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गजानन माधव मुक्तिबोध : Biography

हिन्दी भाषा के प्रमुख साहित्यकार  नमस्कार दोस्तों आज हम हिंदी साहित्य के सिलेबस के अनुसार बाहरी राज्यों में जन्म लेने वाले साहित्यकारों का अध्ययन करेंगे।‌ जो उत्तराखंड की परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं आज के लेख में गजानन माधव मुक्तिबोध के जीवन परिचय और उनकी प्रमुख सभी रचनाओं के बारे में विस्तार से जानेंगे । इससे पूर्व हम सुमित्रानंदन पंत, राहुल सांकृत्यायन, महादेवी वर्मा, शैलेश मटियानी और मंगलेश डबराल के बारे में विस्तार से पढ़ चुके हैं। जिनके लिंक लेख के अंत में नीचे दिए गए हैं। तो आईए जानते हैं गजानन मुक्तिबोध के बारे में विस्तार से - गजानन माधव मुक्तिबोध  हिंदी साहित्य में 'अंधेरे के कवि' और फेंटेसी के बेजोड़ शिल्पी के रूप में विख्यात गजानन माधव मुक्तिबोध का नाम आधुनिक हिंदी काव्य के इतिहास में सबसे अलग और चमकीला है । वे प्रगतिशील चेतना और प्रयोगवाद के एक ऐसे अनूठे सेतु थे, जिन्होंने कविता को आत्म संघर्ष, आत्मा खोज और व्यवस्था के खिलाफ एक तीव्र बौद्धिक हथियार बनाया।  जीवन परिचय  गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर, 1917 को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के 'श्...

उत्तराखंड के साहित्यकार : राहुल सांकृत्यायन

उत्तराखंड के प्रसिद्ध साहित्यकार : राहुल सांकृत्यायन 

जैसा कि आप जानते हैं इस लेख से पूर्व सुमित्रानंदन के जीवन परिचय और उनकी प्रमुख रचनाओं के बारे में पढ़ चुके हैं। आज हम राहुल सांकृत्यायन के जीवन परिचय और उनकी सभी रचनाओं के बारे में विस्तार से जानेंगे। अतः ध्यानपूर्वक पूरा लेख पढ़ें।

हिंदी साहित्य में 'महापंडित' और 'घुमक्कड़ शास्त्र के जनक' के रूप में विख्यात राहुल सांकृत्यायन का नाम आधुनिक हिंदी गद्य के इतिहास में सबसे अनूठा है। वे केवल एक लेखक या कवि नहीं थे, बल्कि एक असाधारण भाषाविद्, इतिहासकार, पुरातत्वविद् और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने ज्ञान की खोज में अपना पूरा जीवन यात्राओं में समर्पित कर दिया। आइए, उनके संपूर्ण जीवन और अद्वितीय साहित्य को विस्तार से समझते हैं।

जीवन परिचय,


राहुल सांकृत्यायन का जन्म 9 अप्रैल, 1893 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के 'पंदहा' नामक गांव (उनके ननिहाल) में हुआ था। उनका पैतृक गांव आजमगढ़ का 'कनैला' था। उनके बचपन का नाम केदारनाथ पांडेय था। उनका शुरुआती जीवन बहुत सरल नहीं था; बचपन में ही उनकी माता कुलवंती देवी का निधन हो गया, जिसके कारण उनका लालन-पालन उनकी नानी ने किया।

उनके जीवन में नाम बदलने के कई रोचक मोड़ आए। वे ज्ञान की खोज में जब साधु बने, तो उनका नाम 'दामोदर स्वामी' रखा गया। इसके बाद जब वे श्रीलंका गए और बौद्ध धर्म से अत्यधिक प्रभावित होकर उसे अपना लिया, तब उन्होंने अपना नाम बदलकर 'राहुल' रख लिया। चूँकि उनका गोत्र 'सांकृत्य' था, इसलिए वे पूरे विश्व में 'राहुल सांकृत्यायन' के नाम से अमर हो गए।

