सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भारत के रामसर स्थल

भारत के रामसर स्थल  केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 2 फरवरी 2024 में भारत में 5 आर्द्र भूमि को रामसर साइट के रूप में नामित किया। वर्तमान समय में इनकी संख्या 75 से बढ़कर 80 हो गई है। इनमें से तीन स्थल अंकसमुद्र पक्षी संरक्षण रिजर्व, अघनाशिनी मुहाना और मगादी केरे संरक्षण रिजर्व कर्नाटक में स्थित है। जबकि दो कराईवेटी पक्षी अभयारण्य तथा लॉन्गवुड शोला रिज़र्व वन तमिलनाडु में स्थित है। रामसर सूची में जोड़े गए पांच आर्द्र भूमि स्थल हैं । मगदीकेरे संरक्षण रिजर्व (कर्नाटक) अंकसमुद्र पक्षी संरक्षण रिजर्व (कर्नाटक) अघनाशिनी मुहाना (कर्नाटक) कराईवेट्टी पक्षी अभयारण्य (तमिलनाडु) लॉन्गवुड शोला रिजर्व वन (तमिलनाडु) मगदीकेरे संरक्षण रिजर्व (कर्नाटक) मगदीकेरे संरक्षण रिजर्व कर्नाटक राज्य में स्थित है। यह लगभग 50 हेक्टेयर क्षेत्र वाली एक मानव निर्मित आर्द्र भूमि है जिसका निर्माण सिंचाई उद्देश्य के लिए वर्षा जल से संग्रहित करने हेतु किया गया था। मगदीकेरे दक्षिणी भारत में बार-हेडेड हंस (एंसर इंडिकस) के लिए सबसे बड़े शीतकालीन आश्रय स्थलों में से एक है। अंकसमुद्र पक्षी संरक्षण रिजर्व (कर्नाटक) अंक

हिन्दी वर्णमाला (Hindi Notes part - 02)

हिन्दी वर्णमाला (देवनागरी लिपि)

हिंदी शब्द फारसी ईरानी भाषा का शब्द है। भाषा - भाष् (संस्कृत) की धातु से उत्पन्न होकर बनी है, जिसका का अर्थ है. 'प्रकट करना' । हिंदी सहित सभी भाषाओं की जननी संस्कृत को माना जाता है.

भाषा का विकास 

1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई. पू.)
2. लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई. पू.)
3. पाली (500 ई.पू. से 1 ई.पू. - बौद्ध ग्रंथ )
4. प्राकृत (1 ई.पू. से 500 ई. - जैन ग्रंथ)
5. अपभ्रंश (शोरसैनी) (500 ई से 1000 ई.)
6. हिंदी (1000 ई. से वर्तमान समय में)

*1100 ई. को हिंदी भाषा का मानक समय माना जाता है



वर्णमाला

वर्ण क्या है? 

उच्चारित ध्वनियों को जब लिखकर बताना होता है तब उनके लिए कुछ लिखित चिन्ह बनाएं जाते हैं ध्वनियों को व्यक्त करने वाले ये लिपि - चिन्ह ही वर्ण कहलाते हैं। हिन्दी में इन वर्णों को 'अक्षर' कहा जाता है।

वर्णमाला

वर्णों की व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला में पहले 'स्वर वर्णों तथा बाद में व्यंजन वर्णों' की व्यवस्था है।

हिंदी लिपि के चिन्ह

अ आ इ ई उ ऊ ऋ 
ए ऐ ओ औ अं अः
क ख ग घ ङ 
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न 
प फ ब भ म
य र ल व श 
ष स ह
क्ष त्र ज्ञ 

*महत्वपूर्ण तथ्य 

  • देवनागरी लिपि का अंतिम चिन्ह ज्ञ
  • हिंदी वर्णमाला का अंतिम चिन्ह ह 
  • अर्थ के आधार पर भाषा की सबसे छोटी इकाई - शब्द
  • भाषा की सबसे छोटी इकाई - वर्ण 
  • भाषा की सार्थक इकाई - वाक्य
वाक्य - उपवाक्य - पदबंध - पद (शब्द) - अक्षर - ध्वनि या वर्ण
जैसे राम एक शब्द हैं, जिसमें 
2 अक्षर हैं रा और म ।
4 वर्ण हैं - र्, आ, म, अ

