पर्वतों के निर्माण प्रस्तावना "पर्वत हमारी पृथ्वी की सबसे भव्य और प्रभावशाली संरचनाओं में से एक हैं। ये न केवल हमारे भूगोल को तय करते हैं, बल्कि मौसम से लेकर हमारी नदियों तक सब कुछ बदलते हैं। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे की कहानी उतनी ही जटिल और दिलचस्प है। इस अध्याय में हम बेहद आसान भाषा में समझेंगे कि प्लेटों के टकराने, ज़मीन के फटने और ज्वालामुखी के विस्फोट से इन पर्वतों का जन्म कैसे होता है।" पर्वतों के निर्माण पर्वतों के निर्माण का मुख्य आधार टेक्टोनिक प्लेटों की गति है। हमारी पृथ्वी का सबसे ऊपरी हिस्सा (स्थलमंडल) कई टुकड़ों में टूटा हुआ है जिन्हें 'टेक्टोनिक प्लेट्स' कहते हैं। ये प्लेटें मेंटल की अर्ध-तरल परत (एस्थेनोस्फीयर) पर बहुत धीमी गति (सालाना 1 से 10 सेमी) से खिसकती रहती हैं। जब ये प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, दूर जाती हैं या आपस में रगड़ खाती हैं, तो पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) पर भीषण तनाव और दबाव बनता है। इसी हलचल के कारण ज़मीन का हिस्सा या तो ऊपर उठ जाता है या फिर ज्वालामुखी के मैग्मा के जमाव से पहाड़ का रूप ले लेता है। पर्वतों के मुख्य प्रकार पर्...
कविता संग्रह
प्रकृति का अंश : बादल
मैं बादलों-सा उड़ रहा हूँ !
कभी-यहां, कभी-वहां,
खुशियों का आंगन, भर रहा हूँ ।
चला हूँ ! दिलों में राज करने को,
अपना-सा कुछ ढूंढ रहा हूँ ।
मैं बादलों - सा उड़ रहा हूं,
घर-घर, शहर-शहर
बरस रहा हूं।
हरियाली मुझको प्रिय है ।
कृषि को मैं सींच रहा हूँ,
उपवन में मयूर देखकर!
जोर जोर से गरज रहा हूं।
समंदर का मैं रखवाला,
नदियों का मैं दीवाना हूँ,
पीकर उनसे अमृत जल,
फिर तुमको मैं सींच रहा हूँ ।
प्रकृति का ही अंश हूँ मैं,
हे मानव ! तू मुझको निराश ना करना,
प्रलय का मैं राजा हूँ !
विनम्रता से व्यवहार तू करना,
वरना ! मैं बादलों - सा उड़ रहा हूँ ।
कभी - यहां, कभी - वहां,
बरस रहा हूँ ।।
मां
होठों में मुस्कान,
उम्मीदों में जान,
आंखों में एक लंबा
इंतजार करते देखा है!
मां वह मूरत है खुदा की!
प्यार की सच्ची मसाल जलते देखा है!
मेरे ख्वाबों ने वह मंजर देखा है।
प्यार से भरा एक समंदर देखा है ।
इतनी शिद्दत है मां की दुआओं में ।
बड़े-बड़े सपने
पूरे होते देखा है।
सितारा है मेरी जिंदगी का
दर्द में भी
मुस्कुराते देखा है।।
मानवता
पार्ट -1
ना कोई लिबास शोहरत का हो,
ना कोई बात सम्मान की हो,
पहचान सके जो इंसान,
इंसान को,
इबादत हो, तो सच्ची शहादत से हो ।
ना कोई किसी का गुलाम हो,
ना कोई सरताज भगवान हो,
हाथ जोड़कर खड़ा रहूं मैंं,
मुलाकात गर सच्चे इंसान से हो।।
पार्ट 2
ना कोई भेद रंग से हो,
ना कोई पहचान धर्म से हो।
मानवता की पहचान है जिसको,
ऐसी मोहब्बत हर इंसान से हो।
ना कोई गुरूर ज्ञान का हो,
ना कोई जंग शान की हो,
जीत सके जो हृदय को,
ऐसी मोहब्बत उस इंसान से हो।।
अनजान रास्ते
भटक गया है राही!
रास्ता ढूंढ रहा है।
भूल गया है अपनी मंजिल,
नए ख्वाब सजा रहा है।
अपनी इच्छाएं खत्म करके,
आंसू छुपा रहा है।
खुशियां मिलेंगी इन राहों में,
उसे यकीन तो नहीं है,
फिर भी हंसते हुए,
सारे दर्द छुपा रहा है।
जा रहा है उस सफर में,
इसका कोई छोर तो नहीं है,
खुश हो जाता है,
मां की मुस्कान सोच कर,
जिसके लिए कोई और नहीं है।
अनजान रास्ता ! है मुश्किल
फिर भी आगे बढ़ रहा है,
शायद मिल जाए , वह रास्ता,
जहां फूलों का मंजर खिला है ।
भटक गया है राही!
रास्ता ढूंढ रहा है।।
प्रस्तुत सभी कविताएं मेरे द्वारा स्वरचित (सुनील सिंह राणा ) जिनमें मानवता और प्रकृति का समन्वय किया गया है । और मां के लिए ममता प्रस्तुत की गई है जो अत्यधिक भावुक और प्रेरणादायक है । जिनका अर्थ आप आसानी से समझ सकते हैं।
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Beautiful
जवाब देंहटाएंAwesome
जवाब देंहटाएंअंश भर जो प्रकृति का कविता संग्रह है। इसकी पुस्तक भी उपलब्ध है।
जवाब देंहटाएंमाफ़ कीजिए । हम आपकी बात ठीक से समझें नहीं।।
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