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पर्वतों के निर्माण (Geography Notes - part 06)

पर्वतों के निर्माण  प्रस्तावना "पर्वत हमारी पृथ्वी की सबसे भव्य और प्रभावशाली संरचनाओं में से एक हैं। ये न केवल हमारे भूगोल को तय करते हैं, बल्कि मौसम से लेकर हमारी नदियों तक सब कुछ बदलते हैं। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे की कहानी उतनी ही जटिल और दिलचस्प है। इस अध्याय में हम बेहद आसान भाषा में समझेंगे कि प्लेटों के टकराने, ज़मीन के फटने और ज्वालामुखी के विस्फोट से इन पर्वतों का जन्म कैसे होता है।" पर्वतों के निर्माण पर्वतों के निर्माण का मुख्य आधार टेक्टोनिक प्लेटों की गति है। हमारी पृथ्वी का सबसे ऊपरी हिस्सा (स्थलमंडल) कई टुकड़ों में टूटा हुआ है जिन्हें 'टेक्टोनिक प्लेट्स' कहते हैं। ये प्लेटें मेंटल की अर्ध-तरल परत (एस्थेनोस्फीयर) पर बहुत धीमी गति (सालाना 1 से 10 सेमी) से खिसकती रहती हैं। जब ये प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, दूर जाती हैं या आपस में रगड़ खाती हैं, तो पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) पर भीषण तनाव और दबाव बनता है। इसी हलचल के कारण ज़मीन का हिस्सा या तो ऊपर उठ जाता है या फिर ज्वालामुखी के मैग्मा के जमाव से पहाड़ का रूप ले लेता है। पर्वतों के मुख्य प्रकार पर्...

पृथ्वी की आंतरिक संरचना (Part - 05)

पृथ्वी की आंतरिक संरचना 

"नमस्कार साथियों/छात्रों,  आज के इस लेख में हम पृथ्वी की आंतरिक संरचना पढ़ने वाले हैं। यह अध्याय परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है प्रत्येक परीक्षा में 2-3 प्रश्न यहां से अवश्य पूछे जाते हैं। देवभूमि उत्तराखंड द्वारा यह प्रयास किया गया है कि सभी तथ्यों को आसान भाषा में परिभाषित किया जा सके। इस लेख में दिए गए सभी तथ्य 6-12 तक की एनसीईआरटी पुस्तक और माजिद हुसैन की भूगोल से लिए गए हैं। 

प्रस्तावना,

जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, उसके बाहरी रूप—जैसे ऊंचे पर्वत, गहरी नदियाँ, विशाल महासागर और हरे-भरे मैदानों से तो हम भली-भांति परिचित हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस ठोस जमीन पर हम खड़े हैं, उसके हजारों किलोमीटर नीचे पैर पसारकर बैठी दुनिया कैसी दिखती होगी?

जैसे एक पके हुए आम का सबसे बाहरी हिस्सा उसका पतला छिलका होता है, बीच में उसका रसदार गूदा और सबसे अंदर एक ठोस गुठली होती है; या जैसे एक उबले हुए अंडे में सबसे बाहर एक पतला सफेद छिलका, फिर सफेद भाग और केंद्र में पीला भाग (Yolk) होता है—ठीक वैसे ही हमारी पृथ्वी भी परतों में बंटी हुई है।

भले ही हम आज चांद और मंगल तक पहुंच चुके हैं, लेकिन इंसान आज तक पृथ्वी के भीतर सिर्फ कुछ किलोमीटर (लगभग 12 किमी) तक ही ड्रिल कर पाया है। ऐसे में, पृथ्वी के केंद्र—जो लगभग (6371 किमी} गहरा है—वहां क्या है, यह जानना विज्ञान के लिए एक रोमांचक रहस्य रहा है। भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves) और ज्वालामुखियों से मिले सुरागों की मदद से वैज्ञानिकों ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है।

आज हम इसी अद्भुत रहस्यमयी सफर पर चलेंगे और जानेंगे कि पृथ्वी की तीन मुख्य परतें—भूपर्पटी (Crust), जिस पर हम रहते हैं; मेंटल (Mantle), जहां पिघला हुआ मैग्मा उबल रहा है; और कोर (Core), जो सूरज की सतह जितना गर्म होने के बावजूद लोहे की तरह ठोस है—कैसे काम करती हैं और कैसे ये हमारी धरती को जीवंत बनाए रखती हैं। 
तो आइए, पृथ्वी के केंद्र की इस रोमांचक यात्रा को शुरू करते हैं!"

