उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल
उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Era) अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली है। इस काल का कोई लिखित प्रमाण नहीं है, इसलिए इसका इतिहास गुफाओं में मिले शैल-चित्रों (Rock Paintings), पत्थरों के औजारों और प्राचीन कंकालों के आधार पर लिखा गया है। आइए जानते हैं विस्तार से -
“धूल से भरी राहें और तपता हुआ सूरज... उत्तर भारत के एक गुमनाम गाँव के किनारे एक ऊँचा सा मिट्टी का टीला था। लोग वहाँ से ईंटें उखाड़ रहे थे, कोई अपने घर की दीवार बना रहा था, तो कोई उन पत्थरों को कचरा समझकर फेंक रहा था।
वहीं दूर खड़ा एक अंग्रेज अफसर, जिसका नाम अलेक्जेंडर कनिंघम था, यह सब बड़े गौर से देख रहा था। उसके पास एक पुरानी किताब थी—चीनी यात्री ह्वेनसांग की डायरी। कनिंघम को यकीन था कि जिस टीले को लोग 'कचरा' समझ रहे हैं, उसके नीचे सम्राट अशोक का कोई महान शहर या बुद्ध का कोई पवित्र मठ दफन है।
वो बेचैनी और वो खत
कनिंघम रात भर सो नहीं पाए। उन्हें लग रहा था जैसे वो दफन शहर उन्हें पुकार रहे हों। उन्होंने सोचा, "अगर आज मैंने इन पत्थरों को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ कभी नहीं जान पाएँगी कि भारत कितना महान था। लोग कहेंगे कि भारत का इतिहास तो बस सुनी-सुनाई कहानियाँ और परियों के किस्से हैं!"
अगली सुबह, उन्होंने एक कागज उठाया और अपने हाथ कांपते हुए मगर इरादे मजबूत रखते हुए वायसराय लॉर्ड कैनिंग को एक खत लिखा।
कनिंघम ने उस खत में लिखा:
"महामहिम, हम एक ऐसे देश पर राज कर रहे हैं जिसकी जड़ें पाताल तक गहरी हैं। लेकिन अफसोस! यहाँ के लोग और हमारी सरकार, दोनों ही इन बेशकीमती निशानियों को पैरों तले कुचल रहे हैं। रेलवे की पटरियां बिछाने के लिए प्राचीन शहरों की ईंटें तोड़ी जा रही हैं। यह सिर्फ ईंटें नहीं हैं, यह भारत का चेहरा है जो धुंधला होता जा रहा है।"
उन्होंने आगे तर्क दिया कि अगर हम इन स्मारकों को 'खोजेंगे' और 'सहेजेंगे' (Survey and Preserve), तो दुनिया देखेगी कि भारत की सभ्यता यूनान और रोम से कम नहीं है। उन्होंने यह भी समझाया कि किसी देश के दिल पर राज करने के लिए उसके अतीत को समझना बहुत जरूरी है।
लॉर्ड कैनिंग उस खत की सच्चाई से हिल गए। उन्होंने तुरंत आदेश दिया—"जाओ कनिंघम! भारत की मिट्टी में दबे उस सच को बाहर निकालो।"
और इस तरह, साल 1861 में जन्म हुआ 'भारतीय पुरातत्व विभाग' (ASI) का। कनिंघम 'भारतीय पुरातत्व के पिता' बन गए। उन्होंने घोड़ा गाड़ी उठाई और निकल पड़े पूरे भारत के सफर पर। जहाँ लोग झाड़ियाँ देखते, कनिंघम वहाँ 'सांची का स्तूप' ढूंढ निकालते। जहाँ लोग पत्थर देखते, कनिंघम वहाँ 'अशोक का शिलालेख' पढ़ लेते।
कनिंघम की यह कहानी हमें सिखाती है कि नजरिया ही सब कुछ है। जिसे दुनिया 'मलबा' समझ रही थी, कनिंघम ने उसमें 'इतिहास' देख लिया। आज अगर हम उत्तराखंड के कालसी में खड़े होकर अशोक के शिलालेख को देख पाते हैं, या जागेश्वर के मंदिरों की नक्काशी पर गर्व करते हैं, तो यह उस एक 'खत' और उस एक 'जुनून' का नतीजा है”।
