पर्वतों के निर्माण प्रस्तावना "पर्वत हमारी पृथ्वी की सबसे भव्य और प्रभावशाली संरचनाओं में से एक हैं। ये न केवल हमारे भूगोल को तय करते हैं, बल्कि मौसम से लेकर हमारी नदियों तक सब कुछ बदलते हैं। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे की कहानी उतनी ही जटिल और दिलचस्प है। इस अध्याय में हम बेहद आसान भाषा में समझेंगे कि प्लेटों के टकराने, ज़मीन के फटने और ज्वालामुखी के विस्फोट से इन पर्वतों का जन्म कैसे होता है।" पर्वतों के निर्माण पर्वतों के निर्माण का मुख्य आधार टेक्टोनिक प्लेटों की गति है। हमारी पृथ्वी का सबसे ऊपरी हिस्सा (स्थलमंडल) कई टुकड़ों में टूटा हुआ है जिन्हें 'टेक्टोनिक प्लेट्स' कहते हैं। ये प्लेटें मेंटल की अर्ध-तरल परत (एस्थेनोस्फीयर) पर बहुत धीमी गति (सालाना 1 से 10 सेमी) से खिसकती रहती हैं। जब ये प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, दूर जाती हैं या आपस में रगड़ खाती हैं, तो पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) पर भीषण तनाव और दबाव बनता है। इसी हलचल के कारण ज़मीन का हिस्सा या तो ऊपर उठ जाता है या फिर ज्वालामुखी के मैग्मा के जमाव से पहाड़ का रूप ले लेता है। पर्वतों के मुख्य प्रकार पर्...
पर्वतों के निर्माण
प्रस्तावना
"पर्वत हमारी पृथ्वी की सबसे भव्य और प्रभावशाली संरचनाओं में से एक हैं। ये न केवल हमारे भूगोल को तय करते हैं, बल्कि मौसम से लेकर हमारी नदियों तक सब कुछ बदलते हैं। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे की कहानी उतनी ही जटिल और दिलचस्प है। इस अध्याय में हम बेहद आसान भाषा में समझेंगे कि प्लेटों के टकराने, ज़मीन के फटने और ज्वालामुखी के विस्फोट से इन पर्वतों का जन्म कैसे होता है।"
पर्वतों के निर्माण का मुख्य आधार टेक्टोनिक प्लेटों की गति है। हमारी पृथ्वी का सबसे ऊपरी हिस्सा (स्थलमंडल) कई टुकड़ों में टूटा हुआ है जिन्हें 'टेक्टोनिक प्लेट्स' कहते हैं। ये प्लेटें मेंटल की अर्ध-तरल परत (एस्थेनोस्फीयर) पर बहुत धीमी गति (सालाना 1 से 10 सेमी) से खिसकती रहती हैं।
जब ये प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, दूर जाती हैं या आपस में रगड़ खाती हैं, तो पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) पर भीषण तनाव और दबाव बनता है। इसी हलचल के कारण ज़मीन का हिस्सा या तो ऊपर उठ जाता है या फिर ज्वालामुखी के मैग्मा के जमाव से पहाड़ का रूप ले लेता है।
यह कोई चमत्कार या रहस्यमयी घटना नहीं है, बल्कि पृथ्वी के भीतर होने वाली एक पूरी तरह से वैज्ञानिक और प्राकृतिक हलचल है।
चट्टानों के अचानक टूटने से बहुत भारी मात्रा में ऊर्जा (Energy) निकलती है। यह ऊर्जा तरंगों (Waves) के रूप में चारों तरफ फैलती है, ठीक वैसे ही जैसे पानी में पत्थर फेंकने पर लहरें उठती हैं। जब ये तरंगें पृथ्वी की सतह तक पहुंचती हैं, तो हमें झटका महसूस होता है।
पर्वतों के निर्माण
जब ये प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, दूर जाती हैं या आपस में रगड़ खाती हैं, तो पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) पर भीषण तनाव और दबाव बनता है। इसी हलचल के कारण ज़मीन का हिस्सा या तो ऊपर उठ जाता है या फिर ज्वालामुखी के मैग्मा के जमाव से पहाड़ का रूप ले लेता है।