पृथ्वी की आंतरिक संरचना

पृथ्वी की आंतरिक संरचना को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जाता है: 
  1. भूपर्पटी (Crust)
  2. मेंटल (Mantle)
  3. कोर (Core)


1. भूपर्पटी (Crust)

यह पृथ्वी की सबसे ऊपरी और सबसे पतली ठोस परत है, जिस पर हम रहते हैं। यह महासागरों के नीचे पतली (लगभग 5 किमी) और महाद्वीपों (ज़मीन) के नीचे मोटी (लगभग 30 से 50 किमी तक) होती है। हिमालय जैसी पर्वत श्रृंखलाओं के नीचे इसकी मोटाई 70 किमी तक हो सकती है।

इसमें दो प्रकार की क्रस्ट होती हैं:

1. महाद्वीपीय परत

  • इसे सियोल (SIAL) कहा जाता है, क्योंकि यह मुख्य रूप से सिलिका (Silica) और एल्युमिनियम (Aluminium) से बनी है।
  • यह ग्रेनाइट (Granite) जैसी चट्टानों से बनी होती है और औसतन 30-50 किमी मोटी होती है।

2. महासागरीय परत :

  • इसे सिमा (SIMA) कहते हैं, जो सिलिका (Silica) और मैग्नीशियम (Magnesium) से बनी है और यह बेसाल्ट चट्टानों से निर्मित है।
  • यह बेसाल्ट (Basalt) जैसी भारी चट्टानों से बनी होती है और औसतन 5-10 किमी मोटी होती है।
पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) में द्रव्यमान (Mass) के प्रतिशत के रूप में सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला तत्व ऑक्सीजन है, जो कुल क्रस्ट के द्रव्यमान का लगभग 46.6% हिस्सा बनाता है।

क्रस्ट में पाए जाने वाले शीर्ष चार तत्वों का क्रम इस प्रकार है:
  1. ऑक्सीजन (Oxygen): ~46.6%
  2. सिलिकॉन (Silicon): ~27.7%
  3. एल्युमिनियम (Aluminium): ~8.1%
  4. लोहा (Iron): ~5.0%

पृथ्वी की सतह से नीचे आंतरिक भाग (क्रस्ट) की ओर जाने पर सामान्यतः प्रति 32 मीटर की गहराई पर तापमान 1° बढ़ जाता है। हालांकि, यह वृद्धि दर हमेशा एक समान नहीं रहती। जैसे-जैसे हम और अधिक गहराई (मेंटल और कोर) में जाते हैं, तापमान बढ़ने की यह दर (Temperature Gradient) कम होती जाती है, लेकिन कुल तापमान लगातार बढ़ता रहता है और केंद्र तक पहुँचते-पहुँचते यह लगभग 5000° से 6000° तक पहुँच जाता है।


  • भूपर्पटी का औसत घनत्व : इसका औसत घनत्व 2.7 से 3.0 g/cm³ है। महाद्वीपीय क्रस्ट का घनत्व महासागरीय क्रस्ट से कम होता है, जिसके कारण महाद्वीप महासागरीय क्रस्ट के ऊपर तैरते हैं। क्रस्ट टेक्टोनिक प्लेटों का ऊपरी हिस्सा बनाती है। 
  • पृथ्वी का औसत घनत्व : पूरी पृथ्वी का औसत घनत्व 5.51 g/cm³ है, जो सौरमंडल के सभी ग्रहों में सबसे अधिक है।

2. मेंटल (Mantle)

भूपर्पटी के नीचे की परत को मेंटल कहा जाता है। यह मोहरोविकिक असंबद्धता (Moho Discontinuity) से शुरू होकर 2,900 किमी की गहराई तक फैली है। 

इसे दो भागों में बांटा गया है:

1. ऊपरी मेंटल (Upper Mantle) :

  • यह लगभग 400 किमी तक फैला है। इसका ऊपरी हिस्सा (लगभग 100-200 किमी) कमजोर और अर्ध-तरल अवस्था में होता है, जिसे एस्थेनोस्फीयर (Asthenosphere) या दुर्बलता मंडल कहते हैं।
  • यह टेक्टोनिक प्लेटों के खिसकने में मदद करता है।
  • ज्वालामुखी विस्फोट के समय मैग्मा यहीं से बाहर आता है।

