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हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि) हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है. भाषा का विकास  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.) 2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.) 3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ ) 4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ) 5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.) 6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में) *1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है वर्णमाला वर्ण क्या है?  उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है। वर्णमाला वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। हिंदी लिपि के चिन्ह अ आ इ ई उ ऊ ऋ  ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ

उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम (भाग -03)

उत्तराखंड का आधुनिक इतिहास (कुमाऊं और गढ़वाल)


भाग -03

दोस्तों आज उत्तराखंड के आधुनिक इतिहास का अति महत्वपूर्ण टॉपिक है। यहां से 2 से 4 प्रश्न उत्तराखंड की प्रत्येक परीक्षा में पूछे जाते हैं अतः लेख को अंत तक जरूर पढ़ें। 

उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम की नींव कैसे और कब पड़ी ? उत्तराखंड स्वतंत्रता संग्राम में किन व्यक्तियों ने सहयोग किया और कौन-कौन से संगठन बनाएं ? इसका विस्तार से अध्ययन करेंगे यहां साथ ही भारत के इतिहास के साथ संबंध बनाते हुए सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं की चर्चा करेंगे। 

उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम (1912-1930 ईस्वी)

यूं तो उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत 1857 से पहले 1822 में सर्वप्रथम हरिद्वार जिले के कुंजाबहादुरपुर गांव के गुर्जरों द्वारा "कुंजा क्रांति" के रूप में हो चुकी थी। कुंजा क्रांति के बाद 1857 में क्रांति में कुमाऊं के लोग शामिल हुए थे। जिसमें कालू सिंह मेहरा ने "क्रांतिवीर संगठन" की स्थापना की और प्रथम स्वतंत्रा सेनानी कहलाए। किंतु उत्तराखंड में वास्तविक स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत भारत के स्वदेशी आंदोलन से हुई।

भारत में स्वदेशी आंदोलन - 7 अगस्त 1905

भारत के तत्कालीन वायसराय "लॉर्ड कर्जन" ने अपने कार्यकाल के दौरान ब्रिटिश भारत का सबसे बड़ा प्रांत बंगाल को अलग करने का निर्णय लिया था। इस निर्णय ने देश की जनता पर गहरा असर डाला । इसके विरोध में 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल से स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई। स्वदेशी का अर्थ है "अपने देश का"। इस आंदोलन में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने पर जोर दिया गया था। जिस दिन बंगाल का विभाजन हुआ था उस दिन को "शोक दिवस" के रूप में जाना जाता है। इस दिन लोग नंगे पैर सड़कों पर निकल गए और एक दूसरे के लाल धागा बांधकर बंगाल विभाजन की निंदा की। 

1905 में हुए बंगाल विभाजन के बाद अल्मोड़ा की नंदा देवी मंदिर परिसर में लाला बद्रीशाह ठुलघरिया ने "दैशिक शास्त्र" नामक पुस्तक लिखी जो स्वराज्य पर आधारित थी। बाल गंगाधर तिलक ने इस पुस्तक की प्रशंसा की थी। और जब 1906 में 'वंदे मातरम' पर पूरे देश में उच्चारण को देशद्रोह माना जा रहा था तब हरिराम त्रिपाठी ने वंदे मातरम् का 'कुमाऊंनी' अनुवाद किया।

स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव संपूर्ण देश में कुछ ना कुछ मात्रा में अवश्य पड़ा । जनता में राष्ट्रीय भावना विकसित होने लगी थी। उत्तराखंड में भी स्वदेशी आंदोलन प्रभाव पड़ा तथा उत्तराखंड के लोग कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लेने लगे थे कांग्रेस का प्रभाव उत्तराखंड में बढ़ने लगा था। 

*स्वदेशी आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय राम सिंह कूका को दिया जाता है।  

उत्तराखंड में कांग्रेस की स्थापना - 1912

कांग्रेस की जड़े उत्तराखंड में दिन प्रतिदिन अपनी पकड़ मजबूत करने लगी थी।  कांग्रेसी समर्थकों की संख्या में भी वृद्धि होने लगी थी। जिस कारण पटना अधिवेशन के पश्चात सन् 1912 में 'अल्मोड़ा में कांग्रेस की स्थापना' ज्वालादत्त जोशी, सदानंद सनवाल आदि के सहयोग से की गयी। कांग्रेस की स्थापना करने वाले अधिकांश प्रगतिशील विचारों वाले युवा थे जो देश के विभिन्न स्थानों से शिक्षा प्राप्त कर चुके थे या प्राप्त कर रहे थे ।

