उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन और संघर्ष उत्तराखंड राज्य का निर्माण कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि यह दशकों लंबे संघर्ष, बलिदान और जन-आंदोलन का परिणाम था । हालांकि अलग राज्य की मांग 1897 से ही समय-समय पर उठती रही थी, लेकिन 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद इस संघर्ष ने एक नया मोड़ लिया । जब आप उत्तराखंड का आंदोलन ध्यानपूर्वक पढ़ रहे होंगे तो आपको आभास होगा जिस प्रकार भारत ने अंग्रेजों से आजादी पाई ठीक उसी प्रकार उत्तराखंड राज्य को बनाने में संघर्ष हुए। यह बात तो सच है की उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर में बांध बनाने के अलावा कोई भी कार्य नहीं किए। न सड़कें बनवायी न ही पर्यटन में विकास किया और बिजली तो पहाड़ों में दूर दूर तक नहीं पहुंची । जबकि दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश काफी आगे बढ़ गया। तो जरूरत तो थी एक नये राज्य की इसलिए तो संघर्ष हुआ। आप जब उत्तराखंड निर्माण आंदोलन के बारे में पढ़ें तो स्वतंत्र भारत आंदोलन से तुलना करें। जैसे भारत आजाद करने की प्रथम लड़ाई 1857 का स्वतंत्रता संग्राम वैसे ही उत्तराखंड की प्रथम लड़ाई 1947 से तुलना करें। ये बात अलग है कि भारत का वह संग्राम असफल हुआ औ...
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन और संघर्ष
उत्तराखंड राज्य का निर्माण कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि यह दशकों लंबे संघर्ष, बलिदान और जन-आंदोलन का परिणाम था । हालांकि अलग राज्य की मांग 1897 से ही समय-समय पर उठती रही थी, लेकिन 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद इस संघर्ष ने एक नया मोड़ लिया ।
जब आप उत्तराखंड का आंदोलन ध्यानपूर्वक पढ़ रहे होंगे तो आपको आभास होगा जिस प्रकार भारत ने अंग्रेजों से आजादी पाई ठीक उसी प्रकार उत्तराखंड राज्य को बनाने में संघर्ष हुए। यह बात तो सच है की उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर में बांध बनाने के अलावा कोई भी कार्य नहीं किए। न सड़कें बनवायी न ही पर्यटन में विकास किया और बिजली तो पहाड़ों में दूर दूर तक नहीं पहुंची । जबकि दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश काफी आगे बढ़ गया। तो जरूरत तो थी एक नये राज्य की इसलिए तो संघर्ष हुआ।
आप जब उत्तराखंड निर्माण आंदोलन के बारे में पढ़ें तो स्वतंत्र भारत आंदोलन से तुलना करें। जैसे भारत आजाद करने की प्रथम लड़ाई 1857 का स्वतंत्रता संग्राम वैसे ही उत्तराखंड की प्रथम लड़ाई 1947 से तुलना करें। ये बात अलग है कि भारत का वह संग्राम असफल हुआ और 1947 में हम आजाद हो गये। किंतु 1947 में उत्तराखंड को अलग राज्य नहीं बनाया । फिर कांग्रेस का गठन किया गया तो वहीं यहां उत्तराखंड क्रांति दल का गठन । ऐसे ही सभी आंदोलन और यूकेडी का विभाजन। तो आइए पहले एक संक्षिप्त वर्णन और उसके बाद विस्तार से जानते हैं उत्तराखंड आंदोलन निर्माण का इतिहास।
1947 के बाद उत्तराखंड निर्माण और उत्तराखंड गठन के लिए संघर्ष कब और कैसे शुरू हुआ । आइए जानते हैं विस्तार से,
5-6 मई 1938 का दिन जब श्री नगर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ था जिसकी अध्यक्षता प्रताप सिंह ने की थी। इस सम्मेलन में जवाहरलाल नेहरू व विजय लक्ष्मी पंडित शामिल हुए और इसी अधिवेशन में पहली बार श्रीदेव सुमन जी ने 'पृथक राज्य' की मांग की। साथ ही दिल्ली में "गढ़ देश सेवा संघ" की स्थापना भी की। जिसका नाम बदलकर "हिमालय सेवा संघ" रखा गया था।
