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महादेवी वर्मा का जीवन परिचय एवं उनकी रचनाएं (paart-03)

उत्तराखंड के प्रमुख साहित्यकार  महादेवी वर्मा  जैसा कि आप सभी जानते हैं कि देवभूमि उत्तराखंड द्वारा उत्तराखंड की परीक्षाओं में पूछे जाने वाले सभी साहित्यकारों का अध्ययन किया जा रहा है, इससे पूर्व राहुल सांकृत्यायन और सुमित्रानंदन के बारे में पढ़ चुके हैं।  आज के लेख में हम महादेव वर्मा के बारे में विस्तार जानेंगे जिसमें उनका जीवन परिचय और उनकी सभी प्रमुख रचनाओं का सामान्य परिचय के साथ पढ़ेंगे। महादेवी वर्मा की रचनाओं से प्रतिवर्ष प्रत्येक परीक्षा में प्रश्न पूछे जाते हैं इसलिए परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण लेखिका हैं। अतः अंत तक जरूर पढ़ें। हिंदी साहित्य में 'आधुनिक मीरा' के नाम से विख्यात और छायावाद के चौथे प्रमुख स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित महादेवी वर्मा का नाम आते ही करुणा, वेदना और रहस्यवाद का एक अलौकिक संसार सामने आ जाता है। वे न केवल एक महान कवयित्री थीं, बल्कि एक उत्कृष्ट रेखाचित्रकार, निबंधकार और नारी स्वतंत्रता की प्रबल समर्थक भी थीं। जीवन परिचय और बचपन महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च, 1907 को होली के दिन उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद शहर में हुआ था। उनके परिवार में ...

महादेवी वर्मा का जीवन परिचय एवं उनकी रचनाएं (paart-03)

उत्तराखंड के प्रमुख साहित्यकार 

महादेवी वर्मा 

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि देवभूमि उत्तराखंड द्वारा उत्तराखंड की परीक्षाओं में पूछे जाने वाले सभी साहित्यकारों का अध्ययन किया जा रहा है, इससे पूर्व राहुल सांकृत्यायन और सुमित्रानंदन के बारे में पढ़ चुके हैं। 

आज के लेख में हम महादेव वर्मा के बारे में विस्तार जानेंगे जिसमें उनका जीवन परिचय और उनकी सभी प्रमुख रचनाओं का सामान्य परिचय के साथ पढ़ेंगे। महादेवी वर्मा की रचनाओं से प्रतिवर्ष प्रत्येक परीक्षा में प्रश्न पूछे जाते हैं इसलिए परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण लेखिका हैं। अतः अंत तक जरूर पढ़ें।

हिंदी साहित्य में 'आधुनिक मीरा' के नाम से विख्यात और छायावाद के चौथे प्रमुख स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित महादेवी वर्मा का नाम आते ही करुणा, वेदना और रहस्यवाद का एक अलौकिक संसार सामने आ जाता है। वे न केवल एक महान कवयित्री थीं, बल्कि एक उत्कृष्ट रेखाचित्रकार, निबंधकार और नारी स्वतंत्रता की प्रबल समर्थक भी थीं।

जीवन परिचय और बचपन

महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च, 1907 को होली के दिन उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद शहर में हुआ था। उनके परिवार में पिछले सात पीढ़ियों से किसी बेटी का जन्म नहीं हुआ था, इसलिए उनके जन्म पर उनके बाबा बाबू बांके बिहारी ने उन्हें घर की 'देवी' मानते हुए उनका नाम 'महादेवी' रखा। उनके पिता बाबू गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर के एक कॉलेज में प्राध्यापक थे और माता हेमरानी देवी अत्यंत धार्मिक, सरल और विदुषी महिला थीं। महादेवी जी को बचपन में अपनी माता से ही रामायण, महाभारत की कथाएँ सुनने और संगीत सीखने की प्रेरणा मिली। मात्र 9 वर्ष की अल्पायु में ही उनका विवाह डॉ. स्वरूप नारायण वर्मा से कर दिया गया था, लेकिन महादेवी जी का मन सांसारिक वैवाहिक जीवन में नहीं रमा। वे आजीवन सन्यासिन की तरह श्वेत वस्त्र धारण कर साहित्य साधना और समाज सेवा में लीन रहीं।

शिक्षा-दीक्षा और कार्यक्षेत्र

महादेवी जी की प्रारंभिक शिक्षा इंदौर के मिशन स्कूल में हुई। विवाह के कारण उनकी पढ़ाई में थोड़ा व्यवधान आया, लेकिन उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की और प्रयागराज (इलाहाबाद) के क्रॉस्थवेट गर्ल्स कॉलेज से मिडिल, हाईस्कूल और इंटर की परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में पास कीं। वर्ष 1932 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत विषय में एम.ए. (M.A.) की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा पूरी करने के बाद वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनीं और बाद में वहीं कुलपति के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए जमीनी स्तर पर अभूतपूर्व प्रयास किए।
महादेवी जी के भीतर काव्य के बीज बचपन में ही उनकी माता के धार्मिक गीतों और मीराबाई के पदों को सुनकर पड़ चुके थे। जब वे क्रॉस्थवेट कॉलेज में पढ़ रही थीं, तब उनकी मुलाकात प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान से हुई, जो उनसे वरिष्ठ थीं। सुभद्रा जी ने महादेवी के भीतर छिपे कवि को पहचाना और दोनों मिलकर छिप-छिपकर कविताएँ लिखने लगीं। उनके जीवन में करुणा और वेदना की गहरी पैठ थी, जिसे उन्होंने बौद्ध दर्शन के प्रभाव से 'आध्यात्मिक विरह' में बदल दिया। उन्होंने स्वयं लिखा था कि "दुख मेरे निकट जीवन का ऐसा काव्य है जो सारे संसार को एक सूत्र में बाँध रखने की क्षमता रखता है।" इसी सोच ने उन्हें "मैं नीर भरी दुख की बदली" जैसे कालजयी गीत लिखने की प्रेरणा दी।