पर्वतों के मुख्य प्रकार
पर्वतों को उनके निर्माण की प्रक्रिया के आधार पर मुख्य रूप से 3 भागों में विभाजित किया जाता है:(A). वलित पर्वत (Fold Mountains)
यह दुनिया के सबसे बड़े और ऊंचे पर्वतों के निर्माण की प्रक्रिया है। वलित पर्वतों का निर्माण अभिसारी सीमा पर होता है। जब दो टेक्टोनिक प्लेटें अभिसारी सीमा पर एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं और आपस में टकराती हैं, वलन की प्रक्रिया में ऊपर उठे भाग को अभिनति (Anticline) और धंसे हुए भाग को अपनति (Syncline) कहते हैं।जैसा कि हम इससे पूर्व पृथ्वी की आंतरिक संरचना भाग -05 में पढ़ चुके हैं कि पृथ्वी में ऊपरी मेंटल के ऊपरी भाग में 7 प्रमुख प्लेटें और कुछ छोटी प्लेटें तैर रही हैं। जिनमें कुछ महाद्वीपीय प्लेटें और महासागरीय प्लेटें शामिल हैं। महाद्वीपीय प्लेटें, महासागरीय प्लेटों की तुलना हल्की होती हैं। महासागरीय प्लेटें बेसाल्ट की चट्टानों से बनी होने के कारण कारण सघन और भारी होती है, जबकि महाद्वीपीय प्लेटें ग्रेनाइट से बनी होने के कारण के कारण कम सघन होती है।
a. महासागरीय और महाद्वीपीय प्लेटों का टकराव की स्थिति
जब एक महासागरीय प्लेट और एक महाद्वीपीय प्लेट से टकराती है तो महासागरीय प्लेट नीचे धंस जाती है और महाद्वीपीय प्लेटे ऊपर की ओर उठने लगती है। वहीं महासागरीय प्लेट पृथ्वी के आंतरिक भाग पिघलकर मैग्मा बनाती है, जो ज्वालामुखी और पर्वतों को जन्म देती है।
b. दो महाद्वीपीय प्लेटों का टकराव की स्थिति
जब दो महाद्वीपीय प्लेटें आपस में टकराती हैं, तब प्लेटें धंसती नहीं है क्योंकि दोनों में प्लेटों समान भार होता है और महासागरीय प्लेटों से हल्की होती हैं जिस कारण दोनों प्लेट धंसने की जगह ऊपर की ओर मुड़ने लगती हैं जिन्हें मोड़दार पर्वत या वलित पर्वत कहते हैं।
c. दो महासागरीय प्लेटों का टकराव की स्थिति
जब दो महासागरीय प्लेटें आपस में टकराती हैं। तो उनमें से एक जो आमतौर पर ज्यादा ठंडी और सघन होती है, वह दूसरी प्लेट के नीचे धंसने लगती हैं। इस प्रक्रिया को सबडक्शन कहते हैं। और इसके परिणामस्वरूप गहरे समुद्र के गर्त और ज्वालामुखी द्वीप श्रृंखलाएं बनती है।
मेरियाना गर्त का निर्माण भी सबडक्शन के कारण हुआ है। इसमें प्रशांत प्लेट, जो एक भारी महासागरीय प्लेट है। वह फिलिपींस सागर प्लेट (मेरियाना प्लेट) के नीचे धंस रही है । जिस कारण पृथ्वी का सबसे बड़ा गर्त बना है।
वलित हिमालय की प्रमुख पर्वत श्रृंखला और पर्वत
- हिमालय पर्वत (एशिया)
- आल्प्स पर्वत (यूरोप)
- रॉकी (उत्तर अमेरिका),
- एंडीज़ (दक्षिण अमेरिका)
हिमालय पर्वतमाला
जब इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियाई प्लेट से टकराई, तो बीच का टेथिस सागर सूख गया और वहाँ की चट्टानें मुड़कर हिमालय बन गईं ।हिमालय एक नवीन वलित पर्वत है। इसका निर्माण लगभग 4 से 5 करोड़ साल पहले से हुआ था हिमालय को मुख्य रूप से तीन परतों में बाँटा गया है—महान हिमालय, लघु/मध्य हिमालय, और सबसे बाहरी शिवालिक .
