सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि) हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है. भाषा का विकास  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.) 2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.) 3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ ) 4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ) 5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.) 6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में) *1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है वर्णमाला वर्ण क्या है?  उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है। वर्णमाला वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है। हिंदी लिपि के चिन्ह अ आ इ ई उ ऊ ऋ  ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ

आंग्ल-नेपाल युद्ध : गोरखा शासन का अंत (भाग -03 )

आंग्ल-नेपाल युद्ध -1814

आज हम भारत के इतिहास से जुड़ा प्रमुख टॉपिक आंग्ल-नेपाल युद्ध -1814 और संगोली की संधि के बारे में जानेंगे। जो उत्तराखंड के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अतः दिए गए लेख को पूरा जरूर पढ़ें। यह गोरखा सम्राज्य का तीसरा भाग है -

पृष्ठभूमि

आंग्ल-नेपाल युद्ध की शुरुआत ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स के समय सन् 1814 में हुई थी और आंग्ल-नेपाल युद्ध का अंत संगोली की संधि (1816) से हुआ। आंग्ल नेपाल युद्ध के समय नेपाल का प्रधानमंत्री भीम सिंह थापा (1806-1837) था। युद्ध से पहले के वर्षों में, ब्रिटिश अपने प्रभाव क्षेत्र का तेजी से विस्तार कर रहे थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कलकत्ता , मद्रास, मुम्बई के अपने मुख्य ठिकानों से भारत में अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी। ईस्ट इंडिया कंपनी की विस्तारवादी नीतियों ने आंग्ल-मराठा युद्धों को जन्म दिया। जबकि नेपाली भी अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे - पूर्व में सिक्किम , पश्चिम में कुमाऊं और गढ़वाल, दक्षिण में अवध तक सम्राज्य का विस्तार कर चुके थे ।

साम्राज्य विस्तार

सन् 1600 में ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन भारत में हुआ था। प्रारंभ में ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्य उद्देश्य व्यापार करना था लेकिन भारतीय राजाओं के आपसी मतभेद के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत पर शासन करने की रणनीति बनाई। फलस्वरूप सन 1757 में रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला से प्लासी के युद्ध हुआ। प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला को हराकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर अधिकार कर लिया साथ ही मीर जाफर को कठपुतली राजा नियुक्त किया। सन 1764 में अंग्रेजों ने बक्सर के युद्ध में दिल्ली के बादशाह शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजाऊदौला और मीर कासिम की संयुक्त सेना को हराकर दिल्ली तक ब्रिटिश सत्ता का डंका बजाया। बक्सर के युद्ध के बाद सन् 1773 में इंग्लैंड के राजा द्वारा चार्टर एक्ट पारित किए गए। जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन गवर्नर जनरल के अधीन आ गया। भारत का प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स था। सन 1798 में लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि द्वारा अनेकों भारतीय रियासत ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन हो गई।

वहीं दूसरी तरफ नेपाल के राजा रण बहादुर शाह (1778-1804) भी गोरखा साम्राज्य का तेजी से विस्तार कर रहे थे। गोरखों ने सन् 1790 में चंद वंश के अंतिम राजा महेंद्र चंद्र को हराकर कुमाऊं पर अधिकार कर लिया और सन् 1804 में गढ़नरेश प्रदुम्न शाह को खुडबुड़ा (देहरादून) के मैदान में हराकर गढ़वाल पर अधिकार कर लिया । जब अंग्रेजों के साथ गोरखों का टकराव प्रारंभ हुआ। उस समय नेपाल के प्रधानमंत्री भीमसेन थापा (1806-1837) थे । भीमसेन थापा ने भी पूर्वजों के भांति विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया। उसने अंग्रेजों से गोरखपुर में 200 ग्राम छीने।

