सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पर्वतों के निर्माण (Geography Notes - part 06)

पर्वतों के निर्माण  प्रस्तावना "पर्वत हमारी पृथ्वी की सबसे भव्य और प्रभावशाली संरचनाओं में से एक हैं। ये न केवल हमारे भूगोल को तय करते हैं, बल्कि मौसम से लेकर हमारी नदियों तक सब कुछ बदलते हैं। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे की कहानी उतनी ही जटिल और दिलचस्प है। इस अध्याय में हम बेहद आसान भाषा में समझेंगे कि प्लेटों के टकराने, ज़मीन के फटने और ज्वालामुखी के विस्फोट से इन पर्वतों का जन्म कैसे होता है।" पर्वतों के निर्माण पर्वतों के निर्माण का मुख्य आधार टेक्टोनिक प्लेटों की गति है। हमारी पृथ्वी का सबसे ऊपरी हिस्सा (स्थलमंडल) कई टुकड़ों में टूटा हुआ है जिन्हें 'टेक्टोनिक प्लेट्स' कहते हैं। ये प्लेटें मेंटल की अर्ध-तरल परत (एस्थेनोस्फीयर) पर बहुत धीमी गति (सालाना 1 से 10 सेमी) से खिसकती रहती हैं। जब ये प्लेटें एक-दूसरे की ओर बढ़ती हैं, दूर जाती हैं या आपस में रगड़ खाती हैं, तो पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) पर भीषण तनाव और दबाव बनता है। इसी हलचल के कारण ज़मीन का हिस्सा या तो ऊपर उठ जाता है या फिर ज्वालामुखी के मैग्मा के जमाव से पहाड़ का रूप ले लेता है। पर्वतों के मुख्य प्रकार पर्...

कोठारी आयोग : शिक्षा का एक ऐतिहासिक दस्तावेज

कोठारी आयोग : शिक्षा का एक ऐतिहासिक दस्तावेज

1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) से पूर्व, भारत की शिक्षा व्यवस्था औपनिवेशिक प्रभावों और व्यापक असमानताओं से ग्रस्त थी। 1854 की "वुड्स शिक्षा प्रणाली" ने औपनिवेशिक शिक्षा का आधार तैयार किया, जिसमें अंग्रेजी भाषा, पश्चिमी ज्ञान और रटने पर अत्यधिक ज़ोर दिया गया। उच्च शिक्षा को प्राथमिकता दी गई, जबकि प्राथमिक शिक्षा उपेक्षित रही। शिक्षा का उद्देश्य भारतीयों को ब्रिटिश शासन में सहायक बनाना था।

इस प्रणाली ने विभिन्न प्रकार के विद्यालयों (सरकारी, मिशनरी, निजी) में शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता में भारी असमानताएं पैदा कीं। जाति, लिंग और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव व्याप्त था। लड़कियों और महिलाओं के लिए शिक्षा तक पहुंच अत्यंत सीमित थी। उस समय पाठ्यक्रम में सैद्धांतिक ज्ञान और रटने पर ज़ोर दिया गया था, जबकि व्यावहारिक शिक्षा और कौशल विकास को नजरअंदाज किया गया था। शिक्षा का मूल्यांकन मुख्य रूप से परीक्षाओं पर आधारित था, जिसके कारण रटने और परीक्षा में सफल होने पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया गया। 

स्वतंत्रता के पश्चात भारत में शिक्षा 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, भारत सरकार ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का आधार स्तंभ माना और शिक्षा व्यवस्था में अनेक महत्वपूर्ण बदलाव किए गए। इन परिवर्तनों का उद्देश्य शिक्षा को अधिक सुलभ, न्यायसंगत और प्रासंगिक बनाना था।