अब जानते हैं उत्तराखंड के इतिहास का अध्ययन कब और कैसे शुरू हुआ।
यूं तो उत्तराखंड में पुरातत्व विभाग का जनक हेनवुड को माना जाता है, क्योंकि हेनवुड ने सर्वप्रथम 1856 ईसवी में देवीधुरा से महापाषाणकालीन पुरावशेषों की खोज कर ली थी।
वह चंपावत के देवीधुरा के जंगलों में घूम रहा था, तभी उसकी नजर बड़े-बड़े पत्थरों पर बनी अजीब सी ओखलियों (कप मार्क्स) पर पड़ी। उसने सोचा—"ये निशान प्राकृतिक नहीं हो सकते, इन्हें किसी इंसान ने बनाया है!" यहीं से उत्तराखंड के उस इतिहास की पहली ईंट रखी गई, जिसका कोई लिखित प्रमाण नहीं था। यह 'प्रागैतिहासिक काल' की पहली आहट थी। उसके बाद 1877 ईस्वी में रॉबर्ट कार्नक ने महाश्म संस्कृति के आकृतियों की खोज की ।
('महाश्म' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: 'महा' (बड़ा) और 'अश्म' (पत्थर)। इसे अंग्रेजी में Megalith कहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, यह वह संस्कृति थी जहाँ इंसानों ने अपने पूर्वजों की कब्रों या महत्वपूर्ण स्थानों पर बड़े-बड़े पत्थर सजाने की परंपरा शुरू की थी। द्वाराहाट चंदेश्वर मंदिर से लगभग 200 कप मार्क्स प्राप्त हुए।)
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि सन् 1761 में बक्सर के युद्ध के बाद भारत पर ब्रिटिश शासन स्थापित हो गया था। 15 जनवरी 1784 को विलियम जोंस ने एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की। जिसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन भारतीय लिपियों और स्मारकों को समझाना था। इसी दौरान जेम्स प्रिंसप ने सम्राट अशोक के शिलालेखों को ब्राह्मी लिपि में पहली बार पढ़ा था। संभवतः जिसका असर भारतीयों पर पड़ा। और इतिहास का महत्व बढ़ गया। भारत में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति आधिकारिक तौर पर 7 मार्च 1835 को लागू हुई। जिसने बहुत सारे भारतीय साहित्यकार और इतिहासकारों को जन्म दिया।
वर्ष 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा की खोज की तो वहीं अगले वर्ष 1922 में राखल दास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो की खोज की। इस प्रकार भारतीय विद्वानों की रुचि इतिहास और पुरातत्व में बढ़ने लगी।
उत्तराखंड पुरातत्व की दिशा को आगे बढ़ने का श्रेय यशवंत सिंह कठौच, यशोधर मठपाल, शिवप्रसाद डबराल, एम. पी. जोशी आदि को जाता है।
डॉ. महेश्वर प्रसाद जोशी (M.P. Joshi)
डॉ. महेश्वर प्रसाद जोशी (M.P. Joshi), जो इतिहास और पुरातत्व के प्रति गहरे जुनूनी थे, जोशी जी अक्सर पहाड़ियों में कुछ न कुछ ढूँढते रहते थे। उनके पास पुरानी लोककथाओं का एक सिरा था कि उनका सोचना था कि गुफाओं में 'पुरखों' के निशान हो सकते हैं।