युद्ध के प्रमुख कारण

  • भीम सिंह थापा ने अपने पिता को पाल्पा के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया। जिससे अंग्रेजों और ब्रिटिशों के बीच गंभीर सीमा विवाद पैदा हो गए। वहीं ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन बुटवल प्रांत (गोरखपुर) के तराई भाग पर गोरखों ने कब्जा कर लिया। जो 1814 में आंग्ल-नेपाल युद्ध का तात्कालिक कारण बना।
  • युद्ध का प्रमुख कारण गोरखों की आर्थिक नीतियां थी।  ईस्ट इंडिया कंपनी ने तिब्बत के लिए व्यापार मार्ग खोलने की मांग की थी। लेकिन नेपाली सरकार ने देश से मार्ग खोलने को मना कर दिया।
  • लॉर्ड हेस्टिंग्स हिमालयी क्षेत्र में व्यावसायिक अवसरों की तलाश कर रहे थे।
  • हेस्टिंग्स ने केवल व्यावसायिक कारणों से नेपाल पर आक्रमण किया था। यह एक रणनीतिक फैसला था। वह मराठों, सिखों और गोरखाओं के बीच मुगल साम्राज्य के पतन के बीच हिंदू पुनरुत्थान और एकजुटता से सावधान था। वह मध्य भारत में मराठों के खिलाफ विजय की पूर्व-खाली योजनाएं बना रहा था, और दो मोर्चों पर लड़ने से बचने के लिए उसे पहले नेपाल को अपंग करने की जरूरत थी।

गोरखों के साथ विवादित इलाकों के बारे में समझौता करने के लिए अंग्रेजों ने मेजर ब्रेडसा को चुना था।

आंग्ल नेपाल युद्ध -1814

लॉर्ड हेस्टिंग्स ने नवंबर 1814 में गोरखों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी और फौज को चार भागों में बांटा।

  1. काठमांडू (नेपाल) - मेजर जनरल मार्ले को बिहार में  हजार सैनिकों की सेना लेकर सीधे नेपाल की राजधानी काठमांडू पर हमला करने का आदेश दिया गया।
  2. गोरखपुर -  मेजर जनरल वुड को 4 हजार सैनिकों के साथ गोरखपुर से आक्रमण किया था। बाद में भूतनील दर्रे से नेपाल की पहाड़ियों में प्रवेश किया और पूर्व की ओर मुड़कर पहाड़ी जिलों में प्रवेश करने के लिए काठमांडू की ओर सहयोग किया। 23 अप्रैल 1815 को गणनाथ - डांडा के युद्ध में हस्तीदल चौतरिया मारा गया।
  3. खलंगा किला (देहरादून) - मेजर जनरल जिलेस्पी के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने देहरादून के खलंगा किले व नालापानी किले से गोरखों पर आक्रमण किया। गोरखों का नेतृत्व बलभद्र सिंह थापा कर रहा था। 31 अक्टूबर 1814 ईसवी में कर्नल जिलेस्पी नालापानी दुर्ग में मारा गया। और 30 नवंबर 1814 ईसवी में अंग्रेजों ने खलंगा के दुर्ग पर पुनः बमबारी की। 25 अप्रैल 1815 में अंग्रेजों ने अल्मोड़ा पर आक्रमण कर दिया। 27 अप्रैल 1815 में गार्डनर व बमशाह के बीच संधि हुई। तथा 28 अप्रैल 1815 को बमशाह व कर्नल निकोलसन के बीच संधि हुई।
  4. सतलुज नदी - मेजर जनरल ऑक्टरलोनी ने पश्चिमी मोर्चे पर सतलुज और यमुना नदी के मध्य भाग में आक्रमण किया। ऑक्टरलोनी ब्रिटिश जनरलों में सर्वाधिक योग्यतम सेनापति था। पश्चिम में सतलुज नदी के तट पर अमर सिंह थापा गोरखा सैनिकों की कमान संभाले हुए था। 15 मई 1815 ईसवी में मलॉवगढ़ की संधि अमर सिंह थापा व ऑक्टरलोनी के बीच हुई।

संगौली की संधि - 4 मार्च 1816

कुमाऊं और गढ़वाल में गोरखों की हार के बाद 2 दिसंबर 1815 ईसवी में गजराज मिश्र और  कर्नल ब्रेडसा के बीच संगोली की संधि हुई।
जिनके समक्ष अंग्रेजों ने निम्नांकित शर्तें रखी-

