाधिक सड़कों का निर्माण कराया । इसलिए उन्होंने "गढ़वाल का शेरशाह सूरी" भी कहा जाता है। उन्होंने - 
  1. नरेंद्र नगर से मुनि की रेती तक 
  2. मुनी की रेती से देवप्रयाग (कीर्ति नगर) तक
  3. और नरेंद्र नगर से टिहरी तक
 आदि सड़कों का निर्माण कराया जो टिहरी को मैदानी क्षेत्रों से जोड़ती है। इनके अतिरिक्त टिहरी देवप्रयाग उत्तरकाशी एवं राजगढ़ी के अस्पतालों को उन्नत कर नवीनतम उपकरण उपलब्ध कराएं। नरेंद्र नगर में एक औषधालय (मेडिकल) का निर्माण किया। कई आयुर्वेदिक और औषधालयओं  की भी स्थापना की। इनके सुधारवादी कार्यों से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने इन्हें गढ़वाली फौज का स्थाई "लेफ्टिनेंट कर्नल" बना दिया और "सर व KCSI"  की उपाधि से विभूषित किया। इनकी अनुभवशीलता एवं शिक्षा के प्रति अथाह प्रेम को देखकर बनारस विश्वविद्यालय ने भी इन्हें सन 1937 ईस्वी में "एल. एल.डी. " की उपाधि से अलंकृत किया।
इनके शासनकाल में  वर्ष 1921 में टिहरी में प्रथम बार जनगणना की गई। 

विशेष तथ्य -

नरेंद्र शाह के शासन के दौरान 30 मई 1930 को यमुना नदी के किनारे तिलाड़ी के मैदान में एक हिंसक घटना घटी थी जिसे "उत्तराखंड का जलियांवाला बाग हत्याकांड" कहा गया। नरेंद्र शाह के दीवान चक्रधर जुयाल ने वन संबंधी कानून का विरोध करने वाले आंदोलनकारियों पर निर्दयता से गोली चलवाई और उसमें सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए। जिस कारण इस हिंसक हत्याकांड को करने वाले चक्रधार जुयाल को "उत्तराखंड का जनरल डायर" के नाम से संबोधित किया गया।  इन्हीं के शासनकाल में 25 जुलाई 1945 ईस्वी को टिहरी जेल के अंदर 84 दिनों के लंबे कष्टपूर्ण अनशन के बाद श्रीदेव सुमन की मृत्यु हुई।

मानवेंद्र शाह ( 60वां शासक )

(1946- 1949)

मानवेंद्र शाह परमार वंश (पंवार वंश) का अंतिम शासक था। ये नरेंद्र शाह के जेष्ठ पुत्र थे जो 1946 में राजगद्दी पर बैठे। आजादी के बाद 1948 में प्रजामंडल का मंत्रिमंडल बना और 1 अगस्त सन 1949 ईस्वी को टिहरी गढ़वाल राज्य का भारत में विलीनीकरण कर दिया गया। मानवेंद्र शाह 1959 से 2004 तक टिहरी गढ़वाल से 8 बार सांसद निर्वाचित हुए थे। 5 जनवरी 2007 को मानवेंद्र शाह की मृत्यु हो गई।

गढ़वाल के परमार वंश से संबंधित प्रश्न:-

(1) "गढ़वाल का शेरशाह सूरी" किस गढ़वाल नरेश को कहा जाता है ?
(a) प्रधुम्न शाह
(b) पृथ्वी शाह
(c) कीर्ति शाह
(d) नरेंद्र शाह

(2) निम्नलिखित में से किसे "उत्तराखंड का जनरल डायर" किसे कहा जाता है ?
(a) श्री देव सुमन
(b) मोहन सिंह
(c) चक्रधार जुयाल
(d) नरेंद्र शाह

(3) टिहरी गढ़वाल में सर्वप्रथम पंचायतों की  स्थापना किस गढ़वाल शासक के शासनकाल में हुई ?
(a) प्रताप शाह
(b) भवानी शाह
(c) नरेंद्र शाह
(d) सुदर्शन शाह

(4) निम्न में से यह वाक्य किसका है "कीर्ति शाह" जैसा शासक मैंने पूरे भारत में नहीं पाया"।
(a) लॉर्ड लैंसडाउन
(b) हेनरी रैमजे
(c) कैम्पबेल
(d) गार्डनर

(5) टिहरी वंश का प्रथम शासक किन्हे कहा जाता है?
(a) नरेंद्र शाह
(b) भवानी शाह
(c) सुदर्शन शाह
(d) फतेहशाह

(6) निम्नलिखित में से किसे गढ़ नरेश को "नाइट कमांडर व कमांडर स्टेट ऑफ इंडिया" से संबोधित किया गया था ?
(a) सुदर्शन शाह
(b) कीर्ति शाह
(c) प्रताप शाह
(d) नरेंद्र शाह

(7) श्री हरिदत्त शर्मा किस गढ़वाल शासक दरबार में  राजकवि थे?
(a) श्री सुदर्शन शाह
(b) फतेह शाह
(c) नरेंद्र शाह
(d) महीपत शाह

(8) गढ़वाल के किस शासक के शासनकाल में तिलाड़ी कांड की घटना घटित हुई । जिसे उत्तराखंड का जलियांवाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना जाता है ?
(a) फतेहशाह
(b) जयकृत शाह
(c) नरेंद्र शाह
(d) ललिपतशाह