गढ़वाल कांग्रेस कमेटी

1918 में बैरिस्टर मुकंदी लाल एवं अनुसूया प्रसाद बहुगुणा द्वारा 'गढ़वाल कांग्रेस कमेटी' की स्थापना की गई।

कुमाऊं में होमरूल की स्थापना -1916

प्रथम युद्ध के प्रारंभिक वर्ष सन् 1914 में जब तिलक 6 साल की सजा काटने के बाद रिहा हुए तो उन्होंने अपने साथियों के सहयोग से 'होमरूल लीग की स्थापना' 28 अप्रैल 1916 में की। तत्पश्चात सितंबर 1916 में एनी बेसेंट ने भी होमरूल लीग की स्थापना कर डाली। पूरे देश में होमरूल लीग की हवा चल रही थी। इस आंदोलन को बड़े स्तर पर लोगों का समर्थन मिलने लगा । देश के कोने कोने में होमरूल लीग की शाखाएं स्थापित की जा रही थी। उत्तराखंड के देशभक्त भला कहां पीछे रहने वाले थे । बद्रीदत्त पांडे ने मोहन जोशी, चिरंजीवी लाल, हेमचंद्र जोशी, मोहन सिंह मेहता गुरूदास साह आदि साथियों के साथ "अल्मोड़ा में होमरूल लीग" की स्थापना कर डाली। उत्तराखंड के शिक्षित युवा वर्ग ने भी यहां भी इस आंदोलन का प्रचार प्रसार किया । 1918 में स्वामी विचारानंद सरस्वती ने 'देहरादून में होमरूल लीग' की एक शाखा और स्थापित है। और 1922 में देहरादून से 'अभय' नामक सप्ताहिक पत्रिका का संपादन भी किया।

*कुछ साहित्यकार और इतिहासकारों का कहना है कि अल्मोड़ा में होमरूल लीग की स्थापना 1914 में कर दी गयी  थी। जो तार्किक नहीं है क्योंकि जब भारत में होमरूल की स्थापना 1916 में की गयी है तो उत्तराखंड में पहले कैसे हो सकती है। ?

कुमाऊं परिषद् का इतिहास 

(कुमाऊं परिषद की स्थापना -1916)

उत्तराखंड में राष्ट्रीय चेतना का विकास निरंतर बढ़ता ही जा रहा था। कांग्रेसी अपना विस्तार करने में सफलता प्राप्त कर रहे थे नया नेतृत्व उभर रहा था जो देश की मुख्यधारा के साथ उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन को जोड़ना चाहता था। वर्षों से सरकार की खुशामद करते आए लोग भी सरकार की गलत नीतियों से परेशान हो चुके थे। ऐसे में कांग्रेस से प्रभावित कुछ लोगों ने एक ऐसे संगठन की स्थापना का विचार बनाया। जो उत्तराखंड की समस्याओं को लेकर संगठित हो उनके समाधान के लिए राष्ट्रीय चेतना का प्रचार प्रसार करें । परिणामस्वरूप सन 1916 ईस्वी में कुमाऊं परिषद की स्थापना नैनीताल में की गई । इस परिषद की स्थापना करने वाले पंडित गोविंद बल्लभ पंत, बद्रीदत्त पांडे, लक्ष्मी दास शास्त्री, इंद्र लाल शाह, हरगोविंद चंद, लाल शाह, मोहन सिंह, प्रेम बल्लभ पांडे, भोलादत्त पांडे, मोहन जोशी आदि थे ।

कुमाऊं परिषद के उद्देश्य 

कुमाऊं परिषद का मुख्य उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व शिक्षा संबंधी समस्याओं का हल खोजना था। साथ ही राष्ट्रीय आंदोलन का प्रसार करना था। कुमाऊँ परिषद क्षेत्र के अनेक समस्याओं को लेकर आंदोलन किए। कई स्थानों में कुमाऊं परिषद के क्षेत्रीय परिषद गठित की गई ताकि अधिक सक्रियता तथा सुविधानुसार आंदोलन चलाया जाए।