  • युद्ध के पूर्व झगड़े के क्षेत्र लौटा दिए जाएं।
  • काली-रापती की तराई स्थली अंग्रेजों को मिले।
  • बुटवुल को छोड़कर रापती और गंडक की तराई भूमि की अंग्रेजी लेंगे।
  • गंडक - कोसी के मध्य की तराई जमीन अंग्रेजों के अधिकृत होगी।
  • मेची-विस्ता के मध्य का तराई भाग एवं पर्वतीय प्रदेश पर अंग्रेजों की सत्ता होगी।
  • काली नदी के पश्चिम का संपूर्ण गोरखा राज्य भी अंग्रेजों के अधीन होगा।

अंतिम शर्त को नेपाल सम्राट ने अस्वीकार कर दिया एवं पुन: युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। फरवरी 1816 ईसवी में अंग्रेजी सेना ने नेपाल पर चढ़ाई कर दी थी। 4 मार्च 1816 को नेपाल सरकार ने संगोली की संधि स्वीकार कर ली। संगोली संधि अनुसार टिहरी रियासत सुदर्शन शाह को प्रदान की गई और शेष को नॉन रेगुलेशन प्रांत बनाया गया। नॉन रेगुलेशन प्रांत सन् 1891 में खत्म कर दिया गया तथा सन् 1901 में संयुक्त प्रांत, आगरा एवं अवध बना तो उत्तराखंड को इस में विलय कर दिया गया।

महत्वपूर्ण तथ्य

*गजराज मिश्र नेपाल के राजा रण बहादुर शाह के गुरु थे। 
*लार्ड हेस्टिंग्स को लार्ड मोयेरा नाम से भी जाना जाता है



 Related posts :-


टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

If you have any doubts.
Please let me now.

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व एवं स्वतंत्रता सेनानी

उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व उत्तराखंड की सभी परीक्षाओं हेतु उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व एवं स्वतंत्रता सेनानियों का वर्णन 2 भागों में विभाजित करके किया गया है । क्योंकि उत्तराखंड की सभी परीक्षाओं में 3 से 5 मार्क्स का उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान अवश्य ही पूछा जाता है। अतः लेख को पूरा अवश्य पढ़ें। दोनों भागों का अध्ययन करने के पश्चात् शार्ट नोट्स पीडीएफ एवं प्रश्नोत्तरी पीडीएफ भी जरूर करें। भाग -01 उत्तराखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी [1] कालू महरा (1831-1906 ई.) कुमाऊं का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) "उत्तराखंड का प्रथम स्वतंत्रा सेनानी" कालू महरा को कहा जाता है। इनका जन्म सन् 1831 में चंपावत के बिसुंग गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम रतिभान सिंह था। कालू महरा ने अवध के नबाब वाजिद अली शाह के कहने पर 1857 की क्रांति के समय "क्रांतिवीर नामक गुप्त संगठन" बनाया था। इस संगठन ने लोहाघाट में अंग्रेजी सैनिक बैरकों पर आग लगा दी. जिससे कुमाऊं में अव्यवस्था व अशांति का माहौल बन गया।  प्रथम स्वतंत्रता संग्राम -1857 के समय कुमाऊं का कमिश्नर हेनरी रैम्

चंद राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास

चंद राजवंश का इतिहास पृष्ठभूमि उत्तराखंड में कुणिंद और परमार वंश के बाद सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजवंश है।  चंद वंश की स्थापना सोमचंद ने 1025 ईसवी के आसपास की थी। वैसे तो तिथियां अभी तक विवादित हैं। लेकिन कत्यूरी वंश के समय आदि गुरु शंकराचार्य  का उत्तराखंड में आगमन हुआ और उसके बाद कन्नौज में महमूद गजनवी के आक्रमण से ज्ञात होता है कि तो लगभग 1025 ईसवी में सोमचंद ने चंपावत में चंद वंश की स्थापना की है। विभिन्न इतिहासकारों ने विभिन्न मत दिए हैं। सवाल यह है कि किसे सच माना जाए ? उत्तराखंड के इतिहास में अजय रावत जी के द्वारा उत्तराखंड की सभी पुस्तकों का विश्लेषण किया गया है। उनके द्वारा दिए गए निष्कर्ष के आधार पर यह कहा जा सकता है । उपयुक्त दिए गए सभी नोट्स प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से सर्वोत्तम उचित है। चंद राजवंश का इतिहास चंद्रवंशी सोमचंद ने उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में लगभग 900 वर्षों तक शासन किया है । जिसमें 60 से अधिक राजाओं का वर्णन है । अब यदि आप सभी राजाओं का अध्ययन करते हैं तो मुमकिन नहीं है कि सभी को याद कर सकें । और अधिकांश राजा ऐसे हैं । जिनका केवल नाम पता है । उनक