हिमालय पर्वत की प्रमुख चोटियां
- माउंट एवरेस्ट (8,848 मी या नवीनतम 8,848.86 मी) : यह दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत चोटी है (हिमालय श्रृंखला का हिस्सा)। यह भारतीय और यूरेशियन प्लेट के टकराव से बनी है।
- के2 / गॉडविन ऑस्टिन (8,611 मी) : यह दुनिया की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है, जो काराकोरम श्रेणी (भारत/पाक सीमा) में स्थित है।
- कंचनजंगा (8,586 मीटर) - भारत की सबसे ऊंची चोटी है जो पूरी तरह भारत (सिक्किम) में स्थित है ।
आल्प्स पर्वतमाला (यूरोप)
आल्प्स पर्वतमाला यूरोप महाद्वीप की सबसे प्रमुख और विशाल पर्वत श्रृंखला है। इस पर्वत श्रृंखला का निर्माण मुख्य रूप से अफ्रीकी प्लेट और यूरेशियन प्लेट के आपस में टकराने से हुआ।
- माउंट ब्लांक (4,807 मी) : यह आल्प्स (Alps) पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊँची चोटी है, जो फ्रांस और इटली की सीमा पर है।
- मैटरहॉर्न (4,478 मी) : आल्प्स पर्वत का यह हिस्सा अपने पिरामिड जैसे सटीक आकार के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।
रॉकी पर्वतमाला (उत्तर अमेरिका)
रॉकी पर्वत उत्तरी अमेरिका महाद्वीप की एक प्रमुख पर्वत श्रृंखला है। इस पर्वतमाला का निर्माण मुख्य रूप से प्रशांत प्लेट और उत्तरी अमेरिकी प्लेट के आपस में टकराने के कारण हुआ है। यह पर्वत श्रृंखला उत्तरी अमेरिका में कनाडा से लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यू मैक्सिको तक लगभग 4800 किलोमीटर की लंबाई में फैली हुई है।
- माउंट अल्बर्ट (4401 मीटर) : रॉकी पर्वत माला की सबसे ऊंची चोटी माउंट अल्बर्ट (4401मीटर) है
एंडीज़ पर्वतमाला (दक्षिण अमेरिका)
एंडीज पर्वतमाला दक्षिण अमेरिका महाद्वीप की प्रमुख पर्वत श्रृंखला है और यह दुनिया की सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला है। यह दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट से साथ उत्तर से दक्षिण तक लगभग 7000 किलोमीटर की विशाल लंबाई में फैली हुई है।एंडीज का निर्माण नाज़का प्लेट और दक्षिणी अमेरिकी प्लेट के आपस में टकराने से हुआ है। महासागरीय प्लेट के नीचे पिघलने के कारण यहां कई सक्रिय और प्रयुक्त ज्वालामुखी पाए जाते हैं
- माउंट एकंकागुआ (6,960 मी) : यह एंडीज पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी माउंट एकंकागुआ है और यह एशिया महाद्वीप के बाहर दुनिया की सबसे ऊँची चोटी है। यह पर्वत अर्जेंटीना में स्थित है।
अन्य प्रमुख पर्वत
- माउंट डेनाली / मैकिनले (6,194 मी) - यह अलास्का श्रेणी में स्थित पूरे उत्तरी अमेरिका महाद्वीप की सबसे ऊँची पर्वत चोटी है।
- माउंट एल्ब्रूस (5,642 मी) - यह काकेशस पर्वत श्रृंखला में स्थित यूरोप महाद्वीप की सबसे ऊँची चोटी है।
- माउंट एवॉन (2,228 मीटर) - ग्रेट डिवाइडिंग रेंज में स्थित यह ऑस्ट्रेलिया की सबसे ऊँची चोटी है।
अवशिष्ट पर्वत
ये मूल रूप से पुराने वलित या ब्लॉक पर्वत ही होते हैं। लाखों-करोड़ों वर्षों तक हवा, बारिश, नदियों और धूप (अपरदन के कारकों) की निरंतर मार पड़ने के कारण ये पर्वत घिस जाते हैं और इनका अधिकांश भाग बह जाता है। जो कठोर चट्टानी भाग बच जाता है, उसे ही अवशिष्ट पर्वत कहते हैं।
- अरावली पर्वत श्रृंखला : विश्व का सबसे प्राचीन वलित पर्वत (Old Fold Mountain) है, जिसकी उत्पत्ति प्री-कैलम्ब्रियन काल (लगभग 60-70 करोड़ वर्ष पूर्व) में हुई थी। इसकी सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर (1722 मीटर) है