कुमाऊं परिषद के कार्य

  • इस परिषद ने कांग्रेस को उत्तराखंड में प्रतिष्ठित करने में सबसे बड़ा योगदान दिया। 
  • उत्तराखंड के जागरूक युवाओं को देश में घटित प्रत्येक घटनाक्रम से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई।
  • कुमाऊं परिषद में राष्ट्रीय कांग्रेसका भी उत्तराखंड में व्यापक प्रचार-प्रसार किया।
  • रॉलेट एक्ट 1919 के विरोध में परिषद ने विरोध प्रदर्शन और सभाएं आयोजित की।
  • कुली बेगार, कुली उतार, वन कानून, लाइसेंस नीति, नया वाद, बंदोबस्ती प्रणाली आदि स्थानीय समस्याओं में आन्दोलन कर महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कुमाऊं परिषद के अधिवेशन

कांग्रेस अधिवेशन के भांति उत्तराखंड में भी कुमाऊं परिषद का प्रतिवर्ष वार्षिक अधिवेशन होता था। वार्षिक अधिवेशन अलग अलग स्थानों में होता था। जिसमें स्थानीय समस्याओं के संबंध में विचार किए जाते थे। नए प्रस्ताव रखे जाते थे। समस्याओं का समाधान हेतु नई नीतियां बनाई जाती थी।
  1. प्रथम अधिवेशन - कुमाऊं परिषद का प्रथम अधिवेशन सितंबर 1917 ईस्वी में अल्मोड़ा में हुआ था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता जयदत्त जोशी ने की जो कि सेवानिवृत्त डिप्टी कलेक्टर थे।
  2. द्वितीय अधिवेशन - कुमाऊं परिषद का दूसरा अधिवेशन हल्द्वानी में 24-25 दिसंबर 1918 में हुआ था जिसके अध्यक्ष तारादत्त गैरोला थे। इस अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में 2 वर्ष के भीतर कुली प्रथा, उतार प्रथा को समाप्त करने हेतु सरकार को कहा गया तथा चेतावनी दी गई यदि सरकार द्वारा उतार प्रथा को समाप्त ना किया गया तो जनता सत्याग्रह करेगी।
  3. तीसरा अधिवेशन - अक्टूबर 1919 में कुमाऊं परिषद का तीसरा अधिवेशन कोटद्वार में हुआ था। जिसकी अध्यक्षता बद्रीदत्त जोशी ने की थी। इस अधिवेशन में भाग लेने वालों की संख्या 500 से अधिक थी। कुमाऊं परिषद के तीसरे सम्मेलन में 'जंगलात संबंधी' प्रस्ताव प्रेम बल्लभ पांडे व 'कुली उतार प्रस्ताव' मथुरा दत्त नैथानी ने रखा था । इस अधिवेशन को "हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक" के रूप में आयोजित किया गया था। 
  4. चौथा अधिवेशन - दिसंबर 1920 ईस्वी में कुमाऊं परिषद का चौथा अधिवेशन काशीपुर में हुआ था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता हरगोविंद पंत ने की थी। इस अधिवेशन में जंगलात समस्या एवं बेगार प्रथा को समाप्त करने के प्रस्ताव रखे गए तथा असहयोग आंदोलन की चर्चा की गई । इस प्रकार स्थानीय आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलनों से जोड़ा गया।
  5. पांचवां अधिवेशन - कुमाऊं परिषद का अनेक सफल आंदोलन के पश्चात पांचवा अधिवेशन सन् 1923 ईस्वी में टनकपुर में आयोजित किया गया था । इस आंदोलन की अध्यक्षता बद्रीदत्त पांडे ने की थी।
  6. छठवां अधिवेशन - 1923 के बाद संगठन ने राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यक्रमों को अपना लिया था फिर भी इसका अंतिम अधिवेशन 1926 गनियाद्योली (रानीखेत) में बैरिस्टर मुकंदीलाल की अध्यक्षता में हुआ था। और अन्त में सन् 1926 में कुमाऊं परिषद का कांग्रेस में विलय हो गया।
इस प्रकार अनेक अन्य क्षेत्रों में भी कुमाऊं क्षेत्रीय शाखाएं स्थापित की गई । उनका भी समय-समय पर वार्षिक अधिवेशन होता था। उनका सबका परिणाम यह हुआ कि आगामी राष्ट्रीय आंदोलन हेतु जनसमूह एकत्रित हो गया जिसने बाद में हुए राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस प्रकार उत्तराखंड में स्थापित करने में सफल रहा।