2. निचला मेंटल (Lower Mantle): 

  • यह ठोस अवस्था में होता है और 400 किमी से 2,900 किमी तक फैला है।
  • यह मुख्य रूप से सिलिकेट चट्टानों, मैग्नीशियम और लोहे से समृद्ध है। यह पृथ्वी का सबसे विशाल हिस्सा है, जो पृथ्वी के कुल आयतन का लगभग 84% और द्रव्यमान (Mass) का 67% हिस्सा घेरता है।

3. कोर (Core / क्रोड)

यह पृथ्वी का सबसे आंतरिक और केंद्रीय भाग है, जो 2,900 किमी से लेकर पृथ्वी के केंद्र (6,371 किमी) तक फैला है। इसे निफे (NIFE) भी कहते हैं क्योंकि यह मुख्य रूप से निकेल (Nickel) और लोहे (Ferrum/Iron) से बना है। इसे दो हिस्सों में विभाजित किया गया है:

1. बाहरी कोर (Outer Core):

  • गहराई : 2,900 किमी से 5,150 किमी तक।
  • अत्यधिक तापमान के कारण यह तरल (Liquid) अवस्था में है।
  • इस तरल लोहे के प्रवाह और पृथ्वी के घूमने के कारण यहाँ विद्युत धाराएं पैदा होती हैं, जिससे पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) बनता है।

2. आंतरिक कोर (Inner Core):

  • गहराई: 5,150 किमी से 6,371 किमी (पृथ्वी का केंद्र) तक।
  • यहाँ तापमान सबसे अधिक (लगभग 5000°C से 6000°C) होता है, लेकिन अत्यधिक ऊपर के दबाव (Pressure) के कारण यह हिस्सा ठोस (Solid) अवस्था में रहता है।

असंबद्धताएं (संक्रमण क्षेत्र - Discontinuity) 

माजिद हुसैन की पुस्तक में इन परतों के बीच पाई जाने वाली विभिन्न असंबद्धताओं (संक्रमण क्षेत्रों) का विस्तृत विवरण है, जहाँ भूकंपीय तरंगों की गति में अचानक परिवर्तन आता है:
  1. कॉनराड (Conrad) असंबद्धता : ऊपरी क्रस्ट और निचले क्रस्ट के बीच।
  2. मोहो (Mohorovicic) असंबद्धता : निचले क्रस्ट और ऊपरी मैंटल के बीच।
  3. रेपेटी (Repetti) असंबद्धता : ऊपरी मैंटल और निचले मैंटल के बीच।
  4. गुटेनबर्ग (Gutenberg) असंबद्धता : निचले मैंटल और बाहरी कोर के बीच।
  5. लेहमैन (Lehmann) असंबद्धता : बाहरी कोर और आंतरिक कोर के बीच।
स्थलमंडल (Lithosphere): 
इसमें पूरा क्रस्ट (Crust) और ऊपरी मैंटल का सबसे ऊपरी ठोस हिस्सा शामिल होता है। इसकी मोटाई 10 किमी से 200 किमी के बीच पाई जाती है। (यही वो परत है जो टेक्टोनिक प्लेट्स के रूप में टूटी हुई है)।

दुर्बलता मंडल (Asthenosphere):
यह ऊपरी मैंटल का ही हिस्सा है जो थोड़ा पिघला हुआ (Semi-fluid) है। यह स्थलमंडल के ठीक नीचे 400 किमी की गहराई तक फैला हुआ है। यानी इसकी अपनी मोटाई लगभग 200 से 300 किमी होती है।

टेक्टोनिक प्लेट्स क्या हैं और ये कैसे काम करती हैं?

हमारी पृथ्वी की ऊपरी संरचना वैसी नहीं है जैसी ऊपर से दिखाई देती है। इसे गहराई से समझने के लिए तीन मुख्य बातों को जानना ज़रूरी है:

प्लेटों की परिभाषा : हमारी पृथ्वी की सबसे ऊपरी ठोस परत को क्रस्ट (भूपर्पटी) कहा जाता है। इस क्रस्ट और उसके ठीक नीचे मौजूद ऊपरी मेंटल के ठोस हिस्से को मिलाकर स्थलमंडल (Lithosphere) बनता है। यह स्थलमंडल एक अखंड या एक ठोस टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह कई बड़े और छोटे टुकड़ों में टूटा हुआ है। इन्हीं गतिशील टुकड़ों को टेक्टोनिक प्लेट्स कहा जाता है।