आजादी से ठीक एक वर्ष पूर्व ही बद्रीदत्त पांडे की अध्यक्षता में 1946 ई. में हल्द्वानी में कांग्रेस सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में बद्रीनाथ पांडे और अनुसूइया प्रसाद बहुगुणा ने उत्तरांचल के पर्वतीय भू-भाग को विशेष वर्ग में रखने की मांग उठायी थी।
अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत देश आजाद हुआ और फिर शुरू हुआ उत्तराखंड निर्माण का संघर्ष । आइए जानते हैं पूरी कहानी को हम इन महत्वपूर्ण चरणों में।
प्रारंभिक प्रयास (1947-1960 के दशक तक)
- आजादी के तुरंत बाद, उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों के विकास की अनदेखी होने लगी, जिससे अलग राज्य की मांग तेज हुई। 1950 ईस्वी में हिमाचल व उत्तरांचल को मिलाकर हिमालय राज्य बनाने के लिए पर्वतीय विकास जन समिति का गठन किया गया था।
- 1952 में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पी.सी. जोशी ने पृथक राज्य की मांग का ज्ञापन भारत सरकार को सौंपा था।
- 1954 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य इंद्र सिंह नयाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को पर्वतीय क्षेत्र लिए अलग विकास योजना की मांग सौंपी।
- 1955 में फजल अली आयोग (राज्य पुनर्गठन आयोग) के समक्ष पर्यटक राज्य का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन उस समय इसे स्वीकार नहीं किया गया ।
- 1957 में टिहरी के पूर्व राजा मानवेन्द्र शाह ने अपने स्तर पर आंदोलन शुरू किया।
संस्थागत संघर्ष की शुरुआत (1960-1970 का दशक)
इस दौरान आंदोलन को संगठित करने के लिए कई परिषदों का गठन हुआ।
- 1967 : रामनगर में पर्वतीय राज्य परिषद का गठन हुआ जिसकी अध्यक्षता दयाकृष्णा पांडे ने की ।
- 1979 : 24-25 जुलाई को मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) की स्थापना हुई। इसके प्रथम अध्यक्ष कुमाऊं विश्वविद्यालय कुलपति डॉ.डी.डी. पंत बने। UKD के गठन ने इस आंदोलन को एक राजनीतिक दिशा दी।
जन आंदोलन का उग्र रूप (1990 का दशक)
1994 में जब तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरियों और शिक्षक संस्थानों मे आरक्षण नीति (मुल्तानी आयोग/ओबीसी आरक्षण) लागू की, तो पहाड़ों में इसका कड़ा विरोध हुआ। छात्र और कर्मचारी सड़कों पर उतर आए और यहीं से आंदोलन ने निर्णायक मोड़ लिया।
प्रमुख हिंसक घटनाएं और शहदत:
- खटीमा कांड (1 सितंबर 1994): पुलिस ने दर्शन कार्यों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई, जिसमें सात लोग शहीद हुए। इसे उत्तराखंड आंदोलन का 'काला दिन' कहा जाता है ।
- मसूरी कांड (2 सितंबर 1994): खटीमा कांड के विरोध में मसूरी के झूला घर पर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर फायरिंग हई, जिसमें बेलमती चौहान और हंसा धनई जैसी वीरांगनाताओं सहित कई लोग शहीद हुए।
- रामपुर तिहाड़ कांड (2 अक्टूबर 1994): दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर रोक गया। यहां पुलिस की बर्बरता की सभी हदें पार हो गई, जिसमें कई लोग शहीद हुए और महिलाओं के साथ बदसलूकी की गई। इस घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया।
राज्य गठन की अंतिम प्रक्रिया