- यूराल पर्वत (1895 मीटर) : यह एशिया और यूरोप महाद्वीप को अलग करने वाली प्राचीन पर्वत श्रृंखला है। इसकी सबसे ऊंची चोटी नारोदनाया है।
- अपलाचियन पर्वत (2037 मीटर) : यह पर्वत श्रृंखला उत्तरी अमेरिका में स्थित है यह बहुत प्राचीन पर्वत श्रृंखला है जो घिस चुकी है । यह एंथ्रेसाइट कोयले के लिए प्रसिद्ध है,
B. भ्रंशोत्थ पर्वत या ब्लॉक पर्वत (Block/Fault-Block Mountains)
जब प्लेटों में खिंचाव (Tensional Force) उत्पन्न होता है, तो भूपर्पटी की चट्टानों में दरारें या भ्रंश (Faults) पड़ जाते हैं। इस दरार के कारण जमीन का कुछ हिस्सा नीचे धंस जाता है और आसपास का हिस्सा ऊपर उठ जाता है (या ऊपर उठा हुआ प्रतीत होता है)। इन पर्वतों के शिखर समतल और सपाट होते हैं तथा तीव्र ढालों वाले होते हैं।- ऊपर उठे हुए भाग को 'हॉर्स्ट' (Horst) या ब्लॉक पर्वत कहते हैं।
- नीचे धंसे हुए भाग को 'ग्रैबेन' (Graben) या भ्रंश घाटी (Rift Valley) कहते हैं।
प्रमुख भ्रंशोत्थ पर्वत
- ब्लैक फॉरेस्ट पर्वत (जर्मनी) - यह दुनिया के सबसे प्रसिद्ध ब्लॉक पर्वत है। इसके पर्वत के ठीक पश्चिम में राइन भ्रंश घाटी बहती है। इस पर्वत से यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी नदी डेन्यूब निकलती है।
- वॉसजेस पर्वत (फ्रांस) - राइन नदी के दूसरी तरफ पश्चिम में फ्रांस-जर्मनी सीमा के पास यह पर्वत स्थित है।
- सिएरा नेवादा - यह अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में स्थित है। दुनिया की सबसे विस्तृत ब्लॉक पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है।
भारत के प्रमुख ब्लॉक पर्वत
- सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला (भारत) - यह पर्वत श्रृंखला नर्मदा नदी घाटी और ताप्ती नदी घाटी के बीच में स्थित है। यह मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में स्थित है। लेकिन कुछ इससे गुजरात, और छत्तीसगढ़ तक भी जाते हैं। सतपुड़ा पर्वत माला की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ (1350 मीटर) है। और इसके पूर्वी भाग में मैकाल श्रेणी है। जहां नर्मदा और सोन नदी का उद्गम अमरकंटक स्थित है।
- विंध्याचल पर्वतमालाएँ (भारत) - यह पर्वतमाला नर्मदा भ्रंश घाटी के उत्तर में स्थित है। इसके दक्षिण में सतपुड़ा पर्वत श्रेणी फैली हुई है । यह गुजरात से शुरू होकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में 1050 किलोमीटर की लंबाई फैली है। इसमें पारसनाथ की पहाड़ियों और कैमूर पहाड़ियां प्रसिद्ध है।
3. ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic Mountains)
जब दो प्लेटों के खिसकने या दूर जाने से पृथ्वी की गहराई से अत्यधिक गर्म और पिघला हुआ मैग्मा भूपर्पटी को तोड़कर बाहर आता है, तो इसे ज्वालामुखी विस्फोट कहते हैं। यह मैग्मा (लावा), राख और चट्टानी मलबा सतह पर ठंडा होकर बार-बार जमता रहता है। समय के साथ यह जमाव एक शंकु के आकार के विशाल पहाड़ का रूप ले लेता है।
- माउंट किलिमंजारो (5895 मीटर ) : यह ज्वालामुखी परत तंजानिया, अफ्रीका में स्थित है। यह अफ्रीका महाद्वीप का सबसे ऊंचा पर्वत है जो एक प्रसुप्त ज्वालामुखी पर्वत है।
- माउंट फूजी (3776 मीटर ) : यह ज्वालामुखी पर्वत जापान में स्थित सबसे ऊंचा, सुंदर और पवित्र पर्वत है। हालांकि यह अभी शांत है । अंतिम बार विस्फोट 1707 में हुआ था।
- माउंट कोटोपैक्सी (5897 मीटर) : यह ज्वालामुखी पर्वत दक्षिण अमेरिका महाद्वीप की इक्वाडोर देश में स्थित है । यह एंडीज पर्वत का एक सक्रिय ज्वालामुखी पर्वत है।
- ओजोस डेल सालाडो (6,893 मी) : दुनिया का सबसे ऊँचा सक्रिय ज्वालामुखी दक्षिण अमेरिका (चिली/अर्जेंटीना