परमार वंश - उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

उत्तराखंड का इतिहास History of Uttarakhand भाग -1 परमार वंश का इतिहास उत्तराखंड में सर्वाधिक विवादित और मतभेद पूर्ण रहा है। जो परमार वंश के इतिहास को कठिन बनाता है परंतु विभिन्न इतिहासकारों की पुस्तकों का गहन विश्लेषण करके तथा पुस्तक उत्तराखंड का राजनैतिक इतिहास (अजय रावत) को मुख्य आधार मानकर परमार वंश के संपूर्ण नोट्स प्रस्तुत लेख में तैयार किए गए हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में 688 ईसवी से 1947 ईसवी तक शासकों ने शासन किया है (बैकेट के अनुसार)।  गढ़वाल में परमार वंश का शासन सबसे अधिक रहा।   जिसमें लगभग 12 शासकों का अध्ययन विस्तारपूर्वक दो भागों में विभाजित करके करेंगे और अंत में लेख से संबंधित प्रश्नों का भी अध्ययन करेंगे। परमार वंश (गढ़वाल मंडल) (भाग -1) छठी सदी में हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात संपूर्ण उत्तर भारत में भारी उथल-पुथल हुई । देश में कहीं भी कोई बड़ी महाशक्ति नहीं बची थी । जो सभी प्रांतों पर नियंत्रण स्थापित कर सके। बड़े-बड़े जनपदों के साथ छोटे-छोटे प्रांत भी स्वतंत्रता की घोषणा करने लगे। कन्नौज से सुदूर उत्तर में स्थित उत्तराखंड की पहाड़ियों में भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्

उत्तराखंड में भूमि बंदोबस्त का इतिहास

  भूमि बंदोबस्त व्यवस्था         उत्तराखंड का इतिहास भूमि बंदोबस्त आवश्यकता क्यों ? जब देश में उद्योगों का विकास नहीं हुआ था तो समस्त अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। उस समय राजा को सर्वाधिक कर की प्राप्ति कृषि से होती थी। अतः भू राजस्व आय प्राप्त करने के लिए भूमि बंदोबस्त व्यवस्था लागू की जाती थी । दरअसल जब भी कोई राजवंश का अंत होता है तब एक नया राजवंश नयी बंदोबस्ती लाता है।  हालांकि ब्रिटिश शासन से पहले सभी शासकों ने मनुस्मृति में उल्लेखित भूमि बंदोबस्त व्यवस्था का प्रयोग किया था । ब्रिटिश काल के प्रारंभिक समय में पहला भूमि बंदोबस्त 1815 में लाया गया। तब से लेकर अब तक कुल 12 भूमि बंदोबस्त उत्तराखंड में हो चुके हैं। हालांकि गोरखाओ द्वारा सन 1812 में भी भूमि बंदोबस्त का कार्य किया गया था। लेकिन गोरखाओं द्वारा लागू बन्दोबस्त को अंग्रेजों ने स्वीकार नहीं किया। ब्रिटिश काल में भूमि को कुमाऊं में थात कहा जाता था। और कृषक को थातवान कहा जाता था। जहां पूरे भारत में स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी बंदोबस्त और महालवाड़ी बंदोबस्त व्यवस्था लागू थी। वही ब्रिटिश अधिकारियों ने कुमाऊं के भू-राजनैतिक महत्