शिक्षा-दीक्षा, घुमक्कड़ी और भाषा ज्ञान

राहुल जी की औपचारिक स्कूली शिक्षा बहुत कम हुई थी। उन्होंने केवल उर्दू मिडिल की परीक्षा पास की थी, लेकिन उनके भीतर सीखने की जो भूख थी, उसने उन्हें एक महाविद्वान बना दिया। उन्होंने स्वाध्याय (Self-study) और अपनी अनवरत यात्राओं के माध्यम से ज्ञान अर्जित किया। वे एक अद्भुत 'बहुभाषाविद्' (Polyglot) थे, जिन्हें हिंदी, संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी के साथ-साथ तिब्बती, सिंहली, रूसी, जापानी और चीनी सहित लगभग 36 भाषाओं का गहरा ज्ञान था।

वे मानते थे कि घूमना ही शिक्षा का सबसे बड़ा माध्यम है। उन्होंने भारत के कोने-कोने के अलावा श्रीलंका, तिब्बत, सोवियत संघ (रूस), ईरान, चीन और यूरोप के कई देशों की अत्यंत कठिन यात्राएँ कीं। उस समय तिब्बत जाना प्रतिबंधित था, लेकिन वे बौद्ध भिक्षु के भेष में वहां गए और वहां से खच्चरों पर लादकर हजारों दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपियां (Manuscripts) भारत लेकर आए, जो नष्ट होने की कगार पर थीं।

लेखक क्यों और कैसे बने?

राहुल जी के लेखक बनने के पीछे उनकी अगाध जिज्ञासा और दुनिया को जानने-समझने की चाह थी। बचपन में उन्होंने उर्दू की किताब में एक शेर पढ़ा था — "

सैर कर दुनिया की गाफ़िल ज़िन्दगानी फिर कहाँ,

ज़िन्दगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ।"

इस एक शेर ने उनके बाल मन को ऐसा प्रभावित किया कि वे किशोर उम्र में ही घर से भाग गए।

जब उन्होंने दुनिया देखी, सामाजिक कुरीतियों को समझा और बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया, तो उन्होंने महसूस किया कि ज्ञान को केवल अपने तक सीमित रखना समाज के साथ अन्याय है। वे मार्क्सवाद (साम्यवाद) और राष्ट्रीय आंदोलन से भी गहराई से जुड़े, जिसके कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। जेल के एकांत और अपनी यात्राओं के अनुभवों को उन्होंने कागज़ पर उतारना शुरू किया, ताकि भारत के लोग दुनिया के इतिहास, भूगोल और दर्शन को अपनी सरल भाषा में समझ सकें।

पहली रचना : 'वोल्गा से गंगा'

राहुल सांकृत्यायन जी की पहली महत्वपूर्ण कृति वर्ष 1918 के आसपास आई, लेकिन उनकी सबसे पहली युगांतकारी और प्रसिद्ध ऐतिहासिक कहानी-संग्रह 'वोल्गा से गंगा' वर्ष 1943 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक मानव सभ्यता के विकास की कहानी को 20 अलग-अलग कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत करती है, जिसने उन्हें इतिहास-लेखन और कथा-साहित्य की दुनिया में एक विशिष्ट पहचान दिलाई।

प्रमुख रचनाएँ

राहुल सांकृत्यायन का साहित्य बेहद विशाल है, जिसमें 150 से अधिक पुस्तकें शामिल हैं। इतिहास, दर्शन, यात्रा-वृत्तांत और जीवनी जैसे क्षेत्रों में उनका अवदान अतुलनीय है। उनकी प्रमुख रचनाओं की व्याख्या इस प्रकार है:

  • प्रसिद्ध यात्रा-साहित्य (घुमक्कड़ शास्त्र):