स्वतंत्रता के पश्चात 1948 भारत में उच्च शिक्षा में सुधार के लिए डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में "विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग" का गठन किया गया। इस आयोग ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे "राधाकृष्णन आयोग रिपोर्ट" के नाम से जाना गया। तथा माध्यमिक शिक्षा में सुधार हेतु 23 सितंबर 1952 को शिक्षाविद् डॉ. लक्ष्मणस्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में 'माध्यमिक शिक्षा आयोग' की स्थापना की। जिसे मुदालियर आयोग भी कहा गया।

कोठारी आयोग की स्थापना

भारत सरकार ने 14 जुलाई 1964 को शिक्षा प्रणाली का आकलन करने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार करने के लिए "डॉ. दौलत सिंह कोठारी" की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया। इसे 'कोठारी आयोग' के नाम से जाना जाता है। 

मुख्य उद्देश्य :

इस आयोग का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्र भारत की शिक्षा प्रणाली का मूल्यांकन करना और सभी स्तरों पर शिक्षा के विकास के लिए राष्ट्रीय नीति और सिद्धांतों की सिफारिश करना था। यह रिपोर्ट शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है और आज भी भारतीय शिक्षा नीति पर चर्चा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार लाना।
  • शिक्षा को जीवन, आवश्यकताओं और लोगों की आकांक्षाओं से जोड़ना।
  • सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए शिक्षा को एक शक्तिशाली उपकरण बनाना।

आयोग के सुझाव व सिफारिशें

 'आयोग' ने शिक्षा के सभी अंगों के विषय में अपने विचार व्यक्त किये अंग निम्नलिखित है- है। इनमें से महत्त्वपूर्ण

1. शिक्षा एवं राष्ट्रीय लक्ष्य 
  • शिक्षा द्वारा उत्पादन में वृद्धि करना 
  • शिक्षा द्वारा सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास करना।
  • शिक्षा द्वारा लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाना 
  • शिक्षा द्वारा आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तीव्रता लाना।
  • शिक्षा द्वारा सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करके चरित्र का निर्माण करना 
2. शिक्षा की संरचना एवं स्तर 

3. अध्यापक की स्थिति

4. अध्यापक शिक्षा

5. छात्र संख्या एवं जनबल 

6. शैक्षिक अवसरों की समानता

7. विद्यालय शिक्षा का विस्तार 

8. विद्यालय पाठ्यक्रम

9. शिक्षण-विधियों, निर्देशन एवं मूल्यांकन

10. उच्च शिक्षा

11. स्त्री शिक्षा

12. वयस्क शिक्षा

13. विज्ञान की शिक्षा

14. कृषि की शिक्षा

15. व्यावसायिक, प्राविधिक एवं इंजीनियरिंग की शिक्षा 

शिक्षा की संरचना व स्तर 

आयोग ने शिक्षा की नवीन संरचना अर्थात् ढाँचे और शिक्षा स्तरों के उन्नयन के सम्बन्ध में विचार अभिव्यक्त किये हैं, हम उनका वर्णन निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत कर रहे सम्बन्ध

(1) विद्यालय शिक्षा की नवीन संरचना - 'आयोग' ने सामान्य शिक्षा के प्रचलित स्वरूप को ध्यान में रखते हुए, इस शिक्षा की नवीन संरचना को इस प्रस्तुत किया है-
  • 10 वर्ष की सामान्य शिक्षा
  • 2 या 3 वर्ष की उच्चतर माध्यमिक शिक्षा
  • 2 या 3 वर्ष की निम्न माध्यमिक शिक्षा
  • 3 वर्ष की उच्च प्राथमिक शिक्षा
  • 4 या 5 वर्ष की निम्न प्राथमिक शिक्षा
  • 1 से 3 वर्ष की पूर्व-विद्यालय शिक्षा
कोठारी आयोग की शिक्षा प्रणाली का 10+2+3 पैटर्न पर आधारित थी। जिसमें प्राथमिक शिक्षा (1-5), माध्यमिक शिक्षा (6-8), उच्च माध्यमिक शिक्षा (9-10), स्नातक शिक्षा (3 वर्ष) 
और स्नातकोत्तर शिक्षा (2 वर्ष) थी 

