उत्तराखंड के प्रमुख साहित्यकार : शैलेश मटियानी
जीवन परिचय
शैलेश मटियानी का जन्म 14 अक्टूबर, 1931 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के 'बाड़ेछीना' नामक गांव में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था, लेकिन साहित्य जगत में वे अपने उपनाम 'शैलेश' से विख्यात हुए। मटियानी जी का प्रारंभिक जीवन दुखों और अभावों का एक ऐसा अंतहीन सिलसिला था जिसकी कल्पना भी डराती है। जब वे मात्र बारह वर्ष के थे, तब उनके माता-पिता दोनों का साया उनके सिर से उठ गया। अनाथ होने के कारण उनका बचपन घोर कंगाली, उपेक्षा और अकेलेपन में बीता। परिवार को संभालने और खुद का पेट पालने के लिए उन्हें बचपन से ही मजदूरी, फेरी लगाना और छोटे-मोटे काम करने पड़े। जीवन के इन शुरुआती थपेड़ों और दुखों ने उनके भीतर एक ऐसी संवेदनशीलता को जन्म दिया, जिसने बाद में उनकी लेखनी को शोषितों की सबसे बुलंद आवाज बना दिया।
शिक्षा-दीक्षा और आजीविका की तलाश
विपरीत परिस्थितियों और घोर आर्थिक तंगी के कारण मटियानी जी की औपचारिक शिक्षा बहुत मुश्किलों से भरी रही। उन्होंने जैसे-तैसे अल्मोड़ा से हाईस्कूल (दसवीं कक्षा) की परीक्षा उत्तीर्ण की। गरीबी के कारण वे आगे नियमित पढ़ाई नहीं कर सके, लेकिन उनके भीतर सीखने की ललक कम नहीं हुई। वे रोजगार की तलाश में भटकते हुए दिल्ली, फिर उत्तर प्रदेश के कई शहरों से होते हुए आखिरकार देश की आर्थिक राजधानी मुंबई (तब बंबई) पहुँच गए। मुंबई में उन्होंने रहने के लिए कड़ा संघर्ष किया; वे झोपड़पट्टियों में रहे, बोरीवली स्टेशन पर कुलियों और मजदूरों का जीवन करीब से देखा और स्वयं छोटे-मोटे काम किए। बाद में वे प्रयागराज (इलाहाबाद) आ गए और वहाँ रहकर उन्होंने पूरी तरह लेखन को ही अपनी आजीविका और जीवन का मुख्य ध्येय बना लिया।
लेखक क्यों और कैसे बने?
मटियानी जी के लेखक बनने की कहानी उनके अपने जीवन की कड़वी सच्चाइयों और फक्कड़ स्वभाव का परिणाम थी। बचपन का अनाथपन, पहाड़ों का कठिन जीवन और मुंबई की झुग्गियों की बदहाली को उन्होंने केवल देखा नहीं था, बल्कि खुद जिया था। उन्होंने महसूस किया कि उस दौर का साहित्य समाज के इस तबके के वास्तविक दर्द को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पा रहा था। अमर कथाकार प्रेमचंद और विद्रोही कवि निराला के जीवन और साहित्य ने उन्हें गहराई से प्रेरित किया। उन्होंने तय किया कि वे समाज के उन लोगों को अपनी रचनाओं का नायक बनाएंगे जिन्हें दुनिया 'अवांछित' या 'अपराधी' समझकर छोड़ देती है। उनके फक्कड़, स्वाभिमानी और सत्यवादी स्वभाव के कारण उनकी लेखनी में एक अद्भुत धार और ईमानदारी आ गई, जिसने उन्हें हिंदी का एक बेहद प्रामाणिक कथाकार बनाया।
पहली रचना : अमरवल्ली
शैलेश मटियानी जी की सबसे पहली कहानी 'अमरवल्ली' मानी जाती है, जो वर्ष 1950 के आसपास प्रकाशित हुई थी। इसके बाद वर्ष 1959 में उनका पहला उपन्यास 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' प्रकाशित हुआ, जिसने हिंदी साहित्य जगत में तहलका मचा दिया। इस उपन्यास ने मुंबई की झुग्गियों, चालों और वहां के कुलियों व मजदूरों के जीवन के अनछुए पहलुओं को इतने यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया कि मटियानी जी रातों-रात एक स्थापित उपन्यासकार बन गए।
प्रमुख रचनाएँ
शैलेश मटियानी का साहित्य अत्यंत समृद्ध और विशाल है। उन्होंने 30 से अधिक उपन्यास, लगभग 17 कहानी संग्रह और कई महत्वपूर्ण निबंध लिखे हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं की मुख्य व्याख्या इस प्रकार है:
कालजयी उपन्यास (आंचलिक और यथार्थवादी):