एस्थेनोस्फीयर (दुर्बलता मंडल) पर तैरना : स्थलमंडल के ठीक नीचे मेंटल की एक परत होती है जिसे एस्थेनोस्फीयर कहते हैं। अत्यधिक तापमान के कारण यह परत पूरी तरह ठोस नहीं होती, बल्कि अर्ध-तरल या प्लास्टिक जैसी अवस्था में होती है। टेक्टोनिक प्लेटें इसी तैरती हुई परत के ऊपर टिकी हुई हैं। चूंकि नीचे का आधार स्थिर नहीं है, इसलिए ये प्लेटें भी बहुत धीमी गति से (सालाना लगभग 1 से 10 सेंटीमीटर) अलग-अलग दिशाओं में खिसकती रहती हैं।

संवहन धाराएं (Convection Currents): प्लेटों के खिसकने के पीछे असली ताकत पृथ्वी के कोर (आंतरिक भाग) की भीषण गर्मी है। इस अत्यधिक गर्मी के कारण मेंटल में मौजूद पिघला हुआ मैग्मा ऊपर की ओर उठता है। ऊपर आकर जब यह थोड़ा ठंडा होता है, तो यह किनारों की तरफ फैलता है और फिर नीचे बैठ जाता है। मैग्मा के ऊपर उठने, फैलने और नीचे बैठने के इस चक्र को 'संवहन धाराएं' कहते हैं। यह बिल्कुल वैसे ही काम करता है जैसे उबलते हुए पानी में नीचे का गर्म पानी ऊपर आता है। यही धाराएं अपने ऊपर टिकी प्लेटों को धक्का देती हैं और उनमें गति पैदा करती हैं।

पृथ्वी की मुख्य टेक्टोनिक प्लेटें

पूरी पृथ्वी पर ऐसी कई छोटी-बड़ी प्लेटें हैं, लेकिन भूवैज्ञानिकों ने इन्हें मुख्य रूप से 7 बड़ी (Major) प्लेटों में वर्गीकृत किया है, जो पूरी दुनिया के महाद्वीपों और महासागरों का आधार हैं:
  1. प्रशांत महासागरीय प्लेट (Pacific Plate): यह पूरी तरह से महासागरीय क्रस्ट से बनी सबसे बड़ी प्लेट है। इसके किनारे अत्यधिक सक्रिय हैं, जिसे 'रिंग ऑफ फायर' भी कहा जाता है।
  2. उत्तर अमेरिकी प्लेट (North American Plate): इसमें पूरा उत्तरी अमेरिका और अटलांटिक महासागर का एक हिस्सा शामिल है।
  3. दक्षिण अमेरिकी प्लेट (South American Plate): इसमें पूरा दक्षिणी अमेरिका और अटलांटिक महासागर का पश्चिमी हिस्सा आता है।
  4. यूरेशियाई प्लेट (Eurasian Plate): इसमें यूरोप और एशिया महाद्वीप का अधिकांश भाग (भारतीय उपमहाद्वीप को छोड़कर) शामिल है।
  5. अफ़्रीकी प्लेट (African Plate): इसमें पूरा अफ्रीका महाद्वीप और उसके आसपास का महासागरीय क्षेत्र शामिल है।
  6. इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट (Indo-Australian Plate): इसमें भारत, ऑस्ट्रेलिया और आसपास का हिंद महासागर का क्षेत्र शामिल है। यह प्लेट उत्तर की ओर बढ़ रही है।
  7. अंटार्कटिक प्लेट (Antarctic Plate): यह पृथ्वी के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित है, जिसमें पूरा अंटार्कटिका महाद्वीप शामिल है।


परीक्षा के लिए कुछ अन्य महत्वपूर्ण लघु (Minor) प्लेटें:
  • नाज़का प्लेट (Nazca Plate): यह दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट और प्रशांत प्लेट के बीच स्थित है।
  • जुआन डी फूका प्लेट (Juan de Fuca Plate): यह उत्तर अमेरिकी प्लेट के उत्तर-पश्चिम में स्थित है।
  • कैरेबियन प्लेट (Caribbean Plate): यह मध्य अमेरिका और उत्तर-दक्षिण अमेरिका के बीच कैरेबियन सागर वाले क्षेत्र में स्थित है।
  • अरेबियन प्लेट (Arabian Plate): इसमें मुख्य रूप से सऊदी अरब का भूभाग आता है।
  • फिलीपीन प्लेट (Philippine Plate): यह एशिया महाद्वीप और प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।
  • कोकोस प्लेट (Cocos Plate) एक लघु (Minor) प्लेट है। यह मध्य अमेरिका के पश्चिमी तट और प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।