एक दिन, वे सुयाल नदी के तट के साथ-साथ झाड़ियों को हटाते हुए आगे बढ़ रहे थे। चढ़ाई कठिन थी और रास्ता पथरीला। तभी उनकी नज़र एक विशाल चट्टानी छज्जे पर पड़ी जो एक गुफा की तरह बाहर निकला हुआ था। इसे स्थानीय लोग 'लाखु उड्यार' कहते थे। 'लाखु' का अर्थ था 'एक लाख' और 'उड्यार' का 'गुफा'।
डॉ. जोशी जैसे ही उस गुफा के अंदर पहुँचे, वहाँ का नज़ारा देखकर उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। गुफा की भीतरी दीवारों पर कोई साधारण दाग-धब्बे नहीं थे, बल्कि वहाँ हज़ारों साल पुराना इतिहास मुस्कुरा रहा था।
उन्होंने देखा कि लाल, काले और सफेद रंगों से दीवारों पर कुछ आकृतियाँ बनी थीं। उन्होंने अपनी मशाल ऊपर की और देखा—वहाँ इंसानों की कतारें बनी थीं, जो एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए नाच रहे थे। कहीं कोई जानवर भाग रहा था, तो कहीं अजीब सी लहरदार रेखाएँ थीं।
डॉ. जोशी ने महसूस किया कि वे उत्तराखंड के पहले ऐसे इंसान बन गए हैं जिसने पाषाण काल (Stone Age) के इंसानों के पदचिह्नों को छू लिया है। उन्होंने गौर किया कि:
वह चित्र आज के कुमाऊँनी 'झोड़ा-चांचरी' नृत्य की याद दिलाता था, यानी हज़ारों साल पहले भी हमारे पूर्वज उत्सव मनाना जानते थे।
आदिमानव ने गेरू और कोयले का इस्तेमाल कर ऐसे रंग बनाए थे जो हज़ारों सालों की बारिश और धूप के बाद भी फीके नहीं पड़े थे।
डॉ. जोशी ने तुरंत उन चित्रों के स्कैच बनाए और अपनी खोज को दुनिया के सामने रखा। इस खोज ने पूरे भारत के इतिहासकारों को चौंका दिया। इससे पहले लोग सोचते थे कि उत्तराखंड के पहाड़ों में आदिमानव नहीं रहता था, लेकिन डॉ. जोशी की इस खोज ने साबित कर दिया कि जब इंसान सभ्यता सीख रहा था, तब भी ये पहाड़ आबाद थे।
डां एम. पी जोशी द्वारा खोजे गए प्रमुख पुरातत्विक स्थल :-
लाखु उड्यार (Lakhu Udiyar) - अल्मोड़ा
यह उत्तराखंड में प्रागैतिहासिक शैल-चित्रों (Rock Paintings) की खोज का सबसे पहला और मुख्य केंद्र माना जाता है।
स्थिति : यह अल्मोड़ा जिले में सुयाल नदी के तट पर स्थित है। 'उड्यार' का कुमाऊँनी भाषा में अर्थ होता है—"गुफा"।
खोज : इसकी खोज 1968 में डॉ. एम. पी. जोशी ने की थी।
मुख्य विशेषताएं:
चित्रों का विषय: यहाँ के चित्रों में आदिमानव के मनोरंजन और जीवनशैली को दिखाया गया है। मुख्य रूप से सामूहिक नृत्य (Group Dance) करते हुए मनुष्यों की आकृतियाँ मिली हैं।
पशु चित्रण : मनुष्यों के साथ-साथ यहाँ लोमड़ी, छिपकली और लंबे थूथन वाले जानवरों के चित्र भी मिलते हैं।
रंगों का प्रयोग: यहाँ तीन मुख्य रंगों का प्रयोग हुआ है—लाल, काला और सफेद।
संरचना : यहाँ के चित्र ज्यामितीय (Geometric) आकृतियों में बने हैं, जैसे कि लहरदार रेखाएं और बिन्दुओं का समूह।
किमनी गाँव (चमोली)
- यहाँ से सफेद रंग के हथियार और पशुओं के शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।
- स्थिति - किमनी गांव चमोली के थराली के पास पिण्डर नदी घाटी में स्थित है।
- खोज : इसकी खोज एम. पी. जोशी ने 1998 में की थी
