सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

एसडीजी रिपोर्ट 2023-24 (उत्तराखंड को मिला पहला स्थान)

सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) रिपोर्ट 2023-24 रिपोर्ट जारी करने की तिथि - 12 जुलाई 2024 रिपोर्ट जारी कर्त्ता - नीति आयोग  वैश्विक जारी कर्त्ता - संयुक्त राष्ट्र  भारत में उत्तराखंड को सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) रिपोर्ट 2023-24 में पहला स्थान प्राप्त हुआ है।  12 जुलाई 2024 को नीति आयोग द्वारा सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) रिपोर्ट 2023-24 जारी की गई है। यह रिपोर्ट भारत के 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करती है। उत्तराखंड और केरल राज्य ने 79 अंकों के साथ शीर्ष स्थान हासिल किया, जबकि दूसरे स्थान पर तमिलनाडु (78 अंक) और तीसरे स्थान पर गोवा (77 अंक) रहा। प्रथम स्थान - उत्तराखंड व केरल दूसरा स्थान - तमिलनाडु  तीसरा स्थान - गोवा  उत्तराखंड ने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, ऊर्जा, और बुनियादी ढांचे जैसे कई लक्ष्यों में उल्लेखनीय प्रगति की है। सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) क्या है? एसडीजी का आशय सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals) से है। यह 17 वैश्विक लक्ष्य हैं जिन्हें 2030 तक प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। इन लक्ष्यों को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2015 में अप

उत्तराखंड का इतिहास : चंद राजवंश (भाग-3)

     उत्तराखंड का इतिहास

         चंद राजवंश का इतिहास

  भाग-3

नमस्कार मित्रों उत्तराखंड के इतिहास में चंद राजवंश का यह तीसरा भाग है। जिसमें चंद वंश के शेष सभी राजाओं का वर्णन है । देवभूमिउत्तराखंड.com द्वारा बहुत ही सरल भाषा में आपके समक्ष उत्तराखंड के संपूर्ण नोट्स उपलब्ध कराए जा रहे हैं । जिनका आगामी उत्तराखंड की परीक्षाओं में लाभ उठा सकते हैं। इससे पहले कत्यूरी राजवंश के और चंद्र वंश के शार्ट नोट्स तैयार किए गए थे। जिनका लिंक नीचे दिया गया है वहां से पढ़ सकते हैं।

त्रिमल चंद (1625 - 1638 ईसवी )

लक्ष्मीचंद के पश्चात उसका योग्यतम पुत्र  त्रिमल चंद गद्दी पर बैठा। त्रिमल चंद ने गढ़वाल अभियान में अपने पिता की पूरी सहायता की थी। गड्यूडा़ ताम्रपत्र से पता चलता है कि चंद वंश में आंतरिक गृह क्लेश की घटना घटित हुई थी।  1616 से युवराज के रूप में 5 वर्ष तक शासन किया । क्योंकि लक्ष्मीचंद बूढ़ा हो गया था । लेकिन लक्ष्मी चंद की मृत्यु के बाद 1621 में दिलीप चंद गद्दी पर बैठता है। जो 1624 तक शासन करता है। 1624 के बाद विजय चंद राजा बनता है और वह केवल 2 वर्ष  ही शासन कर पाता है और एक षड्यंत्र में मारा जाता है। षड्यंत्र का रचयिता श्री त्रिमल चंद होता है। विजय चंद की मृत्यु के पश्चात 1625 ईसवी से त्रिमल चंद वास्तविक शासक के रूप में 1638 तक शासन करता है। आपसी लड़ाई  की वजह से क्षेत्रीय शक्तियों ने विद्रोह कर दिया था। आंतरिक  गृह क्लेश निपटने के बाद त्रिमल चंद सबसे पहले छखाता(भीमताल के निकट) , ध्यानीरों  के खसों के विद्रोह को दबाया और शासन में स्थिरता स्थापित की।

बाज बहादुर चंद (1638 - 1678 ईसवी)