प्लेट सीमाओं के प्रकार और गतियां

जब ये प्लेटें संवहन धाराओं के कारण हिलती हैं, तो इनके किनारे (Boundaries) आपस में तीन अलग-अलग तरीकों से क्रिया करते हैं। इन्हीं क्रियाओं से पृथ्वी पर भूकंप, ज्वालामुखी और पर्वतों का निर्माण होता है:

1. अभिसारी सीमा (Convergent Boundary) - विनाशकारी किनारा

इस सीमा पर दो टेक्टोनिक प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं और आपस में टकराती हैं। जब एक महासागरीय प्लेट (जो भारी होती है) किसी महाद्वीपीय प्लेट (जो हल्की होती है) से टकराती है, तो भारी प्लेट नीचे मेंटल में धंस जाती है। इस धंसने की प्रक्रिया को Subduction कहते हैं। नीचे जाकर अत्यधिक गर्मी के कारण यह प्लेट पिघलने लगती है। वहीं, अगर दोनों प्लेटें महाद्वीपीय (हल्की) हों, तो कोई नीचे नहीं धंसती, बल्कि आपस में टकराकर ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं। जहां दो महाद्वीपीय प्लेटों के टकराव से ऊंचे-ऊंचे वलित पर्वत (जैसे हिमालय) बनते हैं और ज्वालामुखी नहीं होते, वहीं दो महासागरीय प्लेटों के टकराव से पहाड़ों के बजाय समुद्री खाइयाँ (गर्त) और ज्वालामुखी द्वीपों का निर्माण होता है।

परिणाम : 
इसके कारण वलित पर्वत (Fold Mountains) बनते हैं। प्लेट के नीचे धंसने से समुद्र में गहरे गर्त (Trenches) बनते हैं। पिघला हुआ मैग्मा जब दबाव के साथ बाहर आता है, तो भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट और विनाशकारी भूकंप आते हैं।
उदाहरण : हिमालय पर्वतमाला। यह तब बनी जब इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियाई प्लेट से टकराई। आज भी यह टकराव जारी है, जिससे हिमालय की ऊंचाई बढ़ रही है।

2. अपसारी सीमा (Divergent Boundary) - रचनात्मक किनारा

इस सीमा पर दो प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में, यानी दूर खिसकती हैं। जब  दो प्लेटें अलग होती हैं, तो उनके बीच की जमीन में दरार पड़ जाती है। इस दरार के कारण नीचे के मेंटल का दबाव कम होता है और गर्म मैग्मा ऊपर की ओर उठने लगता है। ऊपर आकर यह मैग्मा पानी या हवा के संपर्क में ठंडा हो जाता है और जमकर एक नई ठोस परत (New Crust) का निर्माण करता है।

परिणामइसके कारण नई महासागरीय सतह बनती है। यदि यह प्रक्रिया जमीन पर हो, तो वहां बहुत बड़ी भ्रंश घाटियां (Rift Valleys) बन जाती हैं।
उदाहरण : मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge), जहां अटलांटिक महासागर के बीच में दो प्लेटें दूर जा रही हैं और लगातार नया समंदर का तल बन रहा है। जमीन पर इसका उदाहरण अफ़्रीका की महान भ्रंश घाटी है।

3. रूपांतरित सीमा (Transform Boundary) - संरक्षित किनारा

इस सीमा पर प्लेटें न तो एक-दूसरे के करीब आती हैं और न ही दूर जाती हैं, बल्कि वे एक-दूसरे के समानांतर बगल से घिसटती या रगड़ खाती हुई निकल जाती हैं। चूंकि प्लेटों के किनारे चिकने नहीं होते, इसलिए वे अक्सर एक-दूसरे में फंस जाते हैं। जब संवहन धाराओं का दबाव बहुत बढ़ जाता है, तो ये फंसी हुई चट्टानें अचानक झटके के साथ टूटती हैं और प्लेटें आगे खिसक जाती हैं। इस प्रक्रिया में न तो कोई नई जमीन बनती है और न ही कोई पुरानी परत नष्ट होती है।