कत्यूरी राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

 कत्यूरी राजवंश का इतिहास भाग -1 अमोघभूति कुणिद वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। कुणिद वंश उत्तराखंड में लगभग तीसरी- चौथी शताब्दी की पहली राजनीतिक शक्ति थी । जबकि कत्यूर राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला पहला ऐतिहासिक शक्तिशाली राजवंश था। इसे कार्तिकेयपुर वंश के नाम से भी जाना जाता है। 'कत्यूरी' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग एटकिंसन ने किया था।  कत्यूरी राजवंश के संस्थापक बसंत देव थे । जिन्हें बासुदेव के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी। पांडुकेश्वर ताम्रलेख में पाए गए कत्यूरी राजा ललितशूर के अनुसार कत्यूरी शासकों की प्राचीनतम राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी । बाद में नरसिंह देव ने जोशीमठ से बैजनाथ (बागेश्वर ) में राजधानी स्थानांतरित कर दी । जहां से कत्यूरी राजवंश को विशिष्ट पहचान मिली । कत्यूरी राजवंश का उदय कुणिंदों के पतन के पश्चात देवभूमि उत्तराखंड की भूमि पर कुछ नए राजवंशों का उदय हुआ। जैसे गोविषाण, कालसी लाखामंडल आदि जबकि कुछ स्थानों पर कुणिंद भी शासन करते रहे। कुणिंदो के बाद शक, कुषाण और यौधेय  वंश के शासकों ने कुछ क्षेत्रों पर शासन व्यवस्था स्थ

उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न (उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14)

उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14 उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां वर्ष 1965 में केंद्र सरकार ने जनजातियों की पहचान के लिए लोकर समिति का गठन किया। लोकर समिति की सिफारिश पर 1967 में उत्तराखंड की 5 जनजातियों थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा, और राजी को एसटी (ST) का दर्जा मिला । राज्य की मात्र 2 जनजातियों को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है । सर्वप्रथम राज्य की राजी जनजाति को आदिम जनजाति का दर्जा मिला। बोक्सा जनजाति को 1981 में आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ था । राज्य में सर्वाधिक आबादी थारू जनजाति तथा सबसे कम आबादी राज्यों की रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल एसटी आबादी 2,91,903 है। जुलाई 2001 से राज्य सेवाओं में अनुसूचित जन जातियों को 4% आरक्षण प्राप्त है। उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न विशेष सूचना :- लेख में दिए गए अधिकांश प्रश्न समूह-ग की पुरानी परीक्षाओं में पूछे गए हैं। और कुछ प्रश्न वर्तमान परीक्षाओं को देखते हुए उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित 25+ प्रश्न तैयार किए गए हैं। जो आगामी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। बता दें की उत्तराखंड के 40 प्रश्नों में से 2

गोरखा शासन : उत्तराखंड का इतिहास

    उत्तराखंड का इतिहास           गोरखा शासन (भाग -1) पृष्ठभूमि मल्ल महाजनपद का इतिहास (आधुनिक नेपाल) 600 ईसा पूर्व जब 16 महाजनपदों का उदय हुआ। उन्हीं में से एक महाजनपद था - मल्ल (आधुनिक नेपाल का क्षेत्र)। प्राचीन समय में नेपाल भारत का ही हिस्सा था। मल्ल महाजनपद का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ के " अगुंत्तर निकाय " में किया गया है। और जैन ग्रंथ के भगवती सूत्र में इसका नाम " मौलि या मालि " नाम से जनपद का उल्लेख है। मल्ल महाजनपद की प्रथम राजधानी कुशीनगर थी । कुशीनगर में गौतम बुद्ध के निर्वाण (मृत्यु) प्राप्त करने के बाद उनकी अस्थि-अवशेषों का एक भाग मल्लो को मिला था । जिसके संस्मारणार्थ उन्होंने कुशीनगर में एक स्तूप या चैत्य का निर्माण किया था। मल्ल की वित्तीय राजधानी पावा थी । पावा में ही महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था ।                 322 ईसा पूर्व समस्त उत्तर भारत में मौर्य साम्राज्य ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। मल्ल महाजनपद भी मौर्यों के अधीन आ गया था। गुप्त वंश के बाद उत्तर भारत की केंद्र शक्ति कमजोर हो गई । जिसके बाद  लगभग 5वीं सदीं में वैशाली से आए 'लिच्