उत्तराखंड में कुमाऊं परिषद के दौरान घटित महत्वपूर्ण घटनाएं :-

जब उत्तराखंड में कुमाऊं परिषद का बोलबाला था। उस दौरान उत्तराखंड में विभिन्न घटनाएं घटित हुई। क्रांति में तेजी से वृद्धि हुई।
  • गोविंद बल्लभ पंत ने सन् 1918 में काशीपुर में "खद्दर आश्रम" की स्थापना की। 
  • सन् 1918 में 48 वर्षों के प्रकाशन के पश्चात "अल्मोड़ा अखबार का प्रकाशन बंद" कर दिया गया। दरअसल बद्रीदत्त पांडे के आने के पश्चात 1913 से ही अल्मोड़ा अखबार शासन की नजरों को खटकने लगा था। और फिर बद्रीदत्त पांडे ने एक ग़ज़ल के द्वारा तत्कालीन अल्मोड़ा जिले के डिप्टी कमिश्नर लोमश के काले कारनामों को उजागर कर दिया था ।
  • अल्मोड़ा अखबार बंद होने के बाद 15 अक्टूबर 1918 में बद्रीदत्त पांडे ने "शक्ति नामक सप्ताहिक" पत्रिका का प्रकाशन किया।   
  • कुमाऊं परिषद के प्रयासों से नवंबर 1919 में 'नायक सुधार समिति' की स्थापना हुई। जिसकी पहली बैठक नैनीताल में हुई थी।
  • 1920 में पंडित मोतीलाल नेहरू अल्मोड़ा आए थे। 
  • 1 अगस्त 1919 को महात्मा गांधी द्वारा देश में 'असहयोग आंदोलन' की घोषणा की गई तथा 4 सितंबर 1920 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में गांधीजी ने अन्य नेताओं को खिलाफत के साथ-साथ स्वराज के भी समर्थन में असहयोग आंदोलन शुरू करने के लिए राजी किया। साथ ही देश में 1919 में खिलाफत आंदोलन भी चल रहा था।
  • कुमाऊं परिषद के काशीपुर अधिवेशन (चौथा अधिवेशन) तथा कांग्रेस के 'नागपुर अधिवेशन' में कुली बेगार को समाप्त करने की दिशा में सफल प्रयास किया गया । नागपुर अधिवेशन के बाद भारी मात्रा में स्वयंसेवकों का बागेश्वर आगमन हुआ । 1 जनवरी 1921 को चामी गांव से सभा का आयोजन किया गया तथा 14 जनवरी 1921 को बद्रीनाथ पांडे, हरगोविंद पंत व चिरंजीवी लाल आदि के नेतृत्व में बागेश्वर के सरयू नदी के तट पर "उत्तरायणी मेले" के दिन 40 हजार स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा कुली बेगार न करने की शपथ ली और इससे संबंधित रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए गए। 
  • मार्च 1921 में मोहन सिंह मेहता को गिरफ्तार कर लिया गया । जो कुमाऊं क्षेत्र से जेल जाने वाले प्रथम स्वतंत्रता सेनानी कहलाए । इन्हें 9 माह की सजा हुई।
  • राष्ट्रीय स्तर पर सन् 1923 को "स्वराज पार्टी" का गठन मोतीलाल नेहरू का चितरंजन दास द्वारा किया गया । 20 जुलाई 1923 को नैनीताल में मोतीलाल नेहरू कुमाऊं में कार्यकर्ताओं से मिले जिसके बाद 1923 एवं 1926 के चुनाव संयुक्त प्रांत में हुए। 