परिणाम : इसके कारण कोई ज्वालामुखी नहीं बनता, लेकिन चट्टानों के अचानक टूटने और रगड़ खाने से अत्यधिक तीव्र और विनाशकारी भूकंप आते हैं। इन क्षेत्रों में लंबी फॉल्ट लाइन्स (दरारें) बन जाती हैं।
उदाहरण: अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में स्थित सैन एंड्रियास फॉल्ट (San Andreas Fault), जो दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक है।


प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के महत्वपूर्ण प्रमाण

जब अल्फ्रेड वेगनर और बाद के वैज्ञानिकों ने यह सिद्धांत दिया कि महाद्वीप चल रहे हैं, तो लोगों ने इस पर विश्वास नहीं किया। लेकिन निम्नलिखित ठोस सबूतों ने इस सिद्धांत को विज्ञान की दुनिया में स्थापित कर दिया:
  • महाद्वीपों का जिग्सॉ-फ़िट (Matching Continents): यदि आप ग्लोब पर दक्षिण अमेरिका के पूर्वी तट और अफ्रीका के पश्चिमी तट को देखें, तो ऐसा लगता है कि वे कभी एक ही टुकड़े का हिस्सा थे। उन्हें आपस में जोड़ने पर वे किसी पहेली (Jigsaw Puzzle) के टुकड़ों की तरह बिल्कुल फिट बैठ जाते हैं।
  • जीवाश्मों का वितरण (Fossil Evidence): 'मेसोसॉरस' (एक छोटा रेंगने वाला जीव जो केवल मीठे पानी में रह सकता था) के जीवाश्म केवल दक्षिण अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के कुछ हिस्सों में मिले हैं। यह जीव खारे समंदर को तैरकर पार नहीं कर सकता था, जिससे यह साबित होता है कि ये दोनों महाद्वीप कभी आपस में जुड़े हुए थे।
  • चट्टानों की संरचना और आयु (Similar Rock Types): अटलांटिक महासागर के दोनों छोरों (जैसे ब्राजील के तट और अफ्रीका के पश्चिमी तट) पर पाई जाने वाली प्राचीन चट्टानों की आयु, उनका प्रकार और उनके खनिज बिल्कुल एक समान हैं।
  • प्राचीन हिमनद (Glacial Evidence): भारत, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका जैसे गर्म क्षेत्रों में प्राचीन समय के ग्लेशियरों (हिमनदों) द्वारा चट्टानों पर छोड़े गए रगड़ के निशान और तलछट मिले हैं। इसका मतलब है कि करोड़ों साल पहले ये सभी भूभाग दक्षिणी ध्रुव के पास एक साथ जुड़े हुए थे और बर्फ से ढके थे।
  • समुद्र तल का विस्तार (Sea Floor Spreading): महासागरों के बीच में जब खोज की गई, तो पाया गया कि समुद्र के केंद्र (कटकों) के पास की चट्टानें बिल्कुल नई हैं और जैसे-जैसे हम केंद्र से महाद्वीपों की तरफ जाते हैं, चट्टानें पुरानी होती जाती हैं। यह साबित करता है कि समुद्र का तल बीच से लगातार नया बन रहा है और फैल रहा है।

पृथ्वी की संरचना से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य और सिद्धांत 

