भारती चंद की अमर गाथा
आज हम इस लेख में चंद राजाओं के बारे में विस्तार से पढ़ने वाले हैं। हालांकि चंद राजवंश केवल उत्तराखंड तक ही सीमित था और बहुत बड़ा साम्राज्य नहीं था लेकिन चंद राजवंश का सम्पूर्ण इतिहास रोचकमय है और यह हमें सिखाता है जिंदगी में उतार चढ़ाव आते हैं लेकिन उस उतार चढ़ाव में संतुलन किस प्रकार स्थापित करना होता है। इतने उतार चढ़ाव के बाद भी चंद राजवंश 700 वर्ष शासन किया।
तीन राजाओं की तिकड़ी
भारती चंद - रत्न चंद - कीर्ति चंद
चंद वंश की स्थापना के 400 साल बीत चुके थे लेकिन चंद शासक फिर भी पूर्ण रूप से आजाद नहीं थे वो अभी डोटी (नेपाल) के राजा को कर दे रहे थे, हालांकि इससे पूर्व 26वें चंद शासक ने थोहर चंद स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया और 31वें चंद शासक गरुड़ ज्ञान चंद ने सोर और सीरा क्षेत्रों को जीत लिया था फिर भी चंद वंश अधीन था डोटी राजाओं के, कितने राजा आए और गये लेकिन किसी ने डोटी पर आक्रमण करने का दुस्साहस नहीं किया। ऐसे में जन्म होता है एक वीर का जिसका नाम भारती चंद होता है और वह चंद वंश का 35वां शासक बनता है और वो डोटी पर आक्रमण करने वाला पहला राजा कहलाता है। उसके बाद उसका पुत्र रत्न चंद और रत्न चंद का पुत्र कीर्ति चंद राजवंश को सर्वोच्च शिखर तक लेकर जाते हैं। उत्तराखंड में एक नयी पहचान दिलाते हैं।
तो दोस्तो आज हम पढ़ने वाले हैं उन तीन राजाओं की कहानी जिसने चंद राजवंश के इतिहास को बदल दिया। जो चंद राजवंश कुमाऊं की पहाड़ियों तक सीमित था अब उसे पूरा नेपाल और गढ़वाल जानने लगा था। वो राजा थे -
भारती चंद — रत्न चंद — कीर्ति चंद
भारती चंद (1437 - 1440 ई.)
कहानी की शुरुआत होती है वर्ष 1437 ई. में। कुमाऊं के चंद वंश की राजधानी चंपावत का राजमहल उदासी और आक्रोश के माहौल में डूबा था। उस समय चंद राजा स्वतंत्र नहीं थे; उन्हें हर साल नेपाल के डोटी (मल्ल) राजाओं को भारी टैक्स (कर) और उपहार भेजने पड़ते थे। जो राजा कर नहीं चुका पाता, डोटी के मल्ल शासक उसे हटा देते या प्रताड़ित करते थे।
इसी घुटन भरे माहौल में भारती चंद का राज्याभिषेक होता है। जब भारती चंद गद्दी पर बैठा, तो उसने परंपरा के अनुसार डोटी के राजा को सिर झुकाने और टैक्स भेजने से साफ मना कर दिया। उसने सिंहासन पर बैठते ही भरे दरबार में तलवार खींचकर प्रतिज्ञा ली:
"जब तक कुमाऊं की धरती से डोटी के राजाओं का जुआ (गुलामी) उतार नहीं फेंकूंगा,
तब तक चैन से नहीं बैठूंगा।"
राजा बनने के बाद भारती चंद का सबसे पहला कार्य राजमहल को सजाना नहीं, बल्कि एक अजेय सेना खड़ी करना था। लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि चंदों की पारंपरिक सेना बहुत छोटी थी। उस दौर में सेना में केवल कुछ खास जातियों के लोग ही होते थे। भारती चंद ने इस नियम को बदल दिया। उसने राज्य के कोने-कोने से खस, राजपूत, शिल्पकार और स्थानीय साहसी युवाओं को बुलाया। उसने घोषणा की कि जो भी देश के लिए लड़ेगा, उसे जागीर दी जाएगी। देखते ही देखते एक विशाल फौज तैयार हो गई, जिसे 'कटक' कहा गया। उसने चंपावत से आगे बढ़कर पिथौरागढ़ के पास 'कटकुनौला' नामक स्थान पर अपना पहला मजबूत सैन्य बेस (शिविर) बनाया, जहां सैनिकों को पहाड़ी और छापामार युद्ध की कड़ी ट्रेनिंग दी गई।
महायुद्ध की शुरुआत – 12 वर्षों का ऐतिहासिक घेरा (1440 - 1451 ई.)
