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मंगलेश डबराल : उत्तराखंड के प्रमुख साहित्यकारों में से एक (भाग -05)

उत्तराखंड के प्रमुख साहित्यकार  आज के लेख में हम मंगलेश डबराल के जीवन परिचय एवं उनकी सभी रचनाओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे। जैसा कि आप सभी जानते हैं हम उत्तराखंड समूह ग की सभी परीक्षाओं हेतु हिन्दी सिलेबस के अनुसार उत्तराखंड के साहित्यकारों की क्रमानुसार अध्ययन कर रहे हैं। इसी क्रम में हम आज भाग -05 में मंगलेश डबराल के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।  मंगलेश डबराल का सम्पूर्ण जीवन परिचय  पहाड़ों से पलायन कोई आज की समस्या नहीं है, पहाड़ों में शुरुआत से ही बेरोजगारी रही है जिस कारण आजीविका की तलाश में वहां के निवासी पलायन करते हैं नौकरी की तलाश में, और एक दिन मंगलेश भी चल‌ पड़ा शहर की ओर  जब वे नौकरी की तलाश में दिल्ली और भोपाल जैसे बड़े शहरों में आए, तो उन्होंने देखा कि कैसे आधुनिकता की दौड़ में मनुष्य अपनी संवेदनाएं और अपनी जड़ें खोता जा रहा है। वे स्वयं संगीत (विशेष रूप से भारतीय शास्त्रीय संगीत) के बहुत शौकीन थे, जिसने उनकी कविताओं को एक आंतरिक लय प्रदान की। उन्होंने महसूस किया कि जो बातें वे अपनी पत्रकारिता की खबरों में नहीं कह पाते, उन्हें व्यक्त करने के लिए कविता ही ...

मंगलेश डबराल : उत्तराखंड के प्रमुख साहित्यकारों में से एक (भाग -05)

उत्तराखंड के प्रमुख साहित्यकार 

आज के लेख में हम मंगलेश डबराल के जीवन परिचय एवं उनकी सभी रचनाओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे। जैसा कि आप सभी जानते हैं हम उत्तराखंड समूह ग की सभी परीक्षाओं हेतु हिन्दी सिलेबस के अनुसार उत्तराखंड के साहित्यकारों की क्रमानुसार अध्ययन कर रहे हैं। इसी क्रम में हम आज भाग -05 में मंगलेश डबराल के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे। 

मंगलेश डबराल का सम्पूर्ण जीवन परिचय 

पहाड़ों से पलायन कोई आज की समस्या नहीं है, पहाड़ों में शुरुआत से ही बेरोजगारी रही है जिस कारण आजीविका की तलाश में वहां के निवासी पलायन करते हैं नौकरी की तलाश में, और एक दिन मंगलेश भी चल‌ पड़ा शहर की ओर जब वे नौकरी की तलाश में दिल्ली और भोपाल जैसे बड़े शहरों में आए, तो उन्होंने देखा कि कैसे आधुनिकता की दौड़ में मनुष्य अपनी संवेदनाएं और अपनी जड़ें खोता जा रहा है। वे स्वयं संगीत (विशेष रूप से भारतीय शास्त्रीय संगीत) के बहुत शौकीन थे, जिसने उनकी कविताओं को एक आंतरिक लय प्रदान की। उन्होंने महसूस किया कि जो बातें वे अपनी पत्रकारिता की खबरों में नहीं कह पाते, उन्हें व्यक्त करने के लिए कविता ही सबसे सशक्त माध्यम है। महान कवि मुक्तिबोध और निराला के साहित्य ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने बड़े शहरों में हाशिए पर धकेले गए आम आदमी, कुलियों, मजदूरों और अपनी संस्कृति से कटे हुए प्रवासियों के दर्द को अपनी कविताओं का नायक बनाया।

मंगलेश डबराल का उत्तराखंड की पहाड़ी, चेतना समकालीन समाज के यथार्थ और विस्थापन के दर्द को अपनी कविताओं में पिरोने वाले सुप्रसिद्ध कवि और पत्रकार है डबराल का आधुनिक हिंदी कविता में एक विशिष्ट योगदान है उन्होंने अपनी सादगी पूर्ण लेकिन दिल को झकझोर देने वाली भाषा से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। तो आइए जानते हैं मंगलेश डबराल का जीवन परिचय एवं उनकी प्रमुख रचनाएं।

जीवन परिचय 



मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई, 1948 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के 'काफलपानी' नामक गांव में हुआ था। उनका बचपन पहाड़ की नैसर्गिक सुंदरता, कठिन जीवन और वहां की लोक-संस्कृति के बीच बीता। उनके पिता का नाम मित्रानंद डबराल था। मंगलेश जी का अपनी जन्मभूमि और पहाड़ के जीवन से बहुत गहरा लगाव था, जो बाद में उनकी कविताओं का मुख्य आधार बना। हालांकि, रोजगार और आजीविका की तलाश में उन्हें अपना गांव छोड़ना पड़ा, और इस 'घर छूटने' का दर्द व विस्थापन की पीड़ा उनके पूरे जीवन और साहित्य में एक स्थाई भाव बनकर उभरती रही।