  • प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) शब्द का प्रयोग सबसे पहले टूजो विल्सन (Tuzo Wilson) ने वर्ष 1965 में किया था। इस सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप से विकसित करने और इसकी विस्तृत व्याख्या करने का श्रेय डब्ल्यू. जे. मॉर्गन (W. J. Morgan), पार्कर और मैकेन्जी को जाता है (1967 में)।
  • महासागरीय नितल प्रसरण (Sea Floor Spreading) का सिद्धांत हैरी हेस (Harry Hess) ने वर्ष 1960 में प्रतिपादित किया था (और 1962 में इसे विस्तार से प्रकाशित किया)। इस सिद्धांत के अनुसार, महासागरों के बीच में स्थित मध्य-अटलांटिक कटक (Mid-Atlantic Ridge) जैसी जगहों से पिघला हुआ मैग्मा लगातार ऊपर उठता है। जब यह मैग्मा बाहर आकर ठंडा होता है, तो नई महासागरीय क्रस्ट (सतह) का निर्माण करता है और पुराना समंदर का तल दोनों तरफ दूर खिसक जाता है। यानी, समुद्र का तल लगातार फैल रहा है।
  • वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory): अल्फ्रेड वेगनर ने 1912 में बताया था कि सभी महाद्वीप पहले एक विशाल भूभाग का हिस्सा थे जिसे 'पेंजिया' (Pangaea) कहा जाता था और इसके चारों ओर के महासागर को 'पेंथालासा' (Panthalassa) कहा जाता था।
  • लॉरेशिया और गोंडवानालैंड: पेंजिया के टूटने पर उत्तरी भाग लॉरेशिया (अंगारा लैंड) और दक्षिणी भाग गोंडवानालैंड बना। हमारा प्रायद्वीपीय भारत गोंडवानालैंड का हिस्सा है।
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उत्तराखंड का इतिहास History of Uttarakhand भाग -1 परमार वंश का इतिहास उत्तराखंड में सर्वाधिक विवादित और मतभेद पूर्ण रहा है। जो परमार वंश के इतिहास को कठिन बनाता है परंतु विभिन्न इतिहासकारों की पुस्तकों का गहन विश्लेषण करके तथा पुस्तक उत्तराखंड का राजनैतिक इतिहास (अजय रावत) को मुख्य आधार मानकर परमार वंश के संपूर्ण नोट्स प्रस्तुत लेख में तैयार किए गए हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में 688 ईसवी से 1947 ईसवी तक शासकों ने शासन किया है (बैकेट के अनुसार)।  गढ़वाल में परमार वंश का शासन सबसे अधिक रहा।   जिसमें लगभग 12 शासकों का अध्ययन विस्तारपूर्वक दो भागों में विभाजित करके करेंगे और अंत में लेख से संबंधित प्रश्नों का भी अध्ययन करेंगे। परमार वंश (गढ़वाल मंडल) (भाग -1) छठी सदी में हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात संपूर्ण उत्तर भारत में भारी उथल-पुथल हुई । देश में कहीं भी कोई बड़ी महाशक्ति नहीं बची थी । जो सभी प्रांतों पर नियंत्रण स्थापित कर सके। बड़े-बड़े जनपदों के साथ छोटे-छोटे प्रांत भी स्वतंत्रता की घोषणा करने लगे। कन्नौज से सुदूर उत्तर में स्थित उत्तराखंड की पहाड़ियों में भी कुछ ऐसा ही...

कुणिंद वंश का इतिहास (1500 ईसा पूर्व - 300 ईसवी)

कुणिंद वंश का इतिहास   History of Kunid dynasty   (1500 ईसा पूर्व - 300 ईसवी)  उत्तराखंड का इतिहास उत्तराखंड मूलतः एक घने जंगल और ऊंची ऊंची चोटी वाले पहाड़ों का क्षेत्र था। इसका अधिकांश भाग बिहड़, विरान, जंगलों से भरा हुआ था। इसीलिए यहां किसी स्थाई राज्य के स्थापित होने की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है। थोड़े बहुत सिक्कों, अभिलेखों व साहित्यक स्रोत के आधार पर इसके प्राचीन इतिहास के सूत्रों को जोड़ा गया है । अर्थात कुणिंद वंश के इतिहास में क्रमबद्धता का अभाव है।               सूत्रों के मुताबिक कुणिंद राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला प्रथम प्राचीन राजवंश है । जिसका प्रारंभिक समय ॠग्वैदिक काल से माना जाता है। रामायण के किस्किंधा कांड में कुणिंदों की जानकारी मिलती है और विष्णु पुराण में कुणिंद को कुणिंद पल्यकस्य कहा गया है। कुणिंद राजवंश के साक्ष्य के रूप में अभी तक 5 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। जिसमें से एक मथुरा और 4 भरहूत से प्राप्त हुए हैं। वर्तमान समय में मथुरा उत्तर प्रदेश में स्थित है। जबकि भरहूत मध्यप्रदेश में है। कुणिंद वंश का ...