पूरी तैयारी के बाद, भारती चंद ने अपनी सेना के साथ नेपाल (डोटी) की ओर कूच किया। लेकिन डोटी का राजा भी बेहद शक्तिशाली था। उसने अपने विशाल किलों के दरवाजे बंद कर लिए।
यहाँ से शुरू हुआ इतिहास का सबसे लंबा और थका देने वाला सैन्य अभियान—12 वर्षों का घेरा।
हिमालय की गोद में, बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के बीच 12 साल तक टिके रहना कोई आसान काम नहीं था। कई बार सेना के पास खाने की कमी हो जाती, तो भारती चंद खुद सैनिकों के बीच बैठकर साधारण भोजन करता और उनका हौसला बढ़ाता। सालों-साल घर से दूर रहने के कारण सैनिकों में हताशा फैलने लगी थी। इसी दौरान चंद सैनिकों ने स्थानीय महिलाओं से अस्थायी विवाह या संबंध स्थापित किए, जिससे उनका समय और मनोबल बना रहा (इसी से आगे चलकर 'नायक जाति' का जन्म हुआ)। आखिरकार, 12 साल (1451-52 ई.) के लंबे धैर्य और अनगिनत झड़पों के बाद, भारती चंद की सेना ने डोटी के राजा 'जयमल' के किले की दीवारों को तोड़ दिया। डोटी के राजा ने घुटने टेक दिए और कुमाऊं हमेशा के लिए आजाद हो गया।
सीमा विस्तार – पिथौरागढ़ से तिब्बत सीमा तक (1452 - 1465 ई.)
डोटी को हराने के बाद भारती चंद रुका नहीं। उसने अपने पराक्रमी बेटे रत्नचंद को साथ लिया और साम्राज्य विस्तार की कसम खाई।
सोर (पिथौरागढ़) की विजय: सोर क्षेत्र पर उस समय मल्ल राजाओं के सामंत 'बम' राजाओं का राज था। भारती चंद ने वहां आक्रमण किया। बम राजाओं ने कड़ा मुकाबला किया, लेकिन रत्नचंद की चालाकी और भारती चंद के अनुभव के आगे वे टिक नहीं पाए। सोर को सीधे चंद साम्राज्य में मिला लिया गया।
सिरा (डीडीहाट) पर कब्जा: इसके बाद सेना आगे बढ़ी और सिरा क्षेत्र के 'रैका' राजाओं को धूल चटाई।
व्यापारिक मार्गों पर अधिकार: इस जीत का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि तिब्बत (भोट) से होने वाले व्यापार के सारे रास्ते अब भारती चंद के कब्जे में आ गए। जो भोटिया व्यापारी पहले नेपाल को टैक्स देते थे, अब वो चंद राजा के खजाने में सोना और ऊन जमा करने लगे।
जीवन के आखिरी पड़ाव में भारती चंद ने तलवार की जगह कलम और न्याय को थाम लिया। उसने जीते हुए राज्यों को केवल लूटा नहीं, बल्कि उन्हें संभाला:
राजनीतिक व्यवस्था: उसने अपने बेटे रत्नचंद को विजित क्षेत्रों (सोर और सिरा) का मुख्य प्रशासक बनाया, ताकि सीमाएं सुरक्षित रहें।