    • घुमक्कड़ शास्त्र: यह राहुल जी की एक अनूठी और कालजयी कृति है। इसमें उन्होंने घूमना-फिरना या यात्रा करने को एक व्यवस्थित 'शास्त्र' (विज्ञान) के रूप में स्थापित किया है। वे युवाओं को संदेश देते हैं कि घुमक्कड़ी से ही मानसिक विकास और संस्कृति का आदान-प्रदान संभव है।

    • मेरी तिब्बत यात्रा, मेरी लद्दाख यात्रा, किन्नर देश में और रूस में 25 मास: इन यात्रा-वृत्तांतों में केवल भौगोलिक रास्तों का विवरण नहीं है, बल्कि वहां के समाज, संस्कृति, इतिहास और लोगों के रहन-सहन का अत्यंत सजीव और ज्ञानवर्धक चित्रण है।

  • इतिहास और दर्शन ग्रंथ:

    • वोल्गा से गंगा (1943): इसमें हिंद-यूरोपीय (आर्य) सभ्यता के विकास यात्रा को वोल्गा नदी (रूस) से लेकर गंगा नदी (भारत) तक कहानियों के रूप में पिरोया गया है। यह राजनीति, समाज और इतिहास का अद्भुत मिश्रण है।

    • दर्शन-दिग्दर्शन और मध्य एशिया का इतिहास: इन ग्रंथों में उन्होंने दुनिया भर के दर्शन और मध्य एशिया के उस इतिहास को सामने रखा, जिससे सामान्य भारतीय पाठक पूरी तरह अनजान थे।

  • उपन्यास और जीवनियाँ:

    • सिंह सेनापति और जय यौधेय: इन ऐतिहासिक उपन्यासों में उन्होंने प्राचीन भारत के गणराज्यों और वहां की राजनीतिक व्यवस्था को बहुत जीवंत रूप में चित्रित किया है।

    • उन्होंने कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन और महान बौद्ध विद्वानों की अत्यंत प्रेरणादायक जीवनियाँ भी लिखीं।

पुरस्कार एवं सम्मान

साहित्य और ज्ञान के इस महासमुद्र को देश-विदेश में सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया:

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1958): उनके द्वारा लिखे गए विशाल ग्रंथ 'मध्य एशिया का इतिहास' के लिए उन्हें इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया।

  • पद्म भूषण (1963): भारत सरकार द्वारा राष्ट्र के प्रति उनकी महान सांस्कृतिक और साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें देश के इस उच्च नागरिक सम्मान से विभूषित किया गया।

  • 'महापंडित' की उपाधि: काशी के प्रकांड विद्वानों और हिंदी जगत ने उनकी अगाध विद्वता और दर्जनों भाषाओं के ज्ञान को देखते हुए उन्हें सर्वसम्मति से 'महापंडित' की उपाधि दी थी।

  • मरणोपरांत सम्मान: भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा उनके नाम पर हर साल यात्रा-साहित्य के लिए 'महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार' दिया जाता है।

जीवन के अंतिम दिनों में अत्यधिक यात्राओं और कड़े मानसिक श्रम के कारण वे 'विस्मृति' (Amnesia/याददाश्त खोना) और मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो गए। इलाज के लिए वे रूस भी गए, लेकिन स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ। अंततः 14 अप्रैल, 1963 को दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) में ज्ञान का यह महापंडित हमेशा के लिए शांत हो गया, लेकिन उनका लिखा साहित्य आज भी हर जिज्ञासु को दुनिया नापने की प्रेरणा देता है।

दोस्तों देवभूमि उत्तराखंड द्वारा सभी साहित्यकारों की एक विस्तृत सीरीज प्रारंभ की गई है जिसमें आपको सभी साहित्यकारों का विस्तार से उनके जीवन परिचय और रचनाओं के बारे में बताया जाएगा, जिसके बाद आप आप स्वयं से शार्ट नोट्स बना सकते हैं या फिर शार्ट नोट्स प्राप्त करने के लिए हमसे संपर्क कर सकते और टेलीग्राम चैनल से जुड़ सकते हैं।

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