- ब्लैक हिल्स (Black Hills) : संयुक्त राज्य अमेरिका के साउथ डकोटा राज्य में स्थित गुम्बददार पर्वत (Dome Mountain) का दुनिया में सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है,
पर्वतीकरण का कालक्रम (Orogeny/Mountain Building Eras)
भूवैज्ञानिक इतिहास में पर्वतों का निर्माण 4 प्रमुख चरणों (Orogenies) में हुआ है:- चरनियन काल (Pre-Cambrian): इसमें दुनिया की सबसे प्राचीन चट्टानें और अरावली जैसी पर्वतमालाएँ बनीं।
- कैलेडोनियन काल: इसमें स्कॉटलैंड और स्कैंडिनेविया के पर्वत बने।
- हर्सिनियन काल: इसमें यूराल पर्वत (रूस) और ब्लैक फॉरेस्ट बने।
- ऐल्पाइन काल (Tertiary Period): यह सबसे नवीनतम चरण है जिसमें दुनिया के सबसे ऊंचे 'नवीन वलित पर्वत' (Young Fold Mountains) बने, जैसे कि हिमालय, रॉकीज़ और एंडीज़।
भूकंप (Earthquake)
भूकंप (Earthquake) का सीधा अर्थ है—'भू' यानी पृथ्वी और 'कंप' यानी कंपन। जब पृथ्वी की सतह अचानक तेजी से हिलने या कांपने लगती है, तो उसे भूकंप कहते हैं।यह कोई चमत्कार या रहस्यमयी घटना नहीं है, बल्कि पृथ्वी के भीतर होने वाली एक पूरी तरह से वैज्ञानिक और प्राकृतिक हलचल है।
1. टेक्टोनिक प्लेट्स की हलचल (Tectonic Plates)
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि हमारी पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत (Crust) एक कड़क टुकड़े की तरह नहीं है, बल्कि यह कई बड़े और छोटे हिस्सों में बंटी हुई है। इन हिस्सों को टेक्टोनिक प्लेट्स कहते हैं। ये प्लेट्स पृथ्वी के अंदर मौजूद पिघले हुए लावे (Magma) पर बहुत धीमी गति से तैर रही हैं।2. फॉल्ट लाइन और ऊर्जा का रुकना
जब ये प्लेट्स आपस में एक-दूसरे के पास से गुजरती हैं, तो इनके किनारे आपस में उलझ या फंस जाते हैं। हालांकि प्लेट्स आगे बढ़ने की कोशिश करती रहती हैं, लेकिन घर्षण (Friction) के कारण वे वहीं रुक जाती हैं। इस जगह को फॉल्ट लाइन (दरार) कहते हैं।भूकंप आने के कारण
1. रूपांतरित सीमा (Transform Boundary) पर भूकंप
यहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे के बगल से रगड़ खाती हैं। इनके किनारे उबड़-खाबड़ होते हैं, इसलिए ये आपस में फंस जाते हैं। जब मेंटल की संवहन धाराओं का दबाव बहुत बढ़ जाता है, तो ये फंसी हुई चट्टानें एक झटके से टूटती हैं। इस सीमा पर दुनिया के सबसे तीव्र और विनाशकारी भूकंप आते हैं, लेकिन यहाँ ज्वालामुखी नहीं होते (जैसे अमेरिका का सैन एंड्रियास फॉल्ट)।2. अभिसारी सीमा (Convergent Boundary) पर भूकंप
जब दो प्लेटें टकराती हैं (जैसे महासागरीय प्लेट का महाद्वीपीय प्लेट के नीचे धंसना या सबडक्शन)। जब भारी प्लेट नीचे धंसती है, तो वह ऊपरी प्लेट को बहुत ज़ोर से रगड़ती है। इसके कारण बहुत गहराई वाले और भयानक भूकंप आते हैं। यही कारण है कि प्रशांत महासागर के चारों ओर बने 'रिंग ऑफ फायर' में दुनिया के 90% भूकंप आते हैं और इसी वजह से हमारे हिमालय क्षेत्र (भारत-यूरेशिया टकराव) में अक्सर भूकंप के झटके महसूस होते हैं।3. अपसारी सीमा (Divergent Boundary) पर भूकंप
जब दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं और बीच में दरार पड़ती है। यहाँ प्लेटों के दूर हटने और मैग्मा के ऊपर उठने से क्रस्ट टूटती है, जिससे कम गहराई वाले और हल्के भूकंप आते हैं (जैसे मध्य-अटलांटिक कटक)।भूकंपीय तरंगें (Seismic Waves)