कुमाऊं परिषद का विलय -1926

सन् 1926 में कुमाऊं परिषद को कांग्रेस में सम्मिलित कर लिया गया। इतिहासकारों ने सन 1916 से सन् 1926 के मध्य कुमाऊं परिषद इतिहास ही कुमाऊं कमिश्नर में राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास बताया गया है । कुमाऊं परिषद में कुली उतार, कुली बेगार, कोली बर्दायाश, जंगलात, लाइसेंस, नयाबाद, बंदोबस्त आदि विषयों के विरुद्ध आवाज उठाई और आंदोलन किया।

ब्रिटिश गढ़वाल में स्वतंत्रता संग्राम 

कुमाऊं कमिश्नरी के अल्मोड़ा नैनीताल जिलों में सन् 1919 तक काफी राजनीतिक चेतना आ चुकी थी लेकिन ब्रिटिश गढ़वाल में बीसवीं सदी के प्रारंभिक दो दशकों तक सामाजिक सुधारों तथा सांस्कृतिक विकास का समय रहा। उस काल में वहां में रायबहादुर, तारादत्त गैरोला, चंद्रमोहन रतूड़ी, धनीराम शर्मा, गिरिजा दत्त, जोध सिंह नेगी, पातीराम परमार, कुलानंद बड़थ्वाल, विश्वंभर दत्त चंदोला जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों का प्रभाव था । यह सभी लोग गोखले मनोवृति के थे उन्होंने समाचार पत्रों तथा सभाओं के माध्यम से ब्रिटिश गढ़वाल में सामाजिक चेतना उत्पन्न की। 

गढ़वाल परिषद -1919

ब्रिटिश गढ़वाल के दो प्रमुख नेता मुकंदी लाल तथा अनुसूया प्रसाद ने सन् 1919 में अमृतसर के रोलेट एक्ट के विरोध में हुए कांग्रेसी अधिवेशन में भाग लेकर ब्रिटिश गढ़वाल में राजनीतिक जागृति उत्पन्न की। कुमाऊं परिषद की भांति पश्चिमी उत्तराखंड में "गढ़वाल परिषद" की स्थापना की गई। अक्टूबर 1919 में श्रीनगर में इसका एक विशाल सम्मेलन हुआ। जिसमें अनेक प्रस्ताव पारित किए गए। गढ़वाल परिषद का प्रथम अधिवेशन कोटद्वार में नवंबर 1920 ईस्वी में संपन्न हुआ। 

गढ़वाल सभा का गठन -1914

गढ़वाल परिषद के गठन से पूर्व नारायण सिंह अग्रवाल की अध्यक्षता में गठित कमेटी की अपील पर गढ़वाल भातृ मंडल और गढ़वाल यूनियन का विलय 16 फरवरी 1914 को दुगड्डा को कर "गढ़वाल सभा" का गठन किया। इस संगठन ने 1915 में स्टोवल प्रेस स्थापित किया तथा गढ़वाली पत्र को मासिक से सप्ताहिक में परिवर्तित किया और गिरिजा दत्त नैथानी को संपादक बनाया ।

क्षत्रिय सभा का गठन -1919

प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत अंग्रेजी शिक्षा से उत्पन्न चेतना की लहर ने जातीय संगठनों के आधार पर सुधार की भावना को क्षत्रियों के मध्य ब्राह्मण सभाओं के माध्यम से उभारा था। कृषि से प्रत्यक्ष जुड़े रहने से छात्रों की स्थिति सामान्य सुरक्षित थी। परंपरागत रूप से क्षत्रियों के मध्य शिक्षा को अधिक महत्व नहीं दिया जाता था । किंतु नये प्रगतिशील युग में सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए तथा अंग्रेजों का कृपा भाजन के लिए शिक्षा के महत्व को भी सभी वर्गों में समझा जाने लगा था। अतः प्रताप सिंह नेगी व जोध सिंह नेगी द्वारा सन् 1919 में क्षत्रिय सभा का गठन किया गया। तथा जोध सिंह नेगी ने क्षत्रियों को शिक्षा में सहायता प्रदान करने के लिए "गढ़वाल क्षत्रिय छात्रवृत्ति ट्रस्ट" की स्थापना 14 सितम्बर 1919 में की थी ।