इन बलिदानों के बाद केंद्र सरकार पर दबाव बड़ा और अंतत: संवैधानिक प्रक्रिया शुरू हई:
- 15 अगस्त 1996 तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा ने लाल किले की प्राचीर से उत्तराखंड राज्य बनाने की घोषणा की।
- वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान 'उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक' लोकसभा (1 अगस्त) और राज्यसभा (10 अगस्त) में पारित हुआ।
- 9 नवंबर 2000 में भारत के 27 वे राज्य के रूप में उत्तरांचल का गठन हुआ (जिसे 2007 में बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया)।
आइए अब जानते हैं सभी घटनाओं को विस्तार से,
पृथक राज्य की मांग एवं आन्दोलन
उस समय उत्तराखंड की मांग मुख्य रूप से दो धाराओं में बँटी हुई थी , जिन्होंने आयोग के सामने अपना पक्ष रख आजादी के बाद, जब 1953 में भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश बना, तो पूरे देश में नए राज्यों की मांग उठी। इसी उद्देश्यक लिए केंद्र सरकार ने दिसंबर 1953 में न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में 13 सदस्यीय आयोग (अन्य सदस्य के. एम. पणिक्कर और एच.एन. कुजरु) गठित किया।
1955 में फजल अली आयोग (जिस राज्य पुनर्गठन आयोग कहा जाता है) इसके समकक्ष पृथक राज्यों का प्रस्ताव रखना उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पड़ाव था हालांकि आयोग ने भाषा को आधार मानकर देश के कई राज्यों का पुनर्गठन किया, लेकिन उत्तराखंड (पर्वतीय क्षेत्र) की मांग को स्वीकार नहीं किया गया।
उत्तराखंड की ओर से इस आयोग के सामने मुख्य रूप से दो प्रस्ताव आए थे:
- 'कुमाऊं- गढ़वाल' - पी.सी. जोशी (कम्युनिस्ट पार्टी ) भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव पी. सी. जोशी पहले ऐसे बड़े नेता थे जिन्होंने वैज्ञानिक आधार पर 'कुमाऊं - गढ़वाल' को मिलाकर एक अलग प्रशानिक इकाई बनाने का ज्ञापन फजल अली आयोग को सौंपा । उन्होंने तर्क दिया कि पहाडों की संस्कृति, भूगोल और भाषा उत्तर प्रदेश के मैदान इलाकों से बिल्कुल अलग है ।
- हिमालयी संघ की मांग : कुछ नेताओं का यह भी विचार था कि उत्तराखंड ( टिहरी रियासत सहित) और हिमाचल प्रदेश को मिलाकर एक बड़ा 'महा-हिमालयी राज्य' बनाया जाए ताकि वह आर्थिक रूप से मजबूत हो सके ।
*1957 में टिहरी रियासत के पूर्व नरेश मानवेन्द्र शाह ने पृथक राज्य के लिए नये सिरे से मॉग उठायी थी।
आयोग के सामने रखे गए 'पृथक राज्य' के पक्ष में तर्क
आंदोलनकारियों ने फजल अली आयोग के समक्ष तीन प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया था।
- भौगोलिक विषमता : उन्होंने कहा की लखनऊ (राजधानी) से पहाडों की दूरी बहुत अधिक है 'जिससे शासन-प्रशासन की पहुँच आम आदमी तक नहीं हो पाती ।
- सांस्कृतिक पहचान : पहाडों की 'पहाडी' बोली और रैबार-रैंसे (संस्कृति) मैदानी संस्कृति से भिन्न है, जिसे उत्तर प्रदेश के साथ रहने पर खतरा है ।
- विकास की उपेक्षा : सरकारी बजट का अधिकांश हिस्सा मैदानी खेती और उद्योगों पर खर्च हो जाता है , जबकि पहाड़ों में सड़क बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है ।
आयोग द्वारा मांग अस्वीकार करने के मुख्य कारण
फजल अली आयोग ने उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग को निम्नलिखित कारणों से खारिज कर दिया:
- आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability): आयोग का मानना था कि पर्वतीय क्षेत्र राजस्व के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। उस समय के अनुसार, एक नए राज्य को चलाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा और वित्तीय संसाधन वहां सीमित थे ।
- छोटे राज्यों के प्रति अरुचि : उस समय भारत सरकार की नीति छोटे राज्यों के पक्ष में नहीं थी। आयोग का मानना था कि छोटे राज्य आर्थिक रूप से बोझ बनेंगे ।
- उत्तर प्रदेश के नेताओं का दबाव : तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत (जो स्वयं उत्तराखंड से थे) और मुख्य मंत्री संपूर्णानंद उत्तराखण्ड को उत्तर प्रदेश से अलग करने के सख्त खिलाफ थे। उनका तर्क था कि "बड़ा उत्तर प्रदेश भारत की राजनीति में स्थिरता के लिए जरूरी है"।
- रसद और संचार का अभाव : आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इस क्षेत्र में संचार के साधन ( सड़क , रेल ) इतने कम है कि एक स्वतंत्र राज्य का प्रशासन चलाना असंभव होगा
- उत्तर प्रदेश का आकार और एकता: आयोगा का तर्क था कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और महत्वपूर्ण राज्य को विभाजित करना प्रशासनिक दृष्टि से ठीक नहीं होगा । उन्हें डर था कि इससे अन्य क्षेत्रों से भी ऐसी ही मांगें उठने लगेंगी ।
- सीमा सुरक्षा का डर : 1950 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा किए जाने के बाद , भारत सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों में कई राजनीतिक अस्थिरता या नया प्रयोग नहीं करना चाहती थी। उन्हें लगा कि एक बड़ा राज्य (UP) सीमा की सुरक्षा बेहतर ढंग से कर सकता है।
- जनसंख्या का कम घनत्व: मैदानी इलाकों की तुलना में पहाड़ों की जनसंख्या काफी कम थी 'जिसे उस समय एक अलग राज्य के गठन के लिए पर्याप्त नही माना गया ।
परिणाम और प्रभाव
भले ही 1955 में सफलता नहीं मिली , लेकिन इस घटना ने "उत्तराखण्डी चेतना" को जन्म दिया। पहली बार अधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया गया कि पहाड़ों की समसयाएं मैदानों से अलग हैं। जब आयोग ने मांग ठुकराई, तो 1957 में मानवेंद्र शाह ( टिहरी के अंतिम राजा ) ने इस आंदोलन को राजनीति का हिस्सा बनाया और चुनाव में इसे मुद्दा बनाया ।
यही वह आधार था जिसने 1960 में उत्तर प्रदेश सरकार को मजबूर किया कि वह उत्तराखंड के विकास के लिए अलग से तीन सीमावर्ती जिले' (उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ) बनाए ।
यही वह आधार था जिसने 1960 में उत्तर प्रदेश सरकार को मजबूर किया कि वह उत्तराखंड के विकास के लिए अलग से तीन सीमावर्ती जिले' (उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ) बनाए ।
पर्वतीय राज्य परिषद - 1967
1955 में फजल अली आयोग द्वारा पृथक राज्य की मांग ठुकराए जाने के बाद, 1960 के दशक में आंदोलन ने फिर से जोर पकड़ा । इसी क्रम में 24-25 जून 1967 में 'पर्वतीय राज्य परिषद् का गठन हुआ, उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में एकमील का पत्थर माना जाता है।
गठन और पृष्ठभूमि
24-25 जून 1967 को रामनगर (नैनीताल) में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया । इसी सम्मेलन में 'पर्वतीय राज्य परिषद' की स्थापना की गई । इस परिषद का मुख्य उद्देश्य बिखरे हुए आंदोलनकारियों का एक मंच पर लाना और पृथक राज्य की मांग को पुरजोर तरीके से उठाना था।
प्रमुख नेतृत्व कर्ता
परिषद के गठन में उस समय के दिग्गज नेताओं और बुद्धिजीवियों का हाथ था :