बोरीवली से बोरीबंदर तक (1959): यह उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है। इसमें मुंबई महानगर के चकाचौंध के पीछे छिपे अंधेरे, फुटपाथ पर सोने वालों के संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं के टूटने-बिखरने की मर्मस्पर्शी गाथा है।
कबूतरखाना (1960): इस उपन्यास में भी मुंबई की बहुमंजिला इमारतों और छोटी चालों में कबूतरों की तरह ठुंसे हुए मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों की मानसिक व सामाजिक समस्याओं का जीवंत चित्रण है।
बावन नदियों का संगम: इसमें उन्होंने नारी के जीवन के अंतर्द्वंद्व, उसकी विवशताओं और समाज के दोहरे चरित्र पर करारा प्रहार किया है।
मुठभेड़: यह सत्ता, व्यवस्था और अपराधी तंत्र के बीच के गठजोड़ को बेनकाब करने वाला एक अत्यंत सशक्त और यथार्थवादी उपन्यास है।
किस्सा नर्मदाबेन गंगूबाई और छोटे-छोटे पक्षी: इन रचनाओं में भी समाज के हाशिए पर जी रहे चरित्रों को केंद्र में रखकर गहरी दार्शनिक और सामाजिक बातें कही गई हैं।
प्रसिद्ध कहानी संग्रह:
मटियानी जी ने 'महाभोज', 'चील', 'अर्धांगिनी', 'भेड़ें और चरवाहे' जैसी सैकड़ों अद्भुत कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियाँ 'मेरी तैंतीस कहानियाँ', 'दो दुखों का एक सुख', 'हारा हुआ' और 'जंगल में मंगल' जैसे प्रसिद्ध संग्रहों में संकलित हैं। उनकी कहानियों में पहाड़ की संस्कृति और वहाँ के निवासियों का सीधा-सरल लेकिन संघर्षमय जीवन साफ झलकता है।
संपादन और पत्र-पत्रिकाएँ:
उन्होंने साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए 'विकल्प' और 'जनपक्ष' नामक प्रसिद्ध पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन भी किया, जिसके माध्यम से उन्होंने नए लेखकों को मंच प्रदान किया।
पुरस्कार एवं सम्मान
उत्तराखंड और देश का गौरव बढ़ाने वाले इस महान लेखक को उनके जीवनकाल में कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया:
महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार: भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा उन्हें उनके उत्कृष्ट कथेतर लेखन और वैचारिक अवदान के लिए इस बड़े राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
शारदा सम्मान और लोहिया सम्मान: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा उन्हें साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए 'लोहिया सम्मान' और अन्य गौरवशाली पुरस्कार प्रदान किए गए थे।
फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार: बिहार सरकार द्वारा उन्हें उनकी आंचलिक और यथार्थवादी लेखन शैली के लिए इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से विभूषित किया गया था।
मरणोपरांत उत्तराखंड का गौरव: उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद, राज्य सरकार और स्थानीय अकादमियों ने उनके सम्मान में कई साहित्यिक आयोजनों और पुरस्कारों की शुरुआत की, क्योंकि वे उत्तराखंड की आंचलिक चेतना के सबसे मजबूत संवाहक थे।
जीवनभर अभावों से लड़ते हुए और समाज के सबसे दबे-कुचले लोगों को शब्दों का संबल देने वाले शैलेश मटियानी जी का अंतिम समय काफी कष्टप्रद रहा। मानसिक तनाव और अस्वस्थता के चलते 24 अप्रैल, 2001 को दिल्ली के एक अस्पताल में हिंदी का यह महाप्राण कथाकार हमेशा के लिए शांत हो गया। उनका साहित्य आज भी हमें यह याद दिलाता है कि वास्तविक भारत महलों में नहीं, बल्कि खेतों, खलिहानों, पहाड़ों और फुटपाथों पर बसता है।
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