कोठारी आयोग का प्रभाव 

  • कार्यात्मक शिक्षा : कोठारी आयोग ने शिक्षा को जीवनोपयोगी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने सिफारिश की कि स्कूली शिक्षा में व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा को शामिल किया जाए। ताकि छात्रों को रोजगार के लिए तैयार किया जा सके। इस सिफारिश के परिणामस्वरूप, भारत में कई व्यावसायिक और तकनीकी स्कूल और कॉलेज स्थापित किए गए।
  • व्यावसायिक शिक्षा : कोठारी आयोग ने रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने की सिफारिश की। उन्होंने सिफारिश की कि सरकार व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए अधिक संसाधन आवंटित करे। इस सिफारिश के परिणामस्वरूप, भारत में कई सरकारी और गैर-सरकारी व्यावसायिक शिक्षा संस्थान स्थापित किए गए।
  • शिक्षा में समानता : कोठारी आयोग ने लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय और समान अवसरों पर ध्यान केंद्रित करते हुए शिक्षा में समानता लाने पर जोर दिया। उन्होंने लड़कियों और वंचित वर्गों के लिए शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के लिए कई सिफारिशें कीं। इन सिफारिशों के परिणामस्वरूप, लड़कियों और वंचित वर्गों के शिक्षा में नामांकन दर में वृद्धि हुई।
  • शिक्षकों का प्रशिक्षण और कल्याण : कोठारी आयोग ने शिक्षकों के बेहतर प्रशिक्षण और सेवा शर्तों के लिए सिफारिशें कीं। उन्होंने शिक्षकों को अधिक पेशेवर और सम्मानित बनाने के लिए कई उपाय किए। इन सिफारिशों के परिणामस्वरूप, भारत में शिक्षकों के प्रशिक्षण और कल्याण में सुधार हुआ।
  • शिक्षा का विकेंद्रीकरण : कोठारी आयोग ने शिक्षा प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने के लिए शिक्षा का विकेंद्रीकरण करने की सिफारिश की। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए कई उपाय किए।इन सिफारिशों के परिणामस्वरूप, भारत में शिक्षा प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भूमिका बढ़ी।
  • शिक्षा का वित्तपोषण : कोठारी आयोग ने शिक्षा के लिए अधिक संसाधन जुटाने की सिफारिश की। उन्होंने शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाने और शिक्षा के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए कई उपाय किए 

संविधान के साथ संबंध

शिक्षा का मौलिक अधिकार : भारत के संविधान का अनुच्छेद 21A 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। कोठारी आयोग ने इस अधिकार को लागू करने के लिए कई सिफारिशें कीं, जिनमें शामिल हैं:
  • प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने के लिए ठोस कदम उठाना।
  • शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना।
  • शिक्षकों के प्रशिक्षण और कल्याण में सुधार करना।
समानता का अधिकार : संविधान का अनुच्छेद 14 और 15 शिक्षा में समानता का अधिकार प्रदान करता है। कोठारी आयोग ने सभी नागरिकों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सिफारिशें कीं।

धर्मनिरपेक्षता : संविधान का अनुच्छेद 25 धर्मनिरपेक्षता की गारंटी देता है। कोठारी आयोग ने धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए सिफारिशें कीं, जिसमें सभी धर्मों का सम्मान करते हुए नैतिक और सामाजिक मूल्यों को बढ़ावा देना शामिल है।

कोठारी आयोग की सिफारिशों का प्रभाव 

कोठारी आयोग की सिफारिशों का भारतीय शिक्षा प्रणाली पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इन सिफारिशों ने 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति और बाद की शिक्षा नीतियों को आकार देने में मदद की। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्तराखंड में भूमि बंदोबस्त का इतिहास