बाज बहादुर चंद दिल्ली के सुल्तान शाहजहां और औरंगजेब के समकालीन था। बाज बहादुर एक प्रतापी शासक था उसने साम्राज्य विस्तार की नीति को अपनाया । शुरुआती शासनकाल में ही चौरासी माल अर्थात तराई क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। जबकि वह दिल्ली के बादशाहों द्वारा अधिकृत क्षेत्र था जहां से उन्हें कर प्राप्त होता था। । जिसके बाद उसने शाहजहां को चंवर,  कस्तूरी , निरबीसी, गजशाह, घोड़े, खांडा, खुकरी तथा सोने-चांदी के बर्तन भेंट करने पड़े। चौरासी कोस में अधिकार होने से चंद राजाओं को प्रतिवर्ष 9 लाख रुपए की आमदनी होती थी। शाहजहां ने गढ़वाल पर आक्रमण किया था। जिसमें बाज बहादुर ने मदद की । इसके बाद बाज बहादुर चंद को भी जमीदार की पदवी मिल गई । 
                   बाद बाज बहादुर चंद ने एक सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था स्थापित की। और अपनी यादगार में तराई क्षेत्र में बाजपुर नगर की स्थापना की। बाज बहादुर ने साम्राज्य विस्तार में अहम भूमिका निभाई । समस्त तराई क्षेत्र पर कब्जा करने के बाद गढ़वाल पर भी हमला किया और कत्यूर कुवंरो को गढ़वाल जाने पर मजबूर किया है । यहीं पर एक प्रसिद्ध घटना घटित होती है।

                     तीलू रौतेली की कहानी

तीलू रौतेली (तिलोत्तमा देवी ) गढ़वाल के एक थोकदार (प्रमुख सभासद) रावत भूपि सिंह की  पुत्री थी। जब राजा बाज बहादुर द्वारा कत्यूरी-कुवंरो को गढ़वाल की तरफ खदेड़ा गया। तब गढ़वाल में कत्यूरियों ने लूट-पाट मचानी शुरू कर दी। उस समय गढ़वाल में परमारों का शासन था। कत्यूरियों के आतंक को रोकने के लिए गढ़वाली सैनिक आए तो दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ। और उस युद्ध के दौरान रावत भूपी सिंह के दोनों पुत्रों की मृत्यु हो गई। तब  भाइयों की मौत का बदला लेने के लिए तीलू रौतेली जो कि मात्र 15 वर्ष की थी। उसनेे सबसे पहले  बिखरी हुई सेना को एकत्रित किया। कोली राजपूतों,  रावत , नेगी, सज्वाण, असवाल आदि जातियों को मिलाकर एक सुदृढ़ फौज तैयार की। बर्किंडा में पहली लड़ाई  में कुमाऊं के उपद्रवियों को राज्य सीमा से बाहर खदेड़ दिया। उसने लगातार 7 वर्षों तक राज्य सीमा की सुरक्षा के लिए संघर्ष किया और तीन बड़े युद्ध लड़े। बर्किंडा में पहली लड़ाई लड़ी। उसके पश्चात ही देघाट ,  तामाढौधान, टकौलीखाल में  नियंत्रण स्थापित किया। कलिंकाखाल प्रसिद्ध  दूसरी लड़ाई में गढ़वाल की इस सेना ने कुमाऊं की सेना के छक्के छुड़ा दिए। और अंतिम युद्ध खेरागढ़ पर हुआ । जिसमें  विजय प्राप्त की । इस प्रकार शत्रुओं के विरुद्ध युद्धरत रहने व अपने देश की आन बान शान के लिए अपनी जान की बाजी लगा चुकने के बाद जब यह वीरांगना थकी-हारी पूर्वी नायर नदी में नहा रही थी। तभी एक शत्रु ने तलवार से उसकी गर्दन उड़ा दी। 

तीलू रौतेली भारत के उन महान वीरांगनाओं में शामिल है। जिन्होंने अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए रणभूमि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। तीलू रौतेली महिला सशक्तिकरण के लिए प्रेरणा देने वाली हस्ती है। इसलिए इस बात का ध्यान रखते हुए उत्तराखंड सरकार ने "तीलू रौतेली पेंशन" योजना प्रारंभ की है जिसका उद्देश्य खेतों में काम करने के दौरान हुई विकलांग महिलाओं का आर्थिक सहायता प्रदान करना है। तीलू रौतेली को गढ़वाल की झांसी भी कहा जाता है। गढ़वाल में 8 अगस्त को इनकी जयंती मनाई जाती है। इन्होंने 13 गणों पर विजय प्राप्त की थी। और मात्र 22 वर्ष की उम्र में वीरगति प्राप्त की।