ब्रिटिश कुमाऊं कमिश्नर : उत्तराखंड

ब्रिटिश कुमाऊं कमिश्नर उत्तराखंड 1815 में गोरखों को पराजित करने के पश्चात उत्तराखंड में ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से ब्रिटिश शासन प्रारंभ हुआ। उत्तराखंड में अंग्रेजों की विजय के बाद कुमाऊं पर ब्रिटिश सरकार का शासन स्थापित हो गया और गढ़वाल मंडल को दो भागों में विभाजित किया गया। ब्रिटिश गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल। अंग्रेजों ने अलकनंदा नदी का पश्चिमी भू-भाग पर परमार वंश के 55वें शासक सुदर्शन शाह को दे दिया। जहां सुदर्शन शाह ने टिहरी को नई राजधानी बनाकर टिहरी वंश की स्थापना की । वहीं दूसरी तरफ अलकनंदा नदी के पूर्वी भू-भाग पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। जिसे अंग्रेजों ने ब्रिटिश गढ़वाल नाम दिया। उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन - 1815 ब्रिटिश सरकार कुमाऊं के भू-राजनीतिक महत्व को देखते हुए 1815 में कुमाऊं पर गैर-विनियमित क्षेत्र के रूप में शासन स्थापित किया अर्थात इस क्षेत्र में बंगाल प्रेसिडेंसी के अधिनियम पूर्ण रुप से लागू नहीं किए गए। कुछ को आंशिक रूप से प्रभावी किया गया तथा लेकिन अधिकांश नियम स्थानीय अधिकारियों को अपनी सुविधानुसार प्रभावी करने की अनुमति दी गई। गैर-विनियमित प्रांतों के जिला प्रमु...

चंद राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास

चंद राजवंश का इतिहास पृष्ठभूमि उत्तराखंड में कुणिंद और परमार वंश के बाद सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजवंश है।  चंद वंश की स्थापना सोमचंद ने 1025 ईसवी के आसपास की थी। वैसे तो तिथियां अभी तक विवादित हैं। लेकिन कत्यूरी वंश के समय आदि गुरु शंकराचार्य  का उत्तराखंड में आगमन हुआ और उसके बाद कन्नौज में महमूद गजनवी के आक्रमण से ज्ञात होता है कि तो लगभग 1025 ईसवी में सोमचंद ने चंपावत में चंद वंश की स्थापना की है। विभिन्न इतिहासकारों ने विभिन्न मत दिए हैं। सवाल यह है कि किसे सच माना जाए ? उत्तराखंड के इतिहास में अजय रावत जी के द्वारा उत्तराखंड की सभी पुस्तकों का विश्लेषण किया गया है। उनके द्वारा दिए गए निष्कर्ष के आधार पर यह कहा जा सकता है । उपयुक्त दिए गए सभी नोट्स प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से सर्वोत्तम उचित है। चंद राजवंश का इतिहास चंद्रवंशी सोमचंद ने उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में लगभग 900 वर्षों तक शासन किया है । जिसमें 60 से अधिक राजाओं का वर्णन है । अब यदि आप सभी राजाओं का अध्ययन करते हैं तो मुमकिन नहीं है कि सभी को याद कर सकें । और अधिकांश राजा ऐसे हैं । जिनका केवल नाम पता...

कत्यूरी राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

कत्यूरी राजवंश का इतिहास भाग -1 अमोघभूति कुणिद वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था। कुणिद वंश उत्तराखंड में लगभग तीसरी- चौथी शताब्दी की पहली राजनीतिक शक्ति थी । जबकि कत्यूर राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला पहला ऐतिहासिक शक्तिशाली राजवंश था। इसे कार्तिकेयपुर वंश के नाम से भी जाना जाता है। 'कत्यूरी' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग एटकिंसन ने किया था। कत्यूरी राजवंश के संस्थापक बसंत देव थे । जिन्हें बासुदेव के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी। पांडुकेश्वर ताम्रलेख में पाए गए कत्यूरी राजा ललितशूर के अनुसार कत्यूरी शासकों की प्राचीनतम राजधानी जोशीमठ (चमोली) में थी । बाद में नरसिंह देव ने जोशीमठ से बैजनाथ (बागेश्वर ) में राजधानी स्थानांतरित कर दी। जहां से कत्यूरी राजवंश को विशिष्ट पहचान मिली । कत्यूरी राजवंश का उदय कुणिंदों के पतन के पश्चात देवभूमि उत्तराखंड की भूमि पर कुछ नए राजवंशों का उदय हुआ। जैसे गोविषाण, कालसी लाखामंडल आदि जबकि कुछ स्थानों पर कुणिंद भी शासन करते रहे। कुणिंदो के बाद शक, कुषाण और यौधेय वंश के शासकों ने कुछ क्षेत्रों पर शासन व्यवस्था स्थापित की। ...