आर्थिक बहाव: तिब्बत व्यापार से जो पैसा आया, उससे उसने तांबे की खदानें खुदवाईं। प्रजा पर से पुराने युद्ध कर (टैक्स) हटा दिए और केवल कृषि व व्यापार पर न्यूनतम कर रखा।
धार्मिक और सामाजिक ताना-बाना: युद्ध समाप्त होने पर भारती चंद ने उन सभी सैनिकों और जातियों को जमीनें इनाम में दीं (जिन्हें 'रौत' कहा जाता था), जिन्होंने 12 साल के युद्ध में उसका साथ दिया था। उसने बालेश्वर महादेव और थल के शिव मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और भूमि दान की।
वर्ष 1477 ई. के आसपास, एक गुलाम कुमाऊं को एक स्वतंत्र, समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्य में बदलकर, अजेय योद्धा भारती चंद ने राजपाठ अपने योग्य पुत्र रत्नचंद को सौंप दिया और इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। आज भी कुमाऊं के लोकगीतों (पवाड़ों) में उसकी 12 वर्ष की जंग की गाथाएं गाई जाती हैं।
अगर भारती चंद के काल को चंद वंश का "स्वतंत्रता संग्राम" कहा जाए, तो उनके पुत्र रत्न चंद (1477 ई. से 1488 ई.) का काल उस स्वतंत्रता को एक महासाम्राज्य में बदलने की कहानी है। रत्न चंद इतिहास के उन चुनिंदा राजाओं में से थे, जिन्होंने गद्दी पर बैठने से पहले ही अपनी योग्यता साबित कर दी थी। वह चंद वंश के 36वें राजा बने।
रत्न चंद (1450 - 1477 ई.)
रत्न चंद सिर्फ राजा का बेटा नहीं, बल्कि अपने पिता भारती चंद का दायां हाथ और प्रधान सेनापति था। जब भारती चंद ने नेपाल के डोटी राजाओं के खिलाफ 12 वर्षों का ऐतिहासिक मोर्चा खोला, तब रत्न चंद युवा थे।
12 साल लंबे युद्ध के दौरान जब चंपावत से कुमाऊंनी सेना की रसद (खाना-पीना) और नए सैनिकों की सप्लाय रुकने लगी, तब रत्न चंद ने कमान संभाली। उन्होंने न केवल पीछे से रसद की कलाई टूटने नहीं दी, बल्कि सेना का मनोबल बनाए रखा। डोटी के राजा जयमल को अंतिम युद्ध में पीछे हटने पर मजबूर करने वाले मुख्य रणनीतिकार रत्न चंद ही थे।
युवराज के रूप में पहला सैन्य अभियान (सोर और सिरा की विजय)
डोटी से स्वतंत्र होते ही भारती चंद ने रत्न चंद को पिथौरागढ़ (सोर क्षेत्र) की जिम्मेदारी दी। वहां मल्ल राजाओं के सामंत 'बम शाह' राज करते थे। रत्न चंद ने सोर पर हमला किया। बम राजाओं ने पहाड़ी किलों की आड़ लेकर भीषण प्रतिरोध किया, लेकिन रत्न चंद की छापामार रणनीति के आगे वे टिक नहीं पाए और भाग खड़े हुए। इस जीत के बाद भारती चंद ने रत्न चंद को सोर और सिरा का गवर्नर (प्रशासक) घोषित कर दिया।
राज्याभिषेक (वर्ष 1477 ई.)