  भूमि बंदोबस्त व्यवस्था         उत्तराखंड का इतिहास भूमि बंदोबस्त आवश्यकता क्यों ? जब देश में उद्योगों का विकास नहीं हुआ था तो समस्त अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर थी। उस समय राजा को सर्वाधिक कर की प्राप्ति कृषि से होती थी। अतः भू राजस्व आय प्राप्त करने के लिए भूमि बंदोबस्त व्यवस्था लागू की जाती थी । दरअसल जब भी कोई राजवंश का अंत होता है तब एक नया राजवंश नयी बंदोबस्ती लाता है।  हालांकि ब्रिटिश शासन से पहले सभी शासकों ने मनुस्मृति में उल्लेखित भूमि बंदोबस्त व्यवस्था का प्रयोग किया था । ब्रिटिश काल के प्रारंभिक समय में पहला भूमि बंदोबस्त 1815 में लाया गया। तब से लेकर अब तक कुल 12 भूमि बंदोबस्त उत्तराखंड में हो चुके हैं। हालांकि गोरखाओ द्वारा सन 1812 में भी भूमि बंदोबस्त का कार्य किया गया था। लेकिन गोरखाओं द्वारा लागू बन्दोबस्त को अंग्रेजों ने स्वीकार नहीं किया। ब्रिटिश काल में भूमि को कुमाऊं में थात कहा जाता था। और कृषक को थातवान कहा जाता था। जहां पूरे भारत में स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी बंदोबस्त और महालवाड़ी बंदोबस्त व्यवस्था लागू थी। वही ब्रिटिश अधिकारियों ...

परमार वंश - उत्तराखंड का इतिहास (भाग -1)

उत्तराखंड का इतिहास History of Uttarakhand भाग -1 परमार वंश का इतिहास उत्तराखंड में सर्वाधिक विवादित और मतभेद पूर्ण रहा है। जो परमार वंश के इतिहास को कठिन बनाता है परंतु विभिन्न इतिहासकारों की पुस्तकों का गहन विश्लेषण करके तथा पुस्तक उत्तराखंड का राजनैतिक इतिहास (अजय रावत) को मुख्य आधार मानकर परमार वंश के संपूर्ण नोट्स प्रस्तुत लेख में तैयार किए गए हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में 688 ईसवी से 1947 ईसवी तक शासकों ने शासन किया है (बैकेट के अनुसार)।  गढ़वाल में परमार वंश का शासन सबसे अधिक रहा।   जिसमें लगभग 12 शासकों का अध्ययन विस्तारपूर्वक दो भागों में विभाजित करके करेंगे और अंत में लेख से संबंधित प्रश्नों का भी अध्ययन करेंगे। परमार वंश (गढ़वाल मंडल) (भाग -1) छठी सदी में हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात संपूर्ण उत्तर भारत में भारी उथल-पुथल हुई । देश में कहीं भी कोई बड़ी महाशक्ति नहीं बची थी । जो सभी प्रांतों पर नियंत्रण स्थापित कर सके। बड़े-बड़े जनपदों के साथ छोटे-छोटे प्रांत भी स्वतंत्रता की घोषणा करने लगे। कन्नौज से सुदूर उत्तर में स्थित उत्तराखंड की पहाड़ियों में भी कुछ ऐसा ही...

उत्तराखंड का इतिहास : चंद राजवंश (भाग-2)