भले ही प्लेट्स फंस जाएं, लेकिन उनके पीछे का बल रुकता नहीं है। इसके कारण चट्टानों पर लगातार दबाव और तनाव बढ़ता जाता है। जब यह दबाव चट्टानों की सहने की क्षमता से ज्यादा हो जाता है, तो वे अचानक एक झटके के साथ टूट जाती हैं या फिसल जाती हैं।चट्टानों के अचानक टूटने से बहुत भारी मात्रा में ऊर्जा (Energy) निकलती है। यह ऊर्जा तरंगों (Waves) के रूप में चारों तरफ फैलती है, ठीक वैसे ही जैसे पानी में पत्थर फेंकने पर लहरें उठती हैं। जब ये तरंगें पृथ्वी की सतह तक पहुंचती हैं, तो हमें झटका महसूस होता है।
भूकंप के संबंधित प्रमुख शब्दावली
- फोकस या हाइपोसेंटर (Focus / Hypocenter): पृथ्वी के अंदर वह सटीक जगह जहां चट्टानें सबसे पहले टूटती हैं और भूकंप की शुरुआत होती है।
- एपिसेंटर या अधिकेंद्र (Epicenter): पृथ्वी की सतह पर फोकस के ठीक ऊपर स्थित बिंदु। यहां भूकंप के झटके सबसे तेज और विनाशकारी होते हैं।
- सिस्मोग्राफ (Seismograph): वह यंत्र जिससे भूकंप की तीव्रता और तरंगों को मापा जाता है। भूकंप की ताकत को मापने के लिए रिक्टर स्केल (Richter Scale) का इस्तेमाल किया जाता है।
1. P-तरंगें (Primary Waves / प्राथमिक तरंगें)
ये भूकंप आने पर सिस्मोग्राफ (भूकंप मापने वाले यंत्र) पर सबसे पहले रिकॉर्ड होती हैं, इसीलिए इन्हें 'प्राथमिक' या P-तरंगें कहा जाता है।- गति (Speed): ये तीनों तरंगों में सबसे तेज चलती हैं (लगभग 5 से 8 किमी प्रति सेकंड)।
- माध्यम (Medium): ये तरंगें ठोस (Solid), तरल (Liquid) और गैस (Gas) तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं। जब ये पृथ्वी के कोर (जो तरल है) से गुजरती हैं, तो इनकी गति थोड़ी धीमी हो जाती है, लेकिन ये रुकती नहीं हैं।
- प्रभाव/गति की दिशा: ये ध्वनि तरंगों (Sound Waves) की तरह काम करती हैं। इसमें चट्टानों के कण तरंग की दिशा में ही आगे-पीछे (Push and Pull) खिंचते और सिकुड़ते हैं।
2. S-तरंगें (Secondary Waves / द्वितीयक तरंगें)
P-तरंगों के ठीक बाद जो तरंगें धरातल पर पहुंचती हैं, उन्हें S-तरंगें कहा जाता है।- गति (Speed): इनकी गति P-तरंगों से थोड़ी कम होती है (लगभग 3 से 5 किमी प्रति सेकंड)।
- माध्यम (Medium): यह इनकी सबसे बड़ी विशेषता है—S-तरंगें सिर्फ ठोस (Solid) माध्यम में ही चल सकती हैं। ये तरल पदार्थ (जैसे पृथ्वी के बाहरी कोर) में प्रवेश करते ही गायब या लुप्त हो जाती हैं। इसी विशेषता से वैज्ञानिकों को पता चला कि पृथ्वी का बाहरी कोर तरल अवस्था में है।
- प्रभाव/गति की दिशा: ये प्रकाश तरंगों (Light Waves) या पानी में उठने वाली लहरों की तरह चलती हैं। इसमें चट्टानों के कण तरंग की दिशा के समकोण (90 डिग्री पर) यानी ऊपर-नीचे या दाएं-बाएं कंपन करते हैं।
3. धरातलीय तरंगें (L-Waves )
जब अंदर से आने वाली P और S तरंगें पृथ्वी की ऊपरी सतह (Crust) की चट्टानों से टकराती हैं, तो एक नई तरंग का जन्म होता है, जिसे धरातलीय तरंगें कहते हैं। इन्हें L-तरंगें (Love Waves) और रेले तरंगें (Rayleigh Waves) भी कहा जाता है।- गति (Speed): इनकी गति तीनों तरंगों में सबसे धीमी होती है। सिस्मोग्राफ पर ये सबसे अंत में दर्ज होती हैं।
- माध्यम (Medium): ये केवल पृथ्वी की ऊपरी सतह (धरातल) पर ही आगे बढ़ती हैं, गहराई में नहीं जातीं।
- प्रभाव/विनाशकारी क्षमता: ये तरंगें भले ही सबसे धीमी चलती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा विनाशकारी और खतरनाक यही होती हैं। P और S तरंगें जमीन को सिर्फ झटका देकर निकल जाती हैं, लेकिन धरातलीय तरंगें जमीन को ऊपर-नीचे और दाएं-बाएं बहुत तेज हिलाती हैं। मकानों का गिरना, पुलों का टूटना और तबाही मचना मुख्य रूप से इन्हीं तरंगों के कारण होता है।