- अध्यक्ष : परिषद के पहले अध्यक्ष दयाकृष्णा पांडे बनाए गए ।
- महासचिव : हिमाचल प्रदेश के साथ मिलकर हिमालयी राज्य की वकालत करने वाले महासचिव बने।
- अन्य प्रमुख सदस्य : इसमें नारायण दत्त तिवारी , प्रताप सिंह नेगी, नरेन्द्र सिंह बिष्ट और और रामचन्द्र आजाद जैसे नेता शामिल थे। प्रताप सिंह नेगी और नरेंद्र सिंह बिष्ट को 1973 में शामिल किया गया ।
परिषद के मुख्य उद्देश्य और मांगे
पर्वतीय राज्य परिषद ने सरकार के सामने स्पष्ट रूप से निम्न लिखित मांगे रखी :
- पृथक राज्य का निर्माण : उत्तर प्रदेश के सभी पर्वतीय जिलों को मिलाकर एक अलग राज्य बनाया जाए ।
- विकासात्मक स्वायत्तता : पहाडों के लिए अलग बजट और अलग विकास नीतियां बनाई जाएं, क्योंकि मैदानी योजनाए पहाड़ों में विफल हो रही थी
- संसाधनों पर अधिकार : जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय लोगों के हक को प्राथमिकता दी जाए।
आंदोलन की नई रणनीति
इस परिषद ने आंदोलन को केवल कागजों तक सीमित नहीं किया, बल्कि उसे जमीन पर उतारा :
- दिल्ली में प्रदर्शन (1968 ) : परिषद के नेतृत्व में पहली बार बड़ी संख्या में लोग दिल्ली पहुंचे और वोट क्लब पर प्रदर्शन कर केन्द्र सरकार का ध्यान आकर्षित किया । जिसके प्रमुख नेतृत्वकर्ता थे ऋषि बल्लभ सुन्दरिया।
- इंद्रमणि बडोनी की भूमिका : इसी दौरान इंद्रमाणि बडोनी (जिन्हें उत्तराखंड का गांधी कहा जाता है ) इस आन्दोलन से गहराई से जुड़े । उन्होंने 1973 में इस परिषद के बैनर तले और बाद में 'उत्तरांचल परिषद ' के माध्यम से अलग राज्य की मांग के लिए दिल्ली में धरना दिया ।
महत्व और परिणाम
'पर्वतीय राज्य परिषद' ने उत्तराखंड आंदोलन को बौद्धिक और संगठनात्मक मजबूती प्रदान की :
- इसने गढ़वाल और कुमाऊं के बीच के भौगोलिक विभाजन को खत्म कर "पर्वतीय एकता" का संदेश दिया ।
- 1969 में उत्तर प्रदेश सरकार ने क्षेत्र विकास के लिए पर्वतीय विकास परिषद का गठन किया।
- इसी परिषद के संघर्ष का परिणाम था कि आगे चलकर 1970 के दशक में छात्र और युवा आंदोलन से जुड़े जिससे अंततः 1979 में 'उत्तराखंड क्रांति दल' (UKD) के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ ।
- कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पी. सी. जोशी ने इस परिषद के माध्यम से 1970 में कुमाऊं राष्ट्रीय मोर्चा का गठन किया।
- 1972 ई में उत्तरांचल परिषद का गठन हुआ और 1973 में इस परिषद ने दिल्ली चलो का नारा दिया। कुछ वर्ष पश्चात ही उत्तराखंड के युवा एकत्रित हुए और 1976 में उत्तराखंड युवा परिषद का गठन किया। जिसके सदस्यों ने संसद घेराव के लिए प्रदर्शन किया और गिरफ्तारियां दी।
- 1979 में जनता दल के त्रेपन सिंह नेगी के नेतृत्व में उत्तरांचल राज्य परिषद स्थापना की गई। और त्रेपन सिंह नेगी ने मोरारजी देसाई को पृथक राज्य हेतु ज्ञापन सौंपा।
उत्तराखंड क्रांति दल (UKD)
- गठन : (24-25 जुलाई 1979 )
- स्थान : मसूरी ।
- उद्देश्य : उत्तर प्रदेश के आठ पर्वतीय जिलों को मिलाकर एक अलग 'पर्वतीय राज्य' का निर्माण करना ।
- प्रथम अध्यक्ष : कुमाऊं विश्व विद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. डी. डी. पंत (देवीदत्त पंत )
प्रमुख संस्थापक सदस्य
इस दल की नींव रखने में कई दिग्गज नेताओं का हाथ था, जिन्हें आज भी राज्य आन्दोलन के स्तंभ माना जाता है :- डॉ. देवीदत्त पंत : पहले अध्यक्ष और बौद्धिक मार्गदर्शक ।