  उत्तराखंड का इतिहास चंद राजवंश का इतिहास (भाग-२) विस्तार से चंद राजा कन्नौज के शासकों के वंशज थे । जो महमूद गजनवी के आक्रमण के समय कुर्मांचल में प्रविष्ट हुए थे। उस समय कुर्मांचल में ब्रह्मदेव का शासन था। ब्रह्मदेव कत्यूर वंश का अंतिम सम्राट था। 10 वीं शताब्दी में लोहाघाट के आसपास सुई राज्य था। सुई राज्य पर ब्रह्मदेव शासन कर रहा था। *इतिहासकार श्यामलाल, एटकिंसन, वाल्टन व बद्रीदत्त पांडे के अनुसार चंद शासक इलाहाबाद के निकट झूंसी से आया था। चंद राजवंश का उदय चंद वंश के संस्थापक - (1) सोमचंद (1025-1046 ईसवी) 1025 ईस्वी के आसपास सोमचंद ने चंपावत में अपनी राजधानी स्थापित की। इतिहासकार श्यामलाल के अनुसार सोमचंद इलाहाबाद के निकट झूंसी से आया था। कुमाऊं में सोमचंद के आने की अनेक कहानियां है । परीक्षाओं की दृष्टि से यह मान सकते हैं कि सोमचंद 11 वीं सदी के आरंभ में बद्रीनाथ की यात्रा पर आया था। संयोगवश उसकी मुलाकात कत्यूरी नरेश ब्रह्मदेव से हो जाती है। ब्रह्मदेव सोमचंद की राजोचित, योग्यता, रूप-रंग व व्यक्तित्व को देखकर अत्यधिक प्रभावित हो जाता है। और अपनी एकलौती पुत्री चंपा का विवाह सोमचंद...

कुणिंद वंश का इतिहास (1500 ईसा पूर्व - 300 ईसवी)

कुणिंद वंश का इतिहास   History of Kunid dynasty   (1500 ईसा पूर्व - 300 ईसवी)  उत्तराखंड का इतिहास उत्तराखंड मूलतः एक घने जंगल और ऊंची ऊंची चोटी वाले पहाड़ों का क्षेत्र था। इसका अधिकांश भाग बिहड़, विरान, जंगलों से भरा हुआ था। इसीलिए यहां किसी स्थाई राज्य के स्थापित होने की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है। थोड़े बहुत सिक्कों, अभिलेखों व साहित्यक स्रोत के आधार पर इसके प्राचीन इतिहास के सूत्रों को जोड़ा गया है । अर्थात कुणिंद वंश के इतिहास में क्रमबद्धता का अभाव है।               सूत्रों के मुताबिक कुणिंद राजवंश उत्तराखंड में शासन करने वाला प्रथम प्राचीन राजवंश है । जिसका प्रारंभिक समय ॠग्वैदिक काल से माना जाता है। रामायण के किस्किंधा कांड में कुणिंदों की जानकारी मिलती है और विष्णु पुराण में कुणिंद को कुणिंद पल्यकस्य कहा गया है। कुणिंद राजवंश के साक्ष्य के रूप में अभी तक 5 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। जिसमें से एक मथुरा और 4 भरहूत से प्राप्त हुए हैं। वर्तमान समय में मथुरा उत्तर प्रदेश में स्थित है। जबकि भरहूत मध्यप्रदेश में है। कुणिंद वंश का ...

ब्रिटिश कुमाऊं कमिश्नर : उत्तराखंड

ब्रिटिश कुमाऊं कमिश्नर उत्तराखंड 1815 में गोरखों को पराजित करने के पश्चात उत्तराखंड में ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से ब्रिटिश शासन प्रारंभ हुआ। उत्तराखंड में अंग्रेजों की विजय के बाद कुमाऊं पर ब्रिटिश सरकार का शासन स्थापित हो गया और गढ़वाल मंडल को दो भागों में विभाजित किया गया। ब्रिटिश गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल। अंग्रेजों ने अलकनंदा नदी का पश्चिमी भू-भाग पर परमार वंश के 55वें शासक सुदर्शन शाह को दे दिया। जहां सुदर्शन शाह ने टिहरी को नई राजधानी बनाकर टिहरी वंश की स्थापना की । वहीं दूसरी तरफ अलकनंदा नदी के पूर्वी भू-भाग पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। जिसे अंग्रेजों ने ब्रिटिश गढ़वाल नाम दिया। उत्तराखंड में ब्रिटिश शासन - 1815 ब्रिटिश सरकार कुमाऊं के भू-राजनीतिक महत्व को देखते हुए 1815 में कुमाऊं पर गैर-विनियमित क्षेत्र के रूप में शासन स्थापित किया अर्थात इस क्षेत्र में बंगाल प्रेसिडेंसी के अधिनियम पूर्ण रुप से लागू नहीं किए गए। कुछ को आंशिक रूप से प्रभावी किया गया तथा लेकिन अधिकांश नियम स्थानीय अधिकारियों को अपनी सुविधानुसार प्रभावी करने की अनुमति दी गई। गैर-विनियमित प्रांतों के जिला प्रमु...