- P-तरंग छाया क्षेत्र: 105° से 145° के बीच।
- S-तरंग छाया क्षेत्र: 105° से 180° के बीच (S-तरंग कोर में प्रवेश नहीं कर पाती)।
भूकंप की ऊर्जा/तीव्रता मापता
- रिक्टर स्केल : भूकंप की ऊर्जा/तीव्रता (Magnitude - 1 to 10) मापता है,
- मरकेली स्केल (Mercalli Scale): रिक्टर स्केल भूकंप की ऊर्जा/तीव्रता (Magnitude - 1 to 10) मापता है, जबकि मरकेली स्केल भूकंप से हुए विनाश/आघात (Intensity - I to XII) को मापता है।
भारत में भूकंप
भारत में भूकंप के खतरों को देखते हुए देश के अलग-अलग हिस्सों को उनकी संवेदनशीलता के आधार पर बांटा जाता है। हाल ही में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा जारी किए गए नए भूकंपीय मानचित्र (Seismic Zonation Map) के अनुसार, अब भारत को 5 भूकंपीय क्षेत्रों (Zones) में वर्गीकृत किया गया है (पहले इसमें 4 जोन होते थे)।भारत के 5 भूकंपीय क्षेत्र (Seismic Zones)
वैज्ञानिकों ने भूगर्भीय बनावट और फॉल्ट लाइनों (दरारों) को ध्यान में रखते हुए देश को निम्नलिखित जोन में बांटा है:- नोट: भारत के भूकंपीय नक्शे में 'जोन 1' नहीं होता है। न्यूनतम सुरक्षा मानकों को बनाए रखने के लिए पुराने जोन 1 को बहुत पहले ही जोन 2 में मिला दिया गया था, ता कि देश के सबसे शांत इलाकों में भी मकान बनाते समय भूकंप रोधी नियमों का पालन किया जा सके।
सबसे खतरनाक जोन कौन से हैं?
- भारत में सबसे खतरनाक और विनाशकारी जोन V (Very High Risk) और हाल ही में जोड़ा गया जोन VI हैं।
- क्यों खतरनाक हैं ये क्षेत्र?: यह पूरा इलाका (विशेषकर हिमालयी राज्य) उस जगह पर स्थित है जहां इंडियन टेक्टोनिक प्लेट लगातार यूूरेशियन प्लेट को नीचे से धक्का दे रही है। इस आपसी टकराव और भारी दबाव के कारण इन क्षेत्रों में 8.0 या उससे अधिक तीव्रता के बड़े और विनाशकारी भूकंप आने की आशंका हमेशा बनी रहती है।
ज्वालामुखी क्या है?
पृथ्वी की सतह पर एक ऐसा प्राकृतिक छेद या दरार जिससे होकर भीतर का पिघला हुआ पदार्थ, गैसें, राख और भाप बाहर निकलते हैं। ज्वालामुखी विस्फोट के समय सबसे अधिक मात्रा में जलवाष्प (Water Vapor - 60-90%) निकलती है, इसके बाद CO₂, SO₂ और N₂ निकलती हैं।- मैग्मा : जब तक यह पिघला हुआ तरल पदार्थ पृथ्वी के भीतर रहता है, तब तक इसे मैग्मा कहते हैं।
- लावा : जब यही मैग्मा दबाव के कारण सतह को तोड़कर बाहर आ जाता है, तो इसे लावा कहा जाता है।
- क्रेटर : ज्वालामुखी के मुख को 'क्रेटर' कहते हैं।
- कालडेरा : जब यह मुख बहुत बड़ा और धंसा हुआ हो जाता है, तो उसे 'कालडेरा' कहते हैं, जैसे इंडोनेशिया का टोबा कालडेरा
प्लेट सीमाएँ और ज्वालामुखी (Volcanic Boundaries)
ज्वालामुखी मुख्य रूप से केवल दो ही सीमाओं पर बनते हैं। तीसरी सीमा पर ज्वालामुखी नहीं बनते:1. अभिसारी सीमा – यहाँ दो टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराती हैं और एक प्लेट दूसरी के नीचे धंस जाती है। नीचे धंसी चट्टान अत्यधिक गर्मी से पिघलकर भारी मात्रा में मैग्मा बनाती है। संवहनीय धाराओं के दबाव से यह मैग्मा ऊपर की चट्टानें तोड़कर बहुत ही विस्फोटक और खतरनाक रूप में बाहर आता है।
2: अपसारी सीमा — यहाँ दो प्लेटें संवहनीय धाराओं के कारण एक-दूसरे से दूर जाती हैं।
ज्वालामुखी कैसे बनता है: प्लेटों के दूर हटने से बीच में गैप या दरार बनती है। नीचे का मैग्मा बिना किसी रुकावट के (कम दबाव के कारण) शांत तरीके से लावा के रूप में बाहर बहता है।
ज्वालामुखी कैसे बनता है: प्लेटों के दूर हटने से बीच में गैप या दरार बनती है। नीचे का मैग्मा बिना किसी रुकावट के (कम दबाव के कारण) शांत तरीके से लावा के रूप में बाहर बहता है।