ल्वेथाप (अल्मोड़ा)
यहाँ मानव को हाथों में हाथ डालकर नृत्य करते हुए दिखाया गया है और शिकार के चित्र भी मिले हैं।
शिवप्रसाद डबराल
उत्तराखंड के पहाड़ों में एक धुंधली सी सुबह थी। एक शख्स, जिसके कंधे पर एक पुराना झोला था और पैरों में धूल से सने जूते, चमोली की ऊँची पहाड़ियों को नाप रहा था। वह कोई और नहीं, डॉ. शिव प्रसाद डबराल थे। वे किसी सरकारी आदेश पर नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी के मोह में पैदल ही गाँवों की खाक छान रहे थे।
चलते-चलते वे तिब्बत सीमा के पास बसे मलारी गाँव पहुँचे। वहाँ के स्थानीय लोग खेती के लिए जमीन खोद रहे थे, तो उन्हें कुछ अजीब से पत्थर और हड्डियाँ मिलीं। डबराल जी की पारखी नजरों ने भांप लिया कि यह कोई साधारण हड्डियाँ नहीं हैं। उन्होंने अपनी छड़ी उठाई और खुदाई की जगह की जांच शुरू की।
जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, डबराल जी के होश उड़ते गए। वहाँ से एक के बाद एक कई शवाधान (कब्रें) मिलीं। यह देखकर वे दंग रह गए कि ये लाशें वैसे नहीं दफनाई गई थीं जैसा आज होता है। उन्हें घुटनों के बल मोड़कर खास तरीके से रखा गया था।
लेकिन असली रोमांच अभी बाकी था। उन कब्रों के अंदर से निकले काले और भूरे मिट्टी के बर्तन जिन पर वैसी ही नक्काशी थी जैसी हजारों मील दूर पाकिस्तान की 'स्वात्त घाटी' की प्राचीन सभ्यताओं में पाई जाती थी। एक पूरा का पूरा हिमालयी वृषभ (जुबू) का कंकाल, जिसके गले में रस्सी के निशान थे। इसका मतलब था कि उस समय के लोग पशुपालन में उस्ताद थे।
कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब आगे की खोजों (2002 के दौरान गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोध में) ने डबराल जी के दावों पर मुहर लगा दी। एक कब्र से निकला 5.2 किलोग्राम शुद्ध सोने का मुखौटा (Mask)।
पूरी दुनिया के इतिहासकार हक्के-बक्के रह गए! हिमालय की इतनी ऊँचाई पर, जहाँ आज भी ऑक्सीजन कम है, हजारों साल पहले एक ऐसी सभ्यता रहती थी जो न केवल सोना गलाना जानती थी, बल्कि उसे खूबसूरत मुखौटों की शक्ल देना भी जानती थी
डबराल जी के पास न बड़ी मशीनें थीं, न कोई टीम। उन्होंने अपना घर बेचकर, अपनी जमा-पूँजी लगाकर उत्तराखंड का इतिहास 12 खंडों में लिखा। वे खुद कहते थे कि "पहाड़ का इतिहास महलों में नहीं, बल्कि इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों और गुफाओं में छिपा है।”
शिवप्रसाद डबराल की प्रमुख खोजें -
मलारी गाँव (Malari Village) - चमोली
मलारी गाँव का इतिहास उत्तराखंड के 'धातु युग' और 'शवाधान' (Burial system) की उन्नत जानकारी देता है।
स्थिति: यह चमोली जिले में भारत-तिब्बत सीमा के पास स्थित एक छोटा सा गाँव है।
प्रमुख खोजें:
प्रथम खोज (1956): प्रख्यात इतिहासकार शिव प्रसाद डबराल 'चारण' ने यहाँ कई प्राचीन शवाधानों (Graves) की खोज की थी।