- इंद्रमणि बडोनी : जिन्हें ' उत्तराखण्ड का गांधी ' कहा जाता है ।
- काशी सिंह ऐरी : युवा नेता जिन्होंने आन्दोलन को धार दी ।
- बिपिन चंद्र त्रिपाठी : प्रमुख रणनीतिकार और विचारक ।
- दिवाकर भट्ट : जिन्हें ' फील्ड मार्शल ' के नाम से भी जाना जाता था।
UKD की कार्य प्रणाली और संघर्ष उत्तराखंड क्रांति दल ने राज्य की मांग को गाँव-गाँव तक पहुंचाने के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए :
- 1980 के दशक से ही UKD ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाग लेना शुरू किया ताकि सदन के भीतर पृथक राज्य की आवाज उठाई जा सके । जसवंत सिंह बिष्ट रानीखेत से दल के पहले विधायक बने । और इन्होंने 1990 में पृथक राज्य का पहला प्रस्ताव रखा।
- 1988 में इंद्रमणि बड़ोनी के नेतृत्व में पिथौरागढ़ के तवाघाट से देहरादून तक 100 दिन की ऐतिहासिक पदयात्रा की गई, जिसने लोगों में अभूतपूर्व चेतना जगाई ।
उत्तराखंड क्रांति दल का विभाजन -1987
भारत में ऐसा कोई दल ही नहीं बना जिसका विभाजन न हुआ। जैसे-जैसे दल का आकार बड़ा होता है। उसमें विभिन्न विचारों वाले बुद्धिजीवी शामिल होते हैं। यूकेडी में आंतरिक गुटबाजी, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और नेतृत्व को लेकर मतभेद हो गये। जिस कारण उत्तराखंड क्रांति दल का भी विभाजन 1987 ई में हो गया। जिसके बाद दल की बागडोर काशी सिंह ऐरी के हाथ में आ गयी। इसी क्रम में यूकेडी के उपाध्यक्ष त्रिवेंद्र पंवार ने 23 अप्रैल 1987 ई. को संसद में पत्र बम फेंका। उसके बाद
- 1991 ई० में उत्तराखण्ड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया
- काशी सिंह ऐरी ने 1992 में चौखुटिया (अल्मोड़ा) के पास गैरसैंण को उत्तराखंड की प्रस्तावित राजधानी घोषित किया और इसका नाम 'चंद्रनगर' (वीर चन्द सिंह गढ़वाली के नाम पर) रखा ।
1994 का निर्णायक आंदोलन
1994 वह वर्ष है जिसमें उत्तराखंड निर्माण आंदोलन चरम पर था। इस वर्ष प्रत्येक माह, हर दिन, हर क्षण पहाड़ों में, मैदानों में हलचल देखने को मिलती है। हमारे उत्तराखंड वासियों ने कुर्बानी दी। आइए जानते हैं विस्तार से -
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने पृथक राज्य की संरचना व राजधानी हेतु नगर विकास मंत्री रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में कौशिक समिति का गठन किया । जिसने 1994 में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। कौशिक समिति ने 8 पर्वतीय जिलों को मिलाकर उत्तराखंड राज्य एवं राजधानी गैरसैंण बनाने की सिफारिश की थी। उसके बाद
- अप्रैल 1994 ई. में उत्तरांचल राज्य की मांग को लेकर उत्तराखंड पीपुल्स फ्रंट बनाया गया। तथा इसी माह बहादुर राय टम्टा ने संयुक्त उत्तराखंड राज्य मोर्चा का गठन किया।
- जून 1994 में कौशिक समिति की सिफारिश स्वीकार कर ली गयी तथा राज्य विधानसभा सभा में विधेयक पास किया गया। और पृथक उत्तराखंड की अनिवार्यता पर सुझाव देने के लिए विनोद बड़थ्वाल समिति का गठन किया गया।
- उत्तराखंड जन आन्दोलन की शुरुआत 2 अगस्त 1994 को पौड़ी गढ़वाल से हुयी।
- 1994 ई. में मुलायम सिंह यादव सरकार ने आरक्षण नीति लागू की, जिसके विरोध में इंद्रमणि बडोनी जी ने पौड़ी में आमरण अनशन किया । वहीं दूसरी तरफ आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन भड़का, तो UKD ने इसका नेतृत्व किया ।
- खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा कांड जैसी घटनाओं के बाद UKD ने पूरे पहाड़ में 'चक्का जाम' और 'बाजार बंद' का आहान किया, जिससे दिल्ली की केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा ।
- 1994 के वे हिंसक कांड उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास के सबसे दुखद लेकिन सबसे निर्णायक अध्याय हैं। इन घटनाओं ने शांत पहाड़ों में ऐसी आग लगा दी थी कि तत्कालीन केन्द्र सरकार के लिए अलग राज्य की मांग को टालना असंभव हो गया ।
इन तीन प्रमुख कांडों ने आंदोलन का रुख पूरी तरह बदल दिया :
1 . खटीमा कांड (1 सितंबर 1994)
खटीमा कांड (1 सितंबर 1994 ) को उत्तराखंड के इतिहास में 'काला दिवस' और 'क्रूरतम दिवस' के रूप में याद किया जाता है। यह वह घटना थी जिसने दशकों से शांतिपूर्वक चल रहे आंदोलन को एक हिंसक और निर्णायक मोड़ पर खड़ा कर दिया ।1994 की गर्मियों में, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27% अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) OBC आरक्षण लागू करने का निर्णय लिया । पर्वतीय क्षेत्रों में OBC की जनसंख्या बहुत कम थी, इसीलिए वहां के युवाओं को लगा कि उनके अवसर खत्म हो जाएंगे । छात्र सड़कों पर उतर आए और धीरे-धीरे यह 'आरक्षण विरोधी आंदोलन' एक पृथक राज्य आंदोलन में बदल गया । जबकि 1 सितंबर 1994 को खटीमा (उधम सिंह नगर) के रामलीला मैदान में हजारों की संख्या में पूर्व सैनिक, छात्र और स्थानीय लोग एक शांतिपूर्ण जुलूस निकालने के लिए जमा हुए थे ।
दोपहर के समय, जब प्रदर्शनकारी बाजार की ओर बढ़ रहे थे, तो पुलिस और पीएसी ( PAC ) के साथ उनकी नोक झोंक हुई । पुलिस ने बिना किसी पूर्व सूचना के लाठी चार्ज कर दिया। सीधे सीने और सर पर गोलियां चलानी शुरु कर दी । भगदड़ मचने के बाद भी पुलिस ने गल्लियों में भाग रहे लोगों का पीछा किया ।
इस कांड में कई निर्दोष आंदोलनकारी शहीद हुए । आधिकारिक और गैर आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मुख्य रूप से इन 7 लोगों की शहादत दर्ज है :
- अमर शहीद सलीम अहमद (यह नाम आंदोलन के सांप्रदायिक एकता का प्रतीक बना )
- अमर शहीद धर्मानंद भट्ट
- अमर शहीद गोपीचंद
- अमर शहीद परमजीत सिंह
- अमर शहीद रामपाल
- प्रताप सिंह
- भगवान सिंह सिरौला
2 . मसूरी कांड (2 सिंतबर 1994 )
खटीमा कांड के विरोध में अगले ही दिन मसूरी में जनता सड़कों पर उतर आई । लोग 'झूलाघर' पर शांतिपूर्वक धरना दे रहे थे, तभी पुलिस और PAC ने फायरिंग कर दी । इस कांड में दो महान वीरांगनाए, बेलमती चौहान और हंसा धनई शहीद हुई । इनके अलावा पुलिस क्षेत्राधिकारी उमाशंकर त्रिपाठी की भी इस झड़प में मृत्यु हो गई । इस घटना ने यह साबित कर दिया कि उत्तराखंड की महिलाएं इस राज्य के निर्माण के लिए अपना जीवन देने को तैयार हैं।मसूरी कांड में शहीद
- हंसा धनाई
- बेलमती चौहान
- धनपत सिंह
- मदन मोहन मंमगाई
- बलवीर सिंह नेगी
- उमाकांत त्रिपाठी
- जेठू सिंह
*रामपुर तिराहा कांड से पूर्व 15 सितंबर 1994 ई मसूरी के बुडस्टाक स्कूल के पास बाटा घाटा कांड हुआ। और 25 सितंबर 1994 ई. को जागरण दिवस के तहत राज्य में लालटेन के साथ जुलूस निकाला गया।
3. रामपुर तिराहा कांड (मुजफ्फनगर कांड) - 2 अक्टूबर 1994