3. रूपांतरित सीमा – यहां प्लेटें केवल क्षैतिज दिशा में एक-दूसरे के पास से रगड़ खाकर खिसकती हैं। चूंकि यहाँ न तो कोई प्लेट नीचे जाकर पिघलती है और न ही दूर जाकर दरार बनाती है, इसलिए मैग्मा को ऊपर आने का रास्ता नहीं मिलता। यहाँ ज्वालामुखी नहीं बनते।
रिंग ऑफ फायर (Ring of Fire): प्रशांत महासागर के चारों ओर फैली परि-प्रशांत पेटी (Circum-Pacific Belt) को 'रिंग ऑफ फायर' कहते हैं, जहाँ विश्व के 68% ज्वालामुखी और 90% भूकंप आते हैं।
ज्वालामुखी सक्रियता के आधार पर वर्गीकरण
A. सक्रिय ज्वालामुखी
जिनमें वर्तमान में लगातार विस्फोट हो रहे हैं या हाल ही में लावा/गैस निकली है।
- माउंट मेरापी (इंडोनेशिया) - यह भारत-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट और सुंडा प्लेट के टकराव वाले क्षेत्र में हैं। मेरापी को इंडोनेशिया का सबसे सक्रिय ज्वालामुखी माना जाता है, जिसमें अक्सर विस्फोट होते रहते हैं।
- माउंट एटना (इटली) - अफ्रीकी और यूरेशियन प्लेट) पर स्थित माउंट एटना यूरोप का सबसे सक्रिय ज्वालामुखी है, जिसमें लगभग हर साल लावा निकलता है।
- ओजोस डेल सालाडो (6,893 मी) - यह दुनिया का सबसे ऊँचा सक्रिय ज्वालामुखी है.यह एंडीज पर्वतमाला के चिली/अर्जेंटीना में स्थित है
- माउंट कोटोपैक्सी (5,897 मी.) - इक्वाडोर: यह दुनिया के सबसे ऊँचे और सबसे सुंदर शंकु (Cone) के आकार वाले सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक है।
- स्ट्रॉम्बोली (926 मीटर ) : भूमध्य सागर का प्रकाश स्तंभ (Lighthouse of the Mediterranean): इटली के लिपारी द्वीप पर स्थित स्ट्रॉम्बोली (Stromboli) ज्वालामुखी को कहा जाता है, क्योंकि इससे लगातार ज्वलनशील गैसें/लावा निकलता रहता है।
B. प्रसुप्त ज्वालामुखी
जो वर्तमान में शांत हैं और लंबे समय से नहीं फटे हैं, लेकिन इनके नीचे मैग्मा का स्रोत मौजूद है और ये कभी भी अचानक फट सकते हैं।
- माउंट फुजी (जापान): यह पैसिफिक और फिलिपिन प्लेट के टकराव वाले क्षेत्र में है। इसमें आखिरी बार सन 1707 में विस्फोट हुआ था। तब से यह शांत है, लेकिन इसे कभी भी सक्रिय होने वाला एक बेहद खतरनाक प्रसुप्त ज्वालामुखी माना जाता है।
- माउंट किलिमंजारो (तंजानिया): यह अफ्रीका की प्लेट के टूटने वाले रिफ्ट जोन के पास है। इसका सबसे ऊंचा शिखर (किबो) प्रसुप्त अवस्था में है, जिससे कभी भी गैस या लावा निकल सकता है।
C. मृत या शांत ज्वालामुखी
जो पूरी तरह मृत हो चुके हैं। प्लेट खिसकने या मैग्मा खत्म होने के कारण अब इनके भविष्य में कभी भी फटने की कोई संभावना नहीं है।
- माउंट पोपा (म्यांमार) - अभिसारी सीमा
- चिम्बोरोज़ो (इक्वाडोर) - अभिसारी सीमा
- माउंट केन्या (केन्या) - अपसारी सीमा
भारत के प्रमुख ज्वालामुखी (अंडमान-निकोबार द्वीप समूह)
भारत के दोनों ज्वालामुखी भारतीय प्लेट और सुंडा प्लेट के अभिसारी (टकराव) क्षेत्र में स्थित हैं:
- बैरेन द्वीप : भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी। भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी अंडमान सागर में स्थित है। यह म्यांमार प्लेट (सुंडा प्लेट का हिस्सा) और भारतीय प्लेट के अभिसारी (टकराने वाले) क्षेत्र में आता है, जिसके कारण यह सक्रिय है और अंतिम बार इसमें 2017-18 के आस-पास सक्रियता देखी गई थी।
- नरकोंडम द्वीप : भारत का एकमात्र मृत/शांत ज्वालामुखी है।
Related posts : -


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
If you have any doubts.
Please let me now.