प्रत्येक भाषा में अनेक वर्ण होते हैं। यह वर्ण एक निश्चित समूह में होते हैं। वर्णों के ऐसे समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी में उच्चारण के आधार पर वर्णों की संख्या 44 (11 स्वर + 33 व्यंजन) है। किन्तु लेखन के आधार पर वर्णों की कुल संख्या 52 है । जिसमें शामिल हैं - 44 + 2 आयोगवाह + 2 आगत व्यंजन + 4 संयुक्त व्यंजन

वर्णों के भेद

उच्चारण एवं प्रयोग के आधार पर वर्णों के दो भेद होते हैं।

1. स्वर 
2. व्यंजन

[1] स्वर किसे कहते हैं 

जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी अन्य वर्ण या ध्वनि की सहायता से किया जाता है, उन्हें स्वर कहते हैं। इनकी संख्या 11 है -

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ

स्वरों के तीन भेद होते हैं -

(1) उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर
  • ह्रस्व / लघु / मूल / एकमात्रिक स्वर 
  • दीर्घ स्वर ( सजातीय और  विजातीय) 
  • प्लुप्त स्वर
  1. ह्रस्व स्वर - जिन स्वरों के उच्चारण में बहुत कम समय लगता है, उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं। इन्हें एकमात्रिक स्वर भी कहा जाता है। क्योंकि इनके उच्चारण में एक मात्रा का समय लगता है। इनकी संख्या चार (4) है - अ, इ, उ, ऋ। ह्रस्व स्वर को मूल स्वर या लघु स्वर भी कहा जाता है। 
  2. दीर्घ स्वर - जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से लगभग दुगना समय लगता है, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं इनकी संख्या सात (7) है - आ, ई, ऊ, ऐ, ऐ ओ, औ
  3. प्लुप्त स्वर - जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों की अपेक्षा तिगुना समय लगता है, उन्हें लुप्त स्वर कहते हैं। इन स्वरों का प्रयोग बहुत कम होता है। इनका प्रयोग प्राय: पुकारते समय किया जाता है; जैसे ओऽम्, राऽम् आदि।
(2) ओष्ठ आकृति के आधार पर 
  1. वृताकार स्वर - जिनके उच्चारण में होठ वृत्त के आकार के हो जाते हैं वृताकार स्वर कहलाते हैं। जैसे - उ, ऊ, ओ, औ 
  2. अवृताकार स्वर - जिनके उच्चारण में होंठ वृत्त के आकार के नहीं होते हैं। अवृताकार स्वर कहलाते हैं । जैसे - अ, आ, इ, ई, ॠ, ए, ऐ
(3) जिव्हा की क्रियाशीलता के आधार पर 
  1. अग्र स्वर - जिनके उच्चारण में जिव्हा का आगे का भाग क्रियाशील रहता है अग्र स्वर कहलाते हैं जैसे - इ, ई, ए, ऐ, ॠ
  2. मध्य स्वर - वे स्वर जिनके उच्चारण में जिव्हा समान अवस्था में रहती है। मध्य स्वर कहलाते हैं जैसे -
  3. पश्च स्वर - जिनके उच्चारण में जिव्हा का पिछला भाग क्रियाशील रहता है। पश्च स्वर कहलाते हैं। जैसे - उ, ऊ, ओ, औ
(4) मुखाकृति के आधार पर 
  1. संवृत स्वर - इस प्रकार के स्वरो में मुख वृत्त के समान बंद सा रहता है अर्थात मुख सबसे कम खुलता है जैसे - इ, ई, उ, ऊ, ॠ
  2. विवृत स्वर - इस प्रकार के स्वर में मुख सबसे अधिक खुलता है अर्थात वृत्त के समान खुलता है। जैसे -
  3. अर्धविवृत्त स्वर - इस प्रकार के स्वर में मुख्य विवृत के समान लगभग आधा खुलता है जैसे अ, ऐ, ओ
  4. अर्ध संवृत स्वर - जिनके उच्चारण में मुख संवृत स्वरों की तुलना में आधा बंद रहता है अर्थ सवृत स्वर कहलाते हैं। जैसे - ए, ओ
(5) नासिका के आधार पर 
  1. निरनुनासिक - जिनके उच्चारण में नासिका का प्रयोग नहीं किया जाता है अर्थात सिर्फ मुख से उच्चारित होने वाली ध्वनिया निरनुनासिक है । जैसे - सभी स्वर
  2. अनुनासिक स्वर - इस प्रकार के स्वर में उच्चारण मुख्य नाक दोनों से होता है जैसे - अँ आँ इँ ईं उँ ऊँ एँ ऐं ओं औं 
*अयोगवाह - हिंदी वर्णमाला में 11 स्वरों तथा 33 व्यंजनों के अतिरिक्त 2 अन्य वर्ण भी प्रयोग होते हैं जो ना तो स्वर हैं और ना ही व्यंजन हैं। यह अयोगवाह कहलाते हैं। यह ऐसे वर्ण होते हैं जिनमें अनुस्वार और विसर्ग लगा होता है जैसे - अं, अः 
  • अनुस्वार - इसका उच्चारण नाक से होता है तथा इसका चिन्ह (ं) वर्णो के ऊपर लगता है, जैसे - हंस, पतंग, गंध, गंगा, संसार, आरंभ, प्रियंका आदि।
  • अनुनासिक - इसका उच्चारण मुंँह और नाक दोनों से होता है तथा इसका चिन्ह (ँ) भी वर्णों के ऊपर लगता है; जैसे - आँख, गाँव, अँगूठा, पाँच, दाँत आदि।
  • विसर्ग - इसका उच्चारण 'ह्' के समान होता है तथा इसका चिन्ह ( : ) वर्णों के आगे लगता है; जैसे- प्रात:, दु:ख, अत:, छ:, आदि।