बाज बहादुर चंद द्वारा कराए गए कार्य

  • बाजबहादुर चंद ने 'पट्टी' नामक प्रशासनिक इकाई की स्थापना की।
  • बाज बहादुर ने कैलाश मानसरोवर के तीर्थ यात्रियों के लिए 1673 इसमें गूंठ भूमि दान दी थी। (गूंठ उस भूमि को कहते हैं जिसे मंदिरों की देखभाल में खर्च होने वाले अनाज ......आदि व्यवस्था के लिए पुजारियों को दिया जाता है)
  • भौटियों वह शौकाओ द्वारा बात  तिब्बत को दी जाने वाली दस्तूर (कर ) पर रोक लगाई थी।
  • बाज बहादुर चंद द्वारा थल (पिथौरागढ़) एक हथिया देवाल मंदिर बनवाया। इसे एकाश्म  मंदिर भी कहा जाता है। क्योंकि मंदिर को एक बड़े पत्थर से तराश कर बनाया गया है । इसकी बनावट एलोरा के मंदिर जैसी है। इसलिए इसे "कुमाऊ का एलोरा मंदिर" भी कहा जाता है।

उद्योत चंद (1678-1691 ईसवी )

उद्योत चंद गढ़वाल में मेदिनशाह और डोटी (नेपाल) का राजा देवपाल के समकालीन था। चंद राजाओं में भारती चंद के बाद दूसरा राजा जिसने नेपाल पर आक्रमण कर वहां की ग्रीष्मकालीन राजधानी अजमेर गढ़ पर अधिकार किया। नाम से ही प्रचंड उद्योत चंद गद्दी पर आसीन होते ही गढ़वाल पर आक्रमण कर दिया । इसके समय गढ़वाल में मेदिनशाह और डोटी (नेपाल) का राजा देवपाल के बीच उद्योत चंद को हराने और उसके राज्य पर कब्जा करने की संधि हुई। उद्योग चंद के राज्याभिषेक के दो-तीन वर्ष के अंदर ही दोनों शासकों ने कुमाऊं में आक्रमण कर दिया । मेदिनीशाह ने दूनागिरी व द्वाराहाट पर हमला कर दिया। दूसरी तरफ डोटी नरेश देव पाल ने चंदों की पुरानी राजधानी चंपावत पर हमला कर उस पर अधिकार कर लिया। उद्योत चंद कुशल और प्रतापी शासक था। उसने कुछ ही समय बाद दोनों राजाओं को राज्य सीमा से बाहर खदेड़ दिया। और कुशल प्रशासन व्यवस्था स्थापित की। राज्य की सीमा द्वाराहाट, दूनागिरी , चंपावत, सोर और ब्रह्मदेव में सैनिक छावनी स्थापित की। देवपाल और उद्योत चंद के बीच लंबे समय तक संघर्ष और आक्रमण होते रहे। जिसमें उद्योग चंद सदैव विजय होता था।
                    एक बार उद्योत चंद अजमेर गढ़ की विजय से वापस अपनी राजधानी आ रहा था। तो डोटी नरेश ने पुनः सीमाओं पर उपद्रव करना प्रारंभ कर दिया । तब उद्योत चंद को पुनः डोटी पर चढ़ाई करनी पड़ी। और इस बार आक्रमण में कुमाऊनी सेना ने उसे शीतकालीन राजधानी जुराइल-दिवापाल से भी भगाकर देश के खैरागढ़ नामक किले में शरण लेने पर मजबूर कर दिया । उद्योत चंद के सेनापति का नाम हिरू देउबा था । जो इस अभियान में मारा गया। इस तरह लगातार पराजय होने के कारण दोनों के बीच संधि हुई। संधि के अनुसार डोटी नरेश को कर ( tax) देना था। 1696 ईसवी में जब डोटी नरेश ने उद्योत चंद को कर देना बंद कर दिया। तो उद्योग चंद ने डोटी पर पुनः आक्रमण कर दिया। लेकिन इस बार जो जुराइल-दिवापाल  कोर्ट में भीषण संग्राम के बाद उद्योत चंद की हार हुई। उद्योत चंद को जान बचाने के लिए भागना पड़ा । सेना में भगदड़ मच गई। शिरोमणि जोशी के साथ जो सैनिक भाग नहीं पाए। उनको सभी को मौत के घाट उतार दिया गया। इस युद्ध से उद्योत चंद इतना दुखी हो गया कि उसने युद्ध करने से तौबा कर लिया और शांति की खोज में लग गया। शेष जीवन उसने धर्म-कर्म में लगाना प्रारंभ कर दिया। मंदिर और पूजा पाठ में ध्यान केंद्रित किया।
ताम्रपत्र बरम - यह ताम्रपत्र (मुवानी-पिथौरागढ़़) से प्राप्त हुआ है । इसमें उद्योत चंद की धाई माता की बीमारी का उल्लेख है। जिसका इलाज राजवैद्य वरदेव जोशी करते हैं।  धाई माता के ठीक हो जाने पर उद्योत चंद  राजवैद्य को भूमि  दान में    दे ता  है। जिसका उल्लेख इसमें किया गया है।

