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पर्वतों के निर्माण (Geography Notes - part 06)

पर्वतों के निर्माण  प्रस्तावना "पर्वत हमारी पृथ्वी की सबसे भव्य और प्रभावशाली संरचनाओं में से एक हैं। ये न केवल हमारे भूगोल को तय करते हैं, बल्कि मौसम से लेकर हमारी नदियों तक सब कुछ बदलते हैं। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे की कहानी उतनी ही जटिल और दिलचस्प है। इस अध्याय में हम बेहद आसान भाषा में समझेंगे कि प्लेटों के टकराने, ज़मीन के फटने और ज्वालामुखी के विस्फोट से इन पर्वतों का जन्म कैसे होता है।" पर्वतों के निर्माण पर्वतों के निर्माण का मुख्य आधार टेक्टोनिक प्लेटों की गति है। हमारी पृथ्वी का सबसे ऊपरी हिस्सा (स्थलमंडल) कई टुकड़ों में टूटा हुआ है जिन्हें 'टेक्टोनिक प्लेट्स' कहते हैं। ये प्लेटें मेंटल की अर्ध-तरल परत (एस्थेनोस्फीयर) पर बहुत धीमी गति (सालाना 1 से 10 सेमी) से खिसकती रहती हैं। जब ये प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, दूर जाती हैं या आपस में रगड़ खाती हैं, तो पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) पर भीषण तनाव और दबाव बनता है। इसी हलचल के कारण ज़मीन का हिस्सा या तो ऊपर उठ जाता है या फिर ज्वालामुखी के मैग्मा के जमाव से पहाड़ का रूप ले लेता है। पर्वतों के मुख्य प्रकार पर्...

काव्य संग्रह - poetry book

 काव्य संग्रह 

 Poetry book

मासूमियत

Part -1

 कैसी ये हवाएं हैं ? 
कैसा ये मौसम है?
 पुरवाई चल रही है।
 वैशाख की गर्मी बढ़ रही है।
हाथ पैर है रुखे - रूखे से ,
दिल के रिश्ते हैं उलझे - उलझे सेे,
लाख मनाया तुम नहीं माने,
दिल की बातें दिल ही जानें। 
चाहे कोई कितना भी सच बोल दे।
 चाहे कोई दिल के सारे भेद खोल दे ।
फर्क नहीं पड़ता, पत्थर हृदय वालों को,
 आसान नहीं है समझना, मासूमियत के दीवानों को,

Part -2


भोलेपन का चोला पहने,
वो नजर अंदाज कर रहे हैं।
 छोड़कर मोहब्बत का समंदर 
जाने - अनजाने में गुनाह कर रहे हैं।
 मुमकिन है हम याद आएंगे । 
एक बार चले गए तो वापस न आएंगे।
वजूद इतना भी छोटा नहीं हमारा।
आपके नहीं तो किसी और के काम आएंगे।
आसमां के ख्वाब लेकर चल रहे हैं।
धीरे-धीरे ही सही पर बढ़ रहे हैं।
तकदीर में जो भी लिखा हो अब,
मंजिल-ए-सफर हर हाल  पाएंगे। 


Part - 3


चलते चलते या तो काबिल 
या एक अच्छे मुसाफिर बन जाएंगे।
कोशिशें कभी कम न होंगी।
वादा खुद से कर रहे हैं।
मोहब्बत का सफर लम्बा है मगर
याद शहर से गुजर रहे हैं।
मंजिल का भी पता नहीं
जानें कहां का ठिकाना है
अनजानी इन गलियों में
इस मुसाफिर का आना-जाना है।

काव्य संग्रह - poetry book

अंदाज अपना अपना




मैं बात बात पर एक और बात कहता हूं।
 मैं अपनी बातों से बहुत कुछ सीखता रहता हूं।

जो बीत गया है उस पर विचार करता हूं
आने वाले कल का सुधार करता हूं।

तुम ध्यान से सुन न मेरी बातों को,
मैं बातों ही बातों में इज़हार करता हूं।

आहिस्ता आहिस्ता बढ़ रहे हैं मेरे कदम।
हर मंदिर हर मस्जिद मिलने की फरियाद करता हूं।

कभी तकदीर से , कभी जिंदगी से,
मैं सवाल पर सवाल करता हूं।

कभी अपनों के, कभी सपनों के, 
मैं बातों में भी तेरा जिक्र करता हूं।

ख्याबों की  दुनिया में, मैं हमेशा डूबा रहता हूं।
मैं बात बात पर अपनी ही बात करता हूं।

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शायद पर चलती है दुनिया ,
 जिसे नसीब कहते हैं,
जो चाहा रहे हो वो मिल जाए..........read full poem





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