पहली रचना

महादेवी वर्मा की प्रारंभिक कविताएँ ब्रजभाषा में थीं, लेकिन जल्द ही वे खड़ी बोली की ओर मुड़ गईं। उनका पहला काव्य-संग्रह 'नीहार' वर्ष 1930 में प्रकाशित हुआ था, जिसकी भूमिका अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने लिखी थी। इस संग्रह की कविताओं में गहरा रहस्यवाद और विरह की भावना स्पष्ट दिखाई देती है।

प्रमुख रचनाएँ एवं उनकी व्याख्या

महादेवी वर्मा का गद्य और पद्य दोनों पर समान अधिकार था। जहाँ उनकी कविताओं में रहस्यमयी वेदना है, वहीं उनका गद्य समाज के दबे-कुचले लोगों और मूक पशु-पक्षियों के प्रति अगाध प्रेम से भरा है। उनकी प्रमुख कृतियों की व्याख्या इस प्रकार है:

  • काव्य कृतियाँ (कविताओं की व्याख्या):

    • नीहार (1930), रश्मि (1932), नीरजा (1934) और सांध्यगीत (1936): इन चारों आरंभिक काव्य-संग्रहों को मिलाकर ही उनकी प्रसिद्ध कृति 'यामा' तैयार की गई थी। इन गीतों में अज्ञात प्रियतम (ईश्वर) के प्रति अनन्य प्रेम, मिलन की व्याकुलता और विरह का ऐसा सुंदर चित्रण है कि इन्हें छायावादी रहस्यवाद का शिखर कहा जाता है।

    • दीपशिखा (1942): इस संग्रह के गीतों में सात्विकता और रहस्य की भावना और अधिक प्रगाढ़ हो जाती है। इसमें 'दीपक' और 'शलभ' (पतंगा) को प्रतीक बनाकर आत्मा-परमात्मा के संबंध को दर्शाया गया है।

  • गद्य साहित्य (रेखाचित्र और संस्मरण):

    • अतीत के चल-चित्र (1941) और स्मृति की रेखाएँ (1943): ये हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ रेखाचित्र माने जाते हैं। इनमें महादेवी जी ने अपने जीवन में आए साधारण चरित्रों (जैसे रामा, भक्तिन, बिंदा, घीसा) के संघर्षपूर्ण जीवन का ऐसा मर्मस्पर्शी चित्रण किया है कि पाठक भावुक हो उठता है।

    • पथ के साथी (1956): इसमें उन्होंने अपने समकालीन साहित्यकारों (जैसे जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, मैथिलीशरण गुप्त) के साथ बिताए संस्मरणों को सहेजा है।

    • मेरा परिवार (1972): इस अनूठी कृति में उन्होंने अपने पाले हुए पशु-पक्षियों (जैसे नीलकंठ मोर, गिल्लू गिलहरी, गौरा गाय, सोना हिरनी) के साथ अपने आत्मीय संबंधों को शब्दों में ढाला है।

  • वैचारिक निबंध:

    • शृंखला की कड़ियाँ (1942): यह हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श (Feminism) का पहला और सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है। इसमें उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं के शोषण, अशिक्षा और उनकी पराधीनता पर अत्यंत तीखे और तार्किक विचार व्यक्त किए हैं।

पुरस्कार एवं सम्मान

महादेवी वर्मा को उनके जीवनकाल में और मरणोपरांत देश के कई सर्वोच्च साहित्यिक और नागरिक पुरस्कारों से अलंकृत किया गया:

  • भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982): उनकी महान काव्य कृति 'यामा' के लिए उन्हें देश के इस सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाली पहली महिला कवयित्री थीं।

  • सकसेरिया पुरस्कार और मंगलाप्रसाद पारितोषिक: उनके काव्य संग्रह 'नीरजा' के लिए उन्हें सकसेरिया पुरस्कार और 'यामा' व 'दीपशिखा' के सामूहिक साहित्यिक अवदान के लिए मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला था।

  • पद्म भूषण (1956) और पद्म विभूषण (1988): भारत सरकार द्वारा उन्हें पहले पद्म भूषण दिया गया और मरणोपरांत 1988 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से नवाजा गया।

  • साहित्य अकादमी फेलोशिप (1979): वे साहित्य अकादमी की फेलो (सदस्य) बनने वाली पहली महिला थीं।

महादेवी जी ने अपना अंतिम समय प्रयागराज में ही साहित्य सृजन और समाज सेवा में बिताया। हिंदी साहित्य की यह अलौकिक 'दीपशिखा' 11 सितंबर, 1987 को हमेशा के लिए बुझ गई, लेकिन अपने कालजयी साहित्य के रूप में वे आज भी अमर हैं।

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इन्हें भी जानें -

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