हिन्दी भाषा के प्रमुख साहित्यकार नमस्कार दोस्तों आज हम हिंदी साहित्य के सिलेबस के अनुसार बाहरी राज्यों में जन्म लेने वाले साहित्यकारों का अध्ययन करेंगे। जो उत्तराखंड की परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं आज के लेख में गजानन माधव मुक्तिबोध के जीवन परिचय और उनकी प्रमुख सभी रचनाओं के बारे में विस्तार से जानेंगे । इससे पूर्व हम सुमित्रानंदन पंत, राहुल सांकृत्यायन, महादेवी वर्मा, शैलेश मटियानी और मंगलेश डबराल के बारे में विस्तार से पढ़ चुके हैं। जिनके लिंक लेख के अंत में नीचे दिए गए हैं। तो आईए जानते हैं गजानन मुक्तिबोध के बारे में विस्तार से - गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी साहित्य में 'अंधेरे के कवि' और फेंटेसी के बेजोड़ शिल्पी के रूप में विख्यात गजानन माधव मुक्तिबोध का नाम आधुनिक हिंदी काव्य के इतिहास में सबसे अलग और चमकीला है । वे प्रगतिशील चेतना और प्रयोगवाद के एक ऐसे अनूठे सेतु थे, जिन्होंने कविता को आत्म संघर्ष, आत्मा खोज और व्यवस्था के खिलाफ एक तीव्र बौद्धिक हथियार बनाया। जीवन परिचय गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर, 1917 को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के 'श्...
कविता संग्रह
प्रकृति का अंश : बादल
मैं बादलों-सा उड़ रहा हूँ !
कभी-यहां, कभी-वहां,
खुशियों का आंगन, भर रहा हूँ ।
चला हूँ ! दिलों में राज करने को,
अपना-सा कुछ ढूंढ रहा हूँ ।
मैं बादलों - सा उड़ रहा हूं,
घर-घर, शहर-शहर
बरस रहा हूं।
हरियाली मुझको प्रिय है ।
कृषि को मैं सींच रहा हूँ,
उपवन में मयूर देखकर!
जोर जोर से गरज रहा हूं।
समंदर का मैं रखवाला,
नदियों का मैं दीवाना हूँ,
पीकर उनसे अमृत जल,
फिर तुमको मैं सींच रहा हूँ ।
प्रकृति का ही अंश हूँ मैं,
हे मानव ! तू मुझको निराश ना करना,
प्रलय का मैं राजा हूँ !
विनम्रता से व्यवहार तू करना,
वरना ! मैं बादलों - सा उड़ रहा हूँ ।
कभी - यहां, कभी - वहां,
बरस रहा हूँ ।।
मां
होठों में मुस्कान,
उम्मीदों में जान,
आंखों में एक लंबा
इंतजार करते देखा है!
मां वह मूरत है खुदा की!
प्यार की सच्ची मसाल जलते देखा है!
मेरे ख्वाबों ने वह मंजर देखा है।
प्यार से भरा एक समंदर देखा है ।
इतनी शिद्दत है मां की दुआओं में ।
बड़े-बड़े सपने
पूरे होते देखा है।
सितारा है मेरी जिंदगी का
दर्द में भी
मुस्कुराते देखा है।।
मानवता
पार्ट -1
ना कोई लिबास शोहरत का हो,
ना कोई बात सम्मान की हो,
पहचान सके जो इंसान,
इंसान को,
इबादत हो, तो सच्ची शहादत से हो ।
ना कोई किसी का गुलाम हो,
ना कोई सरताज भगवान हो,
हाथ जोड़कर खड़ा रहूं मैंं,
मुलाकात गर सच्चे इंसान से हो।।
पार्ट 2
ना कोई भेद रंग से हो,
ना कोई पहचान धर्म से हो।
मानवता की पहचान है जिसको,
ऐसी मोहब्बत हर इंसान से हो।
ना कोई गुरूर ज्ञान का हो,
ना कोई जंग शान की हो,
जीत सके जो हृदय को,
ऐसी मोहब्बत उस इंसान से हो।।
अनजान रास्ते
भटक गया है राही!
रास्ता ढूंढ रहा है।
भूल गया है अपनी मंजिल,
नए ख्वाब सजा रहा है।
अपनी इच्छाएं खत्म करके,
आंसू छुपा रहा है।
खुशियां मिलेंगी इन राहों में,
उसे यकीन तो नहीं है,
फिर भी हंसते हुए,
सारे दर्द छुपा रहा है।
जा रहा है उस सफर में,
इसका कोई छोर तो नहीं है,
खुश हो जाता है,
मां की मुस्कान सोच कर,
जिसके लिए कोई और नहीं है।
अनजान रास्ता ! है मुश्किल
फिर भी आगे बढ़ रहा है,
शायद मिल जाए , वह रास्ता,
जहां फूलों का मंजर खिला है ।
भटक गया है राही!
रास्ता ढूंढ रहा है।।
प्रस्तुत सभी कविताएं मेरे द्वारा स्वरचित (सुनील सिंह राणा ) जिनमें मानवता और प्रकृति का समन्वय किया गया है । और मां के लिए ममता प्रस्तुत की गई है जो अत्यधिक भावुक और प्रेरणादायक है । जिनका अर्थ आप आसानी से समझ सकते हैं।
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Beautiful
जवाब देंहटाएंAwesome
जवाब देंहटाएंअंश भर जो प्रकृति का कविता संग्रह है। इसकी पुस्तक भी उपलब्ध है।
जवाब देंहटाएंमाफ़ कीजिए । हम आपकी बात ठीक से समझें नहीं।।
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