ज्ञान चंद (1698-1708 ईसवी तक )

ज्ञानचंद अपने पिता की ही भांति बलवान और तेजस्वी था। पूर्ववर्ती राजाओं के भांति ही इसने भी गढ़वाल पर आक्रमण किया। गद्दी पर बैठने के बाद सबसे पहले आक्रमण पिंडर घाटी में करता है। थराली जो कि एक उपजाऊ क्षेत्र था उसको लूटते हुए 1699 ईस्वी में बांधवगढ़ पर विजय प्राप्त करता है। यहीं से नंदा देवी की स्वर्ण प्रतिमा लेकर अल्मोड़ा में नंदा देवी मंदिर की स्थापना करता है। 1 वर्ष पश्चात तीलू रौतेली द्वारा विजित साबली, खाटली, व सेंधधार पर पुनः कब्जा कर लेता है। 1704 ईस्वी में डोटी पर विजय प्राप्त कर पिता की हार का बदला लेता है। इसी अभियान के दौरान कुमाऊनी सेना मलेरिया की शिकार हो जाती है । जिसके कारण ज्ञानचंद वापस राजधानी चला जाता है।
                ज्ञानचंद की देवी देवताओं में विशेष रूचि थी पिता की भांति अनेकों मंदिर और धर्म स्थलों का निर्माण कराया। मुख्यतः डोटी अभियानों के दौरान सोर व सीरा में उद्योत चंद और ज्ञान चंद ने चौपाला, नकुलेश्वर, कासनी , मसौली आदि मंदिर चंद शैली में बनवाए । उनके द्वारा बनाए गए मंदिरों को देवल कहा जाता था।।

जगत चंद (1708-1720 ईसवी )

चंद्र वंश का अंतिम प्रतापी शासक जगत चंद था। इसके बाद चंद राजवंश की अवनति प्रारंभ हो जाती है। इसने पिता और दादा जी के द्वारा विजित क्षेत्र पर अधिकार कायम रखा। साथ ही राज्य के विकास के लिए अनेकों निर्माण कार्य कराएं। जुआरियों पर कर लगाया। जगत चंद का काल चंदों के इतिहास में सर्वाधिक उत्कर्ष का काल  था । कुछ इतिहासकार ने जगत चंद के शासनकाल को कुमाऊ के स्वर्णकाल के नाम से संबोधित किया है। इसने गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर के शासक फतेहशाह पर आक्रमण करके अपने अधीन कर लिया। और पहली बार संपूर्ण  उत्तराखंड पर चंद वंश का शासन स्थापित किया। कुछ समय बाद ही जगत चंद की  चेचक की बीमारी से मृत्यु हो जाती है।

देवी चंद (1720 - 1728)

