उत्तराखंड के प्रमुख साहित्यकार
महादेवी वर्मा
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि देवभूमि उत्तराखंड द्वारा उत्तराखंड की परीक्षाओं में पूछे जाने वाले सभी साहित्यकारों का अध्ययन किया जा रहा है, इससे पूर्व राहुल सांकृत्यायन और सुमित्रानंदन के बारे में पढ़ चुके हैं।
आज के लेख में हम महादेव वर्मा के बारे में विस्तार जानेंगे जिसमें उनका जीवन परिचय और उनकी सभी प्रमुख रचनाओं का सामान्य परिचय के साथ पढ़ेंगे। महादेवी वर्मा की रचनाओं से प्रतिवर्ष प्रत्येक परीक्षा में प्रश्न पूछे जाते हैं इसलिए परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण लेखिका हैं। अतः अंत तक जरूर पढ़ें।
जीवन परिचय और बचपन
शिक्षा-दीक्षा और कार्यक्षेत्र
पहली रचना
प्रमुख रचनाएँ एवं उनकी व्याख्या
महादेवी वर्मा का गद्य और पद्य दोनों पर समान अधिकार था। जहाँ उनकी कविताओं में रहस्यमयी वेदना है, वहीं उनका गद्य समाज के दबे-कुचले लोगों और मूक पशु-पक्षियों के प्रति अगाध प्रेम से भरा है। उनकी प्रमुख कृतियों की व्याख्या इस प्रकार है:
काव्य कृतियाँ (कविताओं की व्याख्या):
नीहार (1930), रश्मि (1932), नीरजा (1934) और सांध्यगीत (1936): इन चारों आरंभिक काव्य-संग्रहों को मिलाकर ही उनकी प्रसिद्ध कृति 'यामा' तैयार की गई थी। इन गीतों में अज्ञात प्रियतम (ईश्वर) के प्रति अनन्य प्रेम, मिलन की व्याकुलता और विरह का ऐसा सुंदर चित्रण है कि इन्हें छायावादी रहस्यवाद का शिखर कहा जाता है।
दीपशिखा (1942): इस संग्रह के गीतों में सात्विकता और रहस्य की भावना और अधिक प्रगाढ़ हो जाती है। इसमें 'दीपक' और 'शलभ' (पतंगा) को प्रतीक बनाकर आत्मा-परमात्मा के संबंध को दर्शाया गया है।
गद्य साहित्य (रेखाचित्र और संस्मरण):
अतीत के चल-चित्र (1941) और स्मृति की रेखाएँ (1943): ये हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ रेखाचित्र माने जाते हैं। इनमें महादेवी जी ने अपने जीवन में आए साधारण चरित्रों (जैसे रामा, भक्तिन, बिंदा, घीसा) के संघर्षपूर्ण जीवन का ऐसा मर्मस्पर्शी चित्रण किया है कि पाठक भावुक हो उठता है।
पथ के साथी (1956): इसमें उन्होंने अपने समकालीन साहित्यकारों (जैसे जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, मैथिलीशरण गुप्त) के साथ बिताए संस्मरणों को सहेजा है।
मेरा परिवार (1972): इस अनूठी कृति में उन्होंने अपने पाले हुए पशु-पक्षियों (जैसे नीलकंठ मोर, गिल्लू गिलहरी, गौरा गाय, सोना हिरनी) के साथ अपने आत्मीय संबंधों को शब्दों में ढाला है।
वैचारिक निबंध:
शृंखला की कड़ियाँ (1942): यह हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श (Feminism) का पहला और सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है। इसमें उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं के शोषण, अशिक्षा और उनकी पराधीनता पर अत्यंत तीखे और तार्किक विचार व्यक्त किए हैं।
पुरस्कार एवं सम्मान
महादेवी वर्मा को उनके जीवनकाल में और मरणोपरांत देश के कई सर्वोच्च साहित्यिक और नागरिक पुरस्कारों से अलंकृत किया गया:
भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982): उनकी महान काव्य कृति 'यामा' के लिए उन्हें देश के इस सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाली पहली महिला कवयित्री थीं।
सकसेरिया पुरस्कार और मंगलाप्रसाद पारितोषिक: उनके काव्य संग्रह 'नीरजा' के लिए उन्हें सकसेरिया पुरस्कार और 'यामा' व 'दीपशिखा' के सामूहिक साहित्यिक अवदान के लिए मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला था।
पद्म भूषण (1956) और पद्म विभूषण (1988): भारत सरकार द्वारा उन्हें पहले पद्म भूषण दिया गया और मरणोपरांत 1988 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से नवाजा गया।
साहित्य अकादमी फेलोशिप (1979): वे साहित्य अकादमी की फेलो (सदस्य) बनने वाली पहली महिला थीं।
महादेवी जी ने अपना अंतिम समय प्रयागराज में ही साहित्य सृजन और समाज सेवा में बिताया। हिंदी साहित्य की यह अलौकिक 'दीपशिखा' 11 सितंबर, 1987 को हमेशा के लिए बुझ गई, लेकिन अपने कालजयी साहित्य के रूप में वे आज भी अमर हैं।
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