पर्वतों के निर्माण प्रस्तावना "पर्वत हमारी पृथ्वी की सबसे भव्य और प्रभावशाली संरचनाओं में से एक हैं। ये न केवल हमारे भूगोल को तय करते हैं, बल्कि मौसम से लेकर हमारी नदियों तक सब कुछ बदलते हैं। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे की कहानी उतनी ही जटिल और दिलचस्प है। इस अध्याय में हम बेहद आसान भाषा में समझेंगे कि प्लेटों के टकराने, ज़मीन के फटने और ज्वालामुखी के विस्फोट से इन पर्वतों का जन्म कैसे होता है।" पर्वतों के निर्माण पर्वतों के निर्माण का मुख्य आधार टेक्टोनिक प्लेटों की गति है। हमारी पृथ्वी का सबसे ऊपरी हिस्सा (स्थलमंडल) कई टुकड़ों में टूटा हुआ है जिन्हें 'टेक्टोनिक प्लेट्स' कहते हैं। ये प्लेटें मेंटल की अर्ध-तरल परत (एस्थेनोस्फीयर) पर बहुत धीमी गति (सालाना 1 से 10 सेमी) से खिसकती रहती हैं। जब ये प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, दूर जाती हैं या आपस में रगड़ खाती हैं, तो पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) पर भीषण तनाव और दबाव बनता है। इसी हलचल के कारण ज़मीन का हिस्सा या तो ऊपर उठ जाता है या फिर ज्वालामुखी के मैग्मा के जमाव से पहाड़ का रूप ले लेता है। पर्वतों के मुख्य प्रकार पर्...
स्वाभिमानी राजपूत
काव्य संग्रह
यह कैसी स्वाभिमानी है?
यह कैसी बुद्धिमानी है?
माना कि तुम राजपूत हो,
लेकिन फितरत वही पुरानी,
सौ गजो का बल है तुम में,
कहीं इस बात का अभिमान तो नही,
माना कि तुम राजपूत हो,
कभी दुश्मन से हारे नहीं,
मस्तक - ए - सर झुकाया नहीं,
पहचान तो कर लो बैरी कि,
भाई हमारा दूसरे पार तो नहीं,
क्यों सत्ता की लालच है इतनी,
हाथ मिला बैठे हो गैरों से,
क्या यही स्वाभिमानी है,
क्या यही बुद्धिमानी है,
सदियों से जो करते आए हो,
क्या इतिहास वही दोहराना है,
रण छोड़ दिया जयचंद नेे,
मान गए क्यों अकबर की शरण में,
मैं बात कर रहा हूं उन राणा कि,
मैं बात कर रहा हूं चौहानों की,
अभी भी कुछ नहीं बदला तुम में,
गांव में ही बैर है इतना,
जमीन के कुछ टुकड़ों से,
आपस में क्यों लड़ते हो,
राष्ट्रीय भाव जगाओ मन में,
यह कैसी स्वाभिमानी है?
यह कैसी बुद्धिमानी है?
सहनशीलता क्यों नहीं है तुम में,
वक्त बदला, दुनिया बदली,
राजपूत क्यों नहीं बदले,
हठी को छोड़ो अपनों को खोजो,
प्रेम भाव जगाओ मन मेंं,
माना कि तुम राजपूत हो,
जानता हूं हठी को नही छोड़ोगे,
ऊपर लिखा सच नहीं मानोगे तुम,
यह कैसी स्वाभिमानी है?
यह कैसी बुद्धिमानी है?
जिद के आगे झुक गई है दुनिया,
राज कर गए तुम पर अनपढ़ राजा।
कविता का उद्देश्य
प्रस्तुत पंक्तियों की रचना स्वयं के द्वारा की गई है, यह भाव उत्पन्न होने का मुख्य कारण है कि अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के लिए लोगों को लड़ाई करते पाया है। क्योंकि आजादी के बाद देश की रक्षा के लिए बहुत सारे राजपूत सेना में भर्ती हो गए। वहीं अन्य खेती पर भी निर्भर हो गए थे। जैसा की आप सबको मालूम है कि कन्नौज के शासक हर्षवर्धन के बाद देश में विभिन्न प्रकार के राजपूताना राज्यों का उदय हुआ । परमार, चौहान , राणा, चंद, कत्यूरी आदि ने नए राज्यों की स्थापना की। कहीं ना कहीं भारत में सबसे अधिक मात्रा में राजपूतों की संख्या है । और वह किसी ना किसी जाति या धर्म से संबंध रखते हैं । राजपूत हमेशा की तरह ही स्वाभिमानी से जिए हैं , और जिसकी मुख्य पहचान भी स्वाभिमानी ही है । लेकिन मेरे अनुभव के अनुसार राजपूतों में सहनशीलता की कमी होती है। वे अत्यधिक उग्र स्वभाव के होते हैं। बहुत जल्दी ही हाथापाई और लड़ाई पर आ जाते हैं। मैं यहां पर अधिकांश राजपूतों की बात कर रहा हूं ना कि सभी की बहुत से ऐसे भी हैं जो अत्यधिक प्रेम भाव से रहते हैं। और उनमें सहनशीलता का भंडार है ।
मेरा उद्देश्य किसी जाति धर्म को रात को बढ़ावा देना है। और ना ही किसी की निंदा करना है। मेरी कोशिश है कि अपनों की कमियों को उजागर करना । यदि आपको इन बातों का यकीन ना हो तो कभी महसूस करना आपको सच्चाई खुद-ब-खुद दिख जाएगी । अतः जरूरत देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए सभी को सहनशीलता और प्रेम भाव को बनाने की सदैव कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि आप लोग देश की आन हैं। जिनका लोहा विदेशियों ने भी माना है जिसका जिक्र बाबर ने भी किया है । अकबर ने भी किया है। हारे हैं तो बस अपनों से, जिसके लिए भाईचारे की भावना जरूरी है।
यदि मेरे विचार जातिवाद या किसी व्यक्ति विशेष को कष्ट देती हैं। तो उसके लिए क्षमा करें।। लेकिन सच्चाई यही है और सच्चाई को स्वीकार करें।
धन्यवाद
अन्य आर्टिकल को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
Bahut axchi h poem h Bhai
जवाब देंहटाएंKatai suuper.. se uper tk...
Bhut sundar कविता hai 😊
जवाब देंहटाएंBahut sundar ...
जवाब देंहटाएं