जगत चंद की मृत्यु के पश्चात उसका बड़ा पुत्र देवी चंद गद्दी पर बैठता है। देवी चंद भी गढ़वाल पर अधिकार बनाए रखना चाहता था। इसलिए वह भी उस पर आक्रमण करता है । पिता के द्वारा अपार धन लूटने के कारण खजाना भरा हुआ था। लेकिन देवी चंद चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की कहानियों से प्रेरित होकर कुमाऊ का विक्रमादित्य बनने के चक्कर में सारा धन अपने चाटुकार और पंडितों को दान दक्षिणा में दे देता है । जिसके बाद खजाना खाली हो जाता है। और यहीं से कुमाऊं की अवनति प्रारंभ हो जाती है । इतिहासकारों ने देवी चंद को कुमाऊ का मोहम्मद तुगलक कहा है।

अजीत चंद 
कल्याण चंद बहादुर
दीपचंद
मोहन चंद
प्रद्युम्न चंद
शिवचंद
महेंद्र चंद्र

उपरोक्त सभी शासक देवी चंद के बाद कुमाऊं पर शासन करते हैं। चंद्रवंशी की अवनति हो जाने के कारण इन सभी शासकों का उल्लेख बहुत कम मिलता है । इसमें केवल कल्याण चंद बहादुर के दौरान घटित घटनाओं का वर्णन ताम्रपत्रों में मिलता है। जिसका शासन काल 1730 से 1747 ईसवी के बीच बताया जाता है। कल्याण चंद एक कमजोर और भोग विलासी शासक था जो गढ़वालियों से डरकर नेपाल भाग गया था। बाद में अनूप सिंह तडांग  द्वारा कल्याण चंद को वापस लाया गया । और गद्दी पर बिठाया गया । यह एक अत्याचारी शासक था । सबसे पहले आरामदायक जीवन के लिए अल्मोड़ा में  चौमहला महल बनवाया । इसी के समय 1743-1744 ईस्वी में रुहेलखंड (कटेहरा) के सरदार अली मोहम्मद खां ने कुमाऊं पर आक्रमण कर दिया। और खूब लूट मचाई। भीमताल के निकट छकाता परगना में दोनों का घमासान युद्ध हुआ। इसमें कल्याण चंद की करारी हार हुई। कल्याण चंद जान बचाते हुए गढ़वाल की ओर भाग गया । इस तरह  राजधानी अल्मोड़ा रुहेलों  के हाथों आ गया। उसके बाद अवध के नवाब मंसूर अली खान ने कुमाऊं राज्य के तराई क्षेत्र पर बिलारी और सरवाना ग्रामों पर अधिकार कर लिया।

चंद्र वंश से संबंधित प्रश्न:-

नीचे दिए गए सभी प्रश्न उत्तराखंड कि किसी ना किसी परीक्षा में आए हुए हैं अतः ध्यान पूर्वक लेख को पढ़कर इनका उत्तर दें:-

(1) चंद्र वंश का अंतिम शासक कौन था ?
(a) विक्रम चंद
(b) इंद्र चंद
(c) महेंद्र चंद
(d) पूर्ण चंद

(2) उद्योत चंद के राजवैद्य का क्या नाम था ?
(a) सदानंद
(b) शिरोमणि
(c) वरदेव जोशी
(d) इनमें से कोई नहीं

(3) अल्मोड़ा में नंदा देवी मंदिर का निर्माण किस शासक द्वारा कराया गया था?
(a) विक्रम चंद
(b) ज्ञान चंद
(c) महेंद्र चंद
(d) उद्योत चंद

(4) उद्योत चंद के सेनापति का क्या नाम था ?
(a) शिरोमणि
(b) हिरू देउबा
(c) देवपाल
(d) मेदिनीशाह

(5) निम्न में से कौन सा शासक 1704 ईस्वी में डोटी (नेपाल) पर विजय प्राप्त कर के पिता की हार का बदला लेता है ?
(a) कल्याण चंद
(b) इंद्र चंद
(c) महेंद्र चंद
(d) ज्ञान चंद

(6) डोटी नरेश देवपाल और गढ़वाल नरेश मेदिनीशाह किस चंद शासक के समकालीन थे?
(a) जगत चंद
(b) इंद्र चंद
(c) उद्योत चंद
(d) इनमें से कोई नहीं

(7) रूहेलों ने कुमाऊं पर किस चंद शासक के शासनकाल में आक्रमण किया था ?
(a) विक्रम चंद
(b) देवी चंद
(c) जगत चंद
(d) कल्याण चंद