[2] व्यंजन किसे कहते हैं?

जिन वर्णों के उच्चारण स्वरों की सहायता से किया जाता है, उन्हें व्यंजन कहते हैं। इनकी संख्या तैंतीस (33) है-

क ख ग घ ङ

च छ ज झ ञ

ट ठ ड ढ ण

त थ द ध न

प फ ब भ म

य र ल व

श ष स ह

व्यंजनों के भेद

(क) स्पर्श व्यंजन 

जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय वायु कंठ, तालू, मूर्धा, दंत तथा ओष्ठ का स्पर्श करके मुख से बाहर आती हैं उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं। इनकी संख्या पच्चीस (25) है - क ख ग घ ङ च छ ष ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म 

वर्ग        

उच्चारण स्थान 

 व्यंजन

नाम

क  वर्ग   

  कंठ 

क ख ग घ ङ

कंठ्य 

 च वर्ग    

        तालु 

च छ ज झ ञ

    तालव्य

 ट  वर्ग    

        मूर्धा

 ट ठ ड ढ ण 

  मूर्धन्य

 त वर्ग   

        दंत

 त थ द ध न

दंत्य 

 प वर्ग   

      ओष्ठ

 प फ ब भ म

   ओष्ठ्य


  • स्पर्शी व्यंजन :- इनकी संख्या 16 है। जो इस प्रकार हैं - क ख ग घ ट ठ ड ढ त थ द ध प फ ब भ 
  • स्पर्श संघर्षी व्यंजन :- च वर्ग के चार वर्णों को स्पर्श संघर्षी व्यंजन कहा जाता है जैसे - च छ ज झ
  • पंचम अक्षर/नासिक्य व्यंजन - वे व्यंजन जिनके उच्चारण में नासिका का प्रयोग किया जाता है नासिक्य व्यंजन कहलाते हैं इन्हें पंचम वर्ण भी कहा जाता है जैसे - ङ ञ ण न म
  • उत्क्षिप्त व्यंजन - वे व्यंजन जिनके उच्चारण में जिव्हा ऐसा महसूस कराती है जैसे इन्हें फेंक रही हो इन व्यंजनों को ताङनजात द्विगुण द्विपृष्ठ भी कहा जाता है। जैसे - ड़ ढ़
(ख) अंत:स्थ व्यंजन - 