- स्वर्ण मुखौटा (2002): गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं को यहाँ से एक नरकंकाल के साथ 5.2 किलोग्राम का सोने का मुखौटा मिला। यह मुखौटा चेहरे पर लगाया गया था।
मिट्टी के बर्तन: यहाँ से काले और भूरे रंग के मिट्टी के बर्तन (Pottery) मिले हैं, जिनकी बनावट पाकिस्तान की 'स्वात्त घाटी' (Swat Valley) की प्राचीन सभ्यता से मिलती-जुलती है।
पशु के अवशेष: यहाँ एक हिमालयी वृषभ (जुबू) का पूर्ण कंकाल भी मिला है, जिससे पता चलता है कि उस समय पशुपालन उन्नत था।
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- उत्तराखंड का भोटांतिक
डॉ. यशोधर मठपाल
डॉ. यशोधर मठपाल को उत्तराखंड का 'शैल-चित्र पुरुष' कहा जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन पहाड़ों की गुफाओं और जंगलों में छिपे इतिहास को खोजने में लगा दिया। उन्होंने न केवल स्थलों को खोजा, बल्कि उन चित्रों की प्रतिकृतियां (Reproductions) बनाकर उन्हें दुनिया के लिए सुरक्षित भी किया।
यहाँ डॉ. यशोधर मठपाल द्वारा खोजे गए और अध्ययन किए गए प्रमुख स्थलों की कहानी दी गई है:
1. फड़कापुल (Pharkapauli) - अल्मोड़ा (1985)
यह डॉ. मठपाल की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक है।
स्थान: यह अल्मोड़ा के पास सुयाल नदी के तट पर स्थित है।
क्या मिला: यहाँ से उन्हें तीन शैलाश्रय (Rock Shelters) मिले। इन गुफाओं की छतों और दीवारों पर आदिमानव ने अपनी कला उकेरी थी। यहाँ के चित्र यह साबित करते हैं कि पाषाण काल का मानव केवल मैदानों में नहीं, बल्कि ऊँचे पहाड़ों पर भी स्थायी रूप से रहता था।
2. पेटशाल (Petshal) - अल्मोड़ा (1989)
फड़कापुल की खोज के बाद उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी और पेटशाल नामक स्थान पर पहुँचे।
विशेषता: यहाँ के शैल-चित्रों में कथई (Maroon) रंग का प्रयोग प्रमुखता से किया गया है।
चित्र: यहाँ नृत्य करती हुई मानव आकृतियाँ मिली हैं। डॉ. मठपाल ने बताया कि ये चित्र दर्शाते हैं कि उस समय का समाज उत्सवप्रिय था।
3. रामगंगा घाटी के 'कप मार्क्स' (Cup Marks)
डॉ. मठपाल ने अल्मोड़ा की रामगंगा घाटी में एक बहुत बड़ा शोध अभियान चलाया।
खोज: उन्होंने यहाँ 73 से अधिक स्थलों पर 'कप मार्क्स' (पत्थरों पर बने छोटे-छोटे गड्ढे या ओखलियाँ) खोजे।
महत्व: उन्होंने यह सिद्ध किया कि ये निशान महज संयोग नहीं थे, बल्कि महाश्म संस्कृति (Megalithic Culture) के लोगों द्वारा किसी विशेष धार्मिक या खगोलीय (Astronomical) उद्देश्य से बनाए गए थे।
4. नौला जंतवाल (Naula Jantwal)
अल्मोड़ा के इसी क्षेत्र में उन्होंने एक और महत्वपूर्ण स्थल खोजा जहाँ पत्थरों पर नक्काशी (Engravings) की गई थी। यहाँ के चित्र अन्य गुफाओं से थोड़े अलग और अधिक विकसित शैली के थे।
डॉ. मठपाल का 'लोक संस्कृति संग्रहालय' (भीमताल)
डॉ. मठपाल केवल खोजकर्ता नहीं थे, वे एक महान चित्रकार भी थे। उन्होंने महसूस किया कि गुफाओं के चित्र समय के साथ मिट रहे हैं।