गढ़वाल में कुली बेगार आंदोलन 

30 जनवरी 1921 ई. में चमेठाखाल नामक स्थान पर मुकुंदीलाल  के नेतृत्व में एक विशाल सभा हुई तथा उन्होंने लोगों को बागेश्वर घटना का समर्थन करने को कहा। इससे संपूर्ण गढ़वाल में आंदोलन की आग फैलने लगी। गढ़वाल के कंकोड़ाखाल में कुली बेगार का नेतृत्व अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने किया। दुगड्डा में 1921 में हुए बेगार संबंधी आंदोलन के सम्मेलन की अध्यक्षता पुरुषोत्तम दास टंडन ने की थी।

साइमन कमीशन का विरोध

साइमन आयोग 7 ब्रिटिश सांसदों का समूह था जिसका गठन 8 नवंबर 1927 में भारत में संविधान सुधारों के अध्ययन के लिए किया गया था और इसका मुख्य कार्य मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार की जांच करना था। 3 फरवरी 1928 में साइमन कमीशन भारत आया। जिसका भारतीयों ने कड़ा विरोध किया था । क्योंकि इस समूह में कोई भी भारतीय शामिल नहीं था । संयुक्त प्रांत की काउंसिल में साइमन कमीशन के बहिष्कार का प्रस्ताव मुकंदी लाल ने रखा तथा इसे अनुमोदन बद्रीदत्त पांडे ने दिया था। 

गाड़ोदिया स्टोर डकैती - (6 जुलाई 1930)

1929-33 की अवधि में क्रांतिकारी आंदोलन चरम सीमा पर था। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र से भवानी सिंह रावत, इंद्र सिंह गढ़वाली, बच्चू लाल ने चंद्रशेखर आजाद, रोशनलाल, शंभूनाथ द्वारा स्थापित क्रांतिकारी संगठन में सक्रिय भाग लिया। और 6 जुलाई 1930 दिल्ली के गडौदिया स्टोर डकैती को अंजाम दिया। लूट के बाद आजाद सहित अन्य सभी साथी भवानी सिंह रावत के गांव दुगड्डा के निकट नाथूपुर आए और बंदूक चलाने की ट्रेनिंग ली। बाद में इंद्र सिंह गढ़वाली ने हिंदुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ "नौजवान भारत सभा" में शामिल हुए तथा 1935 मद्रास बम काण्ड में भाग लिया और बच्चू लाल गढ़वाली एवं साथियों ने 28 अप्रैल 1935 में बैंक को लूटा। 

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  भूमि बंदोबस्त व्यवस्था         उत्तराखंड का इतिहास भूमि बंदोबस्त आवश्यकता क्यों ? जब देश में उद्योगों का विकास नहीं हुआ था तो समस्त अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। उस समय राजा को सर्वाधिक कर की प्राप्ति कृषि से होती थी। अतः भू राजस्व आय प्राप्त करने के लिए भूमि बंदोबस्त व्यवस्था लागू की जाती थी । दरअसल जब भी कोई राजवंश का अंत होता है तब एक नया राजवंश नयी बंदोबस्ती लाता है।  हालांकि ब्रिटिश शासन से पहले सभी शासकों ने मनुस्मृति में उल्लेखित भूमि बंदोबस्त व्यवस्था का प्रयोग किया था । ब्रिटिश काल के प्रारंभिक समय में पहला भूमि बंदोबस्त 1815 में लाया गया। तब से लेकर अब तक कुल 12 भूमि बंदोबस्त उत्तराखंड में हो चुके हैं। हालांकि गोरखाओ द्वारा सन 1812 में भी भूमि बंदोबस्त का कार्य किया गया था। लेकिन गोरखाओं द्वारा लागू बन्दोबस्त को अंग्रेजों ने स्वीकार नहीं किया। ब्रिटिश काल में भूमि को कुमाऊं में थात कहा जाता था। और कृषक को थातवान कहा जाता था। जहां पूरे भारत में स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी बंदोबस्त और महालवाड़ी बंदोबस्त व्यवस्था लागू थी। वही ब्रिटिश अधिकारियों ने कुमाऊं के भू-राजनैतिक महत्