जिन व्यंजनों का उच्चारण स्वरों और व्यंजनों के मध्य होता है, उन्हें अंत:स्थ व्यंजन कहते हैं। 
इनकी संख्या चार (4) है - य, र, ल, व

(ग) ऊष्म व्यंजन - 

जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय वायु मुख में टकराकर ऊष्मा उत्पन्न करती है, उन्हें ऊष्म व्यंजन कहते हैं। इनकी संख्या भी चार (4) है - श, ष, स, ह । संघर्ष के कारण वायु गर्म हो जाती है  जिस कारण इन व्यंजनों को संघर्षी व्यंजन भी कहा जाता है।
  • प्रकंपित या लुंठित व्यंजन - वे व्यंजन जिनके उच्चारण में जिव्हा दो से तीन बार कंपन करती है उन्हें प्रकम्पित व्यंजन कहा जाता है । जैसे -
  • पाश्विक व्यंजन - जिनके उच्चारण में जिव्हा ह मसूड़े को छुती है और हवा का प्रमुख वेग जिव्हा के आसपास से निकल जाता है पाश्विक व्यंजन कहलाते हैं जैसे -
  • संघर्षहीन व्यंजन - जिनके उच्चारण में संघर्ष नहीं होता है वह संघर्ष हीन व्यंजन कहलाते हैं इन्हें अर्ध स्वर भी कहा जाता है। जैसे - य, व
इन व्यंजनों के अतिरिक्त कुछ और भी व्यंजन हैं किन्तु ये स्वतंत्र व्यंजन नहीं हैं बल्कि अन्य व्यंजनों से मिलकर बने हैं। ये दो प्रकार के माने गए हैं -

(1) संयुक्त व्यंजन 
(2) द्वित्व व्यंजन

1. संयुक्त व्यंजन - दो भिन्न व्यंजनों के मेल से वाले व्यंजन संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं। इनकी संख्या चार (4) है -

क् + ष = क्ष - क्षति, क्षत्रिय, क्षमा

ज् + ञ = ज्ञ - ज्ञान, ज्ञानी, यज्ञ

त् + र = त्र - पत्र, इत्र, त्रिशूल

श् + र = श्र - श्रवण, श्रम श्रद्धा

2. द्वित्व व्यंजन - दो समान या एक जैसे व्यंजनों के संयोग से बनने वाले व्यंजन द्वित्व व्यंजन कहलाते हैं; जैसे -

क् + क = क्क - शक्कर, चक्की, मक्का

च् + च = च्च - सच्चाई, बच्चा, कच्चा 

ग् + ग = ग्ग - बुग्गी, झुग्गी, दिग्गज

म् + म = म्म - चम्मच, सम्मान, निकम्मा 

आगत ध्वनियांँ

हिंदी भाषा में कुछ ध्वनियां विदेशी भाषाओं से भी आई हैं। ऐसी ध्वनियों को आगत ध्वनियांँ कहते हैं; जैसे - 

आॕ - इस ध्वनि का प्रयोग अंग्रेजी के शब्दों के ठीक उच्चारण के लिए किया जाता है। इसका चिन्ह अर्धचंद्राकार (ॕ) है; जैसे - 
डाॅक्टर, प्राॅक्टर, बाॕॅल, हाॅल आदि।

ज़ - इस ध्वनि का प्रयोग उर्दू, फ़ारसी, तुर्की आदि शब्दों में किया जाता है; जैसे - ज़ब्त, ज़मीन, मज़हब, ज़बानी आदि।