- उन्होंने भीमताल के पास 'लोक संस्कृति संग्रहालय' (Folk Culture Museum) की स्थापना की।
- यहाँ उन्होंने अपने हाथों से उन सभी शैल-चित्रों की हूबहू पेंटिंग्स बनाई हैं जो उन्होंने गुफाओं में देखी थीं, ताकि भविष्य की पीढ़ी उन्हें देख सके।
- यशोधर मठपाल की प्रसिद्ध पुस्तक है - "कुमाऊं की चित्रकला"
अन्य महत्वपूर्ण स्थल (विस्तार में)
ग्वारख्या उड्यार (Gwarkhya Udiyar) - चमोली
- यह चमोली के डूंगरी गाँव के अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है।
- ऐसा माना जाता है कि यहाँ के चित्र लाखु उड्यार की तुलना में अधिक चटकीले और स्पष्ट हैं।
- यहाँ कुल 41 आकृतियाँ मिली हैं, जिनमें 30 मानवों की और 8 पशुओं की हैं। इन चित्रों में मनुष्यों को पशुओं को घेरकर शिकार करते हुए दिखाया गया है
- ग्वारख्या गुफा को खोजने के श्रेय राकेश भट्ट को दिया जाता है। इसकी खोज 1993 में की गई थी।
बनकोट (Banakot) - पिथौरागढ़
यहाँ से 1989 में 8 ताँबा मानव आकृतियाँ (Copper Human Figures) प्राप्त हुई थीं।
यह इस बात का सबूत है कि उत्तराखंड के आदिमानव को धातु शोधन (Extracting Metal) की कला आती थी।
हुडली (Hudhli) - उत्तरकाशी
यहाँ के शैल-चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता नीले रंग (Blue color) का प्रयोग है। पूरे उत्तराखंड में नीले रंग के चित्र केवल यहीं से मिले हैं।
उत्तराखंड के इतिहास को खोजने और उसे व्यवस्थित रूप से लिखने की शुरुआत किसी एक व्यक्ति ने नहीं, बल्कि अलग-अलग दौर में ब्रिटिश अधिकारियों, स्थानीय विद्वानों और पुरातत्वविदों ने की।
इसे हम तीन मुख्य चरणों में समझ सकते हैं:
1. ब्रिटिश काल में शुरुआत (खोज और गजेटियर)
सबसे पहले अंग्रेजों ने प्रशासनिक कारणों से यहाँ के भूगोल और समाज को समझना शुरू किया।
जी.डब्ल्यू. ट्रेल (G.W. Traill): इन्होंने कुमाऊं के कमिश्नर रहते हुए यहाँ के सांख्यिकीय (statistical) विवरण जुटाए।
ई.टी. एटकिंसन (E.T. Atkinson): सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब एटकिंसन ने "The Himalayan Gazetteer" (1882-1886) लिखा। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों, शिलालेखों और स्थानीय लोककथाओं को इकट्ठा कर पहली बार उत्तराखंड के इतिहास के इतिहास का क्रमबद्ध वृतांत लिखा।
2. स्थानीय विद्वानों का उदय (राष्ट्रवादी लेखन)
ब्रिटिश लेखन में कुछ कमियाँ थीं, जिन्हें स्थानीय विद्वानों ने सुधारा और यहाँ के राजवंशों का इतिहास लिखा।
बद्रीदत्त पाण्डे (Badri Dutt Pandey): इन्हें 'कुमाऊं केसरी' कहा जाता है। उन्होंने जेल में रहते हुए "कुमाऊं का इतिहास" (1937) लिखा। इसमें उन्होंने चंद राजवंश और स्थानीय परंपराओं का विस्तार से वर्णन किया।
हरिकृष्ण रतूड़ी (Hari Krishna Raturi): इन्होंने "गढ़वाल का इतिहास" (1928) लिखा। यह गढ़वाल के पंवार राजवंश को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है।

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