कत्यूरी राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

 कत्यूरी राजवंश का इतिहास भाग -1 अमोघभूति कुणिद वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। कुणिद वंश उत्तराखंड में लगभग तीसरी- चौथी शताब्दी की पहली राजनीतिक शक्ति थी । जबकि कत्यूर राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला पहला ऐतिहासिक शक्तिशाली राजवंश था। इसे कार्तिकेयपुर वंश के नाम से भी जाना जाता है। 'कत्यूरी' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग एटकिंसन ने किया था।  कत्यूरी राजवंश के संस्थापक बसंत देव थे । जिन्हें बासुदेव के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी। पांडुकेश्वर ताम्रलेख में पाए गए कत्यूरी राजा ललितशूर के अनुसार कत्यूरी शासकों की प्राचीनतम राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी । बाद में नरसिंह देव ने जोशीमठ से बैजनाथ (बागेश्वर ) में राजधानी स्थानांतरित कर दी । जहां से कत्यूरी राजवंश को विशिष्ट पहचान मिली । कत्यूरी राजवंश का उदय कुणिंदों के पतन के पश्चात देवभूमि उत्तराखंड की भूमि पर कुछ नए राजवंशों का उदय हुआ। जैसे गोविषाण, कालसी लाखामंडल आदि जबकि कुछ स्थानों पर कुणिंद भी शासन करते रहे। कुणिंदो के बाद शक, कुषाण और यौधेय  वंश के शासकों ने कुछ क्षेत्रों पर शासन व्यवस्था स्थ

उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न (उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14)

उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14 उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां वर्ष 1965 में केंद्र सरकार ने जनजातियों की पहचान के लिए लोकर समिति का गठन किया। लोकर समिति की सिफारिश पर 1967 में उत्तराखंड की 5 जनजातियों थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा, और राजी को एसटी (ST) का दर्जा मिला । राज्य की मात्र 2 जनजातियों को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है । सर्वप्रथम राज्य की राजी जनजाति को आदिम जनजाति का दर्जा मिला। बोक्सा जनजाति को 1981 में आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ था । राज्य में सर्वाधिक आबादी थारू जनजाति तथा सबसे कम आबादी राज्यों की रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल एसटी आबादी 2,91,903 है। जुलाई 2001 से राज्य सेवाओं में अनुसूचित जन जातियों को 4% आरक्षण प्राप्त है। उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न विशेष सूचना :- लेख में दिए गए अधिकांश प्रश्न समूह-ग की पुरानी परीक्षाओं में पूछे गए हैं। और कुछ प्रश्न वर्तमान परीक्षाओं को देखते हुए उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित 25+ प्रश्न तैयार किए गए हैं। जो आगामी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। बता दें की उत्तराखंड के 40 प्रश्नों में से 2

गोरखा शासन : उत्तराखंड का इतिहास

    उत्तराखंड का इतिहास           गोरखा शासन (भाग -1) पृष्ठभूमि मल्ल महाजनपद का इतिहास (आधुनिक नेपाल) 600 ईसा पूर्व जब 16 महाजनपदों का उदय हुआ। उन्हीं में से एक महाजनपद था - मल्ल (आधुनिक नेपाल का क्षेत्र)। प्राचीन समय में नेपाल भारत का ही हिस्सा था। मल्ल महाजनपद का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ के " अगुंत्तर निकाय " में किया गया है। और जैन ग्रंथ के भगवती सूत्र में इसका नाम " मौलि या मालि " नाम से जनपद का उल्लेख है। मल्ल महाजनपद की प्रथम राजधानी कुशीनगर थी । कुशीनगर में गौतम बुद्ध के निर्वाण (मृत्यु) प्राप्त करने के बाद उनकी अस्थि-अवशेषों का एक भाग मल्लो को मिला था । जिसके संस्मारणार्थ उन्होंने कुशीनगर में एक स्तूप या चैत्य का निर्माण किया था। मल्ल की वित्तीय राजधानी पावा थी । पावा में ही महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था ।                 322 ईसा पूर्व समस्त उत्तर भारत में मौर्य साम्राज्य ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। मल्ल महाजनपद भी मौर्यों के अधीन आ गया था। गुप्त वंश के बाद उत्तर भारत की केंद्र शक्ति कमजोर हो गई । जिसके बाद  लगभग 5वीं सदीं में वैशाली से आए 'लिच्