फ़ - इस ध्वनि का प्रयोग भी उर्दू, फ़ारसी, तुर्की आदि शब्दों में किया जाता है; जैसे - फ़न, फ़तह, फ़ना, फ़रिश्ता आदि ।

विकसित व्यंजन - 'ङ' तथा 'ढ़' वर्ण 'ड' तथा 'ढ' के विकसित रूप हैं, इसलिए इन्हें विकसित व्यंजन कहते हैं। इनका प्रयोग शब्द के मध्य या अंत में होता है, जैसे - बड़ा, सड़क, गढ़, चढ़ाई आदि।

'र' का संयोग

हिंदी वर्णमाला में 'र' एक ऐसा वर्ण है जिसका अन्य व्यंजनों के साथ संयोग होने पर उसका रूप भिन्न हो जाता है। 'र' के संयोग के कुछ नियम निम्नलिखित हैं -

1. यदि 'र्' ( स्वर रहित) के बाद कोई व्यंजन आता है, तो यह उस व्यंजन के ऊपर रेफ (॑) के रूप में लगता है; जैसे -

र् + म = र्म (धर्म, शर्म)

र् + द = र्द (मर्द, दर्द)

र् + च = र्च (चर्च, खर्च)

र् + व = व (पूर्व, गर्व )

2. यदि 'र' से पहले कोई 'अ' रहित व्यंजन आता है, तो यह उसके साथ पदेन (,) के रुप में लगता है; जैसे -

क् + र = क्र (क्रम, क्रय) 

प् + र = प्र (प्रयास, प्रतिज्ञा)

म् + र = म् (नम्र, आम्र)

ग् + र = ग्र ( ग्रह, ग्रहण )

3. जब 'र' से पहले स्वर रहित 'ट्' या 'ड्' आता है, तो यह उनके नीचे पदेन (^) के रूप में लगता है; जैसे -

ट् + र = ट्र (ट्रक, ट्रेन)

ड् + र = ड्र ( ड्रम, ड्रामा)

वर्ण विच्छेद किसे कहते हैं 

किसी शब्द में प्रयुक्त वर्णों को अलग-अलग करके लिखने की प्रक्रिया वर्ण- विच्छेद कहलाती है; जैसे - 

रोहन = र् + ओ + ह् + अ + न् + अ

नवनीत = न् + अ + व् + अ + न् + ई + त + अ

परिश्रम = प् + अ + र् + इ + श् + र् + अ + म् + अ 

शब्द - विचार

हमें अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए सब शब्दों का प्रयोग करते हैं। शब्दों की रचना वर्णों के मेल से होती है तथा प्रत्येक शब्द का अपना एक निश्चित अर्थ होता है;जैसे -

त् + ओ + त् + आ = तोता 

ग् + उ + ल् + आ + ब् + अ = गुलाब

म् + अ + छ् + अ + ल् + ई = मछली

स्वरतंत्रयों कंपन के आधार पर वर्ण 
  • अघोष वर्ण - जिन वर्णों में गूंज या कंपन नहीं होता है वह वर्ण अघोष वर्ण कहलाते हैं । प्रत्येक वर्ग का पहला और दूसरा वर्ण क ख च छ ट ठ त थ प फ श ष स (13)
  • सघोष वर्ण - जिनके उच्चारण में गूंज या कंपन होता है सघोष वर्ण कहलाते हैं प्रत्येक वर्ग का तीसरा चौथा और पांचवा वर्ण ( ग घ ङ ज झ ञ ड ढ ण द ध न ब भ म य र ल व ह और सभी स्वर )
प्राण वायु और श्वास के आधार पर
  • अल्पप्राण – जिनके उच्चारण में मुख विवर से कम मात्रा में वायु बाहर निकलती है। अल्पप्राण कहलाते हैं। प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा, पांचवा वर्ण को अल्पप्राण कहा जाता है ( क ग ङ च ज ञ ट ड ण त द न प ब म य र ल व और सभी स्वर )
  • महाप्राण - जिनके उच्चारण में मुख्य विवर से ज्यादा मात्रा में वायु बाहर निकलती है महाप्राण वर्ण कहलाते हैं प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा वर्ण (ख घ छ झ ठ ढ थ ध फ भ) इसके अलावा श ष स ह को भी महाप्राण कहा जाता है।
उच्चारण स्थान के आधार पर 