(9) "सुदर्शनोदय काव्य" पुस्तक के रचयिता कौन हैं ?
(a) रतन कवि
(b) कवि  कुमुचानंद
(c) रामचंद्र
(d) सुदर्शन शाह

(10) गढ़वाल के परमार वंश (पंवार वंश) का अंतिम शासक कौन था ?
(a) मानवेंद्र शाह
(b) कल्याण शाह
(c) जयकृत शाह
(d) प्रधुम्न शाह

(11) निम्न में से किसने कुमाऊं और गढ़वाल के क्षेत्र में "बारह आना बीसी भूमि व्यवस्था" लागू की।
(a) लॉर्ड लैंसडाउन
(b) हेनरी रैमजे
(c) कैम्पबेल
(d) गार्डनर


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Sources : उत्तराखंड का राजनीतिक इतिहास (अजय रावत)

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 कत्यूरी राजवंश का इतिहास भाग -1 अमोघभूति कुणिद वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। कुणिद वंश उत्तराखंड में लगभग तीसरी- चौथी शताब्दी की पहली राजनीतिक शक्ति थी । जबकि कत्यूर राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला पहला ऐतिहासिक शक्तिशाली राजवंश था। इसे कार्तिकेयपुर वंश के नाम से भी जाना जाता है। 'कत्यूरी' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग एटकिंसन ने किया था।  कत्यूरी राजवंश के संस्थापक बसंत देव थे । जिन्हें बासुदेव के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी। पांडुकेश्वर ताम्रलेख में पाए गए कत्यूरी राजा ललितशूर के अनुसार कत्यूरी शासकों की प्राचीनतम राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी । बाद में नरसिंह देव ने जोशीमठ से बैजनाथ (बागेश्वर ) में राजधानी स्थानांतरित कर दी । जहां से कत्यूरी राजवंश को विशिष्ट पहचान मिली । कत्यूरी राजवंश का उदय कुणिंदों के पतन के पश्चात देवभूमि उत्तराखंड की भूमि पर कुछ नए राजवंशों का उदय हुआ। जैसे गोविषाण, कालसी लाखामंडल आदि जबकि कुछ स्थानों पर कुणिंद भी शासन करते रहे। कुणिंदो के बाद शक, कुषाण और यौधेय  वंश के शासकों ने कुछ क्षेत्रों पर शासन व्यवस्था स्थ

उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न (उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14)

उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14 उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां वर्ष 1965 में केंद्र सरकार ने जनजातियों की पहचान के लिए लोकर समिति का गठन किया। लोकर समिति की सिफारिश पर 1967 में उत्तराखंड की 5 जनजातियों थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा, और राजी को एसटी (ST) का दर्जा मिला । राज्य की मात्र 2 जनजातियों को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है । सर्वप्रथम राज्य की राजी जनजाति को आदिम जनजाति का दर्जा मिला। बोक्सा जनजाति को 1981 में आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ था । राज्य में सर्वाधिक आबादी थारू जनजाति तथा सबसे कम आबादी राज्यों की रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल एसटी आबादी 2,91,903 है। जुलाई 2001 से राज्य सेवाओं में अनुसूचित जन जातियों को 4% आरक्षण प्राप्त है। उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न विशेष सूचना :- लेख में दिए गए अधिकांश प्रश्न समूह-ग की पुरानी परीक्षाओं में पूछे गए हैं। और कुछ प्रश्न वर्तमान परीक्षाओं को देखते हुए उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित 25+ प्रश्न तैयार किए गए हैं। जो आगामी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। बता दें की उत्तराखंड के 40 प्रश्नों में से 2

गोरखा शासन : उत्तराखंड का इतिहास

    उत्तराखंड का इतिहास           गोरखा शासन (भाग -1) पृष्ठभूमि मल्ल महाजनपद का इतिहास (आधुनिक नेपाल) 600 ईसा पूर्व जब 16 महाजनपदों का उदय हुआ। उन्हीं में से एक महाजनपद था - मल्ल (आधुनिक नेपाल का क्षेत्र)। प्राचीन समय में नेपाल भारत का ही हिस्सा था। मल्ल महाजनपद का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ के " अगुंत्तर निकाय " में किया गया है। और जैन ग्रंथ के भगवती सूत्र में इसका नाम " मौलि या मालि " नाम से जनपद का उल्लेख है। मल्ल महाजनपद की प्रथम राजधानी कुशीनगर थी । कुशीनगर में गौतम बुद्ध के निर्वाण (मृत्यु) प्राप्त करने के बाद उनकी अस्थि-अवशेषों का एक भाग मल्लो को मिला था । जिसके संस्मारणार्थ उन्होंने कुशीनगर में एक स्तूप या चैत्य का निर्माण किया था। मल्ल की वित्तीय राजधानी पावा थी । पावा में ही महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था ।                 322 ईसा पूर्व समस्त उत्तर भारत में मौर्य साम्राज्य ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। मल्ल महाजनपद भी मौर्यों के अधीन आ गया था। गुप्त वंश के बाद उत्तर भारत की केंद्र शक्ति कमजोर हो गई । जिसके बाद  लगभग 5वीं सदीं में वैशाली से आए 'लिच्