(8) कुमाऊं के एलोरा मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हथिया देवाल उत्तराखंड के किस जिले में स्थित है ?
(a) अल्मोड़ा
(b) बागेश्वर
(c) पिथौरागढ़
(d) चंपावत

(9) निम्न में से गढ़वाल की झांसी किसे कहा जाता है ?
(a) लक्ष्मी बाई
(b) तीलू रौतेली
(c) अनुराधा जोशी
(d) ललिता देवी

(10) चंद्र वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक कौन था ?
(a) विक्रम चंद
(b) महेंद्र चंद
(c) देवी चंद
(d) जगत चंद

Answer :- (1)c, (2)c, (3)b, (4)b, (5)d, (6)c, (7)d,  (8)c, (9)b, (10)d

यदि आपको हमारी पोस्ट अच्छी लगती है तो कमेंट और शेयर जरूर करें। ताकि हम आपके लिए और भी नई परीक्षापयोगी जानकारियां उपलब्ध करा सकें। हमारा उद्देश्य उत्तराखंड के सभी प्रतियोगी परीक्षार्थियों को एक मंच उपलब्ध कराना है ।जिसमें विभिन्न परीक्षा की जानकारियों के करंट अफेयर और उत्तराखंड के स्थलों का वर्णन है।

Related post :-




टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

If you have any doubts.
Please let me now.

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

परमार वंश - उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

उत्तराखंड का इतिहास History of Uttarakhand भाग -1 परमार वंश का इतिहास उत्तराखंड में सर्वाधिक विवादित और मतभेद पूर्ण रहा है। जो परमार वंश के इतिहास को कठिन बनाता है परंतु विभिन्न इतिहासकारों की पुस्तकों का गहन विश्लेषण करके तथा पुस्तक उत्तराखंड का राजनैतिक इतिहास (अजय रावत) को मुख्य आधार मानकर परमार वंश के संपूर्ण नोट्स प्रस्तुत लेख में तैयार किए गए हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में 688 ईसवी से 1947 ईसवी तक शासकों ने शासन किया है (बैकेट के अनुसार)।  गढ़वाल में परमार वंश का शासन सबसे अधिक रहा।   जिसमें लगभग 12 शासकों का अध्ययन विस्तारपूर्वक दो भागों में विभाजित करके करेंगे और अंत में लेख से संबंधित प्रश्नों का भी अध्ययन करेंगे। परमार वंश (गढ़वाल मंडल) (भाग -1) छठी सदी में हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात संपूर्ण उत्तर भारत में भारी उथल-पुथल हुई । देश में कहीं भी कोई बड़ी महाशक्ति नहीं बची थी । जो सभी प्रांतों पर नियंत्रण स्थापित कर सके। बड़े-बड़े जनपदों के साथ छोटे-छोटे प्रांत भी स्वतंत्रता की घोषणा करने लगे। कन्नौज से सुदूर उत्तर में स्थित उत्तराखंड की पहाड़ियों में भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्

चंद राजवंश : उत्तराखंड का इतिहास

चंद राजवंश का इतिहास पृष्ठभूमि उत्तराखंड में कुणिंद और परमार वंश के बाद सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजवंश है।  चंद वंश की स्थापना सोमचंद ने 1025 ईसवी के आसपास की थी। वैसे तो तिथियां अभी तक विवादित हैं। लेकिन कत्यूरी वंश के समय आदि गुरु शंकराचार्य  का उत्तराखंड में आगमन हुआ और उसके बाद कन्नौज में महमूद गजनवी के आक्रमण से ज्ञात होता है कि तो लगभग 1025 ईसवी में सोमचंद ने चंपावत में चंद वंश की स्थापना की है। विभिन्न इतिहासकारों ने विभिन्न मत दिए हैं। सवाल यह है कि किसे सच माना जाए ? उत्तराखंड के इतिहास में अजय रावत जी के द्वारा उत्तराखंड की सभी पुस्तकों का विश्लेषण किया गया है। उनके द्वारा दिए गए निष्कर्ष के आधार पर यह कहा जा सकता है । उपयुक्त दिए गए सभी नोट्स प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से सर्वोत्तम उचित है। चंद राजवंश का इतिहास चंद्रवंशी सोमचंद ने उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में लगभग 900 वर्षों तक शासन किया है । जिसमें 60 से अधिक राजाओं का वर्णन है । अब यदि आप सभी राजाओं का अध्ययन करते हैं तो मुमकिन नहीं है कि सभी को याद कर सकें । और अधिकांश राजा ऐसे हैं । जिनका केवल नाम पता है । उनक