1. कंठ्य वर्ग - अकुहविसर्जियांकंठ (अ आ क वर्ग ओर ह)
2. तालुवर्ग - इचुयशानांतालु (इ ई च वर्ग य ओर श)
3. मूर्धा - ऋटूरषाणांममूर्धा (ऋ ट वर्ग र और ष)
4. दन्त - तुलसानीदन्तस्य (त वर्ग ल और स)
5. ओष्ठ - उपूपध्यमानीयानांओष्ठ (उ ऊ प वर्ग)  
6. नासिक्य - (ङ ञ ण न म)
7. वत्स्र्य (मसूड़ा) - (र न ल स ज)
8. एदैतोकंठतालु - (कंठ + तालु : ए ऐ)
9. ओदोतौकंठोष्ठ - (कंठ + ओष्ठ ओ औ)
10. वकारस्य दन्तोष्ठ - (व दन्त + ओष्ठ)
11. काकल्य / अलिजिह्वा - (ह)

 Related posts :- 





टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व एवं स्वतंत्रता सेनानी

उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व उत्तराखंड की सभी परीक्षाओं हेतु उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व एवं स्वतंत्रता सेनानियों का वर्णन 2 भागों में विभाजित करके किया गया है । क्योंकि उत्तराखंड की सभी परीक्षाओं में 3 से 5 मार्क्स का उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान अवश्य ही पूछा जाता है। अतः लेख को पूरा अवश्य पढ़ें। दोनों भागों का अध्ययन करने के पश्चात् शार्ट नोट्स पीडीएफ एवं प्रश्नोत्तरी पीडीएफ भी जरूर करें। भाग -01 उत्तराखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी [1] कालू महरा (1831-1906 ई.) कुमाऊं का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) "उत्तराखंड का प्रथम स्वतंत्रा सेनानी" कालू महरा को कहा जाता है। इनका जन्म सन् 1831 में चंपावत के बिसुंग गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम रतिभान सिंह था। कालू महरा ने अवध के नबाब वाजिद अली शाह के कहने पर 1857 की क्रांति के समय "क्रांतिवीर नामक गुप्त संगठन" बनाया था। इस संगठन ने लोहाघाट में अंग्रेजी सैनिक बैरकों पर आग लगा दी. जिससे कुमाऊं में अव्यवस्था व अशांति का माहौल बन गया।  प्रथम स्वतंत्रता संग्राम -1857 के समय कुमाऊं का कमिश्नर हेनरी रैम्

चंद राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास

चंद राजवंश का इतिहास पृष्ठभूमि उत्तराखंड में कुणिंद और परमार वंश के बाद सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजवंश है।  चंद वंश की स्थापना सोमचंद ने 1025 ईसवी के आसपास की थी। वैसे तो तिथियां अभी तक विवादित हैं। लेकिन कत्यूरी वंश के समय आदि गुरु शंकराचार्य  का उत्तराखंड में आगमन हुआ और उसके बाद कन्नौज में महमूद गजनवी के आक्रमण से ज्ञात होता है कि तो लगभग 1025 ईसवी में सोमचंद ने चंपावत में चंद वंश की स्थापना की है। विभिन्न इतिहासकारों ने विभिन्न मत दिए हैं। सवाल यह है कि किसे सच माना जाए ? उत्तराखंड के इतिहास में अजय रावत जी के द्वारा उत्तराखंड की सभी पुस्तकों का विश्लेषण किया गया है। उनके द्वारा दिए गए निष्कर्ष के आधार पर यह कहा जा सकता है । उपयुक्त दिए गए सभी नोट्स प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से सर्वोत्तम उचित है। चंद राजवंश का इतिहास चंद्रवंशी सोमचंद ने उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में लगभग 900 वर्षों तक शासन किया है । जिसमें 60 से अधिक राजाओं का वर्णन है । अब यदि आप सभी राजाओं का अध्ययन करते हैं तो मुमकिन नहीं है कि सभी को याद कर सकें । और अधिकांश राजा ऐसे हैं । जिनका केवल नाम पता है । उनक