वर्ष 1477 ई. के आसपास, वृद्ध पिता भारती चंद ने जीवित रहते हुए ही रत्न चंद की वीरता और प्रशासनिक सूझबूझ को देखकर स्वेच्छा से राजपाठ उन्हें सौंप दिया। चंपावत के राजसिंहासन पर बैठते ही रत्न चंद के सामने दो मुख्य चुनौतियां थीं:
जीते हुए नए पहाड़ी क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखना।
नेपाल के उन राजाओं को दोबारा सिर उठाने से रोकना, जो घात लगाए बैठे थे।
राजा बनते ही पहला बड़ा कार्य: 'भू-राजस्व और बंदोबस्त'
गद्दी संभालते ही रत्न चंद ने महसूस किया कि तलवार के बल पर राज्य जीता तो जा सकता है, लेकिन बिना नियमों के उसे संभाला नहीं जा सकता। उन्होंने कुमाऊं के इतिहास में पहली बार विजित क्षेत्रों का व्यवस्थित भूमि बंदोबस्त (Land Settlement) करवाया। उन्होंने हर गांव की सीमाएं तय कीं और यह निश्चित किया कि किस क्षेत्र से राजा को कितना कर (राजस्व) मिलेगा। इसके लिए जिंदा केतल नामक भूमि बंदोबस्त अधिकारी की नियुक्ति भी की।
सीमा विस्तार (1478 - 1485 ई.)
रत्न चंद का स्वभाव शांत बैठने का नहीं था। उन्होंने चंद साम्राज्य की सीमाओं को चारों दिशाओं में फैलाना शुरू किया:
1. नागमल्ल (नेपाल) की पराजय
डोटी के राजा तो हार चुके थे, लेकिन नेपाल के पश्चिमी हिस्से में 'जुमला' का राजा बहुत शक्तिशाली था। वह लगातार कुमाऊं के सीमावर्ती गांवों को लूट रहा था। रत्न चंद ने जुमला पर कड़ा सैन्य आक्रमण किया। दुर्गम घाटियों और बर्फीले रास्तों को पार करते हुए चंद सेना ने जुमला के राजा नागमल्ल को उनके ही क्षेत्र में घेरा। अंततः जुमला के राजा नागमल्ल ने रत्न चंद की अधीनता स्वीकार की और सालाना कर देना मंजूर किया।
2. दुगने विस्तार के साथ सीरा और जोहार पर पूर्ण नियंत्रण
सिरा (डीडीहाट) के रैका राजा फिर से विद्रोह करने की कोशिश कर रहे थे। रत्न चंद ने वहां दोबारा सेना भेजी और विद्रोहियों का पूरी तरह दमन कर दिया। इसके बाद वे और उत्तर की ओर बढ़े तथा 'भोट' (तिब्बत सीमा) और जोहार घाटी के स्थानीय सरदारों को हराकर उन्हें कुमाऊं के सीधे नियंत्रण में ले लिया।
3. थल पर विजय
रत्न चंद ने थल के राजा सूर सिंह को परास्त कर साम्राज्य का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लगभग 11 वर्षों के अपने कुशल और प्रतापी शासन के बाद, वर्ष 1488 ई. के आसपास रत्न चंद का देहांत हो गया।
कीर्ति चंद (1488 ई. से 1506 ई.)
यदि दादा भारती चंद ने कुमाऊं को गुलामी से "आजाद" कराया और पिता रत्न चंद ने उसे "व्यवस्थित" किया, तो कीर्ति चंद (1488 ई. से 1503 ई.) वह राजा था जिसने चंद वंश को एक आक्रामक, साम्राज्यवादी महाशक्ति बना दिया। वह चंद वंश का 37वां राजा था।
इतिहासकार बद्री दत्त पांडे के अनुसार, कीर्ति चंद के भीतर एक ऐसी बेचैनी थी जो उसे एक जगह शांत बैठने नहीं देती थी। वर्ष 1488 ई. में पिता रत्न चंद की मृत्यु के बाद कीर्ति चंद चंपावत की गद्दी पर बैठा। गद्दी संभालते ही उसने चारों तरफ देखा—पिता और दादा ने उत्तर और पूर्व (नेपाल और पिथौरागढ़ सीमा) को तो पूरी तरह सुरक्षित कर दिया था, लेकिन कुमाऊं का पश्चिमी और मध्य हिस्सा (अल्मोड़ा, बाराहमंडल, पाली पछाऊँ) अभी भी कत्यूरी राजवंश के छोटे-छोटे राजाओं और ठाकुरों के कब्जे में था, जिन्हें 'खसिया राजा' कहा जाता था।
कीर्ति चंद ने राजमहल के आराम को छोड़कर तुरंत अपनी सेना को कूच करने का आदेश दिया। उसका पहला लक्ष्य था—कुमाऊं के हृदय स्थल (अल्मोड़ा और उसके आस-पास) पर पूर्ण विजय पाना।
कत्यूरी ठाकुरों का दमन और गढ़वाल से पहला महायुद्ध (1489 - 1492 ई.)
