पर्वतों के निर्माण प्रस्तावना "पर्वत हमारी पृथ्वी की सबसे भव्य और प्रभावशाली संरचनाओं में से एक हैं। ये न केवल हमारे भूगोल को तय करते हैं, बल्कि मौसम से लेकर हमारी नदियों तक सब कुछ बदलते हैं। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे की कहानी उतनी ही जटिल और दिलचस्प है। इस अध्याय में हम बेहद आसान भाषा में समझेंगे कि प्लेटों के टकराने, ज़मीन के फटने और ज्वालामुखी के विस्फोट से इन पर्वतों का जन्म कैसे होता है।" पर्वतों के निर्माण पर्वतों के निर्माण का मुख्य आधार टेक्टोनिक प्लेटों की गति है। हमारी पृथ्वी का सबसे ऊपरी हिस्सा (स्थलमंडल) कई टुकड़ों में टूटा हुआ है जिन्हें 'टेक्टोनिक प्लेट्स' कहते हैं। ये प्लेटें मेंटल की अर्ध-तरल परत (एस्थेनोस्फीयर) पर बहुत धीमी गति (सालाना 1 से 10 सेमी) से खिसकती रहती हैं। जब ये प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, दूर जाती हैं या आपस में रगड़ खाती हैं, तो पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) पर भीषण तनाव और दबाव बनता है। इसी हलचल के कारण ज़मीन का हिस्सा या तो ऊपर उठ जाता है या फिर ज्वालामुखी के मैग्मा के जमाव से पहाड़ का रूप ले लेता है। पर्वतों के मुख्य प्रकार पर्...
उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Era) अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली है। इस काल का कोई लिखित प्रमाण नहीं है, इसलिए इसका इतिहास गुफाओं में मिले शैल-चित्रों (Rock Paintings), पत्थरों के औजारों और प्राचीन कंकालों के आधार पर लिखा गया है। आइए जानते हैं विस्तार से - “धूल से भरी राहें और तपता हुआ सूरज... उत्तर भारत के एक गुमनाम गाँव के किनारे एक ऊँचा सा मिट्टी का टीला था। लोग वहाँ से ईंटें उखाड़ रहे थे, कोई अपने घर की दीवार बना रहा था, तो कोई उन पत्थरों को कचरा समझकर फेंक रहा था। वहीं दूर खड़ा एक अंग्रेज अफसर, जिसका नाम अलेक्जेंडर कनिंघम था, यह सब बड़े गौर से देख रहा था। उसके पास एक पुरानी किताब थी—चीनी यात्री ह्वेनसांग की डायरी। कनिंघम को यकीन था कि जिस टीले को लोग 'कचरा' समझ रहे हैं, उसके नीचे सम्राट अशोक का कोई महान शहर या बुद्ध का कोई पवित्र मठ दफन है। वो बेचैनी और वो खत कनिंघम रात भर सो नहीं पाए। उन्हें लग रहा था जैसे वो दफन शहर उन्हें पुकार रहे हों। उन्होंने सोचा, "अगर आज मैंने इन पत्थरों को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ कभी नहीं...