लोककथा : खरिया और भरिया नमस्कार दोस्तों आज हम थारू जनजाति कि संस्कृति के संरक्षण के लिए सदियों से प्रचलित लोककथाओं और लोकगीतों को शुरू करने जा रहे हैं। यूं तो थारू जनजाति के लोगों की अपनी कोई भाषा नहीं है। लेकिन सर्वाधिक प्रभाव ब्रजभाषा का देखने को मिलता है। किंतु समय परिर्वतन के साथ पहाड़ी, खड़ी बोली और हिन्दी का प्रभाव देखने को मिलता है। यदि हमारे द्वारा लिखी यह कहानी आपने कभी सुनी हो तो कमेंट अवश्य करें। खरिया और भरिया : लोककथा यह कहानी दो भाइयों की है - खरिया और भरिया। इस कहानी में खरिया बड़ा भाई और थोड़ा चालक था वहीं बढ़िया छोटा भाई और बहुत सीधा साधा था। यह कथा थारू समाज के उसे समय की है जब उनके पास धन के रूप में केवल खेती और मवेशी हुआ करते थे। एक गांव में दो भाई रहा करते थे। दोनों भाई बहुत मेहनती थे लेकिन अक्सर वे आपस के छोटे छोटे विवादों में फंस जाया करते थे। एक दिन अचानक पिता की मृत्यु जाती है। उनके पिता की मृत्यु के बाद, खरिया ने चालाकी से घर की संपत्तियों का बंटवारा कुछ इस तरह किया : कंबल का बंटवारा : खरिया ने कहा, "भाई, यह कंबल दिन में मेरा रहेगा और रात में तुम्...
काव्य संग्रह मेरी पहली मोहब्बत, Part -1 अक्सर यह रातों के आंसू , दिल में सैलाब लेकर आते हैं छूट रहा है वो पल मेरा , जहां खुशियों का सवेरा निकलता है। जाने क्यों वक्त कम-सा लगता है। कामयाबी मिलेगी यह तो यकीन है। फिर भी कुछ अधूरा-सा लगता है । कहने को तो जिंदगी बहुत बड़ी है । करने को एक मुकाम बाकी है। हौसलों में तो जान है, बस एक उड़ान बाकी है। हर पल बीत रहा है कुछ ऐसे। मानो मुट्ठी में रेत भरी है जैसे जाने क्यों वक्त कम-सा लगता है सब कुछ तो है जिंदगी में। फिर भी कुछ कम-सा लगता है। मस्ती की, मौज किया, खूब खाया, खूब पिया , हर पल जिंदगी को, एक नया मोड़ दिया। बहुत से राही ही मिले थे सफर में, सपनों का सागर था मन में, डर था टूट ना जाए , मेरा खुदा रूठ ना जाए। मैंने जो भी चाहा मिला था रब से, सब कुछ तो है जिंदगी में, फिर भी कुछ कम-सा लगता है। जाने यह कैसी चाहत है ? जाने यह कैसी नजाकत है? दुखों का साया कुछ यूं घबराया, खुशी का पल जब ऐसे आया । हर लम्हों को जिया मैं ऐसे , फूलों से बाग भरा था ज...