कीर्ति चंद चंपावत से अपनी विशाल सेना लेकर उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ा। रास्ते में उसे भौगोलिक और सामरिक, दोनों चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
बाराहमंडल और फल्दाकोट की विजय: अल्मोड़ा के पास के इन क्षेत्रों पर कत्यूरियों के शक्तिशाली सामंत राज कर रहे थे। कीर्ति चंद ने एक-एक करके इन सभी छोटे किलों को घेरा और वहां के स्थानीय राजाओं को मार भगाया।
अल्मोड़ा की पहाड़ियों पर पहला कदम: हालांकि आधिकारिक रूप से अल्मोड़ा को राजधानी बाद में राजा कल्याण चंद और बालो कल्याण चंद ने बनाया, लेकिन अल्मोड़ा की इस रणनीतिक पहाड़ी पर सबसे पहले अधिकार करने वाला और वहां एक छोटा किला व 'कीर्तिचंदेश्वर मंदिर' बनाने वाला राजा कीर्ति चंद ही था।
गढ़वाल राज से ऐतिहासिक टकराव (गंगोली और बधानगढ़ का युद्ध)
अपनी सीमाओं को बढ़ाते हुए कीर्ति चंद की सेना गढ़वाल राज्य की सीमा के करीब पहुंच गई। उस समय गढ़वाल पर पंवार (परमार) वंश के प्रतापी राजा अजय पाल का शासन था (जिन्होंने गढ़वाल के 52 गढ़ों को जीता था)। गढ़वाल और कुमाऊं के इन दो महाविजेताओं की सेनाएं बंधाणगढ़ के मैदान में टकराईं। यह युद्ध बेहद भीषण था। पहली बार चंद सेना को अपने बराबर की टक्कर मिली थी। शुरुआती झटकों के बाद, कीर्ति चंद की आक्रामक युद्ध नीति के आगे अजय पाल की सेना को पीछे हटना पड़ा। कीर्ति चंद ने गढ़वाल के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। इस हार से आहत होकर ही गढ़वाल के राजा अजय पाल ने बाद में अपनी राजधानी को चांदपुर गढ़ से श्रीनगर (गढ़वाल) स्थानांतरित कर लिया था ताकि कुमाऊं के हमलों से बचा जा सके।
तराई-भाबर की फतह और नागनाथ की जंग (1493 - 1498 ई.)