भारत की जनगणना 2011 से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न (भाग -01)

भारत की जनगणना 2011 मित्रों वर्तमान परीक्षाओं को पास करने के लिए रखने से बात नहीं बनेगी अब चाहे वह इतिहास भूगोल हो या हमारे भारत की जनगणना हो अगर हम रटते हैं तो बहुत सारे तथ्यों को रटना पड़ेगा जिनको याद रखना संभव नहीं है कोशिश कीजिए समझ लीजिए और एक दूसरे से रिलेट कीजिए। आज हम 2011 की जनगणना के सभी तथ्यों को समझाने की कोशिश करेंगे। यहां प्रत्येक बिन्दु का भौगोलिक कारण उल्लेख करना संभव नहीं है। इसलिए जब आप भारत की जनगणना के नोट्स तैयार करें तो भौगोलिक कारणों पर विचार अवश्य करें जैसे अगर किसी की जनसंख्या अधिक है तो क्यों है ?, अगर किसी की साक्षरता दर अधिक है तो क्यों है? अगर आप इस तरह करेंगे तो शत-प्रतिशत है कि आप लंबे समय तक इन चीजों को याद रख पाएंगे साथ ही उनसे संबंधित अन्य तथ्य को भी आपको याद रख सकेंगे ।  भारत की जनगणना (भाग -01) वर्ष 2011 में भारत की 15वीं जनगणना की गई थी। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत का कुल क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किलोमीटर था तथा भारत की कुल आबादी 121,08,54,922 (121 करोड़) थी। जिसमें पुरुषों की जनसंख्या 62.32 करोड़ एवं महिलाओं की 51.47 करोड़ थी। जनसंख्या की दृष...

Uttarakhand Current Affairs 2025

उत्तराखंड करेंट अफेयर्स 2025 नवंबर 2025 से अप्रैल 2025 तक जैसा कि आप सभी जानते हैं देवभूमि उत्तराखंड प्रत्येक मा उत्तराखंड के विशेष करंट अफेयर्स उपलब्ध कराता है। किंतु पिछले 6 माह में व्यक्तिगत कारणों के कारण करेंट अफेयर्स उपलब्ध कराने में असमर्थ रहा। अतः उत्तराखंड की सभी आगामी परीक्षाओं को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि नवंबर 2024 से अप्रैल 2025 तक के सभी करेंट अफेयर्स चार भागों में विभाजित करके अप्रैल के अन्त तक उपलब्ध कराए जाएंगे। जिसमें उत्तराखंड बजट 2025-26 और भारत का बजट 2025-26 शामिल होगा। अतः सभी करेंट अफेयर्स प्राप्त करने के लिए टेलीग्राम चैनल से अवश्य जुड़े। 956816280 पर संपर्क करें। उत्तराखंड करेंट अफेयर्स (भाग - 01) (1) 38वें राष्ट्रीय खेलों का आयोजन कहां किया गया ? (a) उत्तर प्रदेश  (b) हरियाणा (c) झारखंड  (d) उत्तराखंड व्याख्या :- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 जनवरी 2025 को राजीव गाँधी अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम रायपुर देहरादून, उत्तराखंड में 38वें ग्रीष्मकालीन राष्ट्रीय खेलों का उद्घाटन किया। उत्तराखंड पहली बार ग्रीष्मकालीन राष्ट्रीय खेलों की मेजबानी की और य...