उत्तराखंड में भूमि बंदोबस्त का इतिहास

  भूमि बंदोबस्त व्यवस्था         उत्तराखंड का इतिहास भूमि बंदोबस्त आवश्यकता क्यों ? जब देश में उद्योगों का विकास नहीं हुआ था तो समस्त अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। उस समय राजा को सर्वाधिक कर की प्राप्ति कृषि से होती थी। अतः भू राजस्व आय प्राप्त करने के लिए भूमि बंदोबस्त व्यवस्था लागू की जाती थी । दरअसल जब भी कोई राजवंश का अंत होता है तब एक नया राजवंश नयी बंदोबस्ती लाता है।  हालांकि ब्रिटिश शासन से पहले सभी शासकों ने मनुस्मृति में उल्लेखित भूमि बंदोबस्त व्यवस्था का प्रयोग किया था । ब्रिटिश काल के प्रारंभिक समय में पहला भूमि बंदोबस्त 1815 में लाया गया। तब से लेकर अब तक कुल 12 भूमि बंदोबस्त उत्तराखंड में हो चुके हैं। हालांकि गोरखाओ द्वारा सन 1812 में भी भूमि बंदोबस्त का कार्य किया गया था। लेकिन गोरखाओं द्वारा लागू बन्दोबस्त को अंग्रेजों ने स्वीकार नहीं किया। ब्रिटिश काल में भूमि को कुमाऊं में थात कहा जाता था। और कृषक को थातवान कहा जाता था। जहां पूरे भारत में स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी बंदोबस्त और महालवाड़ी बंदोबस्त व्यवस्था लागू थी। वही ब्रिटिश अधिकारियों ने कुमाऊं के भू-राजनैतिक महत्

ब्रिटिश कुमाऊं कमिश्नर : उत्तराखंड

ब्रिटिश कुमाऊं कमिश्नर उत्तराखंड 1815 में गोरखों को पराजित करने के पश्चात उत्तराखंड में ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से ब्रिटिश शासन प्रारंभ हुआ। उत्तराखंड में अंग्रेजों की विजय के बाद कुमाऊं पर ब्रिटिश सरकार का शासन स्थापित हो गया और गढ़वाल मंडल को दो भागों में विभाजित किया गया। ब्रिटिश गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल। अंग्रेजों ने अलकनंदा नदी का पश्चिमी भू-भाग पर परमार वंश के 55वें शासक सुदर्शन शाह को दे दिया। जहां सुदर्शन शाह ने टिहरी को नई राजधानी बनाकर टिहरी वंश की स्थापना की । वहीं दूसरी तरफ अलकनंदा नदी के पूर्वी भू-भाग पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। जिसे अंग्रेजों ने ब्रिटिश गढ़वाल नाम दिया। उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन - 1815 ब्रिटिश सरकार कुमाऊं के भू-राजनीतिक महत्व को देखते हुए 1815 में कुमाऊं पर गैर-विनियमित क्षेत्र के रूप में शासन स्थापित किया अर्थात इस क्षेत्र में बंगाल प्रेसिडेंसी के अधिनियम पूर्ण रुप से लागू नहीं किए गए। कुछ को आंशिक रूप से प्रभावी किया गया तथा लेकिन अधिकांश नियम स्थानीय अधिकारियों को अपनी सुविधानुसार प्रभावी करने की अनुमति दी गई। गैर-विनियमित प्रांतों के जिला प्रमु

उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व एवं स्वतंत्रता सेनानी

उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व उत्तराखंड की सभी परीक्षाओं हेतु उत्तराखंड के प्रमुख व्यक्तित्व एवं स्वतंत्रता सेनानियों का वर्णन 2 भागों में विभाजित करके किया गया है । क्योंकि उत्तराखंड की सभी परीक्षाओं में 3 से 5 मार्क्स का उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान अवश्य ही पूछा जाता है। अतः लेख को पूरा अवश्य पढ़ें। दोनों भागों का अध्ययन करने के पश्चात् शार्ट नोट्स पीडीएफ एवं प्रश्नोत्तरी पीडीएफ भी जरूर करें। भाग -01 उत्तराखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी [1] कालू महरा (1831-1906 ई.) कुमाऊं का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) "उत्तराखंड का प्रथम स्वतंत्रा सेनानी" कालू महरा को कहा जाता है। इनका जन्म सन् 1831 में चंपावत के बिसुंग गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम रतिभान सिंह था। कालू महरा ने अवध के नबाब वाजिद अली शाह के कहने पर 1857 की क्रांति के समय "क्रांतिवीर नामक गुप्त संगठन" बनाया था। इस संगठन ने लोहाघाट में अंग्रेजी सैनिक बैरकों पर आग लगा दी. जिससे कुमाऊं में अव्यवस्था व अशांति का माहौल बन गया।  प्रथम स्वतंत्रता संग्राम -1857 के समय कुमाऊं का कमिश्नर हेनरी रैम्

उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न (उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14)

उत्तराखंड प्रश्नोत्तरी -14 उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां वर्ष 1965 में केंद्र सरकार ने जनजातियों की पहचान के लिए लोकर समिति का गठन किया। लोकर समिति की सिफारिश पर 1967 में उत्तराखंड की 5 जनजातियों थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा, और राजी को एसटी (ST) का दर्जा मिला । राज्य की मात्र 2 जनजातियों को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है । सर्वप्रथम राज्य की राजी जनजाति को आदिम जनजाति का दर्जा मिला। बोक्सा जनजाति को 1981 में आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त हुआ था । राज्य में सर्वाधिक आबादी थारू जनजाति तथा सबसे कम आबादी राज्यों की रहती है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल एसटी आबादी 2,91,903 है। जुलाई 2001 से राज्य सेवाओं में अनुसूचित जन जातियों को 4% आरक्षण प्राप्त है। उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित प्रश्न विशेष सूचना :- लेख में दिए गए अधिकांश प्रश्न समूह-ग की पुरानी परीक्षाओं में पूछे गए हैं। और कुछ प्रश्न वर्तमान परीक्षाओं को देखते हुए उत्तराखंड की जनजातियों से संबंधित 25+ प्रश्न तैयार किए गए हैं। जो आगामी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। बता दें की उत्तराखंड के 40 प्रश्नों में से 2

Uttrakhand current affairs in Hindi (May 2023)

Uttrakhand current affairs (MAY 2023) देवभूमि उत्तराखंड द्वारा आपको प्रतिमाह के महत्वपूर्ण करेंट अफेयर्स उपलब्ध कराए जाते हैं। जो आगामी परीक्षाओं में शत् प्रतिशत आने की संभावना रखते हैं। विशेषतौर पर किसी भी प्रकार की जॉब करने वाले परीक्षार्थियों के लिए सभी करेंट अफेयर्स महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। उत्तराखंड करेंट अफेयर्स 2023 की पीडीएफ फाइल प्राप्त करने के लिए संपर्क करें।  उत्तराखंड करेंट अफेयर्स 2023 ( मई ) (1) हाल ही में तुंगनाथ मंदिर को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया है। तुंगनाथ मंदिर उत्तराखंड के किस जनपद में स्थित है। (a) चमोली  (b) उत्तरकाशी  (c) रुद्रप्रयाग  (d) पिथौरागढ़  व्याख्या :- तुंगनाथ मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। तुंगनाथ मंदिर समुद्र तल से 3640 मीटर (12800 फीट) की ऊंचाई पर स्थित एशिया का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित शिवालय हैं। उत्तराखंड के पंच केदारों में से तृतीय केदार तुंगनाथ मंदिर का निर्माण कत्यूरी शासकों ने लगभग 8वीं सदी में करवाया था। हाल ही में इस मंदिर को राष्ट्रीय महत्त्व स्मारक घोषित करने के लिए केंद्र सरकार ने 27 मार्च 2023