यह उत्तराखंड आंदोलन की सबसे बर्बर और शर्मनाक घटना मानी जाती है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा । 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) के दिन हजारों आंदोलनकारी बसों में सवार होकर दिल्ली के 'लाल किला' पर धरना देने जा रहे थे ।उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुजफ्फर नगर के रामपुर तिराहे पर आंदोलनकारियों को रोक लिया । रात के अंधेरे में पुलिस ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाई, लाठी चार्ज किया और सबसे शर्मनाक बात यह रही कि महिलाओं के साथ बदसूलकी और बलात्कार की घटनाएं हुई ।इस कांड में 6 से अधिक लोग शहीद हुए । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस घटना की कड़ीं निंदा की थी और इसे "मानवता के खिलाफ अपराध" बताया था । रामपुर तिराहा कांड की जांच के लिए 'नेगी समिति' बनाई गई।इस घटना को चंडी प्रसाद भट्ट ने "पूरे देश व सभ्य समाज पर एक कलंक बताया"।
मुजफ्फरनगर कांड में शहीद
- राजेश लखेड़ा
- रविन्द्र रावत
- सतेन्द्र सिंह चौहान
- गिरीश कुमार भद्री
- सूर्य प्रकाश थपलियाल
- अशोक कुमार कौशिव
आंदोलन का क्या प्रभाव
झ घटनाओं ने आंदोलन को 'अहिंसक' से आक्रामक बना दिया :
जो लोग अब तक न्यूट्रल थे, वे भी "आज नहीं तो कभी नहीं" के नारे के साथ सड़कों पर आ गए। मुजफ्फरनगर कांड की वजह से यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक पहुँचा, जिससे केंद्र सरकार पर भारी दबाव बना । तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के खिलाफ "पहाड़" में भारी नफरत पैदा हो गई , जिससे क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई और मजबूत हुई। इन्हीं बलिदानों का दबाव था कि 1996 में लाल किले से पृथक राज्य की घोषणा करनी पड़ी।
वर्ष के अंतिम माह में 7 दिसंबर 1994 को उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति के अध्यक्ष भुवन चंद्र खंडूरी के नेतृत्व में दिल्ली में हुई रैली हुई। तथा 9 दिसंबर 1994 को राज्य में जेल भरो आंदोलन में हजारों आंदोलन कार्यों ने गिरफ्तारियां दी ।
महत्वपूर्ण तथ्य :-
प्रश्न : क्या आप जानते हैं राज्य निर्माण से पहले प्रस्तावित नाम क्या था?
उत्तर - 1987 ई को अल्मोड़ा में लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में भाजपा पार्टी का सम्मेलन हुआ । इसमें उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य का दर्जा देने की माँग स्वीकार की लेकिन प्रस्तावित उत्तराखण्ड नाम की जगह उत्तरांचल नाम स्वीकार किया गया। और राज्य निर्माण के समय उत्तरांचल के नाम से गठन किया गया। किंतु 1 जनवरी 2007 को उत्तरांचल से नाम परिवर्तित कर उत्तराखंड रखा गया।
प्रश्न : उत्तरांचल उत्थान परिषद का गठन कब किया गया?
उत्तर - उत्तरांचल उत्थान परिषद का गठन 1988 ई० में शोबन सिंह जीना की अध्यक्षता में हुआ था। 1989 ई० में राज्य के सभी संगठनो ने मिलकर आंदोलन चलाने के लिए उत्तरांचल संयुक्त संघर्ष समिति का गठन किया गया।
प्रश्न : क्या आप जानते हैं इंद्रमणि बडोनी जी को उत्तराखंड का गांधी क्यों कहा जाता है ?
उत्तर - इंद्रमणि बडोनी जी का जन्म 24 दिसंबर 1925 को टिहरी के जखोली विकासखण्ड में हुआ था। ये गांधी के अनुयायी थे। जिस प्रकार की भूमिका गांधी जी ने भारत को आजाद करने में निभाई थी ठीक उसी प्रकार बड़ौनी जी ने भी अहिंसक रूप से उत्तराखंड राज्य निर्माण आन्दोलन में निभाईं, उन्होंने पौड़ी गढ़वाल में ओबीसी आरक्षण व्यवस्था के विरोध में 30 दिनों का आमरण अनशन किया था।
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