लोककथा : खरिया और भरिया नमस्कार दोस्तों आज हम थारू जनजाति कि संस्कृति के संरक्षण के लिए सदियों से प्रचलित लोककथाओं और लोकगीतों को शुरू करने जा रहे हैं। यूं तो थारू जनजाति के लोगों की अपनी कोई भाषा नहीं है। लेकिन सर्वाधिक प्रभाव ब्रजभाषा का देखने को मिलता है। किंतु समय परिर्वतन के साथ पहाड़ी, खड़ी बोली और हिन्दी का प्रभाव देखने को मिलता है। यदि हमारे द्वारा लिखी यह कहानी आपने कभी सुनी हो तो कमेंट अवश्य करें। खरिया और भरिया : लोककथा यह कहानी दो भाइयों की है - खरिया और भरिया। इस कहानी में खरिया बड़ा भाई और थोड़ा चालक था वहीं बढ़िया छोटा भाई और बहुत सीधा साधा था। यह कथा थारू समाज के उसे समय की है जब उनके पास धन के रूप में केवल खेती और मवेशी हुआ करते थे। एक गांव में दो भाई रहा करते थे। दोनों भाई बहुत मेहनती थे लेकिन अक्सर वे आपस के छोटे छोटे विवादों में फंस जाया करते थे। एक दिन अचानक पिता की मृत्यु जाती है। उनके पिता की मृत्यु के बाद, खरिया ने चालाकी से घर की संपत्तियों का बंटवारा कुछ इस तरह किया : कंबल का बंटवारा : खरिया ने कहा, "भाई, यह कंबल दिन में मेरा रहेगा और रात में तुम्...
उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था को भारत के संवैधानिक ढांचे के तहत संचालित किया जाता है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन स्पष्ट रूप से परिभाषित है, उत्तराखंड जो 9 नवंबर 2000 को भारत का 27वां राज्य बना एक संसदीय लोकतंत्र के रूप में कार्य करता है । इसकी प्रशासनिक व्यवस्था को निम्नलिखित स्तरों पर समझा जा सकता है। प्रशासनिक ढांचा विभागीय संरचना : उत्तराखंड सरकार विभिन्न विभागों के माध्यम से प्रशासन संचालित करती है जैसे - गृह, शिक्षा, स्वास्थ्य, वन, पर्यटन, लोक निर्माण और कृषि । प्रत्येक विभाग का एक नेतृत्व एक मंत्री करता है जबकि प्रशासनिक कार्यों का प्रबंध भारतीय प्रशासनिक सेवा और राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी करते हैं। सचिवालय : देहरादून में स्थित सचिवालय राज्य सरकार का प्रशासनिक केंद्र है जहां सभी प्रमुख नीतिगत निर्णय लिए जाते हैं। मुख्य सचिव : यह राज्य राज्य का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होता है जो सभी विभागों के बीच समन्वय स्थापित करता है और सरकार को नीतिगत सलाह देता है। उत्तराखंड राज्य प्रशासन...