परमार वंश - उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

उत्तराखंड का इतिहास History of Uttarakhand भाग -1 परमार वंश का इतिहास उत्तराखंड में सर्वाधिक विवादित और मतभेद पूर्ण रहा है। जो परमार वंश के इतिहास को कठिन बनाता है परंतु विभिन्न इतिहासकारों की पुस्तकों का गहन विश्लेषण करके तथा पुस्तक उत्तराखंड का राजनैतिक इतिहास (अजय रावत) को मुख्य आधार मानकर परमार वंश के संपूर्ण नोट्स प्रस्तुत लेख में तैयार किए गए हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में 688 ईसवी से 1947 ईसवी तक शासकों ने शासन किया है (बैकेट के अनुसार)।  गढ़वाल में परमार वंश का शासन सबसे अधिक रहा।   जिसमें लगभग 12 शासकों का अध्ययन विस्तारपूर्वक दो भागों में विभाजित करके करेंगे और अंत में लेख से संबंधित प्रश्नों का भी अध्ययन करेंगे। परमार वंश (गढ़वाल मंडल) (भाग -1) छठी सदी में हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात संपूर्ण उत्तर भारत में भारी उथल-पुथल हुई । देश में कहीं भी कोई बड़ी महाशक्ति नहीं बची थी । जो सभी प्रांतों पर नियंत्रण स्थापित कर सके। बड़े-बड़े जनपदों के साथ छोटे-छोटे प्रांत भी स्वतंत्रता की घोषणा करने लगे। कन्नौज से सुदूर उत्तर में स्थित उत्तराखंड की पहाड़ियों में भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्

उत्तराखंड में भूमि बंदोबस्त का इतिहास

  भूमि बंदोबस्त व्यवस्था         उत्तराखंड का इतिहास भूमि बंदोबस्त आवश्यकता क्यों ? जब देश में उद्योगों का विकास नहीं हुआ था तो समस्त अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। उस समय राजा को सर्वाधिक कर की प्राप्ति कृषि से होती थी। अतः भू राजस्व आय प्राप्त करने के लिए भूमि बंदोबस्त व्यवस्था लागू की जाती थी । दरअसल जब भी कोई राजवंश का अंत होता है तब एक नया राजवंश नयी बंदोबस्ती लाता है।  हालांकि ब्रिटिश शासन से पहले सभी शासकों ने मनुस्मृति में उल्लेखित भूमि बंदोबस्त व्यवस्था का प्रयोग किया था । ब्रिटिश काल के प्रारंभिक समय में पहला भूमि बंदोबस्त 1815 में लाया गया। तब से लेकर अब तक कुल 12 भूमि बंदोबस्त उत्तराखंड में हो चुके हैं। हालांकि गोरखाओ द्वारा सन 1812 में भी भूमि बंदोबस्त का कार्य किया गया था। लेकिन गोरखाओं द्वारा लागू बन्दोबस्त को अंग्रेजों ने स्वीकार नहीं किया। ब्रिटिश काल में भूमि को कुमाऊं में थात कहा जाता था। और कृषक को थातवान कहा जाता था। जहां पूरे भारत में स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी बंदोबस्त और महालवाड़ी बंदोबस्त व्यवस्था लागू थी। वही ब्रिटिश अधिकारियों ने कुमाऊं के भू-राजनैतिक महत्

उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न (उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14)

उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14 उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां वर्ष 1965 में केंद्र सरकार ने जनजातियों की पहचान के लिए लोकर समिति का गठन किया। लोकर समिति की सिफारिश पर 1967 में उत्तराखंड की 5 जनजातियों थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा, और राजी को एसटी (ST) का दर्जा मिला । राज्य की मात्र 2 जनजातियों को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है । सर्वप्रथम राज्य की राजी जनजाति को आदिम जनजाति का दर्जा मिला। बोक्सा जनजाति को 1981 में आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ था । राज्य में सर्वाधिक आबादी थारू जनजाति तथा सबसे कम आबादी राज्यों की रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल एसटी आबादी 2,91,903 है। जुलाई 2001 से राज्य सेवाओं में अनुसूचित जन जातियों को 4% आरक्षण प्राप्त है। उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न विशेष सूचना :- लेख में दिए गए अधिकांश प्रश्न समूह-ग की पुरानी परीक्षाओं में पूछे गए हैं। और कुछ प्रश्न वर्तमान परीक्षाओं को देखते हुए उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित 25+ प्रश्न तैयार किए गए हैं। जो आगामी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। बता दें की उत्तराखंड के 40 प्रश्नों में से 2

कत्यूरी राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

 कत्यूरी राजवंश का इतिहास भाग -1 अमोघभूति कुणिद वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। कुणिद वंश उत्तराखंड में लगभग तीसरी- चौथी शताब्दी की पहली राजनीतिक शक्ति थी । जबकि कत्यूर राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला पहला ऐतिहासिक शक्तिशाली राजवंश था। इसे कार्तिकेयपुर वंश के नाम से भी जाना जाता है। 'कत्यूरी' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग एटकिंसन ने किया था।  कत्यूरी राजवंश के संस्थापक बसंत देव थे । जिन्हें बासुदेव के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी। पांडुकेश्वर ताम्रलेख में पाए गए कत्यूरी राजा ललितशूर के अनुसार कत्यूरी शासकों की प्राचीनतम राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी । बाद में नरसिंह देव ने जोशीमठ से बैजनाथ (बागेश्वर ) में राजधानी स्थानांतरित कर दी । जहां से कत्यूरी राजवंश को विशिष्ट पहचान मिली । कत्यूरी राजवंश का उदय कुणिंदों के पतन के पश्चात देवभूमि उत्तराखंड की भूमि पर कुछ नए राजवंशों का उदय हुआ। जैसे गोविषाण, कालसी लाखामंडल आदि जबकि कुछ स्थानों पर कुणिंद भी शासन करते रहे। कुणिंदो के बाद शक, कुषाण और यौधेय  वंश के शासकों ने कुछ क्षेत्रों पर शासन व्यवस्था स्थ

गोरखा शासन : उत्तराखंड का इतिहास

    उत्तराखंड का इतिहास           गोरखा शासन (भाग -1) पृष्ठभूमि मल्ल महाजनपद का इतिहास (आधुनिक नेपाल) 600 ईसा पूर्व जब 16 महाजनपदों का उदय हुआ। उन्हीं में से एक महाजनपद था - मल्ल (आधुनिक नेपाल का क्षेत्र)। प्राचीन समय में नेपाल भारत का ही हिस्सा था। मल्ल महाजनपद का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ के " अगुंत्तर निकाय " में किया गया है। और जैन ग्रंथ के भगवती सूत्र में इसका नाम " मौलि या मालि " नाम से जनपद का उल्लेख है। मल्ल महाजनपद की प्रथम राजधानी कुशीनगर थी । कुशीनगर में गौतम बुद्ध के निर्वाण (मृत्यु) प्राप्त करने के बाद उनकी अस्थि-अवशेषों का एक भाग मल्लो को मिला था । जिसके संस्मारणार्थ उन्होंने कुशीनगर में एक स्तूप या चैत्य का निर्माण किया था। मल्ल की वित्तीय राजधानी पावा थी । पावा में ही महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था ।                 322 ईसा पूर्व समस्त उत्तर भारत में मौर्य साम्राज्य ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। मल्ल महाजनपद भी मौर्यों के अधीन आ गया था। गुप्त वंश के बाद उत्तर भारत की केंद्र शक्ति कमजोर हो गई । जिसके बाद  लगभग 5वीं सदीं में वैशाली से आए 'लिच्