पहाड़ों को अपनी मुट्ठी में करने के बाद कीर्ति चंद ने दक्षिण की ओर नजर दौड़ाई—यानी तराई और भाबर का इलाका (आज का उधम सिंह नगर और हल्द्वानी का मैदानी क्षेत्र)। तराई के घने जंगलों में मलेरिया जैसी बीमारियां और जंगली जानवरों का आतंक सबसे बड़ी मुश्किल थी। इसके अलावा, मैदानों में स्थानीय लुटेरे और छोटे नवाब सक्रिय थे। कीर्ति चंद ने अपनी सेना को मैदानी युद्ध के लिए तैयार किया। उसने तराई के समृद्ध इलाकों को जीतकर सीधे चंपावत के नियंत्रण में ला दिया। इससे चंद साम्राज्य को खेती के लिए बेहद उपजाऊ जमीन मिल गई।
कीर्ति चंद के साम्राज्य की बहुआयामी व्यवस्थाएं
कीर्ति चंद केवल तलवार चलाना नहीं जानता था, बल्कि उसने साम्राज्य को आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से भी मजबूत किया:
अ. प्रशासनिक व सैन्य व्यवस्था
किलेबंदी (Fortification): उसने जितने भी नए क्षेत्र जीते (जैसे फल्दाकोट, नैथना), वहां मजबूत किलों का निर्माण कराया और वहां स्थायी चौकियां स्थापित कीं ताकि गढ़वाल या स्थानीय विद्रोही दोबारा हमला न कर सकें।
सख्त केंद्रीय नियंत्रण: उसने कत्यूरी काल के सामंतों को पूरी तरह उखाड़ फेंका और शासन की बागडोर सीधे चंपावत दरबार से जुड़े वफादार अधिकारियों के हाथ में दे दी।
ब. आर्थिक व्यवस्था
तराई से राजस्व का बहाव: तराई-भाबर के मैदानी इलाकों को जीतने से चंद साम्राज्य को भारी मात्रा में अनाज और राजस्व (टैक्स) मिलने लगा। पहाड़ों की कंगाली अब तराई की समृद्धि से दूर होने लगी थी।
व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा: पहाड़ों से मैदानों की ओर जाने वाले सभी 'दर्रों' (घाटियों के रास्तों) पर टैक्स वसूलने के लिए चौकियां बनाई गईं।
स. धार्मिक और सामाजिक प्रभाव (नाथ संप्रदाय का आगमन)
कीर्ति चंद के जीवन का एक बहुत ही रोचक धार्मिक पहलू है। उसके शासनकाल में कुमाऊं में नाथ संप्रदाय (गोरखनाथ पंथ) का गहरा प्रभाव पड़ा।
- गुरु पीरनाथ से दीक्षा: लोककथाओं और ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, कीर्ति चंद नाथ पंथ के योगी 'पीरनाथ' (या नागनाथ) के संपर्क में आया और उनका शिष्य बन गया।
- धार्मिक सहिष्णुता: यद्यपि वह स्वयं शिव भक्त था, लेकिन उसने नाथ संप्रदाय के योगियों को राज्य में मठ बनाने के लिए बड़ी मात्रा में गूंठ (कर-मुक्त भूमि) दान में दी।
वर्ष 1503 ई. के आसपास, मात्र 15 वर्षों के एक बेहद आक्रामक और सफल शासन के बाद कीर्ति चंद का देहांत हो गया। कीर्ति चंद की कहानी एक ऐसे शासक की है जिसने चंद वंश को चंपावत की तंग घाटियों से बाहर निकालकर पूरे कुमाऊं और गढ़वाल की सीमाओं तक फैला दिया। यदि वह अजय पाल को न हराता और मध्य कुमाऊं को न जीतता, तो चंद वंश कभी भी अल्मोड़ा जैसी विशाल राजधानी बनाने का सपना नहीं देख पाता। उसके बाद उसका पुत्र प्रताप चंद गद्दी पर बैठा।
महत्वपूर्ण तथ्य व चंद वंश की जानकारी के स्रोत
- हुड़ेती ताम्रपत्र - के अनुसार भारती चंद ने 1451 में एक गांव दान देने का वर्णन मिलता है और इसी ताम्रपत्र में भारती चंद के पुत्र रत्न चंद का भी उल्लेख मिलता है। इसके अलावा लोहाघाट ताम्रपत्र में भी रत्न चंद का उल्लेख है।
- खेतीखान ताम्रपत्र - में भारती चंद के दूसरे पुत्र सुजान कुंवर का उल्लेख मिलता है।
- मझेड़ा ताम्रपत्र - मल्ल वंश के शासक या फिर सामंत बमशाह और विजयबम का उल्लेख मिलता है।
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