प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा

मंगलेश जी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उत्तराखंड के देहरादून में हुई। उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपनी आजीविका के रूप में पत्रकारिता को चुना। वे देश के कई बड़े और प्रतिष्ठित हिंदी समाचार पत्रों व पत्रिकाओं से जुड़े रहे। उन्होंने दिल्ली में 'पेट्रियट', 'प्रतिपक्ष' और 'आसपास' जैसी पत्रिकाओं में काम किया। इसके बाद वे भोपाल चले गए, जहाँ वे मध्य प्रदेश कला परिषद से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध त्रैमासिक 'पूर्वाग्रह' के सहायक संपादक रहे। उन्होंने लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित 'अमृत प्रभात' में भी अपनी सेवाएँ दीं। इसके बाद वे लंबे समय तक प्रसिद्ध राष्ट्रीय दैनिक 'जनसत्ता' में साहित्य संपादक के पद पर रहे और कुछ समय तक 'सहार समय' का संपादन भी किया। पत्रकारिता के इस लंबे सफर ने उनकी भाषा को बहुत धारदार, सटीक और जनसरोकार से जुड़ा हुआ बनाया।

पहली रचना - पहाड़ पर लालटेन 

मंगलेश डबराल जी का पहला कविता-संग्रह 'पहाड़ पर लालटेन' वर्ष 1981 में प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह ने आते ही हिंदी साहित्य जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस संग्रह की कविताएँ पहाड़ के एकांत, वहां के कठिन संघर्ष और आधुनिक सभ्यता के क्रूर प्रभाव को बहुत ही कोमल और मारक ढंग से प्रस्तुत करती हैं। 'पहाड़ पर लालटेन' आज भी समकालीन हिंदी कविता के सबसे महत्वपूर्ण संग्रहों में से एक माना जाता है।

मंगलेश डबराल की प्रमुख रचनाएं 

मंगलेश डबराल मूलतः कवि थे, लेकिन उन्होंने बेहतरीन गद्य और यात्रा-वृत्तांत भी लिखे। उनकी प्रमुख रचनाओं की व्याख्या इस प्रकार है:

प्रसिद्ध कविता संग्रह (काव्य कृतियाँ):

  • पहाड़ पर लालटेन (1981): इसमें संकलित कविताएँ मनुष्य की जिजीविषा (जीने की इच्छा) और संघर्ष की प्रतीक हैं। जैसे घने अंधेरे में एक छोटी सी लालटेन रास्ता दिखाती है, वैसे ही ये कविताएँ संकट के दौर में मानवीयता को बचाए रखने का संदेश देती हैं।
  • घर का रास्ता (1988): इस संग्रह में विस्थापन और अपने छूटे हुए घर की याद का बहुत गहरा दर्द है। यह उस आधुनिक मनुष्य की कहानी है जो शहर में तो बस गया है, लेकिन उसका मन हमेशा अपने गांव की गलियों को ढूंढता रहता है।
  • हम जो देखते हैं (1995): इस संग्रह की कविताओं में समाज के बदलते दौर, उपभोक्तावादी संस्कृति और उसमें पीसते जा रहे आम आदमी पर तीखा व्यंग्य है। यह समाज की बनावटी सच्चाई को बेनकाब करती है।
  • आवाज़ भी एक जगह है और नये युग में शत्रु: इन संग्रहों में कवि की चेतना और अधिक राजनीतिक और सामाजिक हो जाती है। वे सत्ता के क्रूर चेहरे और मनुष्य के भीतर खत्म होती जा रही दया-करुणा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं।

गद्य और यात्रा-साहित्य:

  • एक बार आयोवा: यह उनका एक प्रसिद्ध यात्रा-संस्मरण है, जो उन्होंने अमेरिका की अपनी यात्रा के अनुभवों के आधार पर लिखा था। इसमें पाश्चात्य समाज और भारतीय जीवन मूल्यों की तुलना बहुत खूबसूरती से की गई है।
  • लेखक की रोटी और कवि का अकेलापन : ये उनके प्रसिद्ध वैचारिक और आलोचनात्मक निबंधों के संग्रह हैं, जिनमें उन्होंने साहित्य, कला, संगीत और समकालीन समाज की समस्याओं पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया है।

पुरस्कार और सम्मान 

मंगलेश डबराल जी को उनकी विशिष्ट और जनवादी काव्य शैली के लिए कई बड़े राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया:
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (2000): उनके सुप्रसिद्ध कविता संग्रह 'हम जो देखते हैं' के लिए उन्हें देश के इस सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • शमशेर सम्मान और कुमार विकल स्मृति पुरस्कार: समकालीन हिंदी कविता में उनके अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें 'शमशेर सम्मान' और 'कुमार विकल पुरस्कार' जैसे गौरवशाली सम्मानों से विभूषित किया गया था।
  • ओमप्रकाश स्मृति सम्मान और श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार: साहित्य में लगातार सक्रिय रहने और आम आदमी की आवाज बनने के लिए उन्हें इन प्रतिष्ठित संस्थागत पुरस्कारों से भी नवाजा गया था।
वर्ष 2020 में कोरोना महामारी (Covid-19) के संक्रमण के कारण देश ने इस महान कवि को खो दिया। 9 दिसंबर, 2020 को दिल्ली के एक अस्पताल में हिंदी कविता की यह अनूठी और शांत आवाज हमेशा के लिए मौन हो गई। मंगलेश डबराल का जाना समकालीन साहित्य के एक युग का अंत था, लेकिन उनकी कविताएँ आज भी अन्याय के खिलाफ और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती हैं।

स्रोत - उपरोक्त लेख में दी गई सम्पूर्ण जानकारी विभिन्न पुस्तकों जैसे बीएस नेगी, परीक्षा वाणी, एवं बेवसाइट विकिपीडिया एवं स्वयं के द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से तैयार किए गये हैं। इसी प्रकार उत्तराखंड के सभी साहित्यकारों और उत्तराखंड के अन्य नोट्स प्राप्त करने के लिए हमसे अवश्य जुड़े। 

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